श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २

नीति–व्यवहार

लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म

49 पद्य

महाभारत — खण्ड २

अहङ्कारशून्य धर्म अनुष्ठान

शौनक उवाच

तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च ।

तस्माद् धर्मानिमान् सर्वान् नाभिमानात् समाचरेत् ॥

वेदकी यह आज्ञा है कि कर्म करो और कर्म छोड़ो; अतः आगे बताये जानेवाले इन सभी धर्मोंका अहंकारशून्य होकर अनुष्ठान करना चाहिये ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 74 महाभारत — खण्ड २ पृ. 47 धर्म–आचरण
सत्य और समता का आचरण

विदुर उवाच

सत्यं श्रेष्ठं पाण्डव विप्रलापं ।

तुल्यं चान्नं सह भोज्यं सहायैः ।

आत्मा चैषामग्रतो न स्म पूज्य ।

एवंवृत्तिर्वर्धते भूमिपालः ॥

पाण्डुनन्दन! व्यर्थकी बकवादसे रहित सत्य बोलना ही श्रेष्ठ है । अपने सहायक भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर समान अन्नका भोजन करना चाहिये । उन सबके आगे अपनी मान-बड़ाई तथा पूजाकी बातें नहीं करनी चाहिये । ऐसा बर्ताव करनेवाला भूपाल सदा उन्नतिशील होता है ।

विदुर जी ने पाण्डुनन्दन को उपदेश दिया।

वनपर्व, अध्याय 5, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड २ पृ. 82

युधिष्ठिर उवाच

आत्मानं च परांश्चैव त्रायते महतो भयात् ।

क्रुध्यन्तमप्रतिक्रुध्यन् द्वयोरेष चिकित्सकः ॥

क्रोध करनेवाले पुरुषके प्रति जो बदलेमें क्रोध नहीं करता, वह अपनेको और दूसरोंको भी महान् भयसे बचा लेता है । वह अपने और पराये दोनोंके दोषोंको दूर करनेके लिये चिकित्सक बन जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड २ पृ. 221
क्षमा और क्रोध का नियन्त्रण

युधिष्ठिर उवाच

आक्रुष्टस्ताडितः क्रुद्धः क्षमते यो बलीयसा ।

यश्च नित्यं जितक्रोधो विद्वानुत्तमपूरुषः ॥

जो बलवान् पुरुषके गाली देने या कुपित होकर मारनेपर भी क्षमा कर जाता है तथा जो सदा अपने क्रोधको काबू में रखता है, वही विद्वान् है और वही श्रेष्ठ पुरुष है ।

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड २ पृ. 224
कर्म की नित्यता

द्रौपदी उवाच

कर्मभिश्चिन्तितो लोको गत्यां गत्यां पृथग्विधः ।

तस्मात् कर्माणि नित्यानि लोभान्मोक्षं यियासति ॥

नेह धर्मानृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नार्जवेन च ।

पुरुषः श्रियमाप्नोति न घृणित्वेन कर्हिचित् ॥

कर्मोंके अनुसार उत्तम, मध्यम, अधम योनिमें भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, अतः कर्म नित्य हैं (भोगे बिना उन कर्मोंका क्षय नहीं होता) । मूर्ख लोग लोभसे ही मोक्ष पानेकी इच्छा रखते हैं । इस जगत्में धर्म, कोमलता, क्षमा, विनय और दयासे कोई भी मनुष्य कभी धन और ऐश्वर्यकी प्राप्ति नहीं कर सकता ।

वनपर्व, अध्याय 30, श्लोक 2–3 महाभारत — खण्ड २ पृ. 228 कर्म–प्रारब्ध
धनार्जन के साधन

भीम → राजन

न चार्थो भैक्ष्यचर्येण नापि क्लैब्येन कर्हिचित् ।

वेत्तुं शक्यः सदा राजन् केवलं धर्मबुद्धिना ॥

राजन्! भीख माँगनेसे, कायरता दिखानेसे अथवा केवल धर्ममें ही मन लगाये रहनेसे धनकी प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती ।

