श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २

ज्ञान–विवेक

आत्मबोध और विवेक

56 पद्य

महाभारत — खण्ड २

आसक्ति का प्रभाव

शौनक उवाच

स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च ।

शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात् प्रवर्तते ॥

स्नेहाद् भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा ।

अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥

दुःखका मूल कारण है आसक्ति । आसक्तिसे ही भय होता है । शोक, हर्ष तथा क्लेश — इन सबकी प्राप्ति भी आसक्तिके कारण ही होती है । आसक्तिसे ही विषयोंमें भाव और अनुराग होते हैं । ये दोनों ही अमंगलकारी हैं। इनमें भी पहला अर्थात् विषयोंके प्रति भाव महान् अनर्थकारक माना गया है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 28–29 महाभारत — खण्ड २ पृ. 41 माया–संसार
आसक्ति से मुक्ति

शौनक उवाच

तस्मात् स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसंचयात् ।

स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत् ॥

इसलिये मित्रों तथा धनराशिको पाकर इनके प्रति स्नेह (आसक्ति) न करे । अपने शरीरसे उत्पन्न हुई आसक्तिको ज्ञानसे निवृत्त करे ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड २ पृ. 41 वैराग्य
परम कल्याण के मार्ग

शौनक उवाच

सम्यक्संकल्पसंबन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् ।

सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात् ॥

सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् ।

सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात् ॥

पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 78–79 महाभारत — खण्ड २ पृ. 48 साधना–योग गुरु महिमा

वासुदेव उवाच

इत्यहं तस्य वचनं श्रुत्वा परमदुर्मनाः ।

निश्चयं नाधिगच्छामि कर्तव्यस्येतरस्य च ॥

दूतका यह वचन सुनकर मेरा मन उदास हो गया । मैं कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें कोई निश्चय नहीं कर पाता था ।

वनपर्व, अध्याय 21, श्लोक 15 महाभारत — खण्ड २ पृ. 178
ब्राह्मण का महत्त्व

बक दाल्भ्य → तात

नाब्राह्मणस्तात चिरं बुभूषेदिच्छन्निमं लोकममुं च जेतुम् ।

विनीतधर्मार्थमपेतमोहं ।

लब्ध्वा द्विजं नुदति नृपः सपत्नान् ॥

तात! इहलोक और परलोकपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाला राजा किसी ब्राह्मणको साथ लिये बिना अधिक कालतक न रहे । जिसे धर्म और अर्थकी शिक्षा मिली हो तथा जिसका मोह दूर हो गया हो, ऐसे ब्राह्मणको पाकर राजा अपने शत्रुओंका नाश कर देता है ।

बक दाल्भ्य ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 26, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड २ पृ. 205 गुरु महिमा

युधिष्ठिर उवाच

क्रोधो हन्ता मनुष्याणां क्रोधो भावयिता पुनः ।

इति विद्धि महाप्राज्ञे क्रोधमूलौ भवाभवौ ॥

युधिष्ठिर बोले — परम बुद्धिमती द्रौपदी! क्रोध ही मनुष्योंको मारनेवाला है और क्रोध ही यदि जीत लिया जाय तो अभ्युदय करनेवाला है । तुम यह जान लो कि उन्नति और अवनति दोनों क्रोधमूलक ही हैं (क्रोधको जीतनेसे उन्नति और उसके वशीभूत होनेसे अवनति होती है)

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 1 महाभारत — खण्ड २ पृ. 220

युधिष्ठिर उवाच

मन्योर्हि विजयं कृष्णे प्रशंसन्तीह साधवः ।

क्षमावतो जयो नित्यं साधोरिह सतां मतम् ॥

कृष्णे! साधु पुरुष क्रोधको जीतनेकी ही प्रशंसा करते हैं । संतोंका यह मत है कि इस जगत्में क्षमाशील साधु पुरुषकी सदा जय होती है ।

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 222

युधिष्ठिर उवाच

प्रभाववानपि नरस्तस्य लोकाः सनातनाः ।

क्रोधनस्त्वल्पविज्ञानः प्रेत्य चेह च नश्यति ॥

वही मनुष्य प्रभावशाली कहा जाता है । उसीको सनातन लोक प्राप्त होते हैं । क्रोधी मनुष्य अल्पज्ञ होता है । वह इस लोक और परलोक दोनोंमें विनाशका ही भागी होता है ।

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड २ पृ. 224
क्षमा का महत्व

युधिष्ठिर उवाच

क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमाः श्रुतम् ।

य एतदेवं जानाति स सर्वं क्षन्तुमर्हति ॥

क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है और क्षमा शास्त्र है । जो इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ क्षमा करनेके योग्य हो जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 36 महाभारत — खण्ड २ पृ. 225

