श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

37 पद्य

श्रीरामचरितमानस

अस बिबेक जब देइ बिधाता । तब तजि दोष गुनहिं मनु राता ॥

काल सुभाउ करम बरिआईं । भलेउ प्रकृति बस चुकड़ भलाई ॥

विधाता जब इस प्रकारका (हंसका-सा) विवेक देते हैं, तब दोषोंको छोड़कर मन गुणोंमें अनुरक्त होता है । काल-स्वभाव और कर्मकी प्रबलतासे भले लोग (साधु) भी मायाके वशमें होकर कभी-कभी भलाईसे चूक जाते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 7(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 28 वैराग्य
ईश्वरीय विधान की स्वीकार्यता

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥

अस कहि लगे जपन हरिनामा । गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥

जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा । तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे । [मनमें] ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुखके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ।

सतीजी को राम की परीक्षा लेने से रोक न पाकर शिवजी ने मन ही मन ऐसा कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 52.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 75 शरणागति भक्ति
भाग्य का स्वीकार

करम लिखा जौं बाउर नाहू । तौ कत दोसु लगाइअ काहू ॥

तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका । मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका ॥

जो मेरे भाग्यमें बावला ही पति लिखा है तो किसीको क्यों दोष लगाया जाय? हे माता! क्या विधाताके अङ्क तुमसे मिट सकते हैं? वृथा कलङ्कका टीका मत लो ।

पार्वतीजी ने माता को विवेकयुक्त कोमल वाणी में कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 97.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 113

जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं ॥

दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं ॥

सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं ॥

बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं ॥

हे माता! कलङ्क मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करनेका नहीं है । मेरे भाग्यमें जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी! पार्वतीजीके ऐसे विनयभरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और भाँति-भाँतिसे विधाताको दोष देकर आँखोंसे आँसू बहाने लगीं ।

बालकाण्ड, छन्द (97 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 113

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी । सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी ॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ॥

और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति [दिव्य] शरीर धारण कर सज्जनोंकी पीड़ा हरते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 121.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 135 लीला–रहस्य
श्रीराम की इच्छा

राम कीन्ह चहहिं सोइ होई । करै अन्यथा अस नहिं कोई ॥

संभु बचन मुनि मन नहिं भाए । तब बिरंचि के लोक सिधाए ॥

श्रीरामचन्द्रजी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके । श्रीशिवजीके वचन नारदजीके मनको अच्छे नहीं लगे, तब वे वहाँसे ब्रह्मलोकको चल दिये ।

नारदजी ने शिवजी को कामदेव का चरित्र सुनाया, तब शिवजी ने उन्हें शिक्षा दी।

बालकाण्ड, चौपाई 128.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 141

भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर ॥

किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर ॥

हे राजन्! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनहार नहीं मिटता । ब्राह्मणोंका शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता ।

बालकाण्ड, दोहा 174 श्रीरामचरितमानस पृ. 178
परमेश्वर की महिमा

रघुपति बिमुख जतन कर कोरी । कवन सकइ भव बंधन छोरी ॥

जीव चराचर बस कै राखे । सो माया प्रभु सों भय भाखे ॥

श्रीरघुनाथजीसे विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसारबन्धन कौन छुड़ा सकता है । जिसने सब चराचर जीवोंको अपने वशमें कर रखा है, वह माया भी प्रभुसे भय खाती है ।

बालकाण्ड, चौपाई 200.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 201 माया–संसार
समय का महत्त्व

का बरषा सब कृषी सुखानें । समय चुकें पुनि का पछितानें ॥

अस जियँ जानि जानकी देखी । प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी ॥

सारी खेतीके सूख जानेपर वर्षा किस कामकी? समय बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या लाभ? जीमें ऐसा समझकर श्रीरामजीने जानकीजीकी ओर देखा और उनका विशेष प्रेम लखकर वे पुलकित हो गये ।

श्रीरामजी ने जानकीजी को विशेष व्याकुल देखा।

बालकाण्ड, चौपाई 261.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 254
कर्म और सुख-दुःख