वनपर्व, अध्याय 33, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड २ पृ. 258

वैशम्पायन उवाच

सर्वथा संहतैरेव दुर्बलैर्बलवानपि ।

अमित्रः शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव ॥

जैसे मधुमक्खियाँ संगठित होकर मधु निकालने-वालेको मार डालती हैं, उसी प्रकार सर्वथा संगठित रहनेवाले दुर्बल मनुष्योंद्वारा बलवान् शत्रु भी मारा जा सकता है ।

वनपर्व, अध्याय 33, श्लोक 70 महाभारत — खण्ड २ पृ. 261
कुलस्त्रियों का आत्मरक्षा

बाहुक उवाच

वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः ।

आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥

उत्तम कुलकी स्त्रियाँ बड़े भारी संकटमें पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं । ऐसा करके वे सत्य और स्वर्ग दोनोंपर विजय पा लेती हैं, इसमें संशय नहीं है ।

एक ब्राह्मण ने दमयन्ती को बाहुक की बात सुनाई।

वनपर्व, अध्याय 70, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड २ पृ. 502
कुलस्त्रियों का आत्मरक्षण

बाहुक उवाच

वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः ।

आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥

बाहु बोला — उत्तम कुलकी स्त्रियाँ बड़े भारी संकटमें पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं । ऐसा करके वे स्वर्ग और सत्य दोनोंपर विजय पा लेती हैं, इसमें संशय नहीं है ।

बाहुक (नल) ने दमयन्ती की दासी केशिनी से कहा।

वनपर्व, अध्याय 74, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड २ पृ. 528

बाहुक उवाच

प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः ।

आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ॥

जीविका पानेके लिये चेष्टा करते समय पक्षियोंने जिसके वस्त्रका अपहरण कर लिया था और जो अनेक प्रकारकी मानसिक चिन्ताओंसे दग्ध हो रहा था, उस पुरुषपर श्यामाको क्रोध नहीं करना चाहिये ।

वनपर्व, अध्याय 74, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड २ पृ. 528
क्षमा और उदारता

नल → राजन

न मेऽपराधं कृतवांस्त्वं स्वल्पमपि पार्थिव ।

कृतेऽपि च न मे कोपः क्षन्तव्यं हि मया तव ॥

नलने कहा — ‘राजन्! आपने मेरा कभी थोड़ासा भी अपराध नहीं किया है और यदि किया भी हो तो उसके लिये मेरे हृदयमें क्रोध नहीं है । मुझे आपके प्रत्येक बर्तावको क्षमा ही करना चाहिये’

नल ने ऋतुपर्ण से कहा।

वनपर्व, अध्याय 77, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 544
तीर्थाटन का पात्रता

पुलस्त्य उवाच

यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् ।

विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥

जिसके हाथ, पैर और मन अपने काबूमें हों तथा जो विद्या, तप और कीर्तिसे सम्पन्न हो, वही तीर्थसेवनका फल पाता है ।

पुलस्त्यजी ने तीर्थ-सेवन का फल बताते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 82, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड २ पृ. 568 साधना–योग

ऋषिगण उवाच

मनो ह्यदुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप ।

मैत्रीं बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि द्रक्ष्यथ ॥

नरेश्वर! यदि मन राग-द्वेषसे दूषित न हो तो वह शुद्धिके लिये पर्याप्त माना गया है । सब प्राणियोंके प्रति मैत्री-बुद्धिका आश्रय ले शुद्धभावसे तीर्थोंका दर्शन करो ।

वनपर्व, अध्याय 93, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड २ पृ. 680 ज्ञान–विवेक
अहङ्कार का पतन

लोमश उवाच

दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत ।

क्रोधादह्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत् ॥

दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ । क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया ।

