श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५
ज्ञान–विवेक
आत्मबोध और विवेक
227 पद्य
महाभारत — खण्ड ५
भीम उवाच
तस्मादिह कृतप्रज्ञास्त्यागं न परिचक्षते ।
धर्मव्यतिक्रमं चैव मन्यन्ते सूक्ष्मदर्शिनः ॥
अतः (जब कि हमारे ऊपर पूर्वोक्त संकट नहीं आया है) विद्वान् पुरुष ऐसे अवसरमें त्याग या संन्यासकी प्रशंसा नहीं करते हैं । सूक्ष्मदर्शी पुरुष तो ऐसे समयमें क्षत्रियके लिये संन्यास लेना उलटे धर्मका उल्लंघन मानते हैं ।
युधिष्ठिर उवाच
दृश्यं पश्यति यः पश्यन् स चक्षुष्मान् स बुद्धिमान् ।
अज्ञातानां च विज्ञानात् सम्बोधाद् बुद्धिरुच्यते ॥
जो स्वयं द्रष्टारूपसे पृथक् रहकर इस दृश्य-प्रपंचको देखता है, वही आँखवाला है और वही बुद्धिमान् है । अज्ञात तत्त्वोंका ज्ञान एवं सम्यग् बोध करानेके कारण अन्तःकरणकी एक वृत्तिको बुद्धि कहते हैं ।
युधिष्ठिर उवाच
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब पुरुष प्राणियोंकी पृथक्-पृथक् सत्ताको एकमात्र परमात्मामें ही स्थित देखता है और उस परमात्मासे ही सम्पूर्ण भूतोंका विस्तार हुआ मानता है, उस समय वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको प्राप्त होता है ।
युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
तपसा महदाप्नोति बुद्ध्या वै विन्दते महत् ।
त्यागेन सुखमाप्नोति सदा कौन्तेय तत्त्ववित् ॥
कुन्तीनन्दन! तत्त्ववेत्ता पुरुष तपस्याद्वारा महान् पदको प्राप्त कर लेता है, ज्ञानयोगसे उस परमतत्त्वको उपलब्ध कर लेता है और स्वार्थत्यागके द्वारा सदा नित्य सुखका अनुभव करता रहता है ।
युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा।
वैशम्पायन उवाच
यदा न भावं कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब यह मन, वाणी और क्रियाद्वारा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति पाप-बुद्धिका परित्याग कर देता है, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।
विनीतमानमोहश्च बहुसङ्गविवर्जितः ।
तदाऽऽत्मज्योतिषः साधोर्निर्वाणमुपपद्यते ॥
‘जिसके मान और मोह दूर हो गये हैं, जो नाना प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित है तथा जिसे आत्माका ज्ञान प्राप्त हो गया है, उस साधु पुरुषको मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है’
वासुदेव उवाच
स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
सृजय! वे साम, दान, दण्ड और भेद — इन चार कल्याणमयी नीतियों अथवा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य — इन चार मंगलकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये, तब दूसरा कौन जीवित रह सकता है । अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।
व्यास उवाच
अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप ।
धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेयं विपश्चिता ॥
नरेश्वर! किसी समय धर्म ही अधर्मरूप हो जाता है और कहीं अधर्मरूप दीखनेवाला कर्म ही धर्म बन जाता है; इसलिये विद्वान् पुरुषको धर्म और अधर्मका रहस्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ।
भीष्म उवाच
न हि पश्यामि ते भावं दिव्यं हि त्रिषु वर्त्मसु ।
त्वां तु पश्यामि तत्त्वेन यत् ते रूपं सनातनम् ॥
मैं तीनों लोकोंमें आपके दिव्य जन्म-कर्मका रहस्य नहीं जान पाता; मैं तो तत्त्वदृष्टिसे आपका जो सनातन रूप है, उसीकी ओर लक्ष्य रखता हूँ ।
भीष्म उवाच
नारायणः परं ब्रह्म नारायणपरं तपः ।
नारायणः परो देवः सर्वं नारायणः सदा ॥
नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तप हैं । नारायण ही सबसे बड़े देवता हैं और भगवान् नारायण ही सदा सब कुछ हैं ।
युधिष्ठिर उवाच
त्रिवर्गो हि समासक्तो राजधर्मेषु कौरव ।
मोक्षधर्मश्च विस्पष्टः सकलोऽत्र समाहितः ॥
कुरुनन्दन! राजाके धर्मोंमें धर्म, अर्थ और काम तीनोंका समावेश है, और यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण मोक्षधर्म भी राजधर्ममें निहित है ।
भीष्म उवाच
आत्मवांश्च जितक्रोधः शास्त्रार्थकृतनिश्चयः ।
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ॥
त्रय्यां संवृतमन्त्रश्च राजा भवितुमर्हति ।
वृजिनं च नरेन्द्राणां नान्यच्चारक्षणात् परम् ॥
जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, क्रोधको जीत लिया है तथा शास्त्रोंके सिद्धान्तका निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके प्रयत्नमें निरन्तर लगा रहता है, जिसे तीनों वेदोंका ज्ञान है तथा जो अपने गुप्त विचारोंको दूसरोंपर प्रकट नहीं होने देता है, वही राजा होने योग्य है, प्रजाकी रक्षा न करनेसे बढ़कर राजाओंके लिये दूसरा कोई पाप नहीं है ।
भीष्म उवाच
यः सत्करोति ज्ञानानि ज्ञेये परहिते रतः ।
सतां वर्त्मानुगस्त्यागी स राजा राज्यमर्हति ॥
जो ज्ञान एवं ज्ञानियोंका सत्कार करता है, शास्त्रके ज्ञातव्य विषयको समझने तथा परहित-साधन करनेमें संलग्न रहता है, सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाला और स्वार्थत्यागी है, वही राजा राज्य चलानेके योग्य समझा जाता है ।
भीष्म उवाच
निराशीः स्यात् सर्वसमो निर्भोगो निर्विकारवान् ।
विप्रः क्षेमाश्रमं प्राप्तो गच्छत्यक्षरसात्मताम् ॥
आशा-तृष्णाका सर्वथा त्याग करके सबके प्रति समान भाव रखे । भोगोंसे दूर रहे और हृदयमें किसी प्रकारका विकार न आने दे । इन्हीं सब धर्मोंके कारण इस आश्रमको ‘क्षेमाश्रम’ (कल्याणप्राप्तिका स्थान) कहते हैं । इस आश्रममें आया हुआ ब्राह्मण अविनाशी ब्रह्मके साथ एकता प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म उवाच
वेत्ति ज्ञानविसर्गं च निग्रहानुग्रहं तथा ।
यथोक्तवृत्तेर्धीरस्य क्षेमाश्रमपदं भवेत् ॥
जो तत्त्वज्ञान, सर्वत्याग, इन्द्रियसंयम तथा प्राणियोंपर अनुग्रह करना जानता है तथा जिसका पहले कहे अनुसार उत्तम आचार-विचार है, उस धीर पुरुषको कल्याणमय गृहस्थाश्रमसे मिलनेवाले फलकी प्राप्ति होती है ।
भीष्म उवाच
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति मानवः ।
न्यस्तदण्डो जितक्रोधः प्रेत्येह लभते सुखम् ॥
जो मानव समस्त प्राणियोंके प्रति अपने समान ही भाव रखता है, दण्डका त्याग कर देता है, क्रोधको जीत लेता है, वह इस लोकमें और मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी सुख पाता है ।
भीष्म उवाच
यदा निवृत्तः सर्वस्मात् कामो योऽस्य हृदि स्थितः ।
तदा भवति सत्त्वस्थस्ततो ब्रह्म समश्नुते ॥
मनुष्यके हृदयमें जो-जो कामनाएँ स्थित हैं, उन सबसे जब वह निवृत्त हो जाता है, तब उसकी विशुद्ध सत्त्वगुणमें स्थिति होती है और इसी समय उसे परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार होता है ।
भीष्म उवाच
मा स्म लुब्धांश्च मूर्खाश्च कामार्थे च प्रयूयुजः ।
अलुब्धान् बुद्धिसम्पन्नान् सर्वकर्मसु योजयेत् ॥
तुम लोभी और मूर्ख मनुष्योंको काम और अर्थके साधनमें न लगाओ । जो लोभरहित और बुद्धिमान् हों, उन्हींको समस्त कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये ।
कश्यप उवाच
असंत्यागात् पापकृतामपापांस्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात् ।
शुष्केणा दह्यते मिश्रभावान्न मिश्रः स्यात् पापकृद्भिः कथंचित् ॥
कश्यपने कहा — पापाचारियोंके संसर्गका त्याग न करनेसे पापहीन-धर्मात्मा पुरुषोंको भी उनसे मेल-जोल रखनेके कारण उनके समान ही दण्ड भोगना पड़ता है । ठीक उसी तरह, जैसे सूखी लकड़ियोंके साथ मिली होनेसे गीली लकड़ी भी जल जाती है । अतः विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह पापियोंके साथ किसी तरह भी सम्पर्क न स्थापित करे ।
भीष्म उवाच
धर्मार्थकामज्ञमुपेत्य पृच्छेद् ।
युक्त गुरुं ब्राह्मणमुत्तरार्थम् ।
निष्ठा कृता तेन यदा सहः स्यात् ।
तं मन्त्रमार्गं प्रणयेदसक्तः ॥
राजा सावधान होकर धर्म, अर्थ और कामके ज्ञाता ब्राह्मणगुरुके समीप जा उनका उत्तर जाननेके लिये उनकी राय पूछे । जब वे कोई निर्णय दे दें और वह सब लोगोंको एक मतसे स्वीकार हो जाय, तब राजा दूसरे किसी विचारमें न पड़कर उसी मन्त्रमार्ग (विचारपद्धति) को कार्यरूपमें परिणत करे ।
भीष्म → तात
एकान्तेन हि सर्वेषां न शक्यं तात रोचितुम् ।
मित्रामित्रमथो मध्यं सर्वभूतेषु भारत ॥
तात! किसीका कोई भी काम सबको सर्वथा अच्छा ही लगे, ऐसा सम्भव नहीं है, भरतनन्दन! सभी प्राणियोंके शत्रु, मित्र और मध्यस्थ होते हैं ।
उतथ्य उवाच
अतस्त्वं सर्वभूतानां धर्मं वेत्स्यसि वै परम् ।
स्वदेशे परदेशे वा न ते धर्मो विनङ्क्ष्यति ॥
