श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

शरणागति

समर्पण और प्रभु पर भरोसा

74 पद्य

श्रीरामचरितमानस

जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ ॥

तिन्ह कहुँ मानस अगम अतिजिन्हहि न प्रिय रघुनाथ ॥

जिनके पास श्रद्धारूपी राह-खर्च नहीं है और संतोंका साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस अत्यन्त ही अगम है । (अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेमके बिना कोई इसको नहीं पा सकता)

बालकाण्ड, दोहा 38 श्रीरामचरितमानस पृ. 63 सत्सङ्ग–सन्त महिमा
ईश्वरीय विधान की स्वीकार्यता

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥

अस कहि लगे जपन हरिनामा । गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥

जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा । तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे । [मनमें] ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुखके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ।

सतीजी को राम की परीक्षा लेने से रोक न पाकर शिवजी ने मन ही मन ऐसा कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 52.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 75 कर्म–प्रारब्ध भक्ति

बर दायक प्रनतारति भंजन । कृपासिंधु सेवक मन रंजन ॥

इच्छित फल बिनु सिव अवराधें । लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥

शिवजी वर देनेवाले, शरणागतोंके दुःखोंका नाश करनेवाले, कृपाके समुद्र और सेवकोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हैं । शिवजीकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप करनेपर भी वाञ्छित फल नहीं मिलता ।

बालकाण्ड, चौपाई 70.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 90 भक्ति

धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे ॥

जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ ॥

किसीने भी हृदयमें धैर्य नहीं धारण किया, कामदेवने सबके मन हर लिये । श्रीरघुनाथजीने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे ।

बालकाण्ड, सोरठा 85 श्रीरामचरितमानस पृ. 102

बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतू ॥

कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी । तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥

कृपाके समुद्र शिवजी बोले — हे देवताओ! कहिये, आप किसलिये आये हैं? ब्रह्माजीने कहा — हे प्रभो! आप अन्तर्यामी हैं, तथापि हे स्वामी! भक्तिवश मैं आपसे विनती करता हूँ ।

बालकाण्ड, चौपाई 88.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 105 भक्ति
प्रभु की महिमा

प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम ॥

जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम ॥

हे प्रभो! आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं । सब कलाओं और गुणोंके निधान हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्यके भण्डार हैं । आपका नाम शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष है ।

पार्वतीजी ने शिवजी से प्रार्थना की।

बालकाण्ड, दोहा 107 श्रीरामचरितमानस पृ. 123 ज्ञान–विवेक

अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद ॥

सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम ॥

अपने हृदयमें ऐसा विचारकर सन्देह छोड़ दो और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंको भजो । हे पार्वती! भ्रमरूपी अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्यकी किरणोंके समान मेरे वचनोंको सुनो!

बालकाण्ड, सोरठा 115 श्रीरामचरितमानस पृ. 130

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार ॥

सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार ॥

हे नारदजी! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं । हमारा वचन असत्य नहीं होता ।

बालकाण्ड, दोहा 132 श्रीरामचरितमानस पृ. 144

ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई । भगत हेतु लीलातनु गहई ॥

जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा । तौ हमार पूजिहि अभिलाषा ॥

ऐसे [महान्] प्रभु भी सेवकके वशमें हैं और भक्तोंके लिये [दिव्य] लीलाविग्रह धारण करते हैं । यदि वेदोंमें यह वचन सत्य कहा है तो हमारी अभिलाषा भी अवश्य पूरी होगी ।

बालकाण्ड, चौपाई 144.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 154 लीला–रहस्य
ईश्वर की महिमा

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू । बिधि हरि हर बंदित पद रेनू ॥

सेवत सुलभ सकल सुखदायक । प्रनतपाल सचराचर नायक ॥

हे प्रभो! सुनिये, आप सेवकोंके लिये कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं । आपकी चरण-रजकी ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी भी वन्दना करते हैं । आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं । आप शरणागतके रक्षक और जड-चेतनके स्वामी हैं ।

मनुजी ने प्रेमपूर्वक भगवान से यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 146.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 155 भक्ति

सुत बिषइक तव पद रति होऊ । मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ ॥

मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना । मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना ॥