लोमशजी ने युधिष्ठिर को असुरों के पतन का कारण बताते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 94, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड २ पृ. 683 काम–क्रोध–लोभ–मोह
अर्जुन का क्षमाशील स्वभाव

युधिष्ठिर उवाच

सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीयसा ।

ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभयस्य च ॥

स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माययाभिजिघांसतः ।

अपि वज्रधरस्यापि भवेत् कालविषोपमः ॥

जो छोटे लोगोंके आक्षेप करनेपर भी सदा क्षमाशील होनेके कारण उस आक्षेपको सह लेता है तथा सरल मार्गसे अपनी शरणमें आनेवाले लोगोंको सुख पहुँचाकर उन्हें अभयदान देता है, वही अर्जुन, जब कोई कुटिल मार्गका आश्रय ले छल-कपटसे उसपर आघात करना चाहता है तब वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उसके लिये काल और विषके समान भयंकर हो जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 957 धर्म–आचरण

हनुमान् उवाच

मन्त्रयेत् सह विद्वद्भिः शक्तैः कर्माणि कारयेत् ।

स्निग्धैश्च नीतिविन्यासान् मूर्खान् सर्वत्र वर्जयेत् ॥

विद्वानोंके साथ ही गुप्त मन्त्रणा करनी चाहिये । जो शक्तिशाली हों, उन्हींसे कार्य कराने चाहिये । जो स्नेही (सुहृद्) हों उन्हींके द्वारा नीतिके प्रयोगका काम कराना चाहिये । मूर्खोंको तो सभी कार्योंसे अलग रखना चाहिये ।

वनपर्व, अध्याय 150, श्लोक 45 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1026

समाप्तकर्मा सहितः सुहृद्भिर्जित्वा सपत्नान् प्रतिलभ्य राज्यम् ।

शैलेन्द्र भूयस्तपसे जितात्मा ।

द्रष्टा तवास्मीति मतिं चकार ॥

‘शैलेन्द्र! अब अपने मन और बुद्धिको संयममें रखनेवाला मैं शत्रुओंको जीतकर अपना खोया हुआ राज्य पानेके बाद सुहृदोंके साथ अपना सब कार्य सम्पन्न करके पुनः तपस्याके लिये लौटनेपर आपका दर्शन करूँगा’ । इस प्रकार युधिष्ठिरने निश्चय किया ।

वनपर्व, अध्याय 176, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1192 धर्म–आचरण

वैशम्पायन → राजन

दानं च सत्यं च तपश्च राजन् ।

श्रद्धा च बुद्धिश्च क्षमा धृतिश्च ।

अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगानेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते ॥

राजन्! आपने राज्य, धन और भोगोंको पाकर भी सदा दान, सत्य, तप, º क्षमा तथा धृति — इन सद्गुणोंसे ही प्रेम किया है ।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1236

मार्कण्डेय उवाच

निर्घातवायसा नागाः शकुनाः समृगद्विजाः ।

रूक्षा वाचो विमोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥

मित्रसम्बन्धिनश्चापि संत्यक्ष्यन्ति नरास्तदा ।

जनं परिजनं चापि युगान्ते पर्युपस्थिते ॥

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर बिजलीकी कड़कके समान कड़वी बोली बोलनेवाले कौवे, हाथी, शकुन, पशु और पक्षी आदि बड़ी कठोर वाणी बोलेंगे । उस समयके मनुष्य अपने मित्रों, सम्बन्धियों, सेवकों तथा कुटुम्बीजनोंको भी अकारण त्याग देंगे ।

वनपर्व, अध्याय 190, श्लोक 84–85 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1320