युधिष्ठिर उवाच

क्षन्तव्यमेव सततं पुरुषेण विजानता ।

यदा हि क्षमते सर्वं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥

विद्वान् पुरुषको सदा क्षमाका ही आश्रय लेना चाहिये । जब मनुष्य सब कुछ सहन कर लेता है, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 42 महाभारत — खण्ड २ पृ. 225

युधिष्ठिर उवाच

येषां मन्युर्मनुष्याणां क्षमयाभिहतः सदा ।

तेषां परतरे लोकास्तस्मात् क्षान्तिः परा मता ॥

जिन मनुष्योंका क्रोध सदा क्षमाभावसे दबा रहता है, उन्हें सर्वोत्तम लोक प्राप्त होते हैं । अतः क्षमा सबसे उत्कृष्ट मानी गयी है ।

वनपर्व, अध्याय 29, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड २ पृ. 226

द्रौपदी उवाच

अनर्थाः संशयावस्थाः सिद्ध्यन्ते मुक्तसंशयाः ।

धीरा नराः कर्मरता ननु निःसंशयाः क्वचित् ॥

कर्मका फल होगा या नहीं, इस संशयमें पड़े हुए मनुष्य अर्थसिद्धिसे वंचित रह जाते हैं और जो संशयरहित हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है । कर्मपरायण और संशयरहित धीर मनुष्य निश्चय ही कहीं बिरले देखे जाते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 32, श्लोक 43 महाभारत — खण्ड २ पृ. 248
देवचिह्नों का विश्लेषण

बृहदश्व उवाच

श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत ।

देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे ।

तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्यापि न लक्षये ।

सा विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ।

शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत ॥

भारत! उसने अपने सुने हुए देवचिह्नोंपर भी विचार किया । वह मन-ही-मन कहने लगी ‘मैंने बड़े-बूढ़े पुरुषोंसे देवताओंकी पहचान करानेवाले जो लक्षण या चिह्न सुन रखे हैं, उन्हें यहाँ भूमिपर बैठे हुए इन पाँच पुरुषोंमेंसे किसी एकमें भी नहीं देख पाती हूँ।’ उसने अनेक प्रकारसे निश्चय और बार-बार विचार करके देवताओंकी शरणमें जाना ही समयोचित कर्तव्य समझा ।

दमयन्ती ने राजा नल को पहचानने के लिए अपने सुने हुए देवचिह्नों पर विचार किया।

वनपर्व, अध्याय 57, श्लोक 14–15 महाभारत — खण्ड २ पृ. 409 शरणागति
दमयन्ती का सच्चा अनुराग

बृहदश्व उवाच

निशम्य दमयन्त्यास्तत् करुणं प्रतिदेवितम् ।

निश्चयं परमं तथ्यमनुरागं च नैषधे ॥

मनोविशुद्धिं बुद्धिं च भक्तिं रागं च नैषधे ।

यथोक्तं चक्रिरे देवाः सामर्थ्यं लिङ्गधारणे ॥

दमयन्तीका वह करुण विलाप सुनकर तथा उसके अन्तिम निश्चय, नलविषयक वास्तविक अनुराग, विशुद्ध हृदय, उत्तम बुद्धि तथा नलके प्रति भक्ति एवं प्रेम देखकर देवताओंने दमयन्तीके भीतर वह यथार्थ शक्ति उत्पन्न कर दी, जिससे उसे देवसूचक लक्षणोंका निश्चय हो सके ।

देवताओं ने दमयन्ती के विलाप और नलविषयक वास्तविक अनुराग को देखकर उसके भीतर देवसूचक लक्षणों को पहचानने की शक्ति उत्पन्न की।

वनपर्व, अध्याय 57, श्लोक 22–23 महाभारत — खण्ड २ पृ. 410 भक्ति

बृहदश्व उवाच

यदा च किंचित् कुर्यात् स कारणं तत्र भामिनि ।

तत्र संचेष्टमानस्य लक्षयन्ती विचेष्टितम् ॥

भामिनि! जब वह कोई काम करे तो उस कार्यको करते समय उसकी प्रत्येक चेष्टा और उसके कारणपर लक्ष्य रखना ।

वनपर्व, अध्याय 75, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड २ पृ. 530
पृथूदकतीर्थ की महिमा