आपके चरणोंमें मेरी वैसी ही प्रीति हो जैसी पुत्रके लिये पिताकी होती है, चाहे मुझे कोई बड़ा भारी मूर्ख ही क्यों न कहे । जैसे मणिके बिना साँप और जलके बिना मछली [नहीं रह सकती], वैसे ही मेरा जीवन आपके अधीन रहे (आपके बिना न रह सके)

बालकाण्ड, चौपाई 151.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 159 भक्ति

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता ॥

गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता ॥

पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई ॥

जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥

हे देवताओंके स्वामी, सेवकोंको सुख देनेवाले, शरणागतकी रक्षा करनेवाले भगवान्! आपकी जय हो! जय हो!! हे गो-ब्राह्मणोंका हित करनेवाले, असुरोंका विनाश करनेवाले, समुद्रकी कन्या (श्रीलक्ष्मीजी) के प्रिय स्वामी! आपकी जय हो । हे देवता और पृथ्वीका पालन करनेवाले! आपकी लीला अद्भुत है,उसका भेद कोई नहीं जानता । ऐसे जो स्वभावसे ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हमपर कृपा करें ।

बालकाण्ड, छन्द 187.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 188 भक्ति

बारेहि ते निज हित पति जानी । लछिमन राम चरन रति मानी ॥

भरत सत्रुहन दूनउ भाई । प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई ॥

बचपनसे ही श्रीरामचन्द्रजीको अपना परम हितैषी स्वामी जानकर लक्ष्मणजीने उनके चरणोंमें प्रीति जोड़ ली । भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंमें स्वामी और सेवककी जिस प्रीतिकी प्रशंसा है वैसी प्रीति हो गयी ।

बालकाण्ड, चौपाई 198.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 199 भक्ति
परम कृपालु प्रभु

अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल ॥

तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऐसे दीनबन्धु और बिना ही कारण दया करनेवाले हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ [मन]! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हींका भजन कर ।

बालकाण्ड, दोहा 211 श्रीरामचरितमानस पृ. 212 भक्ति
सच्चे स्नेह का फल

तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी ॥

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥

तो सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् मुझे रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी दासी अवश्य बनायेंगे । जिसका जिसपर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ।

सीताजी ने अपनी व्याकुलता जानकर धीरज धरकर हृदय में विश्वास लेकर यह वाणी कही।

बालकाण्ड, चौपाई 259.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 253 भक्ति

बार बार मागउँ कर जोरें । मनु परिहरै चरन जनि भोरें ॥

सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे । पूरनकाम रामु परितोषे ॥

मैं बार-बार हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणोंको न छोड़े । जनकजीके श्रेष्ठ वचनोंको सुनकर, जो मानो प्रेमसे पुष्ट किये हुए थे, पूर्णकाम श्रीरामचन्द्रजी सन्तुष्ट हुए ।

बालकाण्ड, चौपाई 342.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 327
गुरु पद-रज की महिमा

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं । ते जनु सकल बिभव बस करहीं ॥

मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें । सबु पायउँ रज पावनि पूजें ॥

जो लोग गुरुके चरणोंकी रजको मस्तकपर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्यको अपने वशमें कर लेते हैं । इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसीने नहीं किया । आपकी पवित्र चरण-रजकी पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया ।

राजा ने मुनिराज से यह बात कही।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 3.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 348 गुरु महिमा
सेवक का समर्पण

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू । भयउ पुनीत आजु यहु गेहू ॥

आयसु होइ सो करौं गोसाईं । सेवकु लहइ स्वामि सेवकाईं ॥

परन्तु प्रभु (आप)-ने प्रभुता छोड़कर (स्वयं यहाँ पधारकर) जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया । हे गोसाईं! [अब] जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ स्वामीकी सेवामें ही सेवकका लाभ है ।

श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि वसिष्ठजी के आगमन पर उनके चरणों में मस्तक नवाकर और षोडशोपचार से पूजन करके उनका स्वागत किया।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 9.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 353 भक्ति
अनन्त सेवकत्व की अभिलाषा

जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं । तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं ॥

सेवक हम स्वामी सियनाहू । होउ नात यह ओर निबाहू ॥

भगवान् हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश भ्रमते हुए जिस-जिस योनिमें जन्में, वहाँ-वहाँ (उस-उस योनिमें) हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्रजी हमारे स्वामी हों और यह नाता अन्ततक निभ जाय ।

