श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १
धर्म–आचरण
कर्तव्य और सदाचरण
62 पद्य
महाभारत — खण्ड १
सौति उवाच
धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानां ।
स ह्येक एव परलोकगतस्य बन्धुः ॥
अर्थाः स्त्रियश्च निपुणैरपि सेव्यमाना ।
नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ॥
तपस्वी महर्षियो! (तथा महाभारतके पाठको!) आप सब लोग सदा सांसारिक आसक्तियोंसे ऊँचे उठें और आपका मन सदा धर्ममें लगा रहे; क्योंकि परलोकमें गये हुए जीवका बन्धु या सहायक एकमात्र धर्म ही है । चतुर मनुष्य भी धन और स्त्रियोंका सेवन तो करते हैं, किंतु वे उनकी श्रेष्ठतापर विश्वास नहीं करते और न उन्हें स्थिर ही मानते हैं ।
सौतिजी ने अनुक्रमणिका के अन्त में ऋषियों से कहा।
उत्तङ्क उवाच
यश्चाधर्मेण वै ब्रूयाद् यश्चाधर्मेण पृच्छति ।
तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति ॥
जो अधर्मपूर्वक अध्यापन या उपदेश करता है अथवा जो अधर्मपूर्वक प्रश्न या अध्ययन करता है, उन दोनोंमेंसे एक (गुरु अथवा शिष्य) मृत्यु एवं विद्वेषको प्राप्त होता है ।
उत्तङ्क ने उपाध्याय से कहा।
सहस्रपाद उवाच
वेदवेदाङ्गविन्नाम सर्वभूताभयप्रदः ।
अहिंसा सत्यवचनं क्षमा चेति विनिश्चितम् ॥
ब्राह्मणस्य परो धर्मो वेदानां धारणापि च ।
क्षत्रियस्य हि यो धर्मः स हि नेष्येत वै तव ॥
वह वेद-वेदांगोंका विद्वान् और समस्त प्राणियोंको अभय देनेवाला होता है । अहिंसा, सत्यभाषण, क्षमा और वेदोंका स्वाध्याय निश्चय ही ये ब्राह्मणके उत्तम धर्म हैं । क्षत्रियका जो धर्म है वह तुम्हारे लिये अभीष्ट नहीं है ।
सहस्रपाद मुनि ने डुण्डुभ-रूप त्यागकर रुरु से कहा।
दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम् ।
तदिदं क्षत्रियस्यासीत् कर्म वै शृणु मे रुरो ॥
जनमेजयस्य यज्ञेऽस्मिन् सर्पाणां हिंसनं पुरा ।
परित्राणं च भीतानां सर्पाणां ब्राह्मणादपि ॥
तपोवीर्यबलोपेताद् वेदवेदाङ्गपारगात् ।
आस्तीकाद् द्विजमुख्याद् वै सर्पसत्रे द्विजोत्तम ॥
‘रुरो! दण्डधारण, उग्रता और प्रजापालन — ये सब क्षत्रियोंके कर्म रहे हैं । मेरी बात सुनो, पहले राजा जनमेजयके यज्ञमें सर्पोंकी बड़ी भारी हिंसा हुई। द्विजश्रेष्ठ! फिर उसी सर्पसत्रमें तपस्याके बल-वीर्यसे सम्पन्न, वेद वेदांगोंके पारंगत विद्वान् विप्रवर आस्तीक नामक ब्राह्मणके द्वारा भयभीत सर्पोंकी प्राणरक्षा हुई’
तिग्मवीर्यविषा ह्येते दन्दशूका महाबलाः ।
तेषां तीक्ष्णविषत्वाद्धि प्रजानां च हिताय च ।
युक्तं मात्रा कृतं तेषां परपीडोपसर्पिणाम् ।
अन्येषामपि सत्त्वानां नित्यं दोषपरास्तु ये ।
तेषां प्राणान्तको दण्डो देवेन विनिपात्यते ।
एवं सम्भाष्य देवस्तु पूज्य कद्रू च तां तदा ।
आहूय कश्यपं देव इदं वचनमब्रवीत् ।
यदेते दन्दशूकाश्च सर्पा जातास्त्वयानघ ।
विषोल्बणा महाभोगा मात्रा शप्ताः परंतप ।
तत्र मन्युस्त्वया तात न कर्तव्यः कथंचन ।
दृष्टं पुरातनं ह्येतद् यज्ञे सर्पविनाशनम् ।
इत्युक्त्वा सृष्टिकृद् देवस्तं प्रसाद्य प्रजापतिम् ।
प्रादाद् विषहरीं विद्यां कश्यपाय महात्मने ॥
‘ये महाबली दुःसह पराक्रम तथा प्रचण्ड विषसे युक्त हैं । अपने तीखे विषके कारण ये सदा दूसरोंको पीड़ा देनेके लिये दौड़ते-फिरते हैं । अतः समस्त प्राणियोंके हितकी दृष्टिसे इन्हें शाप देकर माता कद्रूने उचित ही किया है । जो सदा दूसरे प्राणियोंको हानि पहुँचाते रहते हैं, उनके ऊपर दैवके द्वारा ही प्राणनाशक दण्ड आ पड़ता है ।’ ऐसी बात कहकर ब्रह्माजीने कद्रूकी प्रशंसा की और कश्यपजीको बुलाकर यह बात कही — ‘अनघ! तुम्हारे द्वारा जो ये लोगोंको डँसनेवाले सर्प उत्पन्न हो गये हैं, इनके शरीर बहुत विशाल और विष बड़े भयंकर हैं । परंतप! इन्हें इनकी माताने शाप दे दिया है, इसके कारण तुम किसी तरह भी उसपर क्रोध न करना । तात! यज्ञमें सर्पोंका नाश होनेवाला है, यह पुराणवृत्तान्त तुम्हारी दृष्टिमें भी है ही ।’ ऐसा कहकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने प्रजापति कश्यपको प्रसन्न करके उन महात्माको सर्पोंका विष उतारनेवाली विद्या प्रदान की ।