ऐसा करनेसे तुमको सम्पूर्ण भूतोंके परम धर्मका ज्ञान हो जायगा; फिर स्वदेशमें रहो या परदेशमें, कहीं भी तुम्हारा धर्म नष्ट नहीं होगा ।
वामदेव उवाच
यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा ज्ञानं तत् प्रतिपद्यते ।
आत्मनो मतमुत्सृज्य तं लोकोऽनुविधीयते ॥
जो कल्याणकारी उपदेश सुनकर अपने मतका आग्रह छोड़ उस ज्ञानको ग्रहण कर लेता है, उसके पीछे यह सारा जगत् चलता है ।
राजा उवाच
निर्विद्यति नरः कामान्निर्विद्य सुखमेधते ।
त्यक्त्वा प्रीतिं च शोकं च लब्ध्वा बुद्धिमयं वसु ॥
मनुष्यको जब कभी विषय-भोगोंसे वैराग्य होता है, तब विरक्त होनेपर वह हर्ष और शोकको त्याग देता है तथा ज्ञानमय धन पाकर नित्य सुखका अनुभव करने लगता है ।
उष्ट्र उवाच
बुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि बाहुमध्यानि भारत ।
तानि जङ्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च ॥
भारत! बुद्धिबलसे किये गये कार्य श्रेष्ठ हैं । बाहुबलसे किये जानेवाले कार्य मध्यम हैं । जाँघ अर्थात् पैरके बलसे किये गये कार्य जघन्य (अधम कोटिके) हैं तथा मस्तकसे भार ढोनेका कार्य सबसे निम्न श्रेणीका है ।
भीष्म उवाच
विद्या तपो वा विपुलं धनं वा ।
सर्वं ह्येतद् व्यवसायेन शक्यम् ।
बुद्ध्यायत्तं तन्निवसेद् देहवत्सु ।
तस्माद् विद्याद् व्यवसायं प्रभूतम् ॥
विद्या, तप तथा प्रचुर धन — ये सब उद्योगसे प्राप्त हो सकते हैं । वह उद्योग प्राणियोंमें बुद्धिके अधीन होकर रहता है; अतः उद्योगको ही समस्त कार्योंकी सिद्धिका पर्याप्त साधन समझे ।
भीष्म उवाच
यश्च वेदः स वै धर्मो यश्च धर्मः स सत्पथः ।
ब्रह्मा पितामहः पूर्वं बभूवाथ प्रजापतिः ॥
जो वेद है, वही धर्म है और जो धर्म है, वही सत्पुरुषोंका सन्मार्ग है । सत्पुरुष हैं लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी, जो सबसे पहले प्रकट हुए थे ।
भीष्म उवाच
विषयाश्चैव कार्त्स्न्येन सर्व आहारसिद्धये ।
मूलमेतत् त्रिवर्गस्य निवृत्तिर्मोक्ष उच्यते ॥
सम्पूर्ण विषय पूर्णतः इन्द्रियोंके उपभोगमें आनेके लिये हैं । यही धर्म, अर्थ और कामका मूल है, इससे निवृत्त होना ही ‘मोक्ष’ कहा जाता है ।
भीष्म उवाच
धर्माच्छरीरसंगुप्तिर्धर्मार्थं चार्थ उच्यते ।
कामो रतिफलश्चात्र सर्वे ते च रजस्वलाः ॥
धर्मसे शरीरकी रक्षा होती है, धर्मका उपार्जन करनेके लिये ही अर्थकी आवश्यकता बतायी जाती है तथा कामका फल है रति । वे सभी रजोगुणमय हैं ।
भीष्म उवाच
अर्थार्थमन्यद् भवति विपरीतमथापरम् ।
अनर्थार्थमवाप्यार्थमन्यत्राद्योपकारकम् ।
बुद्ध्याबुद्धिरिहार्थे न तदज्ञाननिकृष्टया ॥
इसके सिवा, कभी दूसरे दूसरे उपाय भी अर्थके साधक हो जाते हैं और कभी अर्थसाधक कर्म भी विपरीत फल देनेवाला हो जाता है। कभी धन पाकर भी मनुष्य अनर्थकारी कर्मोंमें प्रवृत्त हो जाता है और धनसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे साधन हैं, वे धर्ममें सहायक हो जाते हैं । अतः धर्मसे धन होता है और धनसे धर्म, इस मान्यताके विषयमें अज्ञानमयी निकृष्ट बुद्धिसे मोहित हुआ मूढ़ मानव विश्वास नहीं रखता, इसलिये उसे दोनोंका फल सुलभ नहीं होता ।
कामन्दक → राजन
यो धर्मार्थौ परित्यज्य काममेवानुवर्तते ।
स धर्मार्थपरित्यागात् प्रज्ञानाशमिहार्च्छति ॥
कामन्दकने कहा — राजन्! जो धर्म और अर्थका परित्याग करके केवल कामका ही सेवन करता है, उन दोनोंके त्यागसे उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है ।
कामन्दक उवाच
प्रज्ञानाशात्मको मोहस्तथा धर्मार्थनाशकः ।
तस्मान्नास्तिकता चैव दुराचारश्च जायते ॥
बुद्धिका नाश ही मोह है। वह धर्म और अर्थ दोनोंका विनाश करनेवाला है । इससे मनुष्यमें नास्तिकता आती है और वह दुराचारी हो जाता है ।
लक्ष्मी उवाच
धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम् ।
शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ॥
महाप्राज्ञ! धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं (लक्ष्मी) — ये सब सदा शीलके ही आधारपर रहते हैं — शील ही इन सबकी जड़ है । इसमे संशय नहीं है ।
लक्ष्मी ने इन्द्र से कहा।
भीष्म उवाच
अविज्ञानादयोगो हि पुरुषस्योपजायते ।
विज्ञानादपि योगश्च योगो भूतिकरः परः ॥
ज्ञान न होनेसे मनुष्यको संकटकालमें उससे बचनेके लिये कोई योग्य उपाय नहीं सूझता; परंतु ज्ञानसे वह उपाय ज्ञात हो जाता है । उचित उपाय ही ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेका श्रेष्ठ साधन है ।
भीष्म उवाच
यश्चतुर्गुणसम्पन्नं धर्मं ब्रूयात् स धर्मवित् ।
अहेरिव हि धर्मस्य पदं दुःखं गवेषितुम् ॥
यथा मृगस्य विद्धस्य पदमेकं पदं नयेत् ।
लक्षेद् रुधिरलेपेन तथा धर्मपदं नयेत् ॥
जो वेदविहित स्मृतियोंद्वारा अनुमोदित, सज्जनोंद्वारा सेवित तथा अपनेको प्रिय लगनेवाला धर्म है, उसे चतुर्गुणसम्पन्न माना गया है । जो वैसे धर्मका उपदेश करता है, वही धर्मज्ञ है । सर्पके पदचिह्नकी भाँति धर्मके यथार्थ स्वरूपको ढूँढ़ निकालना बहुत कठिन है । जैसे बाणसे बिंधे हुए मृगका एक पैर पृथ्वीपर रक्तका लेप कर देनेके कारण व्याधको उस मृगके रहनेके स्थानको लक्षित कराकर वहाँ पहुँचा देता है, उसी प्रकार उक्त चतुर्गुणसम्पन्न धर्म भी धर्मके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति करा देता है ।
भीष्म उवाच
तत्र न व्यवधातव्यं परोक्षा धर्मयापना ।
अधर्मो धर्म इत्येतद् यथा वृकपदं तथा ॥
धर्म और अधर्मकी समस्या रखकर किसीके कर्तव्यमें व्यवधान नहीं डालना चाहिये; क्योंकि धर्मका फल प्रत्यक्ष नहीं है । जैसे भेड़ियेका पदचिह्न देखकर किसीको यह निश्चय नहीं होता कि यह व्याघ्रका पदचिह्न है या कुत्तेका? उसी प्रकार धर्म और अधर्मके विषयमें निर्णय करना कठिन है ।
भीष्म उवाच
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडानुबन्धास्त्रय एव च ।
अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडाश्च परिवर्जयेत् ॥
धर्म, अर्थ और काम — इन त्रिविध पुरुषार्थोंके सेवनमें लोभ, मूर्खता और दुर्बलता — यह तीन प्रकारकी बाधा-अड़चन उपस्थित होती है । उसी प्रकार उनके शान्ति, सर्वहितकारी कर्म और उपभोग — ये तीन ही प्रकारके फल होते हैं । इन (तीनों प्रकारके) फलोंको शुभ जानना चाहिये; परंतु (उक्त तीनों प्रकारकी) बाधाओंसे यत्नपूर्वक बचना चाहिये ।
भीष्म उवाच
तस्मात् कौन्तेय विदुषा धर्माधर्मविनिश्चये ।
बुद्धिमास्थाय लोकेऽस्मिन् वर्तितव्यं कृतात्मना ॥
अतः कुन्तीनन्दन! अपने मनको वशमें रखनेवाले विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इस जगत्में धर्म और अधर्मका निर्णय करनेके लिये अपनी ही विशुद्ध बुद्धिका आश्रय लेकर यथायोग्य बर्ताव करे ।
भीष्म उवाच
अमिथ्याज्ञानिनः केचिन्मिथ्याविज्ञानिनः परे ।
तद्वै यथायथं बुद्ध्वा ज्ञानमाददते सताम् ॥
कुछ लोग यथार्थ ज्ञानी होते हैं और कुछ लोग मिथ्या ज्ञानी, इस बातको ठीक-ठीक समझकर राजा सत्यज्ञानसम्पन्न सत्पुरुषोंके ही ज्ञानको ग्रहण करते हैं ।
भीष्म उवाच
अद्वैधज्ञः पथि द्वैधे संशयं प्राप्तुमर्हति ।
बुद्धिद्वैधं वेदितव्यं पुरस्तादेव भारत ॥
एक ही धर्म या कर्म किसी समय धर्म माना जाता है और किसी समय अधर्म । उसकी जो यह दो प्रकारकी स्थिति है, उसीका नाम द्वैध है । जो इस द्विविधतत्त्वको नहीं जानता, वह द्वैधमार्गपर पहुँचकर संशयमें पड़ जाता है । भरतनन्दन! बुद्धिके द्वैधको पहले ही अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ।
भीष्म उवाच
ज्ञानमप्यपदिश्यं हि यथा नास्ति तथैव तत् ।
तं तथा छिन्नमूलेन सन्नोदयितुमर्हसि ॥
जो संशयात्मक ज्ञान है, उसका होना और न होना बराबर है; अतः तुम उस संशयका मूलोच्छेद करके उसे दूर हटा दो (संशयरहित ज्ञानका आश्रय लो)
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
गृध्र उवाच
प्रज्ञाविज्ञानयुक्तेन बुद्धिसंज्ञाप्रदायिना ।
वचनं श्राविता नूनं मानुषाः संनिवर्तत ।
शोको द्विगुणतां याति दृष्ट्वा स्मृत्वा च चेष्टितम् ॥
मनुष्यो! मैं बुद्धि और विज्ञानसे युक्त तथा दूसरोंको भी ज्ञान प्रदान करनेवाला हूँ । मैंने तुम्हें विवेक उत्पन्न करनेवाली बहुत-सी बातें सुनायी हैं। अब तुमलोग लौट जाओ । अपने मरे हुए स्वजनका शव देखकर तथा उसकी चेष्टाओंको स्मरण करके दूना शोक होता है ।
भीष्म उवाच
कुर्वते च बहून् मार्गांस्तान् हेतुबलमाश्रिताः ।
सतां मार्गान् विलुम्पन्ति लोभाज्ञानेषु निष्ठिताः ॥
युक्तिबलका आश्रय लेकर बहुत-से असत् मार्ग खड़े कर देते हैं तथा लोभ और अज्ञानमें स्थित हो सत्पुरुषोंके स्थापित किये हुए मार्गों (धर्ममर्यादाओं) का नाश करने लगते हैं ।