श्रीरामचन्द्रजी के बालसखा उनके राजतिलक का समाचार सुनकर हर्षित हुए और प्रभु से मिलकर उनकी बड़ाई करते हुए घर लौटे।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 24.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 365

बारहिं बार लाइ उर लीन्ही । धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥

अचल होउ अहिवातु तुम्हारा । जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥

उन्होंने सीताजीको बार-बार हृदयसे लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गङ्गाजी और यमुनाजीमें जलकी धारा बहे, तबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 69.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 403 भक्ति
भक्त की कृतज्ञता

नाथ आजु मैं काह न पावा । मिटे दोष दुख दारिद दावा ॥

बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी । आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी ॥

[उसने कहा—] हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रताकी आग आज बुझ गयी है । मैंने बहुत समयतक मजदूरी की । विधाताने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी ।

केवट ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी से नाव की उतराई के बदले प्राप्त रत्नजटित अँगूठी को लेकर कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 102.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 430

जिन्हजिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ ॥

भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ ॥

प्यारे पथिक सीताजीसहित दोनों भाइयोंको जिन-जिन लोगोंने देखा, उन्होंने भवका अगम मार्ग (जन्म-मृत्युरूपी संसारमें भटकनेका भयानक मार्ग) बिना ही परिश्रम आनन्दके साथ तै कर लिया (अर्थात् वे आवागमनके चक्रसे सहज ही छूटकर मुक्त हो गये)

अयोध्याकाण्ड, दोहा 123 श्रीरामचरितमानस पृ. 448 ज्ञान–विवेक
ईश्वरीय कृपा और साक्षात्कार

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन । जानहिं भगत भगत उर चंदन ॥

वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है । हे रघुनन्दन! हे भक्तोंके हृदयके शीतल करनेवाले चन्दन! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 128.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 451 ज्ञान–विवेक भक्ति
श्रीराम पर अटूट भरोसा

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस ॥

आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस ॥

यद्यपि मेरा जन्म कुमातासे हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्रीरामजीका भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं ।

भरतजी ने अयोध्या में उपस्थित सभी लोगों से यह वचन कहे।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 183 श्रीरामचरितमानस पृ. 497
परम त्याग का सङ्कल्प

स्वामि काज करिहउँ रन रारी । जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ॥

तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें । दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें ॥

मैं स्वामीके कामके लिये रणमें लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकोंको अपने यशसे उज्ज्वल कर दूँगा । श्रीरघुनाथजीके निमित्त प्राण त्याग दूँगा । मेरे तो दोनों ही हाथोंमें आनन्दके लड्डू हैं (अर्थात् जीत गया तो रामसेवकका यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजीकी नित्य सेवा प्राप्त करूँगा)

निषादराज ने श्रीरामजी के लिए प्राणसमर्पण का निश्चय करके यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 190.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 503 भक्ति

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी । जौं सनमानहिं सेवकु मानी ॥

मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही ॥

चाहे मलिन-मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें (कुछ भी करें); मेरे तो श्रीरामचन्द्रजीकी जूतियाँ ही शरण हैं । श्रीरामचन्द्रजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दासका ही है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 234.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 540

आरत कहहिं बिचारि न काऊ । सूझ जुआरिहि आपन दाऊ ॥

सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ । नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ॥

आर्त (दुखी) लोग कभी विचारकर नहीं कहते । जुआरीको अपना ही दाँव सूझता है । मुनिके वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे-हे नाथ! उपाय तो आपहीके हाथ है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 258.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 561
गुरु और श्रीरघुपति की शरण

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा । एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा ॥

गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू ॥

मैं अपने हृदयमें सब ओर खोजकर हार गया (मेरी भलाईका कोई साधन नहीं सूझता) । एक ही प्रकार भले ही (निश्चय ही) मेरा भला है । वह यह है कि गुरु महाराज सर्वसमर्थ हैं और श्रीसीतारामजी मेरे स्वामी हैं । इसीसे परिणाम मुझे अच्छा जान पड़ता है ।

भरतजी ने चित्रकूट की सभा में गुरुजी और श्रीरामचन्द्रजी के सामने अपने मन की बात कही।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 261.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 563