बक उवाच

फलशाकमपि श्रेयो भोक्तुं ह्यकृपणं गृहे ।

परस्य तु गृहे भोक्तुः परिभूतस्य नित्यशः ।

सुमृष्टमपि न श्रेयो विकल्पोऽयमतः सताम् ।

श्ववत् कीलालपो यस्तु परान्नं भोक्तुमिच्छति ।

धिगस्तु तस्य तद् भुक्तं कृपणस्य दुरात्मनः ॥

दूसरेके सामने दीनता न दिखाकर अपने घरमें फल और शाक खाकर रहना अच्छा है । परंतु दूसरेके घरमें सदा तिरस्कार सहकर मीठे पकवान खाना भी अच्छा नहीं है; अतः दूसरेके आश्रित रहकर जीवन निर्वाह करनेके सम्बन्धमें साधु पुरुषोंका सदासे ही विरोध रहा है । जो पराया अन्न खाना चाहता है, वह कुत्तेकी भाँति खून चाटता है । उस दुरात्मा और कृपणके वैसे भोजनको धिक्कार है ।

वनपर्व, अध्याय 193, श्लोक 30–31 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1349

व्याध उवाच

मृषा वादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।

न च कामान्न संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ॥

झूठ बोलना छोड़ दे, बिना कहे ही दूसरोंका प्रिय करे, काम, क्रोध तथा द्वेषसे भी कभी धर्मका परित्याग न करे ।

वनपर्व, अध्याय 207, श्लोक 42 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1440

व्याध उवाच

अब्रुवन् कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन् ।

न कश्चिद् गुणसम्पन्नः प्रकाशो भुवि दृश्यते ॥

किसी दूसरेकी निन्दा न करे, अपनी मान-प्रतिष्ठाकी प्रशंसा न करे, कोई भी गुणवान् पुरुष पर निन्दा और आत्मप्रशंसाका त्याग किये बिना इस भूमण्डलमें सम्मानित हुआ हो, यह नहीं देखा जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 207, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1441

व्याध उवाच

अक्रुध्यन्तोऽनसूयन्तो निरहङ्कारमत्सराः ।

ऋजवः शमसम्पनाः शिष्टाचारा भवन्ति ते ॥

जिनमें क्रोधका अभाव है, जो दूसरोंके दोष नहीं देखते, जिनमें अहंकार और ईर्ष्याका अभाव है, जो सरल तथा मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं, वे शिष्टाचारी कहलाते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 207, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1445

व्याध उवाच

सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यं ज्ञानं हितं भवेत् ।

यद् भूतहितमत्यन्तं तद् वै सत्यं परं मतम् ॥

सत्य बोलना सदा कल्याणकारी है । यथार्थ ज्ञान ही हितकारक होता है । जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो उसे ही उत्तम सत्य माना गया है ।

वनपर्व, अध्याय 213, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1481

वैशम्पायन उवाच

अन्त्यालापमसंतोषं परव्यापारसंकथाम् ।

अतिहासातिरोषौ च क्रोधस्थानं च वर्जये ।

निरताहं सदा सत्ये भर्तृणामुपसेवने ॥

नीच पुरुषोंसे बात नहीं करती, मनमें असंतोषको स्थान नहीं देती और परायी चर्चासे दूर रहती हूँ । न अधिक हँसती हूँ और न अधिक क्रोध करती हूँ। क्रोधका अवसर ही नहीं आने देती । सदा सत्य बोलती और पतियोंकी सेवामें लगी रहती हूँ ।

वनपर्व, अध्याय 233, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1605 धर्म–आचरण

द्रौपदी उवाच

पतिदेवको अनुकूल करनेका उपायपतिकी अनन्यभावसे ।

इमं तु ते मार्गमपेतमोहं ।

वक्ष्यामि चित्तग्रहणाय भर्तुः ।

अस्मिन् यथावत् सखि वर्तमाना ।

भर्तारमाच्छेत्स्यसि कामिनीभ्यः ॥

द्रौपदी बोली — सखी! मैं स्वामीके मनका आकर्षण करनेके लिये तुम्हें एक ऐसा मार्ग बता रही हूँ, जिसमें भ्रम अथवा छल-कपटके लिये तनिक भी स्थान नहीं है । यदि तुम यथावत्रूपसे इसी पथपर चलती रहोगी तो स्वामीके चित्तको अपनी सौतोंसे हटाकर अपनी ओर अवश्य खींच सकोगी ।