पुलस्त्य उवाच

अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा ।

यत् किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना ॥

तत् सर्वं नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत ।

अश्वमेधफलं चास्य स्वर्गलोकं च गच्छति ॥

भारत! स्त्री हो या पुरुष, उसने मानव-बुद्धिसे अनजानमें या जान-बूझकर जो कुछ भी पापकर्म किया है, वह सब पृथूदकतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाता है और तीर्थसेवी पुरुषको अश्वमेधयज्ञके फल एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ।

वनपर्व, अध्याय 83, श्लोक 143–144 महाभारत — खण्ड २ पृ. 602 कर्म–प्रारब्ध

ऋषिगण उवाच

मनो ह्यदुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप ।

मैत्रीं बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि द्रक्ष्यथ ॥

नरेश्वर! यदि मन राग-द्वेषसे दूषित न हो तो वह शुद्धिके लिये पर्याप्त माना गया है । सब प्राणियोंके प्रति मैत्री-बुद्धिका आश्रय ले शुद्धभावसे तीर्थोंका दर्शन करो ।

वनपर्व, अध्याय 93, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड २ पृ. 680 नीति–व्यवहार

अष्टावक्र उवाच

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।

ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥

अधिक वर्षोंकी अवस्था होनेसे, बाल पकनेसे, धन बढ़ जानेसे और अधिक भाई-बन्धु हो जानेसे भी कोई बड़ा हो नहीं सकता; ऋषियोंने ऐसा नियम बनाया है कि हम ब्राह्मणोंमें जो अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय करनेवाला तथा वक्ता है, वही बड़ा है ।

वनपर्व, अध्याय 133, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड २ पृ. 905 धर्म–आचरण

अष्टावक्र उवाच

न ज्ञायते कायवृद्ध्या विवृद्धिर्यथाष्ठीला शाल्मलेः सम्प्रवृद्धा ।

ह्रस्वोऽल्पकायः फलितो विवृद्धो ।

यश्चाफलस्तस्य न वृद्धभावः ॥

अष्टावक्र बोले — द्वारपाल! केवल शरीर बढ़ जानेसे किसीकी बढ़ती नहीं समझी जाती है । जैसे सेमलके फलकी गाँठ बढ़नेपर भी सारहीन होनेके कारण वह व्यर्थ ही है । छोटा और दुबला-पतला वृक्ष भी यदि फलोंके भारसे लदा है तो उसे ही वृद्ध (बड़ा) जानना चाहिये । जिसमें फल नहीं लगते, उस वृक्षका बढ़ना भी नहीं के बराबर है ।

वनपर्व, अध्याय 133, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड २ पृ. 905
ज्ञान प्राप्ति के मार्ग

देवगण उवाच

मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने ।

ऋते गुरुमधीता हि सुखं वेदास्त्वया पुरा ॥

अनेन तु गुरून् दुःखात् तोषयित्वाऽऽत्मकर्मणा ।

कालेन महता क्लेशाद् ब्रह्माधिगतमुत्तमम् ॥

देवताओंने कहा — मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो । तुमने पूर्वकालमें बिना गुरुके ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्यमुनिने बड़े क्लेश उठाकर अपने व्यवहारसे गुरुजनोंको संतुष्ट करके दीर्घकालतक कष्टसहनपूर्वक उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है ।

देवताओं ने यवक्रीत से कहा।

वनपर्व, अध्याय 138, श्लोक 25–26 महाभारत — खण्ड २ पृ. 945 गुरु महिमा साधना–योग
इन्द्रिय संयम का महत्व

युधिष्ठिर उवाच

मक्षिकादंशमशकान् सिंहान् व्याघ्रान् सरीसृपान् ।

प्राप्नोत्यनियतः पार्थ नियतस्तान् न पश्यति ॥

भीमसेन! जो अपने मन और इन्द्रियोंपर संयम नहीं रखता, ऐसे मनुष्यको वहाँ जानेपर मक्खी, डाँस, मच्छर, सिंह, व्याघ्र और सर्पोंका सामना करना पड़ता है, परंतु जो संयम-नियमसे रहनेवाला है, उसे उन जन्तुओंका दर्शनतक नहीं होता ।

युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा।

वनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड २ पृ. 959 साधना–योग
परमेश्वर का एकमात्र आश्रय

हनुमान् उवाच

समाश्रयं समाचारं समज्ञानं च केवलम् ।

तदा हि समकर्माणो वर्णा धर्मानवाप्नुवन् ॥

उस समय परब्रह्म परमात्मा ही सबके एकमात्र आश्रय थे । उन्हींकी प्राप्तिके लिये सदाचारका पालन किया जाता था । सब लोग एक परमात्माका ही ज्ञान प्राप्त करते थे । सभी वर्णोंके मनुष्य परब्रह्म परमात्माके उद्देश्यसे ही समस्त सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते थे और इस प्रकार उन्हें उत्तम धर्म-फलकी प्राप्ति होती थी ।