ब्रह्माजी ने कद्रू द्वारा सर्पों को दिए गए शाप का अनुमोदन करते हुए कहा।
विनता उवाच
ब्राह्मणानामभिद्रोहो न कर्तव्यः कथंचन ।
न ह्येवमग्निर्नादित्यो भस्म कुर्यात् तथानघ ।
यथा कुर्यादभिक्रुद्धो ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
तदेतैर्विविधैर्लिङ्गैस्त्वं विद्यास्तं द्विजोत्तमम् ।
भूतानामग्रभूर्विप्रो वर्णश्रेष्ठः पिता गुरुः ॥
ब्राह्मणोंके साथ किसी प्रकार द्रोह नहीं करना चाहिये । अनघ! कठोर व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण क्रोधमें आनेपर अपराधीको जिस प्रकार जलाकर भस्म कर देता है, उस तरह अग्नि और सूर्य भी नहीं जला सकते । इस प्रकार विविध चिह्नोंके द्वारा तुम्हें ब्राह्मणको पहचान लेना चाहिये । ब्राह्मण समस्त प्राणियोंका अग्रज, सब वर्णोंमें श्रेष्ठ, पिता और गुरु है ।
विनता ने अपने पुत्र गरुड से कहा।
कश्यप उवाच
न मिथ्या ब्रह्मणो वाक्यं कर्तुमर्हथ सत्तमाः ।
भवतां हि न मिथ्यायं संकल्पो वै चिकीर्षितः ॥
संत-महात्माओ! आप ब्रह्माजीका वचन मिथ्या न करें। साथ ही मैं यह भी चाहता हूँ कि आपके द्वारा किया हुआ यह अभीष्ट संकल्प भी मिथ्या न हो ।
प्रजापति कश्यप ने महर्षि वालखिल्य से कहा।
दास्यामि हि वरं तेऽद्य प्रीतिर्मे परमा त्वयि ।
दिष्ट्या बुद्धिश्च ते धर्मे निविष्टा पन्नगोत्तम ।
भूयो भूयश्च ते बुद्धिर्धर्मे भवतु सुस्थिरा ॥
‘तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम है; अतः आज मैं तुम्हें अवश्य वर दूँगा । पन्नगोत्तम! यह सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारी बुद्धि धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगी हुई है । मैं भी आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारी बुद्धि उत्तरोत्तर धर्ममें स्थिर रहे’
ब्रह्माजी ने शेषजी से कहा।
ब्रह्मा उवाच
तत् करोत्वेष नागेन्द्रः प्राप्तकालं वचः स्वयम् ।
विनशिष्यन्ति ये पापा न तु ये धर्मचारिणः ॥
ये नागराज समय आनेपर स्वयं तदनुसार ही कार्य करें। जनमेजयके यज्ञमें पापी सर्प ही नष्ट होंगे, किंतु जो धर्मात्मा हैं वे नहीं ।
ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा।
शमीक → वत्स
न मे प्रियं कृतं तात नैष धर्मस्तपस्विनाम् ।
वयं तस्य नरेन्द्रस्य विषये निवसामहे ॥
न्यायतो रक्षितास्तेन तस्य शापं न रोचये ।
सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञो ह्यस्मद्विधैः सदा ॥
क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः ।
यदि राजा न संरक्षेत् पीडा नः परमा भवेत् ॥
शमीक बोले — वत्स! तुमने शाप देकर मेरा प्रिय कार्य नहीं किया है । यह तपस्वियोंका धर्म नहीं है । हमलोग उन महाराज परीक्षित्के राज्यमें निवास करते हैं और उनके द्वारा न्यायपूर्वक हमारी रक्षा होती है । अतः उनको शाप देना मुझे पसंद नहीं है । हमारे-जैसे साधु पुरुषोंको तो वर्तमान राजा परीक्षित्के अपराधको सब प्रकारसे क्षमा ही करना चाहिये । बेटा! यदि धर्मको नष्ट किया जाय तो वह मनुष्यका नाश कर देता है, इसमें संशय नहीं है । यदि राजा रक्षा न करे तो हमें भारी कष्ट पहुँच सकता है ।
शमीक ने अपने पुत्र से कहा।
शमीक उवाच
तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः ।
क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥
इसलिये तुम सदा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए क्षमाशील बनो । क्षमासे ही ब्रह्माजीके निकटवर्ती लोकोंमें जा सकोगे ।
शमीक उवाच
स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् ।
चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ॥
तुम मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें तत्पर होकर जंगली कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए इस क्रोधको मिटाकर उत्तम आचरण करो; ऐसा करनेसे तुम्हारे धर्मकी हानि नहीं होगी ।
शमीक मुनि ने अपने पुत्र शृंगी को समझाते हुए कहा।
शमीक उवाच
क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम् ।
ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥
क्रोध प्रयत्नशील साधकोंके अत्यन्त दुःखसे उपार्जित धर्मका नाश कर देता है । फिर धर्महीन मनुष्योंको अभीष्ट गति नहीं मिलती है ।
शमीक मुनि ने अपने पुत्र शृंगी को समझाते हुए कहा।
वैशम्पायन उवाच
अस्मिन्नर्थश्च धर्मश्च निखिलेनोपदिश्यते ।
इतिहासे महापुण्ये बुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ॥
अक्षुद्रान् दानशीलांश्च सत्यशीलाननास्तिकान् ।
कार्ष्णं वेदमिमं विद्वाञ्छ्रावयित्वार्थमश्नुते ॥
इसमें अर्थ और धर्मका भी पूर्णरूपसे उपदेश किया जाता है । इस परम पावन इतिहाससे मोक्षबुद्धि प्राप्त होती है । जिनका स्वभाव अथवा विचार खोटा नहीं है, जो दानशील, सत्यवादी और आस्तिक हैं, ऐसे लोगोंको व्यासद्वारा विरचित वेदस्वरूप इस महाभारतका जो श्रवण कराता है, वह विद्वान् अभीष्ट अर्थको प्राप्त कर लेता है ।
वैशम्पायन उवाच
अभ्यगच्छन्नृतौ नारीं न कामान्नानृतौ तथा ।
तथैवान्यानि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥
ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तत् तथा भरतर्षभ ।
ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः ॥
उस समय सब लोग ऋतुकालमें ही पत्नीसमागम करते थे; केवल कामनावश या ऋतुकालके बिना नहीं करते थे । इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिकी योनिमें पड़े हुए जीव भी ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रियोंसे संयोग करते थे । भरतश्रेष्ठ! उस समय धर्मका आश्रय लेनेसे सब लोग सहस्र एवं शत वर्षोंतक जीवित रहते थे और उत्तरोत्तर उन्नति करते थे ।
वैशम्पायन उवाच
ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपरायणाः ।
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ॥
भूपाल! उस समयकी प्रजा धर्म एवं व्रतके पालनमें तत्पर रहती थी; अतः सभी लोग रोगों तथा मानसिक चिन्ताओंसे मुक्त रहते थे ।
वैशम्पायन उवाच
कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः ।
धर्ममेवानुपश्यन्तश्चक्रुर्धर्मपरायणाः ॥
नरश्रेष्ठ! सब मनुष्य धर्मकी ही ओर दृष्टि रखकर धर्ममें ही तत्पर हो धर्मयुक्त कर्मोंका ही अनुष्ठान करते थे ।
वैशम्पायनजी ने जनमेजय से उस समय की धर्मपरायण प्रजा का वर्णन किया।
शकुन्तला उवाच
सत्यधर्मच्युतात् पुंसः क्रुद्धादाशीविषादिव ।
अनास्तिकोऽप्युद्विजते जनः किं पुनरास्तिकः ॥
जो सत्यरूपी धर्मसे भ्रष्ट है, वह पुरुष क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पके समान भयंकर है । उससे नास्तिक भी भय खाता है; फिर आस्तिक मनुष्यके लिये तो कहना ही क्या है ।
शकुन्तला उवाच
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।
अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥
एक हजार अश्वमेध यज्ञ एक ओर तथा सत्यभाषणका पुण्य दूसरी ओर यदि तराजूपर रखा जाय, तो हजार अश्वमेध यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका पलड़ा ही भारी होता है ।
शकुन्तला ने दुष्यन्त को सत्य की महिमा बताते हुए कहा।
शकुन्तला उवाच
नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद् विद्यते परम् ।
न हि तीव्रतरं किंचिदनृतादिह विद्यते ॥
सत्यके समान कोई धर्म नहीं है । सत्यसे उत्तम कुछ भी नहीं है और झूठसे बढ़कर तीव्रतर पाप इस जगत् में दूसरा कोई नहीं है ।
देवयानी उवाच
सुयन्त्रिता वरा नित्यं विहीनाश्च धनैर्नराः ।
दुर्वृत्ताः पापकर्माणश्चाण्डाला धनिनोऽपि वा ॥
अकारणाद् ये द्विषन्ति परिवादं वदन्ति च ।
न तत्रास्य निवासोऽस्ति पाप्मभिः पापतां व्रजेत् ॥
सुकृते दुष्कृते वापि यत्र सज्जति यो नरः ।
ध्रुवं रतिर्भवेत् तत्र तस्माद् दोषं न रोचयेत् ॥
वाग् दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः ।
मम मथ्नाति हृदयमग्निकाम इवारणिम् ॥