वनपर्व, अध्याय 234, श्लोक 1 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1611 भक्ति

वैशम्पायन उवाच

क्रियेत कस्मादपरे च कुर्युर्वित्तं न दद्युः पुरुषाः कथंचित् ।

प्राप्यार्थकालं च भवेदनर्थः ।

कथं न तत् स्यादिति तत् कुतः स्यात् ॥

यदि यह विश्वास हो जाय तो हम लोभके वश होकर न करनेयोग्य काम क्यों करें और दूसरे भी क्यों करें एवं बुद्धिमान् मनुष्य भी उपार्जित धनका दान क्यों न करें? अर्थके उपयोगका समय प्राप्त होनेपर यदि उसका सदुपयोग न किया जाय तो वह अनर्थका हेतु हो जाता है । अतः विचार करना चाहिये कि उस धनका सदुपयोग क्यों नहीं होता और कैसे हो?

वनपर्व, अध्याय 236, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1624 धर्म–आचरण

कथं न भिद्येत न च स्रवेत ।

न च प्रसिच्येदिति रक्षितव्यम् ।

अरक्ष्यमाणं शतधा प्रकीर्येद् ।

ध्रुवं न नाशोऽस्ति कृतस्य लोके ॥

‘यदि प्राप्त हुए धनका यथावत् वितरण न किया जायगा तो वह कच्चे घड़ेमें रखे हुए जलकी भाँति चूकर व्यर्थ नष्ट क्यों न होगा? यह सोचकर उसकी रक्षा करना ही कर्तव्य है । यदि यथायोग्य विभाजनके द्वारा धनकी रक्षा न की जायगी तो वह सैकड़ों प्रकारसे बिखर जायगा । जगत्में किये हुए कर्म-फलका नाश नहीं होता — यह निश्चित है । (इससे यही सिद्ध होता है कि उसका यथायोग्य वितरण कर देना ही उचित है)’

वनपर्व, अध्याय 236, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1624 धर्म–आचरण

शकुनि उवाच

अतिभीरुमतिक्लीबं दीर्घसूत्रं प्रमादिनम् ।

व्यसनाद् विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजाः ॥

जो राजा अत्यन्त डरपोक, बहुत कायर, दीर्घसूत्री (आलसी), प्रमादी और दुर्व्यसनवश विषयोंमें फँसा होता है, उसे प्रजा अपना स्वामी नहीं स्वीकार करती है ।

वनपर्व, अध्याय 251, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1691

न हि कार्यविरुद्धेषु बहुपापेषु कर्मसु ।

मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥

जो अभीष्ट कार्योंके विरुद्ध पड़ते हों, जिनमें बहुत पाप भरे हों तथा जो जड़मूलसहित अपना विनाश करनेवाले हों, ऐसे आत्महत्या आदि अशुभ कर्मोंमें आप-जैसे बुद्धिमान् पुरुष नहीं प्रवृत्त होते ।

वनपर्व, अध्याय 252, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1697

वैशम्पायन उवाच

सत्यवादी लभेतायुरनायासमथार्जवम् ।

अक्रोधनोऽनसूयश्च निर्वृतिं लभते पराम् ॥

सत्यवादी मनुष्य दीर्घ आयु, क्लेशशून्यता (सुख) तथा सरलता प्राप्त करता है । जो क्रोध नहीं करता और दूसरोंके दोष नहीं देखता है, उसे परमानन्दपदकी प्राप्ति होती ।