भीष्म उवाच
अवाचिनोति कर्माणि न च सम्प्रचिनोति ह ।
समः सर्वेषु भूतेषु मैत्रायणगतिश्चरेत् ॥
वह उपभोगद्वारा प्रारब्ध-कर्मोंको क्षीण करता है और कर्तृत्वाभिमान तथा फलासक्तिसे शून्य होनेके कारण नूतन कर्मोंका संचय नहीं करता है। सभी प्राणियोंमें समानभाव रखकर सबको मित्रकी भाँति अभयदान देता हुआ विचरता है ।
भीष्म उवाच
सत्यं सत्सु सदा धर्मः सत्यं धर्मः सनातनः ।
सत्यमेव नमस्येत सत्यं हि परमा गतिः ॥
सत्पुरुषोंमें सदा सत्यरूप धर्मका ही पालन हुआ है । सत्य ही सनातन धर्म है । सत्यको ही सदा सिर झुकाना चाहिये; क्योंकि सत्य ही जीवकी परम गति है ।
भीष्मजी ने भरतनन्दन से कहा।
भीष्म उवाच
सत्यं धर्मस्तपो योगः सत्यं ब्रह्म सनातनम् ।
सत्यं यज्ञः परः प्रोक्तः सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
सत्य ही धर्म, तप और योग है, सत्य ही सनातन ब्रह्म है, सत्यको ही परम यज्ञ कहा गया है तथा सब कुछ सत्यपर ही टिका हुआ है ।
भीष्मजी ने भरतनन्दन से कहा।
भीष्म उवाच
सत्यं नामाव्ययं नित्यमविकारि तथैव च ।
सर्वधर्माविरुद्धेन योगेनैतदवाप्यते ॥
नित्य एकरस, अविनाशी और अविकारी होना ही सत्यका लक्षण है । समस्त धर्मोके अनुकूल कर्तव्य-पालनरूप योगके द्वारा इस सत्यकी प्राप्ति होती है ।
भीष्म उवाच
अज्ञानप्रभवो मोहः पापाभ्यासात् प्रवर्तते ।
यदा प्राज्ञेषु रमते तदा सद्यः प्रणश्यति ॥
मोह अज्ञानसे उत्पन्न होता है और पापकी आवृत्ति करनेसे बढ़ता है । जब मनुष्य विद्वानोंमें अनुराग करता है, तब उसका मोह तत्काल नष्ट हो जाता है ।
भीष्म उवाच
कुलाज्ज्ञानात् तथैश्वर्यान्मदो भवति देहिनाम् ।
एभिरेव तु विज्ञातैः स च सद्यः प्रणश्यति ॥
अपने उत्तम कुल, उत्कृष्ट ज्ञान तथा ऐश्वर्यका अभिमान होनेसे देहाभिमानी मनुष्योंपर मद सवार हो जाता है; परंतु इनके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर वह मद तत्काल उतर जाता है ।
भीष्म उवाच
अज्ञानप्रभवो लोभो भूतानां दृश्यते सदा ।
अस्थिरत्वं च भोगानां दृष्ट्वा ज्ञात्वा निवर्तते ॥
प्राणियोंका भोगोंके प्रति जो लोभ देखा जाता है, वह अज्ञानके ही कारण है । भोगोंकी क्षणभङ्गुरताको देखने और जाननेसे उसकी निवृत्ति हो जाती है ।
युधिष्ठिर उवाच
यो वै न पापे निरतो न पुण्ये ।
नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे ।
विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनो ।
विमुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ॥
जो न पापमें लगा हो और न पुण्यमें, न तो अर्थोपार्जनमें तत्पर हो न धर्ममें, न काममें ही । वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित मनुष्य दुःख और सुखको देनेवाली सिद्धियोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टीके ढेले और सोनेमें उसका समान भाव हो जाता ।
युधिष्ठिर ने विदुर और भाइयों की बातें सुनकर अपना निर्णय बताया।
भीष्म उवाच
यस्मिन् यस्मिंस्तु विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥
भरतश्रेष्ठ! जो-जो पुरुष जिस-जिस विषयमें पूर्ण निश्चयको पहुँच जाता है (जिसके द्वारा उसे अभीष्ट सिद्धिका विश्वास हो जाता है), उसीको वह कर्तव्य समझता है । दूसरे विषयको नहीं ।
ब्राह्मण उवाच
एतां बुद्धिं समास्थाय गुप्तचित्तश्चरेद् बुधः ।
उदयास्तमयज्ञं हि न शोकः स्प्रष्टुमर्हति ॥
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इसी विचारका आश्रय लेकर मनको काम, क्रोध आदि शत्रुओंसे सुरक्षित रखते हुए उत्तम बर्ताव करे । जो उत्पत्ति और विनाशके तत्त्वको जानता है, उसे शोक छू नहीं सकता ।
ब्राह्मण उवाच
यदा न कुरुते धीरः सर्वभूतेषु पापकम् ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब धैर्यसम्पन्न ज्ञानवान् पुरुष किसी भी प्राणीके प्रति मन, वाणी और क्रियाद्वारा पापपूर्ण बर्ताव नहीं करता, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।
पुत्र उवाच
न मृत्युसेनामायान्तीं जातु कश्चित् प्रबाधते ।
ऋते सत्यमसत् त्याज्यं सत्ये ह्यमृतमाश्रितम् ॥
सत्यके बिना कोई भी मनुष्य सामने आते हुए मृत्युकी सेनाका कभी सामना नहीं कर सकता; इसलिये असत्यको त्याग देना चाहिये । क्योंकि अमृतत्व सत्यमें ही स्थित है ।
पुत्र उवाच
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः ।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥
संसारमें विद्या (ज्ञान)-के समान कोई नेत्र नहीं है, सत्यके समान कोई तप नहीं है, आसक्ति एवं क्रोधके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागके समान कोई सुख नहीं ।
भीष्म उवाच
सर्वसाम्यमनायासं सत्यवाक्यं च भारत ।
निर्वेदश्चाविधित्सा च यस्य स्यात् स सुखी नरः ॥
भीष्मजीने कहा — भारत! सबमें समताका भाव, व्यर्थ परिश्रमका अभाव, सत्यभाषण, संसारसे वैराग्य और कर्मासक्तिका अभाव — ये पाँचों जिस मनुष्यमें होते हैं, वह सुखी होता है ।
भीष्म उवाच
न हृदयमनुरुध्य वाङ्मनो वा ।
प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च ।
तदुभयमुपलक्षयन्निवाहं ।
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥
मन, वाणी और बुद्धिकी उपेक्षा करके इनको प्रिय लगनेवाले विषय-सुखोंकी दुर्लभता तथा अनित्यता — इन दोनोंको देखनेवालेकी भाँति मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ ।
भृगु उवाच
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः ।
मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयश्च सः ॥
वह प्राणसे संयुक्त आत्मा ही जीव है, वही सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा सनातन पुरुष है । वही मन, बुद्धि, अहंकार, पाँचों भूत और विषयरूप हो रहा है ।
भृगु उवाच
न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे ।
मिथ्यैतदाहुर्मृत इत्यबुद्धाः ।
जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति ।
दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥
देहका नाश होनेपर भी जीवका नाश नहीं होता । जो जीवकी मृत्यु बताते हैं, वे अज्ञानी हैं और उनका वह कथन मिथ्या है । जीव तो इस मृत देहका त्याग करके दूसरे शरीरमें चला जाता है । शरीरके पाँच तत्त्वोंका अलग-अलग हो जाना ही शरीरका नाश है ।
भृगु उवाच
अविस्रम्भे न गन्तव्यं विस्रम्भे धारयेन्मनः ।
मनः प्राणे निगृह्णीयात् प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् ॥
जो विश्वासके योग्य नहीं है, उस मार्गपर न चले और जो विश्वास करनेयोग्य है, उसमें मन लगावे । मनको प्राणमें और प्राणको ब्रह्ममें स्थापित करे ।
भृगु → मुने
सत्यं ब्रह्म तपः सत्यं सत्यं विसृजते प्रजाः ।
सत्येन धार्यते लोकः स्वर्गं सत्येन गच्छति ॥
भृगुजी कहते हैं — मुने! सत्य ही ब्रह्म है, सत्य ही तप है, सत्य ही प्रजाकी सृष्टि करता है, सत्यके ही आधारपर संसार टिका हुआ है और सत्यके ही प्रभावसे मनुष्य स्वर्गमें जाता है ।
भृगु उवाच
इत्युक्तोऽयं मया धर्मः संक्षिप्तो ब्रह्मनिर्मितः ।
धर्माधर्मो हि लोकस्य यो वै वेत्ति स बुद्धिमान् ॥
इस प्रकार मैंने यहाँ ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित इस धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया है । जो लोकमें करने और न करने योग्य धर्म और अधर्मको जानता है, वही बुद्धिमान् है ।
भीष्म उवाच
प्रीतिः सत्त्वं रजः शोकस्तमो मोहस्तु ते त्रयः ।
ये ये च भावा लोकेऽस्मिन् सर्वेष्वेतेषु वै त्रिषु ॥
प्रसन्नता या हर्ष सत्त्वगुणका कार्य है, शोक रजोगुणरूप है और मोह तमोगुणरूप । इस संसारमें जो-जो भाव हैं, वे सब इन्हीं तीनोंके अन्तर्गत हैं ।
भीष्म उवाच
सुखस्पर्शः सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुणः ।
तमोगुणेन संयुक्तौ भवतोऽव्यावहारिकौ ॥
सत्त्वगुण सुखकी अनुभूति करानेवाला है, रजोगुण दुःखकी प्राप्ति कराता है और जब वे दोनों तमोगुण (मोह)-से संयुक्त होते हैं, तब व्यवहारके विषय नहीं रह जाते ।
भीष्म उवाच
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता ।
कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणाः ॥
जब मनमें किसी प्रकार भी अत्यन्त हर्ष, प्रेम, आनन्द, सुख और शान्तिका अनुभव हो रहा हो, तब इन गुणोंको सात्त्विक समझना चाहिये ।
भीष्म उवाच
अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा ।
लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ॥
जिस समय किसी कारणसे या बिना कारण ही असंतोष, शोक, संताप, लोभ और असहनशीलताके भाव दिखायी दें तो उन्हें रजोगुणका चिह्न जानना चाहिये ।