हनुमानजी ने भीमसेन को सत्ययुग के लोगों का आचरण बताया।

वनपर्व, अध्याय 149, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1016 भक्ति

हनुमान् उवाच

अधर्मो यत्र धर्माख्यो धर्मश्चाधर्मसंज्ञितः ।

स विज्ञेयो विभागेन यत्र मुह्यन्त्यबुद्धयः ॥

कहीं अधर्म ही धर्म कहलाता है और कहीं धर्म भी अधर्म कहा जाता है । अतः धर्म और अधर्मके स्वरूपका पृथक्-पृथक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । बुद्धिहीनलोग इसमें मोहित हो जाते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 150, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1024 धर्म–आचरण

युधिष्ठिर उवाच

सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा ।

दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥

युधिष्ठिरने कहा — नागराज! जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, क्रूरताका अभाव, तपस्या और दया — से सद्गुण दिखायी देते हों, वही ब्राह्मण कहा गया है ।

वनपर्व, अध्याय 180, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1217

सर्प → तात

बुद्धिरात्मानुगा तात उत्पातेन विधीयते ।

तदाश्रिता हि संज्ञैषा बुद्धिस्तस्यैषिणी भवेत् ॥

बुद्धिरुत्पद्यते कार्यान्मनस्तूत्पन्नमेव हि ।

बुद्धेर्गुणविधानेन मनस्तद्गुणवद् भवेत् ॥

सर्पने कहा — तात! आत्माके भोग और मोक्षका सम्पादन करना ही बुद्धिका प्रयोजन है तथा आत्माका आश्रय लेकर ही बुद्धि विषयोंकी ओर जाती है । इस कारण वह आत्माका अनुसरण करनेवाली मानी जाती है । वह भी आत्माकी चेतनशक्तिके सम्बन्धसे ही है तथा बुद्धिके गुणविधानसे अर्थात् उसकी ज्ञानशक्तिके प्रभावसे ही मन उस गुणसे सम्पन्न होता है यानी इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाता है । अतः बुद्धि तो कार्यके आरम्भसे प्रकट होती है और मन सदैव प्रकट रहता है । (कार्यको देखकर ही कारणकी सत्ता व्यक्त होती है — यह न्याय है)

वनपर्व, अध्याय 181, श्लोक 25–26 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1224
सद्गुणों की प्रधानता

सर्प → राजन

ब्रह्म च ब्राह्मणत्वं च येन त्वाहमचूचुदम् ।

सत्यं दमस्तपो दानमहिंसा धर्मनित्यता ।

साधकानि सदा पुंसां न जातिर्न कुलं नृप ।

अरिष्ट एष ते भ्राता भीमसेनो महाबलः ।

स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ॥

राजन्! उनका ब्रह्म-ज्ञान और ब्राह्मणत्व देखकर भी मुझे बड़ा विस्मय हुआ । इसीलिये इस विषयमें मैंने तुमसे पहले प्रश्न किया था । राजन्! सत्य, इन्द्रियसंयम, तपस्या, दान, अहिंसा और धर्मपरायणता — ये सद्गुण ही सदा मनुष्योंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले हैं, जाति और कुल नहीं । ये रहे तुम्हारे भाई महाबली भीमसेन, जो सर्वथा सकुशल हैं । महाराज! तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं पुनः स्वर्गलोकको जाऊँगा ।

राजा नहुष ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 181, श्लोक 42–43 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1227 वैराग्य धर्म–आचरण

मार्कण्डेय उवाच

जितेन्द्रियत्वाद् वशिनः शुक्लत्वान्मन्दरोगिणः ।

अल्पाबाधपरित्रासाद् भवन्ति निरुपद्रवाः ॥

च्यवन्तं जायमानं च गर्भस्थं चैव सर्वशः ।

स्वमात्मानं परं चैव बुध्यन्ते ज्ञानचक्षुषा ॥

जितेन्द्रिय होनेके कारण वे मनको वशमें रखते हैं और सात्त्विक अन्तःकरणके होनेके कारण नीरोग होते हैं । दुःख और त्रासके क्षीण होनेके कारण वे उपद्रवरहित होते हैं । विवेकी पुरुष गर्भसे गिरते, जन्म लेते अथवा गर्भमें ही रहते समय भी ज्ञानदृष्टिसे अपने-आपका और परमात्माका सर्वथा यथार्थ अनुभव करते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 83–84 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1250
स्वाध्याय का फल