तात जायँ जियँ करहु गलानी । ईस अधीन जीव गति जानी ॥

तीनि काल तिभुअन मत मोरें । पुन्यसिलोक तात तर तोरें ॥

हे तात! तुम अपने हृदयमें व्यर्थ ही ग्लानि करते हो । जीवकी गतिको ईश्वरके अधीन जानो । मेरे मतमें [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों और [स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल] तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 263.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 565 ज्ञान–विवेक

सुर गन सहित सभय सुरराजू । सोचहिं चाहत होन अकाजू ॥

बनत उपाउ करत कछु नाहीं । राम सरन सब गे मन माहीं ॥

देवगणोंसहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है । कुछ उपाय करते नहीं बनता । तब वे सब मन-ही-मन श्रीरामजीकी शरण गये ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 265.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 566

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका । राम रजायस आपन नीका ॥

निज पन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ॥

सब तरहसे विचार करके अन्तमें उन्होंने मनमें यही निश्चय किया कि श्रीरामजीकी आज्ञामें ही अपना कल्याण है । उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा । यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया (अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया)

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 266.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 567 भक्ति
शरणागत की रक्षा

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला । प्रनतपाल पन आपन पाला ॥

यह नइ रीति न राउरि होई । लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई ॥

इन सबने मिलकर पैर रोपकर (प्रण करके) मुझे नष्ट कर दिया था । परन्तु शरणागतके रक्षक आपने अपना [शरणागतकी रक्षाका] प्रण निबाहा (मुझे बचा लिया) । यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है । यह लोक और वेदोंमें प्रकट है, छिपी नहीं है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 267.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 568
निस्वार्थ सेवा का महत्व

जो सेवकु साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची ॥

सेवक हित साहिब सेवकाई । करै सकल सुख लोभ बिहाई ॥

जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है । सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 268.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 569 सेवा–करुणा–विनय

समरथ सरनागत हितकारी । गुनगाहकु अवगुन अघ हारी ॥

स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाईं । मोहि समान मैं साइँ दोहाई ॥

समर्थ, शरणागतका हित करनेवाले, गुणोंका आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापोंको हरनेवाले हैं । हे गोसाईं! आप-सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामीके साथ द्रोह करनेमें मेरे समान मैं ही हूँ ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 298.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 595 भक्ति
स्वामी की निस्वार्थ कृपा

को साहिब सेवकहि नेवाजी । आपु समाज साज सब साजी ॥

निज करतूति न समुझिअ सपनें । सेवक सकुच सोचु उर अपनें ॥

ऐसा सेवकपर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवकका सारा साज-सामान सज दे (उसकी सारी आवश्यकताओंको पूर्ण कर दे) और स्वप्नमें भी अपनी कोई करनी न समझकर (अर्थात् मैंने सेवकके लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर) उलटा सेवकको संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदयमें रखे!

भरतजी ने श्रीरामचन्द्रजी की स्तुति करते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 299.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 596 सेवा–करुणा–विनय
स्वामी की अद्वितीयता

सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी । भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ॥

पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना । गुन गति नट पाठक आधीना ॥

मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर (बड़े जोरके साथ) कहता हूँ, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है । [बंदर आदि] पशु नाचते और तोते [सीखे हुए] पाठमें प्रवीण हो जाते हैं । परन्तु तोतेका [पाठप्रवीणतारूप] गुण और पशुके नाचनेकी गति [क्रमश:] पढ़ानेवाले और नचानेवालेके अधीन है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 299.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 596
रामभक्ति की चतुराई

कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप ॥

परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर ॥

यह कठिन कलिकाल पापोंका खजाना है; इसमें न धर्म है, न ज्ञान है और न योग तथा जप ही है । इसमें तो जो लोग सब भरोसोंको छोड़कर श्रीरामजीको ही भजते हैं, वे ही चतुर हैं ।

अरण्यकाण्ड, सोरठा 6(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 630 वैराग्य

नहिं सतसंग जोग जप जागा । नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा ॥

एक बानि करुनानिधान की । सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥

मैंने न तो सत्सङ्ग, योग, जप अथवा यज्ञ ही किये हैं और न प्रभुके चरणकमलोंमें मेरा दृढ़ अनुराग ही है । हाँ, दयाके भण्डार प्रभुकी एक बान है कि जिसे किसी दूसरेका सहारा नहीं है, वह उन्हें प्रिय होता है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 10.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 633 भक्ति

उभय भाँति देखा निज मरना । तब ताकिसि रघुनायक सरना ॥

उतरु देत मोहि बधब अभागें । कस न मरौं रघुपति सर लागें ॥

जब मारीचने दोनों प्रकारसे अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजीकी शरण तकी (अर्थात् उनकी शरण जानेमें ही कल्याण समझा) । [सोचा कि] उत्तर देते ही (नाहीं करते ही) यह अभागा मुझे मार डालेगा । फिर श्रीरघुनाथजीके बाण लगनेसे ही क्यों न मरूँ?