वनपर्व, अध्याय 259, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1735

व्यास उवाच

विशेषस्त्वत्र विज्ञेयो न्यायेनोपार्जितं धनम् ।

पात्रे काले च देशे च साधुभ्यः प्रतिपादयेत् ॥

यहाँ विशेष बात यह जाननी चाहिये कि मनुष्य न्यायसे कमाये गये धनको उत्तम देश, काल और पात्रका विचार करते हुए श्रेष्ठ पुरुषोंको दे ।

वनपर्व, अध्याय 259, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1737

न त्वामेवंविधो भावः स्प्रष्टुमर्हति मानद ।

आत्मवन्तमिव व्याधिः पुरुषं वृद्धशीलिनम् ॥

‘मानद! मनपर काबू रखनेवाले तथा वृद्धोंके समान संयम-नियमसे रहनेवाले पुरुषको जैसे कोई रोग नहीं छू सकता, उसी प्रकार आपको ऐसे दैन्यभावका स्पर्श होना उचित नहीं जान पड़ता है’

वनपर्व, अध्याय 280, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1870 साधना–योग

सावित्री उवाच

सौहृदात् सर्वभूतानां विश्वासो नाम जायते ।

तस्मात् सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जनः ॥

सौहार्दसे ही समस्त प्राणियोंका एक-दूसरेके प्रति विश्वास उत्पन्न होता है । संतोंमें सौहार्द होनेके कारण ही सब लोग उनपर अधिक विश्वास करते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 297, श्लोक 43 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1994

कर्ण उवाच

मद्विधस्य यशस्यं हि न युक्तं प्राणरक्षणम् ।

युक्तं हि यशसा युक्तं मरणं लोकसम्मतम् ॥

मेरे-जैसे शूरवीरको प्राण देकर भी यशकी ही रक्षा करनी चाहिये; अपयश लेकर प्राणोंकी रक्षा करनी कदापि उचित नहीं है । सुयशके साथ यदि मृत्यु हो जाय तो वह वीरोचित एवं सम्पूर्ण लोकके लिये सम्मानकी वस्तु है ।

वनपर्व, अध्याय 300, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2025 धर्म–आचरण
त्याग से प्राप्त सुख

युधिष्ठिर उवाच

मानं हित्वा प्रियो भवति ।

क्रोधं हित्वा न शोचति ।

कामं हित्वार्थवान् भवति ।

लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥

युधिष्ठिर बोले — मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान् होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता ।

युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न का उत्तर दिया।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2098 काम–क्रोध–लोभ–मोह

युधिष्ठिर उवाच

यदा धर्मश्च भार्या च परस्परवशानुगौ ।

तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगमः ॥

युधिष्ठिर बोले — जब धर्म और भार्या-ये दोनों परस्पर अविरोधी होकर मनुष्यके वशमें हो जाते हैं, उस समय धर्म, अर्थ और काम — इन तीनों परस्पर विरोधियोंका भी एक साथ रहना सहज हो जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 102 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2102 धर्म–आचरण

युधिष्ठिर उवाच

प्रियवचनवादी प्रियो भवति ।

विमृतिकार्यकरोऽधिकं जयति ।

बहुमित्रकरः सुखं वसते ।

यश्च धर्मरतः स गतिं लभते ॥

युधिष्ठिर बोले — मधुर वचन बोलनेवाला सबको प्रिय होता है, सोच-विचारकर काम करनेवालेको अधिकतर सफलता मिलती है एवं जो बहुत-से मित्र बना लेता है, वह सुखसे रहता है और जो धर्मनिष्ठ है, वह सद्गति पाता है ।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 113 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2104 धर्म–आचरण

वैशम्पायन उवाच

न चाप्यधर्मे न सुहृद्विभेदने ।

परस्वहारे परदारमर्शने ।

कदर्यभावे न रमेन्मनः सदा ।

नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम् ॥

तथा जो लोग सदा इस मनोहर उपाख्यानको स्मरण रखेंगे; उनका मन अधर्ममें, सुहृदोंके भीतर फूट डालनेमें, दूसरोंका धन हरनेमें, परस्त्रीगमनमें अथवा कृपणतामें कभी प्रवृत्त नहीं होगा ।