बिसमय हरष रहित रघुराऊ । तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ ॥

जीव करम बस सुख दुख भागी । जाइअ अवध देवहित लागी ॥

श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्षसे रहित हैं । आप तो श्रीरामजीके सब प्रभावको जानती ही हैं । जीव अपने कर्मवश ही सुख-दुःखका भागी होता है । अतएव देवताओंके हितके लिये आप अयोध्या जाइये ।

देवताओं ने पछताती हुई सरस्वतीजी से फिर विनती करके कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 12.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 355 ज्ञान–विवेक
मन्थरा का प्रतिशोध

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा । बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा ॥

कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥

विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरेको क्या दोष] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ । कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! (अर्थात् रानी तो होनेसे रही)

मन्थरा ने कैकेयी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 16.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 358 नीति–व्यवहार

चहत न भरत भूपतहि भोरें । बिधि बस कुमति बसीजिय तोरें ॥

सो सबु मोर पाप परिनामू । भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू ॥

भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते । होनहारवश तेरे ही जीमें कुमति आ बसी । यह सब मेरे पापोंका परिणाम है, जिससे कुसमयमें (बेमौके) विधाता विपरीत हो गया ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 37.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 375
प्रियजन के वियोग की व्यथा

चलन चहत बन जीवननाथू । केहि सुकृती सन होइहि साथू ॥

की तनु प्रान कि केवल प्राना । बिधि करतबु कछु जाइ न जाना ॥

जीवननाथ (प्राणनाथ) वनको चलना चाहते हैं । देखें किस पुण्यवान्से उनका साथ होगा—– शरीर और प्राण दोनों साथ जायँगे या केवल प्राणहीसे इनका साथ होगा? विधाताकी करनी कुछ जानी नहीं जाती ।

सीताजी वनगमन के समाचार सुनकर व्याकुल होकर अपनी सास के पास जाकर उनके चरण स्पर्श करके बैठ गईं।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 58.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 394
कर्म का फल

सुभ अरु असुभ करम अनुहारी । ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी ॥

करइ जो करम पाव फल सोई । निगम नीति असि कह सबु कोई ॥

शुभ और अशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वर हृदयमें विचारकर फल देता है । जो कर्म करता है वही फल पाता है । ऐसी वेदकी नीति है, यह सब कोई कहते हैं ।

राजा ने श्रीरघनाथजी की बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 77.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 409
स्मरण का वास्तविक फल

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ । सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ ॥

सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू । तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू ॥

इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्गका सारा श्रम (थकावट) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया । जिनके स्मरणमात्रसे [बार-बार जन्मने और मरनेका] महान् श्रम मिट जाता है, उनको ‘श्रम’ होना — यह केवल लौकिक व्यवहार (नरलीला) है ।

श्रीरामजी ने मन्त्री, लक्ष्मणजी और सीताजी को देवनदी गङ्गाजी की महिमा सुनायी।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 87.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 417
कर्म का फल

बोले लखन मधुर मृदु बानी । ग्यान बिराग भगति रस सानी ॥

काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सबु भ्राता ॥

तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले — हे भाई! कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है । सब अपने ही किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं ।

लक्ष्मणजी ने निषादराज को समझाते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 92.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 421 ज्ञान–विवेक
काल-कर्म का प्रभाव

जनम मरन सब दुख सुख भोगा । हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा ॥

काल करम बस होहिं गोसाईं । बरबस राति दिवस की नाईं ॥

जन्म-मरण, सुख-दुःखके भोग, हानि-लाभ, प्यारोंका मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी! काल और कर्मके अधीन रात और दिनकी तरह बरबस होते रहते हैं ।

मन्त्री ने राजा को धीरज बँधाते हुए यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 150.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 470 काल–मृत्यु माया–संसार
धैर्य और शोक का त्याग

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू । कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥

जनि मानहु हियँ हानि गलानी । काल करम गति अघटित जानी ॥

हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज धरो । बुरा समय जानकर शोक त्याग दो । काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हृदयमें हानि और ग्लानि मत मानो ।