सरस्वती → मुने

यो ब्रह्म जानाति यथाप्रदेशं ।

स्वाध्यायनित्यः शुचिरप्रमत्तः ।

सवै पारं देवलोकस्य गन्ता ।

सहामरैः प्राप्नुयात् प्रीतियोगम् ॥

सरस्वती बोली — मुने! जो प्रमाद छोड़कर पवित्र भावसे नित्य स्वाध्याय करता है और अर्चि आदि मार्गोंसे प्राप्त होनेयोग्य सगुण ब्रह्मको जान लेता है, वह देवलोकसे उठकर ब्रह्मलोकमें जाता है और देवताओंके साथ प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर लेता है ।

सरस्वतीदेवी ने ब्रह्मर्षि तार्क्ष्य को उनके प्रेमपूर्वक पूछने पर यह हितकर वचन कहा।

वनपर्व, अध्याय 186, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1265 साधना–योग
योगसेवित मार्ग की पात्रता

बालमुकुन्द उवाच

प्राप्तुं न शक्यो यो विद्वन् नरैर्दुष्कृतकर्मभिः ।

लोभाभिभूतैः कृपणैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥

तं मां महाफलं विद्धि नराणां भावितात्मनाम् ।

सुदुष्प्रापं विमूढानां मार्गं योगैर्निषेवितम् ॥

विद्वन्! पापकर्मा, लोभी, कृपण, अनार्य और अजितात्मा मनुष्य जिसे कभी नहीं पा सकते वह महान् फल मुझे ही समझो । मैं ही शुद्ध अन्तःकरणवाले मानवोंको सुलभ होनेवाला योगसेवित मार्ग हूँ । मूढ़ मनुष्योंके लिये मैं सर्वथा दुर्लभ हूँ ।

वनपर्व, अध्याय 189, श्लोक 25–26 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1305 साधना–योग

मार्कण्डेय → राजन

न कश्चित् कस्यचिच्छ्रोता न कश्चित् कस्यचिद् गुरुः ।

तमोग्रस्तस्तदा लोको भविष्यति जनाधिप ॥

राजन्! उस समय कोई किसीका उपदेश नहीं सुनेगा और न कोई किसीका गुरु ही होगा । सारा जगत् अज्ञानमय अन्धकारसे आच्छादित हो जायगा ।

वनपर्व, अध्याय 190, श्लोक 47 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1316

शिबि उवाच

सद्भिः सदाध्यासितं तु प्रशस्तं ।

तस्मात् प्रशस्तं श्रयते मतिर्मे ।

एतन्महाभाग्यवरं शिबेस्तु ।

तस्मादहं वेद यथावदेतत् ॥

श्रेष्ठ पुरुष सदा जिस मार्गसे चले हैं, वही उत्तम मार्ग है । इसीलिये मेरी बुद्धि सदा उस उत्तम पथका ही आश्रय लेती है । यह है राजा शिबिकी सर्वश्रेष्ठ महिमा, जिसे मैं (अच्छी तरह) जानता हूँ । इसीलिये इन सब बातोंका यथावत् वर्णन किया है ।

वनपर्व, अध्याय 198, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1369
सच्ची तपस्या

मार्कण्डेय उवाच

ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक्कर्मबुद्धिभिः ।

ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम् ॥

जो मन, वाणी, क्रिया और बुद्धिके द्वारा कभी पाप नहीं करते हैं, वे ही महात्मा तपस्वी हैं । शरीरको सुखा देना ही तपस्या नहीं है ।

वनपर्व, अध्याय 200, श्लोक 99 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1388 वैराग्य

मार्कण्डेय उवाच

द्व्यक्षरादभिसंधाय केचिच्छ्लोकपदाङ्कितैः ।

शतैरन्यैः सहस्रैश्च प्रत्ययो मोक्षलक्षणम् ॥

कोई ‘तत्त्वम्’ अथवा राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि दो अक्षरोंसे ही परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । कोई श्लोक और पदोंसे अंकित अन्य सैकड़ों तथा सहस्रों शास्त्रवाक्योंसे परमात्माके स्वरूपको जानते हैं । जैसे भी हो, बोध ही मोक्षका लक्षण है ।

वनपर्व, अध्याय 200, श्लोक 111 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1390

मार्कण्डेय उवाच

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ।

ऊचुर्ज्ञानविदो वृद्धाः प्रत्ययो मोक्षलक्षणम् ॥

जिसके मनमें संशय भरा हुआ है, उसके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है । ‘ज्ञान ही मोक्षका लक्षण है’ — यह वृद्ध, ज्ञानी पुरुषोंका कथन है ।

