श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

माया–संसार

माया, भ्रम और जगत् का स्वरूप

43 पद्य

श्रीरामचरितमानस

उपजहिं एक संग जग माहीं । जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ॥

सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू ॥

दोनों (संत और असंत) जगत्में एक साथ पैदा होते हैं; पर [एक साथ पैदा होनेवाले] कमल और जोंककी तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं । (कमल दर्शन और स्पर्शसे सुख देता है, किन्तु जोंक शरीरका स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है ।) साधु अमृतके समान (मृत्युरूपी संसारसे उबारनेवाला) और असाधु मदिराके समान (मोह,प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करनेवाला) है, दोनोंको उत्पन्न करनेवाला जगद्रूपी अगाध समुद्र एक ही है । [शास्त्रोंमें समुद्रमन्थनसे ही अमृत और मदिरा दोनोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है] ।

बालकाण्ड, चौपाई 5.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 26 वैराग्य
सकल जगत की वन्दना

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ॥

बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥

जगत्में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलोंकी सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ ।

बालकाण्ड, दोहा 7(ग) श्रीरामचरितमानस पृ. 29 लीला–रहस्य

जे जनमे कलिकाल कराला । करतब बायस बेष मराला ॥

चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े । कपट कलेवर कलि मल भाँड़े ॥

जो कराल कलियुगमें जन्मे हैं, जिनकी करनी कौएके समान है और वेष हंसका-सा है, जो वेदमार्गको छोड़कर कुमार्गपर चलते हैं, जो कपटकी मूर्ति और कलियुगके पापोंके भाँड़े हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 12.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 35
मोह-मद और कुतर्क की बाधा

बन बहु बिषम मोह मद माना । नदीं कुतर्क भयंकर नाना ॥

मोह, मद और मान ही बहुत-से बीहड़ वन हैं और नाना प्रकारके कुतर्क ही भयानक नदियाँ हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 38.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 63 ज्ञान–विवेक
मन की निष्ठा

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम ॥

जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम ॥

माना कि महादेवजी अवगुणोंके भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणोंके धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसीसे काम है ।

बालकाण्ड, दोहा 80 श्रीरामचरितमानस पृ. 98 ज्ञान–विवेक
स्त्री की पराधीनता

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं । पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं ॥

भै अति प्रेम बिकल महतारी । धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी ॥

[फिर बोलीं कि] विधाताने जगत्में स्त्रीजातिको क्यों पैदा किया? पराधीनको सपने में भी सुख नहीं मिलता । यों कहती हुई माता प्रेममें अत्यन्त विकल हो गयी, परन्तु कुसमय जानकर (दुःख करनेका अवसर न जानकर) उन्होंने धीरज धरा ।

पार्वतीजी की विदाई के समय माता मैनाजी ने विलाप करते हुए यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 102.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 118 वैराग्य
माया का भ्रम

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । जदपि असत्य देत दुख अहई ॥

जौं सपनें सिर काटै कोई । बिनु जागें न दूरि दुख होई ॥

इसी तरह यह संसार भगवान्‌के आश्रित रहता है । यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है; जिस तरह स्वप्नमें कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दु:ख दूर नहीं होता ।

बालकाण्ड, चौपाई 118.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 132
ईश्वरीय माया का प्रभाव

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल ॥

अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥

देवता, मनुष्य और मुनियोंमें ऐसा कोई नहीं है जिसे भगवान्‌की महान् बलवती माया मोहित न कर दे । मनमें ऐसा विचारकर उस महामायाके स्वामी (प्रेरक) श्रीभगवान्‌का भजन करना चाहिये ।

शिवजी पार्वती से कहते हैं।

बालकाण्ड, सोरठा 140 श्रीरामचरितमानस पृ. 151 भक्ति
परमेश्वर की महिमा

रघुपति बिमुख जतन कर कोरी । कवन सकइ भव बंधन छोरी ॥

जीव चराचर बस कै राखे । सो माया प्रभु सों भय भाखे ॥

श्रीरघुनाथजीसे विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसारबन्धन कौन छुड़ा सकता है । जिसने सब चराचर जीवोंको अपने वशमें कर रखा है, वह माया भी प्रभुसे भय खाती है ।

बालकाण्ड, चौपाई 200.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 201 कर्म–प्रारब्ध
माया और भक्ति का प्रभाव

देखी माया सब बिधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ॥

देखा जीव नचावइनचावइ जाहीजाही ।। देखीदेखी भगति जो छोरइ ताही ॥

सब प्रकारसे बलवती मायाको देखा कि वह [भगवान्के सामने] अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है । जीवको देखा, जिसे वह माया नचाती है और [फिर] भक्तिको देखा, जो उस जीवको [मायासे] छुड़ा देती है ।