धनहीन मनुष्य भी यदि सदा अपने मनपर संयम रखें तो वे श्रेष्ठ हैं और धनवान् भी यदि दुराचारी तथा पापकर्मी हों, तो वे चाण्डालके समान हैं। जो अकारण किसीके साथ द्वेष करते हैं और दूसरोंकी निन्दा करते रहते हैं, उनके बीचमें सत्पुरुषका निवास नहीं होना चाहिये; क्योंकि पापियोंके संगसे मनुष्य पापात्मा हो जाता है । मनुष्य पाप अथवा पुण्य जिसमें भी आसक्त होता है, उसीमें उसकी दृढ़ प्रीति हो जाती है, इसलिये पापकर्ममें प्रीति नहीं करनी चाहिये । तात! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको मथ रहा है । ठीक उसी तरह, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है ।
देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से कहा।
ययाति → देवि
राजा प्रमाणं भूतानां स नश्येत मृषा वदन् ।
अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे ॥
ययाति बोले — देवि! सब प्राणियोंके लिये राजा ही प्रमाण है । वह यदि झूठ बोलने लगे तो उसका नाश हो जाता है । अतः अर्थ-संकटमें पड़नेपर भी मैं झूठा काम नहीं कर सकता ।
ययाति ने देवयानी से कहा।
ययाति → राजन
तद् वै नृशंसं तदसत्यमाहुर्यः सेवतेऽधर्ममनर्थबुद्धिः ।
अर्थोऽप्यनीशस्य तथैव राजं ।
स्तदार्जवं स समाधिस्तदार्यम् ॥
राजन्! जो पापबुद्धिवाला मनुष्य अधर्मका आचरण करता है, उसका वह आचरण नृशंस (पापमय) और असत्य कहा गया है एवं उस अजितेन्द्रियका धन भी वैसा ही पापमय और असत्य है । परंतु वानप्रस्थ मुनिका जो धर्मपालन है, वही सरलता है, वही समाधि है और वही श्रेष्ठ आचरण है ।
ययाति ने अधर्म और वानप्रस्थ-धर्म का भेद बताते हुए कहा।
ययाति उवाच
कुर्यादपूर्वं न कृतं यदन्यैर्विधित्समानः किमु तत्र साधु ।
धर्माधर्मौ सुविनिश्चित्य सम्यक् ।
कार्याकार्येष्वप्रमत्तश्चरेद् यः ।
स वै धीमान् सत्यसन्धः कृतात्मा ।
राजा भवेल्लोकपालो महिम्ना ।
यदा भवेत् संशयो धर्मकार्ये ।
कामार्थे वा यत्र विन्दन्ति सम्यक् ।
कार्यं तत्र प्रथमं धर्मकार्यं ।
तौ कुर्यादर्थकामौ स धर्मः ।
ब्रुवाणमेनं नृपतिं ययातिं ।
नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत् तम् ॥
जो शुभ कर्म करनेकी इच्छा रखता है, वह ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसे अन्य राजाओंने नहीं किया हो । जो धर्म और अधर्मका भलीभाँति निश्चय करके कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सावधान होकर विचरता है, वही राजा बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ और मनस्वी है । वह अपनी महिमासे लोकपाल होता है । जब धर्मकार्यमें संशय हो अथवा जहाँ न्यायतः काम और अर्थ दोनों आकर प्राप्त हों, वहाँ पहले धर्मकार्यका ही सम्पादन करना चाहिये, अर्थ और कामका नहीं । यही धर्म है । इस प्रकारकी बातें कहनेवाले राजा ययातिसे नृपश्रेष्ठ वसुमान् बोले ।
वैशम्पायन उवाच
तस्य कीर्तिमतो वृत्तमवेक्ष्म सततं नराः ।
धर्म एव परः कामादर्थाच्चेति व्यवस्थिताः ॥
उन यशस्वी महाराजके धर्मपूर्ण सदाचारको देखकर सब मनुष्य सदा इसी निश्चयपर पहुँचे थे कि काम और अर्थसे धर्म ही श्रेष्ठ है ।
वैशम्पायनजी ने जनमेजय से राजा शान्तनु के सदाचार का प्रभाव बताया।
वैशम्पायन उवाच
शान्तनुप्रमुखैर्गुप्ते लोके नृपतिभिस्तदा ।
नियमात् सर्ववर्णानां धर्मोत्तरमवर्तत ॥
उस समय शान्तनुप्रधान राजाओंद्वारा सुरक्षित जगत्में सभी वर्णोंके लोग नियमपूर्वक प्रत्येक बर्तावमें धर्मको ही प्रधानता देने लगे ।
वैशम्पायन उवाच
अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः ।
चक्षुरेकं च पुत्रश्च अस्ति नास्ति च भारत ।
चक्षुर्नाशे तनोर्नाशः पुत्रनाशे कुलक्षयः ।
अग्निहोत्रं त्रयीविद्यासंतानमपि चाक्षयम् ।
सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
धर्मवादी विद्वान् कहते हैं कि एक पुत्रका होना संतानहीनताके ही तुल्य है । भारत! एक आँख अथवा एक पुत्र यदि है, तो वह भी नहींके बराबर है । नेत्रका नाश होनेपर मानो शरीरका ही नाश हो जाता है, इसी प्रकार पुत्रके नष्ट होनेपर कुलपरम्परा ही नष्ट हो जाती है । अग्निहोत्र, तीनों वेद तथा शिष्य-प्रशिष्यके क्रमसे चलनेवाले विद्याजनित वंशकी अक्षय परम्परा — ये सब मिलकर भी जन्मसे होनेवाली संतानकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है ।
सत्यवती उवाच
यथा कर्म शुभं कृत्वा स्वर्गोपगमनं ध्रुवम् ।
यथा चायुर्ध्रुवं सत्ये त्वयि धर्मस्तथा ध्रुवः ॥