वनपर्व, अध्याय 314, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2113 धर्म–आचरण
राजमहल में व्यवहार

धौम्य उवाच

दृष्टद्वारो लभेद् द्रष्टुं राजस्वेषु न विश्वसेत् ।

तदेवासनमन्विच्छेद् यत्र नाभिपतेत् परः ॥

राजासे मिलना हो, तो पहले द्वारपालसे मिलकर राजाको सूचना देनी चाहिये और मिलनेके लिये उनकी आज्ञा मँगा लेनी चाहिये । इन राजाओंपर पूर्ण विश्वास कभी न करे । अपने लिये वही आसन पसंद करे, जिसपर दूसरा कोई बैठनेवाला न हो ।

धौम्य ने पाण्डवों को राजा के यहाँ रहने का ढंग बताया।

विराटपर्व, अध्याय 4, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2139

धौम्य उवाच

न चानुशिष्याद् राजानमपृच्छन्तं कदाचन ।

तूष्णीं त्वेनमुपासीत काले समभिपूजयेत् ॥

बिना पूछे राजाको कभी कर्तव्यका उपदेश न दे । मौनभावसे ही उसकी सेवा करे और उपयुक्त अवसरपर राजाकी प्रशंसा भी करे ।

विराटपर्व, अध्याय 4, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2140

धौम्य उवाच

यत्नाच्चोपचरेदेनमग्निवद् देववत् त्विह ।

अनृतेनोपचीर्णो हि हन्यादेव न संशयः ॥

इस जगत्में राजाको अग्निके समान दाहक मानकर उसके अत्यन्त निकट न रहे और देवताके समान निग्रह तथा अनुग्रहमें समर्थ जानकर उसकी कभी अवहेलना न करे । इस प्रकार यत्नपूर्वक उसकी परिचर्यामें संलग्न रहे । इसमें संदेह नहीं कि जो मिथ्या एवं कपटपूर्ण उपचारके द्वारा राजाकी सेवा करता है, वह एक दिन अवश्य उसके हाथसे मारा जाता है ।

विराटपर्व, अध्याय 4, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2141
हितकारी एवं प्रिय वचन

धौम्य उवाच

समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रियमेव च ।

संवर्णयेत् तदेवास्य प्रियादपि हितं भवेत् ॥

कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयके सभी अवसरोंपर हितकारक और प्रिय वचन कहे । यदि दोनों सम्भव न हों, तो प्रिय वचनका त्याग करके भी जो हितकारक हो, वही बात कहे (हितविरोधी प्रिय वचन कदापि न कहे)

विराटपर्व, अध्याय 4, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2141

धौम्य उवाच

प्रगृहीतश्च योऽमात्यो निगृहीतस्त्वकारणैः ।

न निर्वदति राजानं लभते सम्पदं पुनः ॥

प्रत्यक्षं च परोक्षं च गुणवादी विचक्षणः ।

उपजीवी भवेद् राज्ञो विषये योऽपि वा भवेत् ॥

यदि कोई मन्त्री पहले राजाका कृपापात्र रहा हो और पीछे अकारण उसे दण्ड भोगना पड़ा हो, उस दशामें भी जो राजाकी निन्दा नहीं करता, वह पुनः अपने पूर्व वैभवको प्राप्त कर लेता है । जो बुद्धिमान् राजाके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह अथवा उसके राज्यमें निवास करता है, उसे राजाके सामने अथवा पीठ पीछे भी उसके गुणोंकी ही चर्चा करनी चाहिये ।

विराटपर्व, अध्याय 4, श्लोक 40–41 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2144

धौम्य उवाच

श्रेयः सदाऽऽत्मनो दृष्ट्वा परं राज्ञा न संवदेत् ।

विशेषयेच्च राजानं योग्य भूमिषु सर्वदा ॥

अपनी भलाई अथवा लाभ देखकर दूसरेको सदा राजाके साथ न मिलावे; न बातचीत करावे । उपयुक्त स्थान और अवसर देखकर सदा राजाकी विशेषता प्रकट करे ।