श्रीहरि ने माता को अपना अखण्ड अद्भुत रूप दिखलाया।

बालकाण्ड, चौपाई 202.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 203 भक्ति
भवानी की असीम महिमा

नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ॥

भव भव बिभव पराभव कारिनि । बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ॥

आपका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है । आपके असीम प्रभावको वेद भी नहीं जानते । आप संसारको उत्पन्न, पालन और नाश करनेवाली हैं । विश्वको मोहित करनेवाली और स्वतन्त्ररूपसे विहार करनेवाली हैं ।

सीताजी ने भवानीजी के मन्दिर में उनके चरणों की वन्दना करते हुए यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 235.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 232 ज्ञान–विवेक
संसार का भ्रम

जोग बियोग भोग भल मंदा । हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा ॥

जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू । संपति बिपति करमु अरु कालू ॥

धरनि धामु धनु पुर परिवारू । सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू ॥

देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं । मोह मूल परमारथु नाहीं ॥

संयोग (मिलना), वियोग (बिछुड़ना), भले-बुरे भोग, शत्रु, मित्र और उदासीन — ये सभी भ्रमके फंदे हैं । जन्म-मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल — जहाँतक जगत्के जंजाल हैं, धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है । परमार्थतः ये नहीं हैं ।

लक्ष्मणजी ने निषाद से ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस से सनी कोमल वाणी में कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 92.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 421
संसार का स्वप्नवत स्वरूप

सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ ॥

जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥

जैसे स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपञ्चको हृदयसे देखना चाहिये ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 92 श्रीरामचरितमानस पृ. 422 वैराग्य

जौं ए कंद मूल फल खाहीं । बादि सुधादि असन जग माहीं ॥

एक कहहिं ए सहज सुहाए । आपु प्रगट भए बिधि न बनाए ॥

जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत्में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं । कोई एक कहते हैं — ये स्वभावसे ही सुन्दर हैं [इनका सौन्दर्य-माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है] । ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्माके बनाये नहीं हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 120.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 445 ज्ञान–विवेक
काल-कर्म का प्रभाव

जनम मरन सब दुख सुख भोगा । हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा ॥

काल करम बस होहिं गोसाईं । बरबस राति दिवस की नाईं ॥

जन्म-मरण, सुख-दुःखके भोग, हानि-लाभ, प्यारोंका मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी! काल और कर्मके अधीन रात और दिनकी तरह बरबस होते रहते हैं ।

मन्त्री ने राजा को धीरज बँधाते हुए यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 150.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 470 कर्म–प्रारब्ध काल–मृत्यु

बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने । सहसनयन बिनु लोचन जाने ॥

मायापति सेवक सन माया । करइ त उलटि परइ सुरराया ॥

इन्द्रके वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुसकराये । उन्होंने हजार नेत्रोंवाले इन्द्रको [ज्ञानरूपी] नेत्रोंसे रहित (मूर्ख) समझा और कहा — हे देवराज! मायाके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके सेवकके साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 218.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 526

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं । बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं ॥

कहि जग गति मायिक मुनिनाथा । कहे कछुक परमारथ गाथा ॥

सीताजी और सब रानियाँ स्नेहके मारे व्याकुल हैं । तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेके लिये कहा । फिर मुनिनाथ वसिष्ठजीने जगत्‌की गतिको मायिक कहकर (अर्थात् जगत् मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर) कुछ परमार्थकी कथाएँ (बातें) कहीं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 247.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 551 ज्ञान–विवेक

देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू । मोरें नीति न धरम बिचारू ॥

कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू । रहत न आरत कें चित चेतू ॥

हे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी) मुझपर रख दिया । पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका । मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ । आर्त (दुखी) मनुष्यके चित्तमें चेत (विवेक) नहीं रहता ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 269.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 570 कर्म–प्रारब्ध
ईश्वरीय विधान की अपरिवर्तनीयता

ईस रजाइ सीस सबही कें । उतपति थिति लय बिषहु अमी कें ॥

देबि मोह बस सोचिअ बादी । बिधि प्रपंच अस अचल अनादी ॥

ईश्वरकी आज्ञा सभीके सिरपर है । उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लय (संहार) तथा अमृत और विषके भी सिरपर है (ये सब भी उसीके अधीन हैं) । हे देवि! मोहवश सोच करना व्यर्थ है । विधाताका प्रपञ्च ऐसा ही अचल और अनादि है ।

कौसल्याजी ने देवी सुमित्राजी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 282.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 581 ज्ञान–विवेक

भय उचाट बस मन थिर नाहीं । छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं ॥

दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी । सरित सिंधु संगम जनु बारी ॥