भीष्म उवाच
अवमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता ।
कथंचिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥
इसी प्रकार जब अपमान, मोह, प्रमाद, स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष किसी तरह भी घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप समझे ।
भीष्म उवाच
महानद्या हि पारज्ञस्तप्यते न तदन्यथा ।
न तु तप्यति तत्त्वज्ञः फले ज्ञाते तरत्युत ॥
किसी महानदीके पारको जाननेवाला पुरुष केवल जाननेमात्रसे कृतकृत्य नहीं होता; जबतक वह नौका आदिके द्वारा वहाँ पहुँच न जाय, तबतक वह चिन्तासे संतप्त ही रहता है । परंतु तत्त्वज्ञ पुरुष ज्ञानमात्रसे ही संसार-सागरसे पार हो जाता है; उसे संताप नहीं होता । क्योंकि यह ज्ञान स्वयं ही पुलस्वरूप है ।
भीष्म उवाच
त्रिवर्गो यस्य विदितः प्रेक्ष्य यश्च विमुञ्चति ।
अन्विष्य मनसा युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ॥
जिसे धर्म, अर्थ और काम — इन तीनोंका ठीक-ठीक ज्ञान है, जो खूब सोच-समझकर उनका परित्याग कर चुका है और जिसने मनके द्वारा आत्मतत्त्वका अनुसंधान करके योगयुक्त हो आत्मासे भिन्न वस्तुके लिये उत्सुकताका त्याग कर दिया है, वही तत्त्वदर्शी है ।
भीष्म उवाच
अभयं चानिमित्तं च न तत् क्लेशसमावृतम् ।
द्वाभ्यां मुक्तं त्रिभिर्मुक्तमष्टाभिस्त्रिभिरेव च ॥
परमात्माका परमधाम विनाशके भयसे रहित है; क्योंकि वह कारणरहित नित्य-सिद्ध है । वह अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक पाँच क्लेशोंसे घिरा हुआ नहीं है । उसमें प्रिय और अप्रिय ये दो भाव नहीं हैं । प्रिय और अप्रियके हेतुभूत तीन गुण-सत्त्व, रज और तम भी नहीं हैं तथा वह परमधाम भूत, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, उपासना, कर्म, प्राण और अविद्या — इन आठ पुरियोंसे भी मुक्त है । वहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय — इस त्रिपुटीका भी अभाव है ।
ब्राह्मण उवाच
तपांसि यानि चीर्णानि चरिष्यन्ति च यत् तपः ।
शतैः शतसहस्रैश्च तैः सत्यान्न विशिष्यते ॥
लोगोंने अबतक जितनी तपस्याएँ की हैं और भविष्यमें भी जितनी करेंगे, उन सबको सौगुना या लाखगुना करके एकत्र किया जाय तो भी उनका महत्त्व सत्यसे बढ़कर नहीं सिद्ध होगा ।
ब्राह्मण उवाच
सत्यं वेदेषु जागार्ति फलं सत्ये परं स्मृतम् ।
सत्याद् धर्मो दमश्चैव सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
वेदोंमें सत्य ही जागता है — उसीकी महिमा बतायी गयी है । सत्यका ही सबसे श्रेष्ठ फल माना गया है । धर्म और इन्द्रिय-संयमकी सिद्धि भी सत्यसे ही होती है । सत्यके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ।
ब्राह्मण उवाच
सत्यं वेदास्तथाङ्गानि सत्यं विद्यास्तथा विधिः ।
व्रतचर्या तथा सत्यमोङ्कारः सत्यमेव च ॥
सत्य ही वेद और वेदांग है । सत्य ही विद्या तथा विधि है । सत्य ही व्रतचर्या तथा सत्य ही ओंकार है ।
ब्राह्मण उवाच
सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः ।
सत्यं यज्ञस्तपो वेदाः स्तोभा मन्त्राः सरस्वती ॥
सत्यसे ही आग जलती है तथा सत्यपर ही स्वर्गलोक प्रतिष्ठित है । यज्ञ, तप, वेद, स्तोभ, मन्त्र और सरस्वती-सब सत्यके ही स्वरूप हैं ।
विरूप उवाच
नायं धारयते किञ्चिज्जिज्ञासा त्वत्कृते कृता ।
कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् ॥
सर्वमन्योन्यनिष्कर्षे निघृष्टं पश्यतस्तव ।
गच्छ लोकान् जितान् स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ॥
यह मेरा साथी कुछ भी धारण नहीं करता अथवा मुझपर भी इसका कोई ऋण नहीं है । यह सब खेल तो हमलोगोंने आपकी परीक्षा लेनेके लिये किया था । काल, धर्म, मृत्यु, काम, - सब एक-दूसरेकी कसौटीपर - - -क्रोध और आप दोनों ये सब के-आपके देखते देखते कसेगये हैं । अब जहाँ आपकी इच्छा हो, अपने कर्मसे जीते हुए उन लोकोंमें जाइये ।
विरूप उवाच
ब्रह्मस्थानमनावर्तमेकमक्षरसंज्ञकम् ।
अदुःखमजरं शान्तं स्थानं तत् प्रतिपद्यते ॥
ब्रह्मपद पुनरावृत्तिरहित, एक, अविनाशी, संज्ञारहित, दुःख-शून्य, अजर और शान्त आश्रय है, उसे ही वह जापक प्राप्त होता है ।
विरूप उवाच
चतुर्भिर्लक्षणैर्हीनं तथा षड्भिः सषोडशैः ।
पुरुषं तमतिक्रम्य आकाशं प्रतिपद्यते ॥
जापक पूर्वोक्त परमेष्ठी पुरुष (सगुण ब्रह्म) से भी ऊपर उठकर आकाशस्वरूप निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होता है । वहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द — इन चारों प्रमाणों और लक्षणोंकी पहुँच नहीं है । क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह तथा जरा और मृत्यु — ये छः तरंगें वहाँ नहीं हैं । पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँचों कर्मेन्द्रियाँ, पाँचों प्राण तथा मन — इन सोलह उपकरणोंसे भी वह रहित है ।
ब्रह्मा उवाच
महास्मृतिं पठेद् यस्तु तथैवानुस्मृतिं शुभाम् ।
तावप्येतेन विधिना गच्छेतां मत्सलोकताम् ।
यश्च योगे भवेद् भक्तः सोऽपि नास्त्यत्र संशयः ।
विधिनानेन देहान्ते मम लोकानवाप्नुयात् ।
साधये गम्यतां चैव यथास्थानानि सिद्धये ॥
ब्रह्माजीने कहा — देवताओ! जो महास्मृति तथा कल्याणमयी अनुस्मृतिका पाठ करता है, वह भी इसी विधिसे मेरा सालोक्य प्राप्त कर लेता है । जो योगका भक्त है, वह भी देहत्यागके पश्चात् इसी विधिसे मेरे लोकोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है । अब तुम सब लोग अपनी अभीष्ट सिद्धिके लिये अपने-अपने स्थानको जाओ । मैं तुम लोगों अभीष्ट साधन करता रहूँगा ।
भीष्म उवाच
ज्ञानं यतः प्रार्थयते नरो वै ।
ततस्तदर्था भवति प्रवृत्तिः ।
न चाप्यहं वेद परं पुराणं ।
मिथ्याप्रवृत्तिं च कथं नु कुर्याम् ॥
मनुष्यको जिस वस्तुका ज्ञान होता है, उसीको वह पाना चाहता है और पानेकी इच्छा उत्पन्न होनेपर उसके लिये वह प्रयत्न आरम्भ करता है; परंतु मैं तो उस पुरातन परमोत्कृष्ट वस्तुके विषयमें कुछ जानता ही नहीं हूँ; फिर उसे पानेके लिये झूठा प्रयत्न कैसे करूँ?
मनु उवाच
आत्मादिभिः कर्मभिरिध्यमानो ।
धर्मे प्रवृत्तो द्युतिमान् सुखार्थी ।
परं हि तत् कर्मपथादपेतं ।
निराशिषं ब्रह्मपरं ह्यवैति ॥
जब मन नित्य कर्मोंके अनुष्ठानसे राग आदि दोषोंको दूर करके दर्पणकी भाँति स्वच्छ एवं दीप्तिमान् हो जाता है, तब वह द्युतिमान् (सदसद्-विवेकके प्रकाशसे युक्त) और नित्य सुखका अभिलाषी (मुमुक्षु) होकर निर्वाणभावसे धर्ममें प्रवृत्त होता है एवं कर्ममार्गसे अतीत तथा कामनाओंसे रहित परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ।
मनु उवाच
स्वेनात्मना चक्षुरिव प्रणेता ।
निशात्यये तमसा संवृतात्मा ।
ज्ञानं तु विज्ञानगुणेन युक्तं ।
कर्माशुभं पश्यति वर्जनीयम् ॥
जब रात बीत जाती है और अन्धकारका आवरण हट जाता है, उस समय जैसे चलनेमें प्रवृत्त करनेवाला नेत्र अपने तैजस् स्वरूपसे युक्त हो रास्तेमें पड़े हुए त्यागने योग्य काँटे आदिको देखते हैं, उसी प्रकार बुद्धि भी मोहका पर्दा हट जानेपर ज्ञानके प्रकाशसे युक्त हो त्यागने योग्य अशुभ कर्मको देखती है ।
मनु उवाच
सर्पान् कुशाग्राणि तथोदपानं ।
ज्ञात्वा मनुष्याः परिवर्जयन्ति ।
अज्ञानतस्तत्र पतन्ति केचिज्ज्ञाने फलं पश्य यथा विशिष्टम् ॥
मनुष्य जब जान लेते हैं कि रास्तेमें सर्प है, कुशोंके काँटे हैं और कुएँ हैं, तब उनसे बचकर निकलते हैं । जो नहीं जानते हैं, ऐसे कितने ही पुरुष उन्हींपर गिर पड़ते हैं । अतः ज्ञानका जो विशिष्ट फल है, उसे तुम प्रत्यक्ष देख लो ।
मनु उवाच
यथा प्रदीप्तः पुरतः प्रदीपः ।
प्रकाशमन्यस्य करोति दीप्यन् ।
तथेह पञ्चेन्द्रियदीपवृक्षा ।
ज्ञानप्रदीप्ताः परवन्त एव ॥
जिस प्रकार अग्निसे प्रज्वलित दीपक स्वयं प्रकाशित होता हुआ पासमें स्थित अन्य वस्तुओंको भी प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार इस शरीररूप वृक्षमें स्थित पाँच इन्द्रियाँ चैतन्यरूपी ज्ञानके प्रकाशसे प्रकाशित होकर विषयोंको प्रकाशित करती हैं (उनका प्रकाश चिन्मय प्रकाशके ही अधीन होनेके कारण वे पराधीन हैं । स्वतः प्रकाश करनेमें समर्थ नहीं हैं)
मनु उवाच
उत्पत्तिवृद्धिव्ययसंनिपातैर्न युज्यतेऽसौ परमः शरीरी ।
अनेन लिङ्गेन तु लिङ्गमन्यद् ।
गच्छत्यदृष्टः फलसंनियोगात् ॥
आत्मा शरीरसे सर्वथा भिन्न है । वह इसके उत्पत्ति, वृद्धि, क्षय और मृत्यु आदि दोषोंसे कभी लिप्त नहीं होता । किंतु अज्ञानी मनुष्य पूर्वकृत कर्मोंके फलके सम्बन्धसे इस ऊपर बताये हुए सूक्ष्म शरीरके सहित दूसरे शरीरमें चला जाता है ।