जैसे शुभ कर्म करके स्वर्गलोकमें जाना निश्चित है, जैसे सत्य बोलनेसे आयुका बढ़ना अवश्यम्भावी है, वैसे ही तुममें धर्मका होना भी निश्चित है ।
सत्यवतीजी ने भीष्मजी से कहा।
भीष्म उवाच
परित्यजेयं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः ।
यद् वाप्यधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कथंचन ॥
मैं तीनों लोकोंका राज्य, देवताओंका साम्राज्य अथवा इन दोनोंसे भी अधिक महत्त्वकी वस्तुको भी एकदम त्याग सकता हूँ, परंतु सत्यको किसी प्रकार नहीं छोड़ सकता ।
भीष्मजी ने माता सत्यवती से कहा।
वैशम्पायन उवाच
मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः ।
अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ॥
सब लोग अभिमान और क्रोधसे रहित तथा लोभसे दूर रहनेवाले थे; सभी एक-दूसरेको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करते थे । लोगोंके आचार-व्यवहारमें धर्मकी ही प्रधानता थी ।
सत्ययुग के समय राष्ट्र की प्रजा धर्मानुकूल कर्मों में संलग्न रहकर एक-दूसरे को प्रसन्न रखती हुई उन्नति के पथ पर बढ़ती जा रही थी।
पाण्डु उवाच
पितृदेवर्षिमनुजैर्देयं तेभ्यश्च धर्मतः ।
एतानि तु यथाकालं यो न बुध्यति मानवः ॥
न तस्य लोकाः सन्तीति धर्मविद्भिः प्रतिष्ठितम् ।
यज्ञैस्तु देवान् प्रीणाति स्वाध्यायतपसा मुनीन् ॥
(उन ऋणोंके नाम ये हैं -) पितृ ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण और मनुष्य-ऋण । उन सबका ऋण धर्मतः हमें चुकाना चाहिये । जो मनुष्य यथासमय इन ऋणोंका ध्यान नहीं रखता, उसके लिये पुण्यलोक सुलभ नहीं होते । यह मर्यादा धर्मज्ञ पुरुषोंने स्थापित की है । यज्ञोंद्वारा मनुष्य देवताओंको तृप्त करता है, स्वाध्याय और तपस्याद्वारा मुनियोंको संतोष दिलाता है ।
पाण्डु ने महर्षिगणों से सन्तानहीनता और पितृ-ऋण की चिन्ता के कारण निवेदन करते हुए कहा।
वैशम्पायन उवाच
अपत्यं नाम लोकेषु प्रतिष्ठा धर्मसंहिता ।
इति कुन्ति विदुर्धीराः शाश्वतं धर्मवादिनः ॥
इष्टं दत्तं तपस्तप्तं नियमश्च स्वनुष्ठितः ।
सर्वमेवानपत्यस्य न पावनमिहोच्यते ॥
सम्पूर्ण लोकोंमें संतान ही धर्ममयी प्रतिष्ठा है — कुन्ती! सदा धर्मका प्रतिपादन करनेवाले धीर पुरुष ऐसा ही मानते हैं। संतानहीन मनुष्य इस लोकमें यज्ञ, दान, तप और नियमोंका भलीभाँति अनुष्ठान कर ले, तो भी उसके किये हुए सब कर्म पवित्र नहीं कहे जाते ।
कणिक उवाच
कर्मणा येन केनैव मृदुना दारुणेन च ।
उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥
राजा यदि संकटमें हो तो कोमल या भयंकर-जिस किसी भी कर्मके द्वारा उस दुरवस्थासे अपना उद्धार करे; फिर समर्थ होनेपर धर्मका आचरण करे ।
ब्राह्मण उवाच
कुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कथंचन ।
इति पूर्वे महात्मान आपद्धर्मविदो विदुः ॥
श्रेयांस्तु सहदारस्य विनाशोऽद्य मम स्वयम् ।
ब्राह्मणस्य वधं नाहमनुमंस्ये कदाचन ॥
आपद्धर्मके ज्ञाता प्राचीन महात्माओंने कहा है कि किसी प्रकार भी क्रूर एवं निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये । अतः आज अपनी पत्नीके साथ स्वयं मेरा विनाश हो जाय, यह श्रेष्ठ है; किंतु ब्राह्मणवधकी अनुमति मैं कदापि नहीं दे सकता ।
गन्धर्व उवाच
ब्रह्मचर्यं परो धर्मः स चापि नियतस्त्वयि ।
यस्मात् तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मि विजितस्त्वया ॥
ब्रह्मचर्य! सबसे बड़ा धर्म है और वह तुममें निश्चितरूपसे विद्यमान है । कुन्तीनन्दन! इसीलिये युद्धमें मैं तुमसे हार गया हूँ ।
गन्धर्व उवाच
तस्मात् तापत्य यत्किंचिन्नॄणां श्रेय इहेप्सितम् ।
तस्मिन् कर्मणि योक्तव्या दान्तात्मानः पुरोहिताः ॥
अतः तपतीनन्दन! मनुष्योंको इस लोकमें जो भी कल्याणकारी कार्य करना अभीष्ट हो, उसमें वह मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरोहितोंको नियुक्त करे ।
चित्ररथ गन्धर्व ने अर्जुन से कहा।
गन्धर्व उवाच
वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः ।
धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ॥