माता कौसल्या ने भरतजी को गोद में बैठाकर और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोले।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 165.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 482 वैराग्य
विधाता की सत्ता

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ ॥

हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥

मुनिनाथने विलखकर (दुखी होकर) कहा — हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान् है । हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं ।

मुनिनाथ ने भरत से कहा।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 171 श्रीरामचरितमानस पृ. 488 वैराग्य
स्वामी की सम्पत्ति का संरक्षण

संपति सब रघुपति कै आही । जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही ॥

तौ परिनाम न मोरि भलाई । पाप सिरोमनि साइँ दोहाई ॥

सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीकी है । यदि उसकी [रक्षाकी] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाममें मेरी भलाई नहीं है । क्योंकि स्वामीका द्रोह सब पापोंमें शिरोमणि (श्रेष्ठ) है ।

भरतजी ने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी की है।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 186.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 499 वैराग्य
भजन का महत्त्व

समुझि मोरिकरतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ ॥

जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ ॥

मेरी करतूत और कुलको समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी महिमाको मनमें देख (विचार) कर (अर्थात् कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करनेवाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी! पर उन्होंने मुझ जैसे नीचको भी अपनी अहैतुकी कृपावश अपना लिया — यह समझकर) जो रघुवीर श्रीरामजीके चरणोंका भजन नहीं करता, वह जगत्में विधाताके द्वारा ठगा गया है ।

निषादराज ने भरतजी के चरणों की वन्दना करते हुए यह बात कही।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 195 श्रीरामचरितमानस पृ. 507 भक्ति
कर्म प्रधान विश्व

जद्यपि सम नहिं राग न रोषू । गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू ॥

करम प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ सो तस फल चाखा ॥

यद्यपि वे सम हैं — उनमें न राग है, न रोष है । और न वे किसीका पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं । उन्होंने विश्वमें कर्मको ही प्रधान कर रखा है । जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 219.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 527

भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ॥

कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥

[अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या है] ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका पद पाकर भी भरतको राज्यका मद नहीं होनेका! क्या कभी काँजीकी बूँदोंसे क्षीरसमुद्र नष्ट हो सकता (फट सकता) है?

अयोध्याकाण्ड, दोहा 231 श्रीरामचरितमानस पृ. 538

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई । कुटिल रानि पछितानि अघाई ॥

अवनि जमहि जाचति कैकेई । महि न बीचु बिधि मीचु न देई ॥

सीताजीसमेत दोनों भाइयों (श्रीराम-लक्ष्मण) को सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछतायी । वह पृथ्वी तथा यमराजसे याचना करती है, किन्तु धरती बीच (फटकर समा जानेके लिये रास्ता) नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 252.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 556

भानुबंस भए भूप घनेरे । अधिक एक तें एक बड़ेरे ॥

जनम हेतु सब कहँ पितु माता । करम सुभासुभ देइ बिधाता ॥

[और कहा—] सूर्यवंशमें एक-से-एक अधिक बड़े बहुत-से राजा हो गये हैं । सभीके जन्म कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मोंको (कर्मोंका फल) विधाता देते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 255.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 558

तात बात फुरि राम कृपाहीं । राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ॥

सकुचउँ तात कहत एक बाता । अरध तजहिं बुध सरबस जाता ॥

[वे बोले—] हे तात! बात सत्य है, पर है रामजीकी कृपासे ही । रामविमुखको तो स्वप्नमें भी सिद्धि नहीं मिलती । हे तात! मैं एक बात कहनेमें सकुचाता हूँ । बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [आधेकी रक्षाके लिये] आधा छोड़ दिया करते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 256.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 559 भक्ति

देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू । मोरें नीति न धरम बिचारू ॥

कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू । रहत न आरत कें चित चेतू ॥

हे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी) मुझपर रख दिया । पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका । मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ । आर्त (दुखी) मनुष्यके चित्तमें चेत (विवेक) नहीं रहता ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 269.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 570 माया–संसार