मनु उवाच
न हि खल्वनुपायेन कश्चिदर्थोऽभिसिद्ध्यति ।
सूत्रजालैर्यथा मत्स्यान् बध्नन्ति जलजीविनः ॥
मृगैर्मृगाणां ग्रहणं पक्षिणां पक्षिभिर्यथा ।
गजानां च गजैरेव ज्ञेयं ज्ञानेन गृह्यते ॥
उचित उपाय किये बिना कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है, जैसे जलमें रहनेवाले प्राणियोंसे जीविका चलानेवाले सूतके जाल बनाकर उनके द्वारा मछलियोंको बाँध लेते हैं, जैसे मृगोंके द्वारा मृगोंको, पक्षियोंद्वारा पक्षियोंको और हाथियोंद्वारा हाथियोंको पकड़ा जाता है, उसी प्रकार ज्ञेय वस्तुका ज्ञानके द्वारा ग्रहण होता है ।
मनु उवाच
इन्द्रियेभ्यो मनः पूर्वं बुद्धिः परतरा ततः ।
बुद्धेः परतरं ज्ञानं ज्ञानात् परतरं महत् ॥
इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे ज्ञान श्रेष्ठतर है और ज्ञानसे परात्पर परमात्मा श्रेष्ठ है ।
मनु उवाच
बुद्धिः कर्मगुणैर्हीना यदा मनसि वर्तते ।
तदा सम्पद्यते ब्रह्म तत्रैव प्रलयं गतम् ॥
जिस समय बुद्धि कर्मजनित गुणोंसे छूटकर हृदयमें स्थित हो जाती है, उस समय जीवात्मा ब्रह्ममें लीन होकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ।
मनु उवाच
सेयं गुणवती बुद्धिर्गुणेष्वेवाभिवर्तते ।
अपरादभिनिःसृत्य गिरेः शृङ्गादिवोदकम् ॥
अन्यथा जैसे जलकी धारा पर्वतके शिखरसे निकलकर ढालकी ओर बहती है, उसी प्रकार यह गुणवती बुद्धि अज्ञानके कारण परमात्मासे नियुक्त होकर रूप आदि गुणोंकी ओर बहने लग जाती है ।
मनु उवाच
यदा निर्गुणमाप्नोति ध्यानं मनसि पूर्वजम् ।
तदा प्रज्ञायते ब्रह्म निकषं निकषे यथा ॥
परंतु जब साधक सबके आदिकारण निर्गुण ध्येयतत्त्वको ध्यानद्वारा अन्तःकरणमें प्राप्त कर लेता है, तब कसौटीपर कसे हुए सुवर्णके समान ब्रह्मके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान होता है ।
मनु उवाच
ज्ञानं ज्ञेयाभिनिर्वृत्तं विद्धि ज्ञानगुणं मनः ।
प्रज्ञाकरणसंयुक्तं ततो बुद्धिः प्रवर्तते ॥
बृहस्पते! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि ज्ञेयरूपमें परमात्मासे ज्ञान प्रकट होता है और मन ज्ञानका गुण (कार्य) है। जब वह ज्ञानेन्द्रियोंसे युक्त होता है, तब बुद्धि कर्मोंमें प्रवृत्त होती है ।
मनु उवाच
गुणवद्भिर्गुणोपेतं यदा ध्यानगुणं मनः ।
तदा सर्वान् गुणान् हित्वा निर्गुणं प्रतिपद्यते ॥
शब्दादि गुणोंसे युक्त इन्द्रियोंके सम्बन्धसे उन गुणोंसे घिरा हुआ मन जब ध्यानजनित गुणोंसे सम्पन्न होता है, तब उन समस्त गुणोंको त्यागकर निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ।
मनु उवाच
यथा पञ्च विमुक्तानि इन्द्रियाणि स्वकर्मभिः ।
तथा हि परमं ब्रह्म विमुक्तं प्रकृतेः परम् ॥
जैसे पाँचों इन्द्रियाँ अपने कार्यरूप शब्द आदि गुणोंसे भिन्न हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा भी प्रकृतिसे सर्वथा परे है ।
मनु उवाच
धर्मादुत्कृष्यते श्रेयस्तथाश्रेयोऽप्यधर्मतः ।
रागवान् प्रकृतिं ह्येति विरक्तो ज्ञानवान् भवेत् ॥
धर्म करनेसे श्रेयकी वृद्धि होती है और अधर्म करनेसे मनुष्यका अकल्याण होता है । विषयासक्त पुरुष प्रकृतिको प्राप्त होता है और विरक्त आत्मज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाता है ।
मनु उवाच
फलं कर्मात्मकं विद्यात् कर्म ज्ञेयात्मकं तथा ।
ज्ञेयं ज्ञानात्मकं विद्याज्ज्ञानं सदसदात्मकम् ॥
इस प्रकार फलको कर्मस्वरूप समझे । कर्मको जाननेमें आनेवाले पदार्थोंका रूप समझे और ज्ञेयको ज्ञानरूप समझे तथा ज्ञानका स्वरूप कार्य और कारण जाने ।
मनु उवाच
ज्ञानानां च फलानां च ज्ञेयानां कर्मणां तथा ।
क्षयान्ते यत् फलं विद्याज्ज्ञानं ज्ञेयप्रतिष्ठितम् ॥
ज्ञान, फल, ज्ञेय और कर्म — इन सबका अन्त होनेपर जो प्राप्तव्य फलरूपसे शेष रहता है, उसको ही तुम ज्ञेयमात्रमें व्याप्त होकर स्थित हुआ ज्ञानस्वरूप परमात्मा समझो ।
भीष्म → राजन
ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति ।
अत्रोपायं प्रवक्ष्यामि यथावच्छास्त्रचक्षुषा ।
तत्त्वज्ञानाच्चरन् राजन् प्राप्नुयात्परमां गतिम् ॥
भीष्मजी कहते हैं — राजन्! अब मैं तुम्हें शास्त्र-दृष्टिसे मोक्षका यथावत् उपाय बताता हूँ। शास्त्रविहित कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता हुआ मनुष्य तत्त्वज्ञानसे परमगतिको प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म उवाच
ज्ञानाभ्यासाज्जागरणं जिज्ञासार्थमनन्तरम् ।
विज्ञानाभिनिवेशात्तु स जागर्त्यनिशं सदा ॥
मनुष्यमें पहले तो ज्ञानका अभ्यास करनेसे जागनेकी आदत होती है, तत्पश्चात् विचार करनेके लिये जागना अनिवार्य हो जाता है तथा जो तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह तो ब्रह्ममें निरन्तर जागता ही रहता है ।
भीष्म उवाच
मनस्यन्तर्हितं द्वारं देहमास्थाय मानुषम् ।
यद् यत् सदसदव्यक्तं स्वपित्यस्मिन्निदर्शनम् ।
सर्वभूतात्मभूतस्थं तमध्यात्मगुणं विदुः ॥
स्वप्न-दर्शनका द्वारभूत जो स्थूल मानव देह है, वह सुषुप्ति अवस्थामें मनमें लीन हो जाता है । उसी देहका आश्रय ले मन अव्यक्त सदसत्स्वरूप एवं साक्षीभूत आत्माको प्राप्त होता है । वह आत्मा सम्पूर्ण भूतोंके आत्मभूत है । ज्ञानी पुरुष उसे अध्यात्मगुणसे युक्त मानते हैं ।
भीष्म उवाच
मर्त्यलोकाद् विमुच्यन्ते विद्यासंसक्तचेतसः ।
ब्रह्मभूता विरजसस्ततो यान्ति परां गतिम् ॥
जिनका मन ज्ञानके साधनमें लगा हुआ है, वे मर्त्यलोकके बन्धनसे छूट जाते हैं और रजोगुणसे रहित एवं ब्रह्मस्वरूप हो परम गतिको प्राप्त कर लेते हैं ।
भीष्म उवाच
अनात्मा ह्यात्मनो मृत्युः क्लेशो मृत्युर्जरामयः ।
आत्मानं मन्यते मोहात् तदसम्यक् परं मतम् ॥
आत्माके स्वरूपभूत शरीरका अभाव होना ही उसकी मृत्यु है । इस दृष्टिसे दुःख, वृद्धावस्था तथा नाना प्रकारके रोग — ये सभी आत्माकी मृत्यु ही हैं (क्योंकि इनके द्वारा शरीरका आंशिक विनाश होता रहता है) । फिर भी जो लोग आत्माको देहसे भिन्न मानते हैं, उनकी यह मान्यता बहुत ही असंगत है ।
प्रह्लाद उवाच
यस्तु कर्तारमात्मानं मन्यते साध्वसाधु वा ।
तस्य दोषवती प्रज्ञा अतत्त्वज्ञेति मे मतिः ॥
जो आत्माको शुभ या अशुभ कर्मोंका कर्ता मानता है, उसकी बुद्धि दोषसे युक्त और तत्त्वज्ञानसे रहित है — ऐसी मेरी मान्यता है ।
प्रह्लाद उवाच
विकारानेव यो वेद न वेद प्रकृतिं पराम् ।
तस्य स्तम्भो भवेद् बाल्यान्नास्ति स्तम्भोऽनुपश्यतः ॥
जो विकारों (कार्यों) को ही जानता है, उनकी परम प्रकृति (स्वभाव) को नहीं जानता, उसीको अविवेकके कारण मोह या अभिमान होता है । जो इस बातको ठीक-ठीक समझता है, उसे मोह नहीं होता ।
प्रह्लाद उवाच
वेद धर्मविधिं कृत्स्नं भूतानां चाप्यनित्यताम् ।
तस्माच्छक्र न शोचामि सर्वं ह्येवेदमन्तवत् ॥
इन्द्र! मैं धर्मकी पूरी-पूरी विधि तथा सम्पूर्ण भूतोंकी अनित्यताको जानता हूँ । इसलिये, ‘यह सब नाशवान् है’ ऐसा समझकर किसीके लिये शोक नहीं करता ।
प्रह्लाद उवाच
कृतप्रज्ञस्य दान्तस्य वितृष्णस्य निराशिषः ।
नायासो विद्यते शक्र पश्यतो लोकमव्ययम् ॥
इन्द्र! मैं शुद्ध-बुद्धि तथा मन और इन्द्रियोंको अपने अधीन करके स्थित हूँ । मैं तृष्णा और कामनासे रहित हूँ और सदा अविनाशी आत्मापर ही दृष्टि रखता हूँ, इसलिये मुझे कभी कष्ट नहीं होता ।
बलि उवाच
न हि दुःखेषु शोचन्ते न प्रहृष्यन्ति चर्धिषु ।
कृतप्रज्ञा ज्ञानतृप्ताः क्षान्ताः सन्तो मनीषिणः ॥
जिसकी बुद्धि शुद्ध है तथा जो ज्ञानसे तृप्त हैं, वे क्षमाशील मनीषी सत्पुरुष दुःख पड़नेपर शोक नहीं करते और समृद्धि प्राप्त होनेपर हर्षसे फूल नहीं उठते हैं ।
बलि उवाच
भूतानां निधनं निष्ठा स्रोतसामिव सागरः ।
नैतत् सम्यग्विजानन्तो नरा मुह्यन्ति वज्रधृक् ॥
वज्रधारी इन्द्र! जैसे जलके प्रवाहोंका अन्तिम आश्रय समुद्र है, उसी प्रकार शरीरधारियोंकी अन्तिम गति मृत्यु है । जो पुरुष इस बातको अच्छी तरह जानते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते हैं ।
नमुचि उवाच
न पण्डितः क्रुध्यति नाभिपद्यते ।
न चापि संसीदति न प्रहृष्यति ।
न चार्थकृच्छ्रव्यसनेषु शोचते ।
स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः ॥
विद्वान् पुरुष कभी क्रोध नहीं करता, कहीं आसक्त नहीं होता, अनिष्टकी प्राप्ति होनेपर दुःखसे व्याकुल नहीं होता और किसी प्रिय वस्तुको पाकर अत्यन्त हर्षित नहीं होता है । आर्थिक कठिनाई या संकटके समय भी वह शोकग्रस्त नहीं होता है; अपितु हिमालयके समान स्वभावसे ही अविचल बना रहता है ।
बलि उवाच
निष्प्रीतिं नष्टसंतापमात्मानं त्वमुपाससे ।
सुहृदं सर्वभूतानां निर्वैरं शान्तमानसम् ॥