जो छहों अंगोंसहित वेदके स्वाध्यायमें तत्पर, ईमानदार, सत्यवादी, धर्मात्मा और मनको वशमें रखनेवाले हों, ऐसे ही ब्राह्मण राजाओंके पुरोहित होने चाहिये ।
चित्ररथ गन्धर्व ने अर्जुन को पुरोहित के लक्षण बताते हुए कहा।
गन्धर्व उवाच
पुत्रव्यसनसंतप्तः शक्तिमानप्यशक्तवत् ।
विश्वामित्रविनाशाय न चक्रे कर्म दारुणम् ॥
विश्वामित्रके द्वारा अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेसे वे संतप्त थे, उनमें बदला लेनेकी शक्ति भी थी, तो भी उन्होंने असमर्थकी भाँति सब कुछ सह लिया एवं विश्वामित्रका विनाश करनेके लिये कोई दारुण कर्म नहीं किया ।
गन्धर्व ने अर्जुन को बताया कि पुत्रशोक में भी वसिष्ठजी ने बदला नहीं लिया।
गन्धर्व उवाच
महीं जिगीषता राज्ञा ब्रह्मकार्यं पुरस्सरम् ।
तस्मात् पुरोहितः कश्चिद् गुणवान् विजितेन्द्रियः ।
विद्वान् भवतु वो विप्रो धर्मकामार्थतत्त्ववित् ॥
पृथ्वीको जीतनेकी इच्छावाले राजाको उचित है कि वह ब्राह्मणको अपने आगे रखे; अतः कोई गुणवान्, जितेन्द्रिय, वेदाभ्यासी, विद्वान् तथा धर्म, काम और अर्थका तत्त्वज्ञ ब्राह्मण आपका पुरोहित हो ।
गन्धर्व ने अर्जुन से कहा।
मम पन्था महाराज धर्म एष सनातनः ।
राज्ञा सर्वेषु धर्मेषु देयः पन्था द्विजातये ॥
‘महाराज! मार्ग तो मुझे ही मिलना चाहिये । यही सनातन धर्म है । सभी धर्मोंमें राजाके लिये यही उचित है कि ब्राह्मणको मार्ग दे’
शक्ति मुनि ने राजा से रास्ते के लिए कहा।
और्व उवाच
यो हि कारणतः क्रोधं संजातं क्षन्तुमर्हति ।
नालं स मनुजः सम्यक् त्रिवर्गं परिरक्षितुम् ॥
जो किसी कारणवश उत्पन्न हुए क्रोधको सह लेता है, वह मनुष्य धर्म, अर्थ और कामकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं होता ।
और्व ने पितरों से कहा।
और्व उवाच
अशिष्टानां नियन्ता हि शिष्टानां परिरक्षिता ।
स्थाने रोषः प्रयुक्तः स्यान्नृपैः सर्वजिगीषुभिः ॥
सबको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले राजाओंद्वारा उचित अवसरपर प्रयोगमें लाया हुआ रोष दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंकी रक्षा करनेवाला हो ।
पुलस्त्य उवाच
शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर ।
अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन् कुरुषे त्वं पराशर ॥
पराशर! शान्त रहना ही (ब्राह्मणोंका) श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसीका आचरण करो । तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो?
पुलस्त्य मुनि ने पराशर से कहा।
विदुर उवाच
यस्मिन् धृतिरनुक्रोशः क्षमा सत्यं पराक्रमः ।
नित्यानि पाण्डवे ज्येष्ठे स जीयेत रणे कथम् ॥
जिन ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरमें धैर्य, दया, क्षमा, सत्य और पराक्रम आदि गुण नित्य निवास करते हैं, उन्हें रणभूमिमें कैसे हराया जा सकता है?
अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम ।
शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥
‘चाहे राजाके तिरस्कारसे मुझे नियमभंगका महान् दोष प्राप्त हो अथवा वनमें ही मेरी मृत्यु हो जाय तथापि शरीरको नष्ट करके भी गौ-ब्राह्मण-रक्षारूप धर्मका पालन ही श्रेष्ठ है’
उलूपी उवाच
कृत्वा मम परित्राणं तव धर्मो न लुप्यते ।
यदि वाप्यस्य धर्मस्य सूक्ष्मोऽपि स्याद् व्यतिक्रमः ॥
स च ते धर्म एव स्याद् दत्त्वा प्राणान् ममार्जुन ।
भक्तां च भज मां पार्थ सतामेतन्मतं प्रभो ॥
मेरी रक्षा करनेसे आपके धर्मका लोप नहीं होगा । यदि आपके इस धर्मका थोड़ा-सा व्यतिक्रम भी हो जाय तो भी मुझे प्राणदान देनेसे तो आपको महान् धर्म होगा ही । अतः मेरे स्वामी कुन्तीकुमार अर्जुन! मैं आपकी भक्त हूँ, मुझे स्वीकार कीजिये; यह आर्तरक्षण सत्पुरुषोंका मत है ।
नारद उवाच
कच्चिद् धर्मे त्रयीमूले पूर्वैराचरिते जनैः ।
यतमानस्तथा कर्तुं तस्मिन् कर्मणि वर्तसे ॥
तीनों वेद ही जिसके मूल हैं और पूर्वपुरुषोंने जिसका आचरण किया है, उस धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तुम अपने पूर्वजोंकी ही भाँति प्रयत्नशील तो रहते हो? धर्मानुकूल कर्ममें ही तुम्हारी प्रवृत्ति तो रहती है?