कौसल्या कह दोसु न काहू । करम बिबस दुख सुख छति लाहू ॥

कठिन करम गति जान बिधाता । जो सुभ असुभ सकल फल दाता ॥

कौसल्याजीने कहा — किसीका दोष नहीं है; दुःख-सुख, हानि-लाभ सब कर्मके अधीन हैं । कर्मकी गति कठिन (दुर्विज्ञेय) है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलोंका देनेवाला है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 282.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 581
विवेकहीन कर्म का फल

करसि पान सोवसि दिनु राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥

राजनीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥

बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ । श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ ॥

संग तें जती कुमंत्र ते राजा । मान ते ग्यान पान तें लाजा ॥

प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी । नासहिं बेगि नीति अस सुनी ॥

शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है । तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिरपर खड़ा है? नीतिके बिना राज्य और धर्मके बिना धन प्राप्त करनेसे, भगवान्‌को समर्पण किये बिना उत्तम कर्म करनेसे और विवेक उत्पन्न किये बिना विद्या पढ़नेसे परिणाममें श्रम ही हाथ लगता है । विषयोंके सङ्गसे संन्यासी, बुरी सलाहसे राजा, मानसे ज्ञान, मदिरापानसे लज्जा, नम्रताके बिना (नम्रता न होनेसे) प्रीति और मद (अहङ्कार) से गुणवान् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार नीति मैंने सुनी है ।

शूर्पणखा ने रावण की सभा में उसे फटकारते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 21(क).4-5 श्रीरामचरितमानस पृ. 651 नीति–व्यवहार

संत कहहिं असि नीति दसानन । चौथेंपन जाइहि नृप कानन ॥

तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता । जो कर्ता पालक संहर्ता ॥

हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन (बुढ़ापे) में राजाको वनमें चला जाना चाहिये । हे स्वामी! वहाँ (वनमें) आप उनका भजन कीजिये जो सृष्टिके रचनेवाले, पालनेवाले और संहार करनेवाले हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 7.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 780 धर्म–आचरण

बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर ॥

जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर ॥

मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना । हे भाई! मैं काल (मृत्यु)-के वश हो गया हूँ, मुझे अपना पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 64 श्रीरामचरितमानस पृ. 836 भक्ति

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर ॥

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ॥

हे धीरबुद्धिवाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु)-रूपी महान् दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है [रावणकी तो बात ही क्या है] ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 80(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 853

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥

मोर अभाग्य जिआवत ओही । जेहिं ह्रौं हरि पद कमल बिछोही ॥

श्रीरघुनाथजीके बाणोंसे सिर कटनेपर भी नहीं मरता । विधाता सारे चरित्र विपरीत (उलटे) ही कर रहा है । [सच बात तो यह है कि] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान्‌के चरण-कमलोंसे अलग कर दिया है ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 100.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 876 वैराग्य

नर सरीर धरि जे पर पीरा । करहिं ते सहहिं महा भव भीरा ॥

करहिं मोह बस नर अघ नाना । स्वारथ रत परलोक नसाना ॥

मनुष्यका शरीर धारण करके जो लोग दूसरोंको दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्युके महान् संकट सहने पड़ते हैं । मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसीसे उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 41.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 950

कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता । सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥

अस बिचारि जे परम सयाने । भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥

हे भाई! मैं उनके लिये कालरूप (भयंकर) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मोंका [यथायोग्य] फल देनेवाला हूँ! ऐसा विचारकर जो लोग परम चतुर हैं वे संसार [के प्रवाह] को दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 41.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 951
पछतावा और मिथ्या दोष

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ ॥

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ ॥

वह परलोकमें दुःख पाता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है तथा [अपना दोष न समझकर] कालपर, कर्मपर और ईश्वरपर मिथ्या दोष लगाता है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 43 श्रीरामचरितमानस पृ. 953 वैराग्य
परतन्त्र जीव और स्वतन्त्र ईश्वर

परबस जीव स्वबस भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता ॥

मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥

जीव परतन्त्र है, भगवान् स्वतन्त्र हैं; जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं । यद्यपि मायाका किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान्के भजन बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 78(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 983 ज्ञान–विवेक