जो हर्षसे रहित, संतापसे शून्य, सम्पूर्ण भूतोंका सुहृद्, वैररहित और शान्तचित्त है, उस आत्माकी तुम उपासना करते हो ।
भीष्म → युधिष्ठिर
मोक्षधर्मेषु नियतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं तत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! जो पुरुष मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर मोक्षोपयोगी धर्मोंके पालनमें संलग्न रहता है, वही प्रकृतिसे परे अविनाशी ब्रह्मपदको प्राप्त होता है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर को ब्रह्मपद प्राप्त करने के साधन बताते हुए कहा।
जैगीषव्य उवाच
पक्वविद्या महाप्राज्ञा जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।
मनसा कर्मणा वाचा नापराध्यन्ति कर्हिचित् ॥
उनका ज्ञान परिपक्व होता है । वे महाज्ञानी, क्रोधको जीतनेवाले और जितेन्द्रिय होते हैं तथा मन, वाणी और शरीरसे कभी किसीका अपराध नहीं करते हैं ।
वासुदेव उवाच
अध्यात्मविधितत्त्वज्ञः क्षान्तः शक्तो जितेन्द्रियः ।
ऋजुश्च सत्यवादी च तस्मात् सर्वत्र पूजितः ॥
वे अध्यात्मशास्त्रके तत्त्वज्ञ विद्वान्, क्षमाशील, शक्तिमान, जितेन्द्रिय, सरल और सत्यवादी हैं । इसीलिये वे सर्वत्र पूजे जाते हैं ।
व्यास उवाच
एतमेव च नैवं च न चोभे नानुभे न च ।
कर्मस्था विषयं ब्रूयुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ॥
कर्मवादी इस विषयमें यह पुरुषार्थ ही कार्यसाधक है, ऐसा नहीं कहते । ऐसा नहीं है, अर्थात् पुरुषार्थ नहीं, दैव कारण है, यह भी नहीं कहते । दोनों मिलकर कार्यसिद्धिके हेतु हैं, यह भी नहीं कहते और दोनों नहीं हैं, यह भी नहीं कहते हैं । तात्पर्य यह है कि वे इस विषयमें कुछ निश्चय नहीं कर पाते हैं; परंतु जो सत्त्वस्वरूप परमात्मामें स्थित हुए योगी हैं, वे समदर्शी हैं अर्थात् शम (ब्रह्म) को ही कारण मानते हैं ।
व्यास उवाच
कर्मजोऽयं पृथग्भावो द्वन्द्वयुक्तोऽपि देहिनः ।
तमात्मसिद्धिर्विज्ञानाज्जहाति पुरुषो बलात् ॥
देहाभिमानी जीवको जो यह पृथक्-पृथक् शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंका भोग प्राप्त होता है, वह कर्मजनित है । मनुष्य तत्त्वज्ञानके द्वारा उस द्वन्द्वभोगको त्याग देता है तथा ज्ञानके ही बलसे आत्मसिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है ।
व्यास उवाच
अधर्मं धर्मकामो हि करोति ह्यविचक्षणः ।
धर्मं वाधर्मसंकाशं शोचन्निव करोति सः ।
धर्मं करोमीति करोत्यधर्ममधर्मकामश्च करोति धर्मम् ।
उभे बालः कर्मणी न प्रजानन् ।
स जायते म्रियते चापि देही ॥
जो मूढ़ है, वह धर्मकी इच्छा रखकर भी अधर्म करता है अथवा शोकमग्न-सा होकर अधर्मतुल्य धर्मका सम्पादन करता है । मूर्ख या अविवेकी मनुष्य न जाननेके कारण ‘मैं धर्म कर रहा हूँ’ ऐसा समझकर अधर्म करता है और अधर्मकी इच्छा रखकर धर्म करता है, इस प्रकार अज्ञानपूर्वक दोनों तरहके कर्म करनेवाला देहधारी मनुष्य बारंबार जन्म लेता और मरता है ।
व्यास उवाच
धर्मोपस्थो ह्रीवरूथ उपायापायकूबरः ।
अपानाक्षः प्राणयुगः प्रज्ञायुर्जीवबन्धनः ॥
चेतनाबन्धुरश्चारुश्चाचारग्रहनेमिमान् ।
दर्शनस्पर्शनवहो घ्राणश्रवणवाहनः ॥
प्रज्ञानाभिः सर्वतन्त्रप्रतोदो ज्ञानसारथिः ।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितो धीरः श्रद्धादमपुरःसरः ॥
त्यागसूक्ष्मानुगः क्षेम्यः शौचगो ध्यानगोचरः ।
जीवयुक्तो रथो दिव्यो ब्रह्मलोके विराजते ॥
यह योग एक सुन्दर रथ है । धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है । लज्जा आवरण है । पूर्वोक्त उपाय और अपाय इसका कूबर है । अपानवायु धुरा है । प्राणवायु जूआ हैं । बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है । चैतन्य बन्धुर है । सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं । नेत्र, त्वचा, घ्राण और श्रवण इसके वाहन हैं । प्रज्ञा नाभि है । सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है । ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है । यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है । श्रद्धा और इन्द्रियदमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं । त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं । यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है । इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है । अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।
व्यास उवाच
निर्ममश्चानहङ्कारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः ।
नैव क्रुध्यति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिरः ।
आक्रुष्टस्ताडितश्चैव मैत्रेण ध्याति नाशुभम् ।
वाग्दण्डकर्ममनसां त्रयाणां च निवर्तकः ।
समः सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते ॥
जिसने ममता और अहंकारका त्याग कर दिया है, जो शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंको समानभावसे सहता है, जिसके संशय दूर हो गये हैं, जो कभी क्रोध और द्वेष नहीं करता, झूठ नहीं बोलता, किसीकी गाली सुनकर और मार खाकर भी उसका अहित नहीं सोचता, सबपर मित्रभाव ही रखता है, जो मन, वाणी और कर्मसे किसी जीवको कष्ट नहीं पहुँचाता और समस्त प्राणियोंपर समानभाव रखता है, वही योगी ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ।
व्यास उवाच
एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ।
ज्ञानवानेव कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति ॥
व्यासजी कहते हैं — बेटा! यह ब्राह्मणकी अत्यन्त प्राचीनकालसे चली आयी हुई वृत्ति है, जो शास्त्रविहित है । ज्ञानवान् मनुष्य ही सर्वत्र कर्म करता हुआ सिद्धि प्राप्त करता है ।
व्यास उवाच
एतदेवं च नैवं च न चोभे नानुभे तथा ।
कर्मस्था विषयं ब्रूयुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ॥
कुछ कर्मनिष्ठ विचारक घट-पट आदि विषयोंके सम्बन्धमें कहते हैं कि ‘यह ऐसा ही है ।’ दूसरे कहते हैं कि ‘यह ऐसा नहीं है ।’ तीसरोंका कहना है कि ‘ये दोनों ही सम्भव हैं अर्थात् यह ऐसा है और नहीं भी है ।’ अन्य लोग कहते हैं कि ‘ये दोनों ही मत सम्भव नहीं हैं’ परंतु सत्त्वगुणमें स्थित हुए योगी पुरुष सर्वत्र समस्वरूप ब्रह्मको ही कारणरूपमें देखते हैं ।
व्यास उवाच
नान्यत्र विद्यातपसोर्नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् ।
नान्यत्र सर्वसंत्यागात् सिद्धिं विन्दति कश्चन ॥
व्यासजीने कहा — बेटा! विद्या, तप, इन्द्रियनिग्रह और सर्वस्वत्यागके बिना कोई भी सिद्धि नहीं पा सकता ।
व्यास उवाच
इन्द्रियाणां तथैवैषां सर्वेषामीश्वरं मनः ।
नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मानसस्तथा ॥
जैसे मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंका राजा और उन्हें विषयोंकी ओर प्रवृत्त करने तथा रोकनेमें भी समर्थ है, उसी प्रकार हृदयस्थित जीवात्मा भी मनका स्वामी तथा उसके निग्रह-अनुग्रहमें समर्थ है ।
व्यास उवाच
सिध्यन्ति चास्य सर्वार्था विज्ञानं च प्रवर्तते ।
समः सर्वेषु भूतेषु लब्धालब्धेन वर्तयन् ॥
धूतपाप्मा तु तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम् ॥
इतना ही नहीं, इनसे साधक के सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं तथा उसे विज्ञानकी भी प्राप्ति होती है । योगीको चाहिये कि वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान भाव रक्खे । जो कुछ भी मिले या न मिले, उसीसे संतोषपूर्वक निर्वाह करे । पापोंको धो डाले तथा तेजस्वी, मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर काम और क्रोधको वशमें करके ब्रह्मपदको पानेकी इच्छा करे ।
भीष्म उवाच
ये स्म बुद्धिं परां प्राप्ता धर्मनैपुण्यदर्शिनः ।
न ते कर्म प्रशंसन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव ॥
परंतु जो धर्मके तत्त्वको भलीभाँति समझकर सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे कर्मकी उसी तरह प्रशंसा नहीं करते हैं, जैसे प्रतिदिन नदीका पानी पीनेवाले मनुष्य कुएँका आदर नहीं करते हैं ।
भीष्म उवाच
कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ ।
विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥
कर्मके फल हैं सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु कर्मद्वारा मनुष्य इन्हींको पाते हैं, परंतु ज्ञानके द्वारा उन्हें उस परमपदकी प्राप्ति होती है, जहाँ जानेसे सदाके लिये शोकसे मुक्त हो जाता है ।
भीष्म उवाच