भय और उचाटके वश किसीका मन स्थिर नहीं है । क्षणमें उनकी वनमें रहनेकी इच्छा होती है और क्षणमें उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं । मनकी इस प्रकारकी दुविधामयी स्थितिसे प्रजा दुखी हो रही है । मानो नदी और समुद्रके सङ्गमका जल क्षुब्ध हो रहा हो । (जैसे नदी और समुद्रके सङ्गमका जल स्थिर नहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकारकी दशा प्रजाके मनकी हो गयी)

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 302.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 599
माया का स्वरूप

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई । सुनहु तात मति मन चित लाई ॥

मैं अरु मोर तोर तैं माया । जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ॥

(श्रीरामजीने कहा—) हे तात! मैं थोड़ेहीमें सब समझाकर कहे देता हूँ । तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो । मैं और मेरा, तू और तेरा-यही माया है, जिसने समस्त जीवोंको वशमें कर रखा है ।

श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 15.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 641 ज्ञान–विवेक
माया का स्वरूप

गो गोचर जहँ लगि मन जाई । सो सब माया जानेहु भाई ॥

तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ । बिद्या अपर अबिद्या दोऊ ॥

एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा । जा बस जीव परा भवकूपा ॥

एक रचइ जग गुन बस जाकें । प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें ॥

इन्द्रियोंके विषयोंको और जहाँतक मन जाता है, हे भाई! उस सबको माया जानना । उसके भी-एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदोंको तुम सुनो, एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यन्त दुःखरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा हुआ है । और एक (विद्या) जिसके वशमें गुण है और जो जगत्की रचना करती है, वह प्रभुसे ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है ।

श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 15.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 641 ज्ञान–विवेक

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह के धारि ॥

तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥

काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह (अज्ञान) की प्रबल सेना है । इनमें मायारूपिणी (मायाकी साक्षात् मूर्ति) स्त्री तो अत्यन्त दारुण दुःख देनेवाली है ।

अरण्यकाण्ड, दोहा 43 श्रीरामचरितमानस पृ. 678 काम–क्रोध–लोभ–मोह

तव माया बस फिरउँ भुलाना । ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना ॥

मैं तो आपकी मायाके वश भूला फिरता हूँ; इसीसे मैंने अपने स्वामी (आप) को नहीं पहचाना ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 2.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 686
समर्पण का सङ्कल्प

उपजा ग्यान बचन तब बोला । नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला ॥

सुख संपति परिवार बड़ाई । सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ॥

जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा मन स्थिर हो गया । सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़प्पन) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा ।

श्रीरामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गई और वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 7.8 श्रीरामचरितमानस पृ. 691 वैराग्य शरणागति
माया का मिथ्यात्व

ए सब राम भगति के बाधक । कहहिं संत तव पद अवराधक ॥

सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं । मायाकृत परमारथ नाहीं ॥

क्योंकि आपके चरणोंकी आराधना करनेवाले संत कहते हैं कि ये सब (सुख-सम्पत्ति आदि) रामभक्तिके विरोधी हैं । जगत्में जितने भी शत्रु-मित्र और सुख-दुःख [आदि द्वन्द्व] हैं, सब-के-सब मायारचित हैं, परमार्थतः (वास्तवमें) नहीं हैं ।

सुग्रीव ने ज्ञान उत्पन्न होने पर श्री राम से ये वचन कहे।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 7.9 श्रीरामचरितमानस पृ. 691 भक्ति

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई । जस थोरेहुँ धन खल इतराई ॥

भूमि परत भा ढाबर पानी । जनु जीवहि माया लपटानी ॥

छोटी नदियाँ भरकर [किनारोंको] तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धनसे भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादाका त्याग कर देते हैं) । पृथ्वीपर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीवके माया लिपट गयी हो ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 14.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 698

जीति को सकइ अजय रघुराई । माया तें असि रचि नहिं जाई ॥

सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥

रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥

लागीं सुनैं श्रवन मन लाई । आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥

[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती । सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं । इसी समय हनुमान्जी मधुर वचन बोले, वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया । वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं । हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 13.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 728 ज्ञान–विवेक

बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस ॥

सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ॥

वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीशको क्या सचमुच ही बाँध लिया?

लङ्काकाण्ड, दोहा 5 श्रीरामचरितमानस पृ. 779

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम ॥

भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥

जो जीवोंके द्रोहमें रत है, मोहके वश हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्नमें भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्तकी शान्ति हो सकती है?