वनपर्व, अध्याय 200, श्लोक 112 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1390

मार्कण्डेय उवाच

शुष्कं तर्क परित्यज्य आश्रयस्व श्रुतिं स्मृतिम् ।

एकाक्षराभिसम्बद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि ।

बुद्धिर्न तस्य सिध्येत साधनस्य विपर्ययात् ॥

प्रणवसे सम्बन्ध रखनेवाले परमात्मतत्त्वको यदि तुम युक्तिपूर्वक अर्थात् निःसंदेहभावसे समझना चाहते हो तो कोरा तर्कवाद छोड़कर श्रुति तथा स्मृतिके वचनोंका आश्रय लो । क्योंकि जो उपर्युक्त साधनका आश्रय नहीं लेता उसकी बुद्धि तत्त्वका निश्चय करनेमें समर्थ नहीं हो सकती ।

वनपर्व, अध्याय 200, श्लोक 114 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1391
त्याग का महत्व

व्याध उवाच

वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः ।

दमस्योपनिषत् त्यागः शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥

वेदका सार है सत्य, सत्यका सार है इन्द्रिय-संयम और इन्द्रिय-सयंमका सार है त्याग । यह त्याग शिष्ट पुरुषोंके आचारमें सदा विद्यमान रहता है ।

वनपर्व, अध्याय 207, श्लोक 67 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1444 वैराग्य
सांसारिक सुख से वैराग्य

व्याध उवाच

धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तृप्यति महाद्विज ।

अतृप्यमाणो निर्वेदमापेदे ज्ञानचक्षुषा ॥

द्विजोत्तम! कोई-कोई धर्मके फलरूपसे सांसारिक सुखको पाकर संतुष्ट नहीं होता । वह ज्ञानदृष्टिके कारण विषयभोगके सुखसे तृप्ति-लाभ न करके निर्वेद (वैराग्य)-को प्राप्त होता है ।

धर्मव्याध ने कौशिक ब्राह्मण से कहा।

वनपर्व, अध्याय 209, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1461 वैराग्य
श्रेष्ठ सङ्ग का प्रभाव

व्याध उवाच

पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु ।

यस्त्वेतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥

कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते ।

तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धर्मेषु राजते ॥

इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है । अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो । जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है । अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है ।

धर्मव्याध ने ब्राह्मण को धर्म की प्राप्ति के विषय में बताया।

वनपर्व, अध्याय 210, श्लोक 11–12 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1465 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

व्याध उवाच

इदं विश्वं जगत् सर्वमजय्यं चापि सर्वशः ।

महाभूतात्मकं ब्रह्म नातः परतरं भवेत् ॥

पञ्चमहाभूतोंसे बना हुआ यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सब प्रकारसे अजेय ब्रह्मस्वरूप है । ब्रह्मसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है ।

वनपर्व, अध्याय 210, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1466

व्याध उवाच

येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात् फलागमम् ।

तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ॥

सभी मनुष्य इन छः इन्द्रियोंके शब्द आदि विषयोंमें उनसे प्राप्त होनेवाले सुखरूप फल पानेके सम्बन्धमें मोहसे संशयमें पड़ जाते हैं। परंतु जो उनके दोषोंका अनुसंधान करनेवाला वीतराग पुरुष है, वह उनका निग्रह करके ध्यानजनित आनन्दका अनुभव करता है ।

वनपर्व, अध्याय 211, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1471 साधना–योग

व्याध उवाच

चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् ।

प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥

मनुष्य अपने चित्तकी पवित्रताके द्वारा ही समस्त शुभाशुभ कर्मोंको नष्ट (फल देनेमें असमर्थ) कर देता है । जिसका अन्तःकरण प्रसन्न (पवित्र) है, वह अपने-आपमें ही स्थित होकर अक्षय सुख (मोक्ष)-का भागी होता है ।

वनपर्व, अध्याय 213, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1480
परम आत्मज्ञान

व्याध उवाच

आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम् ।

एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम् ॥

कुछ भी संग्रह न रखना, सभी दशाओंमें अत्यन्त संतुष्ट रहना तथा कामना और लोलुपताको त्याग देना-यही परम ज्ञान है और यही सत्यस्वरूप उत्तम आत्मज्ञान है ।

वनपर्व, अध्याय 213, श्लोक 35 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1481