द्वन्द्वैर्न यत्र बाध्यन्ते मानसेन च कर्मणा ।
समाः सर्वत्र मैत्राश्च सर्वभूतहिते रताः ॥
उस स्थितिको प्राप्त हुए मनुष्योंको सुख-दुःखादि द्वन्द्व, मानसिक संकल्प और कर्म-संस्कार बाधा नहीं पहुँचाते । वहाँ पहुँचे हुए मानव सर्वत्र समानभाव रखते हैं, सबको मित्र मानते हैं और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ।
शुक उवाच
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञः पूतोऽहं गुरुशासनात् ।
कृत्वा बुद्धिं विमुक्तात्मा द्रक्ष्याम्यात्मानमव्ययम् ॥
मैं आप-जैसे गुरुके उपदेशसे पवित्र हो गया हूँ तथा मुझे जगत्के वृत्तान्त (लौकिक नीति-रीति) का भी ज्ञान हो गया है; अतः धर्माचरणसे बुद्धिका संस्कार करके स्थूल देहका अभिमान त्यागकर अपने अविनाशीस्वरूप परमात्माका दर्शन करूँगा ।
व्यास उवाच
अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान् नियतेन्द्रियः ।
शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥
जो हिंसा न करनेवाला, समदर्शी, सत्यवादी, धैर्यवान्, जितेन्द्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंको शरण देनेवाला है, वह अत्यन्त उत्तम गति पाता है ।
व्यास उवाच
यद्यप्यस्य महीं दद्याद् रत्नपूर्णामिमां नरः ।
इदमेव ततः श्रेय इति मन्येत तत्त्ववित् ॥
यदि कोई मनुष्य रत्नोंसे भरी हुई यह सम्पूर्ण पृथ्वी देने लगे तो भी तत्त्ववेत्ता पुरुष यही समझे कि इस सारे धनकी अपेक्षा यह ज्ञान ही श्रेष्ठ है ।
व्यास उवाच
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः साम्यं स्वस्थात्मचित्तता ।
अकस्माद् यदि वा कस्माद् वर्तन्ते सात्त्विका गुणाः ॥
जब अतिशय हर्ष, प्रेम, आनन्द, समता और स्वस्थचित्तता — ये सद्गुण अकस्मात् या किसी कारणवश विकसित हों, तब समझना चाहिये कि ये सात्विक गुण हैं ।
व्यास उवाच
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा परो मतः ॥
इन्द्रियोंसे उनके विषय बलवान् हैं (क्योंकि वे बलात् इन्द्रियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं), उन विषयोंसे मन बलवान् है (क्योंकि वह इन्द्रियोंको उनसे हटानेमें समर्थ है) । मनसे बुद्धि बलवान् है (क्योंकि वह मनको वशमें रख सकती है) और बुद्धिसे आत्मा बलवान् माना गया है (क्योंकि वह बुद्धिको सम बनाकर स्वाधीन कर सकता है)
व्यास उवाच
अनादिनिधनो ह्यात्मा तं बुद्ध्वा विचरेन्नरः ।
अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च नित्यं विगतमत्सरः ॥
आत्मा आदि और अन्तसे रहित है । उसे जानकर मनुष्य सदा हर्ष, क्रोध और ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो विचरता रहे ।
व्यास उवाच
एतद् वै जन्मसामर्थ्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
आत्मज्ञानं शमश्चैव पर्याप्तं तत्परायणम् ॥
विशेषरूपसे ब्राह्मणमें और समानभावसे मनुष्यमात्रमें इस ज्ञानको प्राप्त करनेकी जन्मसिद्ध शक्ति है । मन और इन्द्रियोंका संयम तथा आत्मज्ञान मोक्ष-प्राप्तिके लिये पर्याप्त साधन है ।
व्यास उवाच
न तु ताम्यति वै विद्वान् स्थले चरति तत्त्ववित् ।
एवं यो विन्दतेऽऽत्मानं केवलं ज्ञानमात्मनः ॥
परंतु जो तैरना जानता है, वह कष्ट नहीं उठाता । वह तो जलमें भी स्थलकी ही भाँति चलता है, उसी तरह ज्ञानस्वरूप विशुद्ध आत्माको प्राप्त हुआ तत्त्ववेत्ता संसार-सागरसे पार हो जाता है ।
व्यास उवाच
गन्धान् रसान् नानुरुन्ध्यात् सुखं वा ।
नालंकारांश्चाप्नुयात् तस्य तस्य ।
मानं च कीर्तिं च यशश्च नेच्छेत् ।
स वै प्रचारः पश्यतो ब्राह्मणस्य ॥
व्यासजी कहते हैं — बेटा! साधकको चाहिये कि गन्ध और रस आदि विषयोंका उपभोग न करे, विषयसेवनजनित सुखकी ओर न जाय, स्वर्ण आदिके बने हुए सुन्दर-सुन्दर आभूषणोंको भी न धारण करे तथा मान, बड़ाई और यशकी इच्छा न करे, यही ज्ञानवान् ब्राह्मणका आचार है ।
व्यास उवाच
यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति ।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जिस समय वह दूसरे प्राणियोंसे नहीं डरता और दूसरे प्राणी भी उससे भयभीत नहीं होते तथा जब वह इच्छा और द्वेषका सर्वथा परित्याग कर देता है, उसी समय उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति होती है ।
व्यास उवाच
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब वह मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीकी बुराई करनेका विचार अपने मनमें नहीं करता, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।
व्यास उवाच
यदर्थं पृथगध्यास्ते मनस्तत्परिषीदति ।
पृथग्भूतं मनो बुद्ध्या मनो भवति केवलम् ॥
बुद्धि जिस विषयका अवलम्बन करती है, मन भी उसीका आश्रय लेता है । मन जब बुद्धिसे पृथक् होता है, तब केवल मन रह जाता है ।
भीष्म उवाच
न च पापकृतः पापान्मुच्यन्ते केचिदापदि ।
अपापवादी भवति यथा भवति धर्मकृत् ।
धर्मस्य निष्ठा त्वाचारस्तमेवाश्रित्य भोत्स्यसे ॥
पापाचारी मनुष्य आपत्तिकालमें कष्ट भोगकर भी उस पापसे मुक्त नहीं होते और धर्मका आचरण करनेवाले लोग आपत्तिकालमें भी पापका समर्थन नहीं करते हैं । आचार (शौचाचार-सदाचार) ही धर्मका आधार है; अतः युधिष्ठिर! तुम उस आचारका आश्रय लेकर ही धर्मके यथार्थ स्वरूपको जान सकोगे ।
तुलाधार उवाच
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब समस्त प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और क्रियाद्वारा भी बुरे भाव नहीं होते हैं तब मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ।
तुलाधार उवाच
कारणाद् धर्ममन्विच्छेन्न लोकचरितं चरेत् ।
यो हन्याद् यश्च मां स्तौति तत्रापि शृणु जाजले ॥
समौ तावपि मे स्यातां न हि मेऽस्ति प्रियाप्रियम् ।
एतदीदृशकं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ॥
इस कर्मका हेतु या परिणाम क्या है? इसपर विचार करके ही तुम्हें किसी भी धर्मको स्वीकार करना चाहिये । लोगोंने किया है या कर रहे हैं, यह जानकर उनका अन्धानुकरण नहीं करना चाहिये । जाजले! अब मैं अपने विषयमें कुछ निवेदन करता हूँ, उसे सुनो, जो मुझे मारता है तथा जो मेरी प्रशंसा करता है, वे दोनों ही मेरे लिये बराबर हैं । उनमेंसे कोई भी मेरे लिये प्रिय या अप्रिय नहीं है, मनीषी पुरुष ऐसे ही धर्मकी प्रशंसा करते हैं ।
तुलाधार उवाच
धर्माधारा धर्मसुखाः कृत्स्नव्यवसितास्तथा ।
अस्ति नस्तत्त्वतो भूय इति प्राज्ञस्त्ववेक्षते ॥
हममें से बहुत लोग ऐसे हैं, जिनका धर्म ही आधार है, जो धर्ममें ही सुख मानते हैं तथा जिन्होंने सम्पूर्ण कर्तव्य-अकर्तव्यका निश्चय कर लिया है; परंतु हमलोगोंका जो यथार्थरूप है, उसकी अपेक्षा बहुत महान् और व्यापक परमात्मा सर्वत्र सर्वात्मा रूपसे विराजमान है — ऐसा ज्ञानी पुरुष देखता है ।
कपिल उवाच
नाहं वेदान् विनिन्दामि न विवक्ष्यामि कर्हिचित् ।
पृथगाश्रमिणां कर्माण्येकार्थानीति नः श्रुतम् ॥
कपिलने कहा — मैं न तो वेदोंकी निन्दा करता हूँ और न कभी उन्हें विपरीत बात बतानेवाला बताता हूँ । पृथक्-पृथक् आश्रमवालोंके जो कर्म हैं, उन सबके उद्देश्य एक ही हैं — ऐसा हमने सुन रखा है ।
कपिल उवाच
ज्ञानं प्लावयते सर्वं यो ज्ञानं ह्यनुवर्तते ।
ज्ञानादपेत्य या वृत्तिः सा विनाशयति प्रजाः ॥
जो ज्ञानका अनुसरण करता है, ज्ञान उसके समस्त संसारबन्धनका नाश कर देता है । बिना ज्ञानकी जो प्रवृत्ति होती है, वह प्रजाको जन्म और मरणके चक्करमें डालकर उसका विनाश कर देती है ।
कपिल ने कहा।
कपिल उवाच
शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः ।
कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति ॥
कपिलजीने कहा — कर्म स्थूल और सूक्ष्म शरीरकी शुद्धि करनेवाले हैं, किंतु ज्ञान परम गतिरूप है । जब कर्मोंद्वारा चित्तके रागादि दोष जल जाते हैं, तब मनुष्य रस-स्वरूप ज्ञानमें स्थित हो जाता है ।
कपिल उवाच
तेजः क्षमा शान्तिरनामयं शुभं ।
तथाविधं व्योम सनातनं ध्रुवम् ।
एतैः सर्वैर्गम्यते बुद्धिनेत्रैस्तस्मै नमो ब्रह्मणे ब्राह्मणाय ॥
उस आकाशके समान असंग, अविनाशी और सदा एकरस तत्त्वका ज्ञान-नेत्रोंवाले सभी पुरुष तेज, क्षमा और शान्तिरूप शुभ साधनोंके द्वारा साक्षात्कार करते हैं । जो वास्तवमें ब्रह्मवेत्तासे अभिन्न है, उस परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है ।
भीष्म उवाच
य एतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ।
कुशलः सुखदुःखानां साधूंश्चाप्यथ सेवते ।
तस्य साधुसमाचारादभ्यासाच्चैव वर्धते ॥