अरण्यकाण्ड, चौपाई 26.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 656
ईश्वरीय कृपा और मुक्ति

क्रोध मनोज लोभ मद माया । छूटहिं सकल राम कीं दाया ॥

सो नर इंद्रजाल नहिं भूला । जा पर होइ सो नट अनुकूला ॥

क्रोध, काम, लोभ, मद और माया-ये सभी श्रीरामजीकी दयासे छूट जाते हैं । वह नट (नटराजभगवान्) जिसपर प्रसन्न होता है, वह मनुष्य इन्द्रजाल (माया) में नहीं भूलता ।

श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 39(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 673 काम–क्रोध–लोभ–मोह

तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा । प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा ॥

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा । भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा ॥

करउँ सदा तिन्ह के रखवारी । जिमि बालक राखड़ महतारी ॥

गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई । तहँ राखड़ जननी अरगाई ॥

तब मैं विवाह करना चाहता था । हे प्रभु! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया? [प्रभु बोले—] हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्षके साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं, मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालककी रक्षा करती है । छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँपको पकड़ने जाता है तो वहाँ माता उसे [अपने हाथों] अलग करके बचा लेती है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 43.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 677 भक्ति

जेन भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी । ग्यान रंक नर मंद अभागी ॥

पुनि सादर बोले मुनि नारद । सुनहु राम बिग्यान बिसारद ॥

संतन्ह के लच्छन रघुबीरा । कहहु नाथ भव भंजन भीरा ॥

सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ । जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ ॥

जो मनुष्य भ्रमको त्यागकर ऐसे प्रभुको नहीं भजते, वे ज्ञानके कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं । फिर नारद मुनि आदरसहित बोले — हे विज्ञान-विशारद श्रीरामजी! सुनिये, हे रघुवीर! हे भव भय (जन्म-मरणके भय)-का नाश करनेवाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतोंके लक्षण कहिये । [श्रीरामजीने कहा—] हे मुनि! सुनो, मैं संतोंके गुणोंको कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वशमें रहता हूँ ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 45.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 679 ज्ञान–विवेक

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें । सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें ॥

नाथ जीव तव मायाँ मोहा । सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा ॥

हे नाथ! यद्यपि मुझमें बहुत-से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामीकी विस्मृतिमें न पड़े (आप उसे न भूल जायँ) हे नाथ! जीव आपकी मायासे मोहित है । वह आपहीकी कृपासे निस्तार पा सकता है ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 3.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 686 भक्ति
पूर्ण शरणागति

ता पर मैं रघुबीर दोहाई । जानउँ नहिं कछु भजन उपाई ॥

सेवक सुत पति मातु भरोसें । रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें ॥

उसपर हे रघुवीर! मैं आपकी दुहाई (शपथ) करके कहता हूँ कि मैं भजन-साधन कुछ नहीं जानता । सेवक स्वामीके और पुत्र माताके भरोसे निश्चिन्त रहता है । प्रभुको सेवकका पालन-पोषण करते ही बनता है (करना ही पड़ता है)

हनुमान्जी ने अकुलाकर प्रभु के चरणों पर गिरते हुए यह कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 3.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 686
अनन्य सेवक की बुद्धि

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ॥

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ॥

और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान्‌का रूप है ।

श्रीरघुनाथजी ने हनुमानजी को उठाकर हृदय से लगाया और उन्हें सम्बोधित करते हुए यह कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 3 श्रीरामचरितमानस पृ. 686 भक्ति ज्ञान–विवेक
समर्पण का सङ्कल्प

उपजा ग्यान बचन तब बोला । नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला ॥