व्याध उवाच

शोचतो न भवेत् किंचित् केवलं परितप्यते ।

परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाप्युभयं नराः ॥

त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिणः ।

असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥

केवल शोक करनेसे कुछ नहीं होता, संतापमात्र ही हाथ लगता है। जो ज्ञानतृप्त मनीषी मानव सुख और दुःख दोनोंका परित्याग कर देते हैं, वे ही सुखी होते हैं । मूढ़ मनुष्य असंतोषी होते हैं और ज्ञानवानोंको संतोष प्राप्त होता है ।

वनपर्व, अध्याय 216, श्लोक 21–22 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1500

धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः ।

रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत् ॥

‘अभिजित्का पतन होनेसे ब्रह्माजीने धनिष्ठासे ही (सत्ययुग आदि) कालकी गणनाका क्रम निश्चित किया (क्योंकि वही उस समय युगादि नक्षत्र था) । इसके पूर्व रोहिणीको ही युगादि नक्षत्र माना जाता था (क्योंकि उसीके प्रारम्भकालमें चन्द्रमा, सूर्य तथा गुरुका योग होता था) — इस प्रकार नाक्षत्र मासकी दिन-संख्या उन दिनों सम थी’

वनपर्व, अध्याय 230, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1569
महात्मन् का स्वरूप

मार्कण्डेय उवाच

सूक्ष्मं तपस्तत् परमं त्वमेव ।

परावरज्ञोऽसि परावरस्त्वम् ।

धर्मस्य कामस्य परस्य चैव ।

त्वत्तेजसा कृत्स्नमिदं महात्मन् ॥

जो सर्वोत्कृष्ट सूक्ष्म तप है, वह आप ही हैं। आप ही कार्य-कारण-तत्त्वके ज्ञाता तथा कार्यकारणस्वरूप हैं । धर्म, काम तथा इन दोनोंसे परे जो मोक्षतत्त्व है, उसके भी आप ही ज्ञाता हैं । महात्मन्! यह सम्पूर्ण जगत् आपके तेजसे प्रकाशित होता है ।

वनपर्व, अध्याय 232, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1598 भक्ति
परमेश्वर का स्वरूप

द्रौपदी उवाच

नीलोत्पलदलश्याम पद्मगर्भारुणेक्षण ।

पीताम्बरपरीधान लसत्कौस्तुभभूषण ॥

त्वमादिरन्तो भूतानां त्वमेव च परायणम् ।

परात्परतरं ज्योतिर्विश्वात्मा सर्वतोमुखः ॥

नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर! कमलपुष्पके भीतरी भागके समान किंचित् लाल नेत्रोंवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण! तुम्हारे वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिमय आभूषण शोभा पाता है । प्रभो! तुम्हीं समस्त प्राणियोंके आदि और अन्त हो । तुम्हीं सबके परम आश्रय हो । तुम्हीं परात्पर, ज्योतिर्मय सर्वात्मा एवं सब ओर मुखवाले परमेश्वर हो ।

द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 263, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1760 भक्ति

द्रौपदी उवाच

धनुर्धराग्र्यो धृतिमान् यशस्वी ।

जितेन्द्रियो वृद्धसेवी नृवीरः ।

भ्राता च शिष्यश्च युधिष्ठिरस्य ।

धनंजयो नाम पतिर्ममैषः ॥

यो वै न कामान्न भयान्न लोभात् ।

त्यजेद् धर्म न नृशंसं च कुर्यात् ।

स एष वैश्वानरतुल्यतेजाः ।

कुन्तीसुतः शत्रुसहः प्रमाथी ॥

ये जो तीसरे वीर पुरुष दिखायी दे रहे हैं, वे मेरे पति धनंजय हैं । इन्हें समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माना गया है । ये धैर्यवान्, यशस्वी, जितेन्द्रिय, वृद्धपुरुषोंके सेवक तथा महाराज युधिष्ठिरके भाई और शिष्य हैं । अर्जुन कभी काम, भय अथवा लोभवश न तो अपना धर्म छोड़ सकते हैं और न कोई निष्ठुरतापूर्ण कार्य ही कर सकते हैं । इनका तेज अग्निके समान है । ये कुन्तीनन्दन धनंजय समस्त शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ और सभी दुष्टोंका दमन करनेमें दक्ष हैं ।

वनपर्व, अध्याय 270, श्लोक 12–13 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1800 धर्म–आचरण
धर्म की प्रधानता