लङ्काकाण्ड, दोहा 78 श्रीरामचरितमानस पृ. 850 भक्ति
विषयों का बढ़ता प्रभाव

जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार ॥

सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार ॥

जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरोंको काटते हैं, वैसे-ही-वैसे वे अपार होते जाते हैं । जैसे विषयोंका सेवन करनेसे काम (उन्हें भोगनेकी इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है ।

श्रीरामजी द्वारा रावण के सिरों को काटे जाने पर यह कहा गया।

लङ्काकाण्ड, दोहा 92 श्रीरामचरितमानस पृ. 868 काम–क्रोध–लोभ–मोह

प्रभु छन महुँ माया सब काटी । जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी ॥

रावनु एकु देखि सुर हरषे । फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरवे ॥

प्रभुने क्षणभरमें सब माया काट डाली । जैसे सूर्यके उदय होते ही अन्धकारकी राशि फट जाती है (नष्ट हो जाती है) । अब एक ही रावणको देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभुपर बहुत-से पुष्प बरसाये ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 97.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 873

बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ । ए चकोर सुख लहहिं न काऊ ॥

मत्सर मान मोह मद चोरा । इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा ॥

भाँति-भाँतिके [बन्धनकारक] कर्म, गुण, काल और स्वभाव–- ये चकोर हैं, जो [रामप्रतापरूपी सूर्यके प्रकाशमें] कभी सुख नहीं पाते । मत्सर (डाह), मान, मोह और मदरूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चल पाता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 31.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 942

ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान ॥

ताहि मोह माया नर पावर करहिं गुमान ॥

जो ज्ञानियोंमें और भक्तोंमें शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान्‌के वाहन हैं, उन गरुड़को भी मायाने मोह लिया । फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 62(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 969 ज्ञान–विवेक
माया का सर्वव्यापक प्रभाव

मच्छर काहि कलंक न लावा । काहि न सोक समीर डोलावा ॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया । को जग जाहि न ब्यापी माया ॥

मत्सर (डाह) ने किसको कलङ्क नहीं लगाया? शोकरूपी पवनने किसे नहीं हिला दिया? चिन्तारूपी साँपिनने किसे नहीं खा लिया? जगत्में ऐसा कौन है, जिसे माया न व्यापी हो?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 79(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 976

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि ॥

छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि ॥

वह माया श्रीरघुवीरकी दासी है । यद्यपि समझ लेनेपर वह मिथ्या ही है, किन्तु वह श्रीरामजीकी कृपाके बिना छूटती नहीं । हे नाथ! यह मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 71(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 977
परमेश्वर की लीला

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ॥

सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥

असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥

जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी ॥

जैसे कोई नट (खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता, हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजीकी यह लीला है, जो राक्षसोंको विशेष मोहित करनेवाली और भक्तोंको सुख देनेवाली है । हे स्वामी! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयोंके वश और कामी हैं, वे ही प्रभुपर इस प्रकार मोहका आरोप करते हैं ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, दोहा 72(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 978 लीला–रहस्य नीति–व्यवहार

नौकारूढ़ चलत जग देखा । अचल मोहबस आपुहि लेखा ॥

बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी । कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥

नौकापर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत्को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपनेको अचल समझता है । बालक घूमते (चक्राकार दौड़ते) हैं, घर आदि नहीं घूमते । पर वे आपसमें एक-दूसरेको झूठा कहते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 73(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 978
अज्ञान का अन्धकार

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ॥

ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥

जो काम, क्रोध, मद और लोभमें रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकाररूपी कुएँमें पड़े हुए हैं ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, दोहा 73(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 978 काम–क्रोध–लोभ–मोह
अखण्ड ज्ञान और माया

जौं सब के रह ग्यान एकरस । ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥

माया बस्य जीव अभिमानी । ईस बस्य माया गुन खानी ॥

यदि जीवोंको एकरस (अखण्ड) ज्ञान रहे, तो कहिये, फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [सत्त्व, रज, तम — इन] तीनों गुणोंकी खान माया ईश्वरके वशमें है ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 78(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 983 ज्ञान–विवेक

क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान ॥

मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान ॥

बिना द्वैतबुद्धिके क्रोध कैसा और बिना अज्ञानके क्या द्वैतबुद्धि हो सकती है? मायाके वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वरके समान हो सकता है?

उत्तरकाण्ड, दोहा 111(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1020 ज्ञान–विवेक
जीव की अविनाशी स्थिति

सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनइ न जाइ बखानी ॥

ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥

हे तात! यह अकथनीय कहानी (वार्ता) सुनिये । यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती । जीव ईश्वरका अंश है । [अतएव] वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभावसे ही सुखकी राशि है ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को जीव का स्वरूप समझाते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 117(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1027 ज्ञान–विवेक
विकारों के दुष्परिणाम

अहंकार अति दुखद डमरुआ । दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥

तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी । त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी ॥

अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू (गाँठका) रोग है । दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसोंका) रोग है । तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि (जलोदर) रोग है । तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).18 श्रीरामचरितमानस पृ. 1037 काम–क्रोध–लोभ–मोह