सुख संपति परिवार बड़ाई । सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ॥

जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा मन स्थिर हो गया । सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़प्पन) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा ।

श्रीरामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गई और वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 7.8 श्रीरामचरितमानस पृ. 691 वैराग्य माया–संसार
सद्गुरु का प्रभाव

भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ ॥

सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ ॥

[वर्षा ऋतुके कारण] पृथ्वीपर जो जीव भर गये थे, वे शरद् ऋतुको पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सद्गुरुके मिल जानेपर सन्देह और भ्रमके समूह नष्ट हो जाते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 17 श्रीरामचरितमानस पृ. 701

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ॥

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥

अयोध्यापुरीके राजा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखे हुए नगरमें प्रवेश करके सब काम कीजिये । उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर हो जाता है, अग्निमें शीतलता आ जाती है ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 5.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 721 भक्ति

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि ॥

गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥

खरके शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके समुद्र हैं । शरण जानेपर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरणमें रख लेंगे ।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 22 श्रीरामचरितमानस पृ. 737

जामवंत कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥

ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥

जाम्बवान्ने कहा — हे रघुनाथजी! सुनिये । हे नाथ! जिसपर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है । देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 30.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 743

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा । बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥

जासु नाम त्रय ताप नसावन । सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ॥

जिसे सम्पूर्ण जगत्से द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण जानेपर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते । जिनका नाम तीनों तापोंका नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूपमें प्रकट हुए हैं । हे रावण! हृदयमें यह समझ लीजिये ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 39(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 752 भक्ति

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ॥

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥

[श्रीरामजी फिर बोले—] जो मनुष्य अपने अहितका अनुमान करके शरणमें आये हुएका त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं, पापमय हैं; उन्हें देखनेमें भी हानि है (पाप लगता है)

सुन्दरकाण्ड, दोहा 43 श्रीरामचरितमानस पृ. 756

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ॥

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥

जिसे करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या लगी हो, शरणमें आनेपर मैं उसे भी नहीं त्यागता । जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 44.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 756

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ । जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ॥

जौं नर होइ चराचर द्रोही । आवै सभय सरन तकि मोही ॥

तजि मद मोह कपट छल नाना । करउँ सद्य तेहि साधु समाना ॥

जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ॥

सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥

समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥

[श्रीरामजीने कहा—] हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती हैं । कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड-चेतन जगत्का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाय, और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ । माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार, इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 48.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 759

सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥

समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥

इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 48.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 759 वैराग्य

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ॥

जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि । सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि ॥

जो मनुष्य [मेरे स्थापित किये हुए इन] रामेश्वरजीका दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोकको जायँगे । और जो गङ्गाजल लाकर इनपर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा (अर्थात् मेरे साथ एक हो जायगा)

लङ्काकाण्ड, चौपाई 3.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 776 भक्ति

होइ अकाम जो छल तजि सेइहि । भगति मोरि तेहि संकर देहि ॥

मम कृत सेतु जो दरसनु करिही । सो बिनु श्रम भवसागर तरिही ॥

जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्रीरामेश्वरजीकी सेवा करेंगे, उन्हें शङ्करजी मेरी भक्ति देंगे । और जो मेरे बनाये सेतुका दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जायगा ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 3.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 776 भक्ति

जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ ॥

राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ ॥

जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडमें सिंह [निःशङ्क होकर] चला जाता है, वैसे ही श्रीरामजीके प्रतापका हृदयमें स्मरण करके वे [निर्भय] सभामें सिर नवाकर बैठ गये ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 19 श्रीरामचरितमानस पृ. 792

सुनु रावन परिहरि चतुराई । भजसि न कृपासिंधु रघुराई ॥

जौं खल भएसि राम कर द्रोही । ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥

अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन । कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीका तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि तू श्रीरामजीका वैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 27.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 799 भक्ति

जथा पंख बिनु खग अति दीना । मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥

अस मम जिवन बंधु बिनु तोही । जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥

जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं, हे भाई! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 61.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 832
सेवक की प्रीति की परीक्षा

उमा काल मर जाकीं ईछा । सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥

सुनु सरबग्य चराचर नायक । प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक ॥

नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जिअत रावनु बल ताकें ॥

सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं । [विभीषणजीने कहा — -] हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये, इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है । हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है । विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये ।