यम उवाच

नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति ।

धर्मं च वासं च परिश्रमं च ।

विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति ।

तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥

जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, वे वनमें रहकर धर्मपालन, गुरुकुलवास तथा कष्टसहनरूप तपस्या नहीं कर सकते हैं । जितेन्द्रिय पुरुष ही यह सब कुछ करनेमें समर्थ हैं । महात्मालोग विवेक विचारसे ही धर्म-प्राप्ति बताते हैं, अतः सभी सत्पुरुष धर्मको ही श्रेष्ठ मानते हैं ।

यमराज ने सावित्री से कहा।

वनपर्व, अध्याय 297, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1990 धर्म–आचरण

सावित्री → राजन

सन्तो हि सत्येन नयन्ति सूर्यं ।

सन्तो भूमिं तपसा धारयन्ति ।

सन्तो गतिर्भूतभव्यस्य राजन् ।

सतां मध्ये नावसीदन्ति सन्तः ॥

श्रेष्ठ पुरुष सत्यके बलसे सूर्यका संचालन करते हैं। संत-महात्मा अपनी तपस्यासे इस पृथ्वीको धारण करते हैं । राजन्! सत्पुरुष ही भूत, वर्तमान और भविष्यके आश्रय हैं । श्रेष्ठ पुरुष संतोंके बीचमें रहकर कभी दुःख नहीं उठाते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 297, श्लोक 48 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1995
ज्ञान और शम की परिभाषा

युधिष्ठिर उवाच

ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चित्तप्रशान्तता ।

दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता ॥

युधिष्ठिर बोले — परमात्मतत्त्वका यथार्थ बोध ही ज्ञान है, चित्तकी शान्ति ही शम है, सबके सुखकी इच्छा रखना ही उत्तम दया है और समचित्त होना ही आर्जव (सरलता) है ।

युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न का उत्तर दिया।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 90 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2100 धर्म–आचरण
मोह और मान की परिभाषा

युधिष्ठिर उवाच

मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता ।

धर्मनिष्क्रियताऽऽलस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते ॥

युधिष्ठिर बोले — धर्ममूढ़ता ही मोह है, आत्माभिमान ही मान है, धर्मका पालन न करना आलस्य है और अज्ञानको ही शोक कहते हैं ।

युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न का उत्तर दिया।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 94 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2101 माया–संसार
पण्डित और मूर्ख की पहचान

युधिष्ठिर उवाच

धर्मज्ञः पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते ।

कामः संसारहेतुश्च हृत्तापो मत्सरः स्मृतः ॥

युधिष्ठिर बोले — धर्मज्ञको पण्डित समझना चाहिये, मूर्ख नास्तिक कहलाता है और नास्तिक मूर्ख है तथा जो जन्म-मरणरूप संसारका कारण है, वह वासना काम है और हृदयकी जलन ही मत्सर है ।

युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 98 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2101 काम–क्रोध–लोभ–मोह

वैशम्पायन → राजन

राजन् विद्वान् भवान् दान्तः ।

सत्यसंधो जितेन्द्रियः ।

नैवंविधाः प्रमुह्यन्ते ।

नराः कस्याञ्चिदापदि ॥

राजन्! आप विद्वान्, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं । आप-जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 315, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2116 धर्म–आचरण

द्रौपदी उवाच

प्रजायां रक्ष्यमाणायामात्मा भवति रक्षितः ।

आत्मा हि जायते तस्यां तेन जायां विदुर्बुधाः ॥

संतानकी रक्षा होनेपर अपना आत्मा सुरक्षित होता है । आत्मा ही पत्नीके गर्भसे पुत्ररूपमें जन्म लेता है । इसीलिये विद्वान् पुरुष पत्नीको ‘जाया’ कहते हैं ।

विराटपर्व, अध्याय 21, श्लोक 41 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2276

कर्ण उवाच

धर्मपाशनिबद्धेन यत् त्वया मर्षितं पुरा ।

तथैव बद्धमात्मानमबद्धमिव मन्यसे ॥

यदि तूने पहले धर्मके बन्धनमें बँधकर कष्ट सहन किया है, तो आज भी तू उसी प्रकार बँधा हुआ है; तो भी तू अपने-आपको उस बन्धनसे मुक्त-सा मान रहा है ।

विराटपर्व, अध्याय 60, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2497 वैराग्य

कङ्क उवाच

किं ते द्यूतेन राजेन्द्र बहुदोषेण मानद ।

देवने बहवो दोषास्तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ॥

कंक बोले — सबको मान देनेवाले महाराज! आपको जूएसे क्या लेना है? इसमें तो बहुत-से दोष हैं। जूआ खेलनेमें अनेक दोष होते हैं, इसलिये इसे त्याग देना चाहिये ।

विराटपर्व, अध्याय 68, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2547 नीति–व्यवहार