नारद → युधिष्ठिर
कच्चिदेषा च ते बुद्धिर्वृत्तिरेषा च तेऽनघ ।
आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थदर्शिनी ॥
पापरहित युधिष्ठिर! अबतक जैसा बतलाया गया है, उसके अनुसार ही तुम्हारी बुद्धि और वृत्ति (विचार और आचार) हैं न? ऐसी धर्मानुकूल बुद्धि और वृत्ति आयु तथा यशको बढ़ानेवाली एवं धर्म, अर्थ तथा कामको पूर्ण करनेवाली है ।
वैशम्पायन उवाच
परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात् ।
शत्रूणां क्षपणाच्चैव बीभत्सोः सव्यसाचिनः ॥
धीमतः सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात् ।
वैनत्यात् सर्वतश्चैव नकुलस्य स्वभावतः ॥
अविग्रहा वीतभयाः स्वधर्मनिरताः सदा ।
निकामवर्षाः स्फीताश्च आसञ्जनपदास्तथा ॥
महाराज युधिष्ठिर सबको आत्मीयजनोंकी भाँति अपनाते, भीमसेन सबकी रक्षा करते, सव्यसाची अर्जुन शत्रुओंके संहारमें लगे रहते, बुद्धिमान् सहदेव सबको धर्मका उपदेश दिया करते और नकुल स्वभावसे ही सबके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करते थे । इससे उनके राज्यके सभी जनपद कलहशून्य, निर्भय, स्वधर्मपरायण तथा उन्नतिशील थे । वहाँ उनकी इच्छाके अनुसार समयपर वर्षा होती थी ।
वैशम्पायन उवाच
सर्वेषां दीयतां देयं मुञ्चन् कोपमदावुभौ ।
साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छ्रयेत भाषितम् ॥
क्रोध और अभिमानसे रहित होकर राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंसे कह दिया कि ‘देनेयोग्य वस्तुएँ सबको दी जायँ अथवा सारी जनताका पावना (ऋण) चुका दिया जाय ।’ उनके राज्यमें ‘धर्मराज! आप धन्य हैं । धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आपको साधुवाद!’ इसके सिवा और कोई बात नहीं सुनी जाती थी ।
राजा युधिष्ठिर ने क्रोध और अभिमान से रहित होकर अपने सेवकों से कहा।
जरासंध उवाच
अथ धर्मोपघाताद्धि मनः समुपतप्यते ।
योऽनागसि प्रसजति क्षत्रियो हि न संशयः ॥
अतोऽन्यथा चरँल्लोके धर्मज्ञः सन् महारथः ।
वृजिनां गतिमाप्नोति श्रेयसोऽप्युपहन्ति च ॥
किसीके धर्म (और अर्थ)-में बाधा डालनेसे अवश्य ही मनको बड़ा संताप होता है । जो धर्मज्ञ महारथी क्षत्रिय लोकमें धर्मके विपरीत आचरण करता हुआ किसी निरपराध व्यक्तिपर दूसरोंके धन और धर्मके नाशका दोष लगाता है, वह कष्टमयी गतिको प्राप्त होता है और अपनेको कल्याणसे भी वंचित कर लेता है; इसमें संशय नहीं है ।
जरासंध उवाच
त्रैलोक्ये क्षत्रधर्मो हि श्रेयान् वै साधुचारिणाम् ।
नान्यं धर्मं प्रशंसन्ति ये च धर्मविदो जनाः ॥
सत्कर्म करनेवाले क्षत्रियोंके लिये तीनों लोकोंमें क्षत्रियधर्म ही श्रेष्ठ है । धर्मज्ञ पुरुष क्षत्रियके लिये अन्य धर्मकी प्रशंसा नहीं करते ।
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् काले तु यद् युक्तं धर्मकामार्थसंहितम् ।
तद् राजा धर्मतश्चक्रे प्रजापालनकीर्तनम् ॥
उस समय धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये जो उचित कर्तव्य था, उसका राजा युधिष्ठिरने धर्मपूर्वक पालन किया । वे प्रजाओंकी रक्षा करनेके साथ ही उन्हें धर्मका उपदेश भी देते रहते थे ।
शिशुपाल उवाच
नायं युक्तः समाचारः पाण्डवेषु महात्मसु ।
यत् कामात् पुण्डरीकाक्षं पाण्डवार्चितवानसि ॥
बाला यूयं न जानीध्वं धर्मः सूक्ष्मो हि पाण्डवाः ।
अयं च स्मृत्यतिक्रान्तो ह्यापगेयोऽल्पदर्शनः ॥
महात्मा पाण्डवोंके लिये यह विपरीत आचार कभी उचित नहीं है । पाण्डुकुमार! तुमने स्वार्थवश कमलनयन श्रीकृष्णका पूजन किया है । पाण्डवो! अभी तुमलोग बालक हो । तुम्हें धर्मका पता नहीं है, क्योंकि धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है । ये गंगानन्दन भीष्म बहुत बूढ़े हो गये हैं । अब इनकी स्मरणशक्ति जवाब दे चुकी है । इनकी सूझ और समझ भी बहुत कम हो गयी है (तभी इन्होंने श्रीकृष्णपूजाकी सम्मति दी है)