विराटपर्व, अध्याय 4, श्लोक 43 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2144

एवमेतत् तु संचिन्त्य यत्कृते मन्यसे हितम् ।

तत् क्षिप्रं कुरु कौरव्य यद्येवं श्रद्दधासि मे ॥

‘कुरुनन्दन! यदि मेरी बातोंपर तुम्हें विश्वास हो, तो इसी प्रकार सोच-विचारकर जो काम करनेसे तुम्हें अपना हित जान पड़े, उसे शीघ्र करो’

विराटपर्व, अध्याय 28, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2322

अश्वत्थामा उवाच

वैश्योऽधिगम्य वित्तानि ब्रह्मकर्माणि कारयेत् ।

शूद्रः शुश्रूषणं कुर्यात् त्रिषु वर्णेषु नित्यशः ।

वन्दनायोगविधिभिर्वैतसीं वृत्तिमास्थितः ॥

वैश्य कृषि और व्यापार आदिके द्वारा धनोपार्जन करके ब्राह्मणोंके द्वारा वेदोक्त कर्म करावें और शूद्र वैतसीवृत्ति (बेंतके वृक्षकी भाँति नम्रता) का आश्रय ले प्रणाम और आज्ञापालन आदिके द्वारा सदा तीनों वर्णोंके पास रहकर उनकी सेवा करे ।

विराटपर्व, अध्याय 50, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2434 धर्म–आचरण

कङ्क उवाच

किं ते द्यूतेन राजेन्द्र बहुदोषेण मानद ।

देवने बहवो दोषास्तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ॥

कंक बोले — सबको मान देनेवाले महाराज! आपको जूएसे क्या लेना है? इसमें तो बहुत-से दोष हैं। जूआ खेलनेमें अनेक दोष होते हैं, इसलिये इसे त्याग देना चाहिये ।

विराटपर्व, अध्याय 68, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2547 ज्ञान–विवेक

कङ्क उवाच

श्रुतस्ते यदि वा दृष्टः पाण्डवेयो युधिष्ठिरः ।

स राष्ट्रं सुमहत् स्फीतं भ्रातॄंश्च त्रिदशोपमान् ॥

राज्यं हारितवान् सर्वं तस्माद् द्यूतं न रोचये ।

निःसंशयं स कितवः पश्चात् तप्यति पाण्डवः ॥

विविधानां च रत्नानां धनानां च पराजये ।

अस्मिन् क्षितिविनाशश्च वाक्पारुष्यमनन्तरम् ॥

अविश्वास्यं बुधैर्नित्यमेकाह्ना द्रव्यनाशनम् ।

अथवा मन्यसे राजन् दीव्याम यदि रोचते ॥

आपने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको देखा होगा अथवा उनका नाम तो अवश्य सुना होगा । वे अपने अत्यन्त समृद्धिशाली राष्ट्रको देवताओंके समान तेजस्वी भाइयोंको तथा समूचे राज्यको भी जूएमें हार गये थे । अतः मैं जूएको पसंद नहीं करता । नाना प्रकारके रत्नों और धनको हार जानेके कारण अब वे जुआरी युधिष्ठिर निश्चय ही पश्चात्ताप करते होंगे । इस जूएमें आसक्त होनेपर राज्यका नाश होता है, फिर जुआरी एक दूसरेके प्रति कटु वचनोंका प्रयोग करते हैं । जूआ एक ही दिनमें महान् धनराशिका नाश करनेवाला है । अतः विद्वान् पुरुषोंको इस (धोखा देनेवाले जूए) पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये । राजन्! तो भी यदि आपकी रुचि और आग्रह हो, तो हम खेलेंगे ही ।

विराटपर्व, अध्याय 68, श्लोक 34–35 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2547