श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण की ओर देखा, तब शिवजी कहते हैं।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 102.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 880 गुरु महिमा

हम देवता परम अधिकारी । स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी ॥

भव प्रबाहँ संतत हम परे । अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥

हम देवता श्रेष्ठ अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्तिको भुलाकर निरन्तर भवसागरके प्रवाह (जन्म-मृत्युके चक्र) में पड़े हैं । अब हे प्रभो! हम आपकी शरणमें आ गये हैं, हमारी रक्षा कीजिये ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 110.6 श्रीरामचरितमानस पृ. 891 भक्ति

जौं करनी समुझे प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कलप सत कोरी ॥

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ । दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ॥

[बात भी ठीक ही है, क्योंकि] यदि प्रभु मेरी करनीपर ध्यान दें, तो सौ करोड़ (असंख्य) कल्पोंतक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता । [परन्तु आशा इतनी ही है कि] प्रभु सेवकका अवगुण कभी नहीं मानते । वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभावके हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 1(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 909 भक्ति

मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ॥

बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना । अधम कवन जग मोहि समाना ॥

अतएव मेरे हृदयमें ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे, [क्योंकि] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं । किन्तु अवधि बीत जानेपर यदि मेरे प्राण रह गये तो जगत्में मेरे समान नीच कौन होगा?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 1(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 909

जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं । बैठि परसपर इहइ सिखावहिं ॥

भज प्रनत प्रतिपालक रामहि । सोभा सील रूप गुन धामहि ॥

लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजीके गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरेको यही सीख देते हैं कि शरणागतका पालन करनेवाले श्रीरामजीको भजो; शोभा, शील, रूप और गुणोंके धाम श्रीरघुनाथजीको भजो ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 30.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 941

उपजइ राम चरन बिस्वासा । भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा ॥

तथा श्रीरामजीके चरणोंमें विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जाता है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 55.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 963

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ॥

राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥

बिना विश्वासके भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते (ढरते) नहीं और श्रीरामजीकी कृपाके बिना जीव स्वप्नमें भी शान्ति नहीं पाता ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 90(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 994 भक्ति ज्ञान–विवेक

भाव सहित खोजइ जो प्रानी । पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा । राम ते अधिक राम कर दासा ॥

जो प्राणी उसे प्रेमके साथ खोजता है, वह सब सुखोंकी खान इस भक्तिरूपी मणिको पा जाता है । हे प्रभो! मेरे मनमें तो ऐसा विश्वास है कि श्रीरामजीके दास श्रीरामजीसे भी बढ़कर हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 120(क).8 श्रीरामचरितमानस पृ. 1034

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा । जौं एहि भाँति बनै संजोगा ॥

सदगुर बैद बचन बिस्वासा । संजम यह न बिषय कै आसा ॥

यदि श्रीरामजीकी कृपासे इस प्रकारका संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जायँ । सद्गुरुरूपी वैद्यके वचनमें विश्वास हो । विषयोंकी आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 122(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1038 भक्ति

रघुपति भगति सजीवन मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं । नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥

श्रीरघुनाथजीकी भक्ति संजीवनी जड़ी है । श्रद्धासे पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवाके साथ लिया जानेवाला मधु आदि) है । इस प्रकारका संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं जाते ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 122(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1038 भक्ति

बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ॥

बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥

जलको मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [को पेरने] से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरिके भजन बिना संसाररूपी समुद्रसे नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 122(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1039 भक्ति

श्लोक- विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे ॥

हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥

मैं आपसे भलीभाँति निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ — मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्रीहरिका भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागरको [सहज ही] पार कर जाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 122(ग) श्रीरामचरितमानस पृ. 1040 भक्ति

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन ॥

बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान ॥

हे गिरिजे! संत-समागमके समान दूसरा कोई लाभ नहीं है । पर वह (संत-समागम) श्रीहरिकी कृपाके बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 125(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1043 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

जासु पतित पावन बड़ बाना । गावहिं कबि श्रुति संत पुराना ॥

ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई । राम भजें गति केहिं नहिं पाई ॥

पतितोंको पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है — ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं — रे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हींको भज । श्रीरामको भजनेसे किसने परम गति नहीं पायी?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 130(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1047 भक्ति