शिशुपाल ने पाण्डवों से कहा।
शिशुपाल → भीष्म
इति सन्तोऽनुशासन्ति सज्जनं धर्मिणः सदा ।
भीष्म लोके हि तत् सर्वं वितथं त्वयि दृश्यते ॥
भीष्म! जगत्में साधु धर्मात्मा पुरुष सज्जनोंको सदा इसी धर्मका उपदेश देते रहते हैं; किंतु तुम्हारे निकट यह सब धर्म मिथ्या दिखायी देता है ।
शिशुपाल → भीष्म
को हि धर्मिणमात्मानं जानन् ज्ञानविदां वरः ।
कुर्याद् यथा त्वया भीष्म कृतं धर्ममवेक्षता ॥
भीष्म! कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनेको ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ और धर्मात्मा जानते हुए भी ऐसे नीच कर्म करेगा, जो धर्मपर दृष्टि रखते हुए भी तुम्हारे द्वारा किये गये हैं ।
दुर्योधन उवाच
भिनत्ति शिरसा शैलमहिं भोजयते च यः ।
धीरेव कुरुते तस्य कार्याणामनुशासनम् ।
यो बलादनुशास्तीह सोऽमित्रं तेन विन्दति ॥
जिनसे प्रेरित होकर मनुष्य अपने सिरसे पर्वतको विदीर्ण करना चाहता है — अर्थात् पत्थरपर सिर पटककर स्वयं ही अपनेको पीड़ा देता है तथा जिनकी प्रेरणासे मनुष्य सर्पको भी दूध पिलाकर पालता है, उसी सर्वनियन्ताकी बुद्धि समस्त जगत्के कार्योंका अनुशासन करती है । जो बलपूर्वक किसीपर अपना उपदेश लादता है, वह अपने उस व्यवहारके द्वारा उसे अपना शत्रु बना लेता है ।
विदुर उवाच
यः पुनर्वितथं ब्रूयाद् धर्मदर्शी सभां गतः ।
अनृतस्य फलं कृत्स्नं सम्प्राप्नोतीति निश्चयः ॥
इसी प्रकार जो धर्मज्ञ मानव सभामें जाकर किसी प्रश्नपर झूठा निर्णय देता है, वह निश्चय ही असत्यभाषण-का पूरा फल (दण्ड) पाता है ।
कश्यप उवाच
जानन्नविब्रुवन् प्रश्नान् कामात् क्रोधाद् भयात् तथा ।
सहस्रं वारुणान् पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ॥
कश्यपजीने कहा — जो जानते हुए भी काम, क्रोध तथा भयसे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देता, वह अपने ऊपर वरुणदेवताके सहस्रों पाश डाल लेता है ।
धृतराष्ट्र उवाच
न वैराण्यभिजानन्ति गुणान् पश्यन्ति नागुणान् ।
विरोधं नाधिगच्छन्ति ये त उत्तमपूरुषाः ॥
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि ।
सन्तः परार्थं कुर्वाणा नावेक्षन्ते प्रतिक्रियाम् ॥
जो पुरुष वैरको याद नहीं रखते, गुणोंको ही देखते हैं, अवगुणोंको नहीं तथा किसीसे विरोध नहीं रखते, वे ही उत्तम पुरुष कहे गये हैं । साधु पुरुष दूसरोंके सत्कर्मों (उपकारादि)-को ही याद रखते हैं, उनके किये हुए वैरको नहीं । वे दूसरोंकी भलाई तो करते हैं; परंतु उनसे बदला लेनेकी भावना नहीं रखते ।
धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा।
विदुर उवाच
एष वै सर्वकल्याणः समाधिस्तव भारत ।
नैनं शत्रुर्विषहते शक्रेणापि समोऽप्युत ॥
भारत! तुम्हारा यह क्षमाशीलताका नियम सब प्रकारसे कल्याणकारी है । इन्द्रके समान पराक्रमी शत्रु भी इसका सामना नहीं कर सकता ।
विदुर → युधिष्ठिर
अगदं वोऽस्तु भद्रं वो द्रष्टास्मि पुनरागतान् ।
आपद्धर्मार्थकृच्छ्रेषु सर्वकार्येषु वा पुनः ॥
यथावत् प्रतिपद्येथाः काले काले युधिष्ठिर ।
आपृष्टोऽसीह कौन्तेय स्वस्ति प्राप्नुहि भारत ॥
तुम्हें कभी कोई रोग न हो, सदा मंगल-ही-मंगल दिखायी दे । कुशलपूर्वक वनसे लौटनेपर मैं फिर तुम्हें देखूँगा । युधिष्ठिर! आपत्तिकालमें, धर्म तथा अर्थका संकट उपस्थित होनेपर अथवा सभी कार्योंमें समय-समयपर अपने उचित कर्तव्यका पालन करना । कुन्तीनन्दन! भारत! तुमसे आवश्यक बातें कर लीं । तुम्हें कल्याण प्राप्त हो ।