जो पुरुष अपनी बुद्धिसे राग आदि दोषोंको पहले ही देख लेता है, वह सुख-दुःखको समझनेमें कुशल होता है । फिर वह श्रेष्ठ पुरुषोंका सेवन करता है । सत्पुरुषोंकी सेवा या सत्संगसे और सत्कर्मोंके अभ्याससे उस पुरुषकी बुद्धि बढ़ती है ।
भीष्म उवाच
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम् ।
ततो मोक्षाय यतते नानुपायादुपायतः ॥
शनैर्निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च ।
धर्मात्मा चैव भवति मोक्षं च लभते परम् ॥
सम्पूर्ण लोकोंको नाशवान् समझकर वह सर्वस्वका मनसे त्याग कर देनेका यत्न करता है । तदनन्तर वह अयोग्य उपायसे नहीं किंतु योग्य उपायसे मोक्षके लिये यत्नशील हो जाता है । इस प्रकार धीरे-धीरे मनुष्यको वैराग्यकी प्राप्ति होनेपर वह पापकर्म तो छोड़ देता है और धर्मात्मा बन जाता है । तत्पश्चात् परम मोक्षको प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म उवाच
भ्रमं सम्मोहमावर्तमभ्यासाद् विनिवर्तयेत् ।
निद्रां च प्रतिभां चैव ज्ञानाभ्यासेन तत्त्ववित् ॥
तत्त्ववेत्ता पुरुष शास्त्रके अभ्याससे भ्रम, मोह और संशयका तथा आलस्य और प्रतिभा (नानाविषयिणी बुद्धि) —–इन दोनों दोषोंका ज्ञानके अभ्याससे निराकरण करे ।
भीष्म उवाच
अमूढत्वमसंगित्वं कामक्रोधविवर्जनम् ।
अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थितिः ॥
एष मार्गों हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमलः शुचिः ।
तथा वाक्कायमनसां नियमः कामतोऽन्यथा ॥
मूढता और आसक्तिका अभाव, काम और क्रोधका त्याग एवं दीनता, उद्दण्डता तथा उद्वेगसे रहित होना और चित्तकी स्थिरता एवं निष्कामभावसे मन, वाणी और इन्द्रियोंका संयम — यह मोक्षका स्वच्छ, निर्मल एवं पवित्र मार्ग है ।
भीष्म उवाच
अर्थाः खलु समृद्धा हि बाढं दुःखं विजानताम् ।
असमृद्धास्त्वपि सदा मोहयन्त्यविचक्षणान् ॥
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् ।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥
जो विवेकी हैं, उन्हें बड़े समृद्धिसम्पन्न विषय भी दुःखरूप ही जान पड़ते हैं । परंतु अज्ञानियोंको तुच्छ विषय भी सदा मोहमें डाले रहते हैं । लोकमें जो कामजनित सुख है तथा जो स्वर्गका दिव्य एवं महान् सुख है, वे दोनों तृष्णाक्षयसे होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाकी भी तुला पानेके योग्य नहीं हैं ।
भीष्म उवाच
विद्वान् सर्वेषु भूतेषु आत्मना सोपमो भवेत् ।
कृतकृत्यो विशुद्धात्मा सर्वं त्यजति चैव ह ॥
विद्वान् पुरुष सभी प्राणियोंके प्रति अपने समान ही भाव रखे। इससे वह कृतकृत्य और शुद्धचित्त होकर समस्त दोषोंको त्याग देता है ।
भीष्म उवाच
ज्ञानेन हि यदा जन्तुरज्ञानप्रभवं तमः ।
व्यपोहति तदा ब्रह्म प्रकाशति सनातनम् ॥
जब जीव तत्त्वज्ञानद्वारा अज्ञानजनित अन्धकारको दूर कर देता है, तब उसके हृदयमें सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है ।
उशना उवाच
बह्वाश्रयो बहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रितः ।
स ब्रह्म परमो धर्मस्तपश्च सदसच्च सः ॥
बहुत-से वर्ण और आश्रम उनके आश्रय हैं, उनके अनेक मुख हैं । हृदयमें आश्रित धर्म भी उन्हींका स्वरूप है । वे ही ब्रह्म हैं । वे ही आत्मदर्शनरूप परम धर्म हैं । वे ही तप और सदसत्स्वरूप हैं ।
उशना उवाच
नानाभूतस्य दैत्येन्द्र तस्यैकत्वं वदत्ययम् ।
जन्तुः पश्यति विज्ञानात् ततो ब्रह्म प्रकाशते ॥
दैत्यराज! अनेक रूपोंमें प्रकट हुए उन परमात्माकी एकताका यह वेद प्रतिपादन करता है । जीव विज्ञानबलसे ही ब्रह्मका साक्षात्कार करता है । उस समय उसकी बुद्धिमें वह ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है ।
अपूर्वं सर्वतोभद्रं सर्वतोमुखमव्ययम् ।
अब्दैर्दशाहसंयुक्तं गूढमप्राज्ञनिन्दितम् ।
वर्णाश्रमकृतैर्धर्मैर्विपरीतं क्वचित्समम् ।
गतान्तैरध्यवसितमत्याश्रममिदं व्रतम् ।
मया पाशुपतं दक्ष शुभमुत्पादितं पुरा ।
तस्य चीर्णस्य तत् सम्यक् फलं भवति पुष्कलम् ।
तच्चास्तु ते महाभाग त्यज्यतां मानसो ज्वरः ॥
‘दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो अपूर्व है । साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी (सभी वर्गों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है । वर्षोंतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी उपलब्धि होती है । वह गूढ़ है । मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं । वह समस्त वर्णधर्म और आश्रम-धर्मके अनुकूल, सम और किसी-किसी अंशमें विपरीत भी है । जिन्हें सिद्धान्तका ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है । यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है । इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है । महाभाग! उस पाशुपत व्रतके अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो । अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो’
भीष्म उवाच
नैव ताम्यन्ति विद्वांसः प्लवन्तः पारमम्भसः ।
अध्यात्मविदुषो धीरा ज्ञानं तु परमं प्लवः ॥
जो तैरनेकी कला जानते हैं, वे तैरकर अगाध जलसे पार हो जाते हैं । उन्हें कष्ट नहीं भोगना पड़ता । उसी प्रकार अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता धीर पुरुष अनायास संसार-सागरको पार कर जाते हैं । उनके लिये परम ज्ञान ही जहाज बन जाता है ।
समङ्ग → नारद
यदा न शोचेमहि किं नु नः स्याद् ।
धर्मेण वा नारद कर्मणा वा ।
कृतान्तवश्यानि यदा सुखानि ।
दुःखानि वा यन्न विधर्षयन्ति ॥
नारदजी! जब अज्ञान दूर हो जानेके कारण हम शोक ही नहीं करते हैं तो धर्म अथवा लौकिक कर्मसे हमारा क्या प्रयोजन है । सारे सुख और दुःख कालके अधीन होनेके कारण क्षणभंगुर हैं, अतः वे ज्ञानी पुरुषको पराभूत नहीं कर सकते हैं ।
पराशर उवाच
यदा व्यपेतहृल्लेखं मनो भवति तस्य वै ।
नानृतं चैव भवति तदा कल्याणमृच्छति ॥
जब मनुष्यका मन कामना और कर्म-संस्कारोंसे रहित हो जाता है तथा वह मिथ्याचारसे रहित हो जाता है, उस समय उसे कल्याणकी प्राप्ति होती है ।
पराशर → राजन
निर्वेदादात्मसम्बोधः सम्बोधाच्छास्त्रदर्शनम् ।
शास्त्रार्थदर्शनाद् राजंस्तप एवानुपश्यति ॥
राजन्! वैराग्यसे मनुष्यको आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा होती है । जिज्ञासासे शास्त्रोंके स्वाध्यायमें मन लगता है तथा शास्त्रोंके अर्थ और भावके ज्ञानसे वह तपको ही कल्याणका साधन समझता है ।
पराशर → राजन
एकः शत्रुर्न द्वितीयोऽस्ति शत्रुरज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् ।
येनावृतः कुरुते सम्प्रयुक्तो ।
घोराणि कर्माणि सुदारुणानि ॥
राजन्! पुरुषका एक ही शत्रु है, उसके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है । वह है अज्ञान, जिससे आवृत और प्रेरित होकर मनुष्य अत्यन्त घोर और क्रूरतापूर्ण कर्म करने लगता है ।
पराशर → राजन
असङ्गः श्रेयसो मूलं ज्ञानं चैव परा गतिः ।
चीर्णं तपो न प्रणश्येद्वापः क्षेत्रे न नश्यति ॥
पराशरजीने कहा — राजन्! आसक्तिका अभाव ही श्रेयका मूल कारण है । ज्ञान ही सबसे उत्तम गति है । स्वयं किया हुआ तप तथा सुपात्रको दिया हुआ दान — ये कभी नष्ट नहीं होते ।
पराशर उवाच
न भिद्यन्ते कृतात्मान आत्मप्रत्ययदर्शिनः ।
बुद्धिकर्मेन्द्रियाणां हि प्रमत्तो यो न बुध्यते ।
शुभाशुभे प्रसक्तात्मा प्राप्नोति सुमहद् भयम् ॥
पवित्र अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानी पुरुष कर्मोंके शुभाशुभ फलोंसे कभी विचलित नहीं होते हैं । जो प्रमादवश ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियोंद्वारा होनेवाले पापोंपर विचार नहीं करता तथा शुभ एवं अशुभमें आसक्त रहता है, उसे महान् भयकी प्राप्ति होती है ।
पराशर उवाच
मरणं जन्मनि प्रोक्तं जन्म वै मरणाश्रितम् ।
अविद्वान् मोक्षधर्मेषु बद्धो भ्रमति चक्रवत् ।
बुद्धिमार्गप्रयातस्य सुखं त्विह परत्र च ॥
जन्ममें मृत्युकी स्थिति बतायी गयी है और मृत्युमें जन्म निहित है । जो मोक्ष-धर्मको नहीं जानता, वह अज्ञानी मनुष्य संसारमें आबद्ध होकर जन्म-मृत्युके चक्रमें घूमता रहता है; किंतु ज्ञानमार्गसे चलनेवालेको इहलोक और परलोकमें भी सुख मिलता है ।
हंस उवाच
इदं कार्यममृताशाः शृणोमि ।
तपो दमः सत्यमात्माभिगुप्तिः ।
ग्रन्थीन् विमुच्य हृदयस्य सर्वान् ।
प्रियाप्रिये स्वं वशमानयीत ॥
हंसने कहा — अमृतभोजी देवताओ! मैं तो सुनता हूँ कि तप, इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण और मनोनिग्रह आदि कार्य ही सबसे उत्तम हैं । हदयकी सारी गाँठें खोलकर प्रिय और अप्रियको अपने वशमें करे अर्थात् उनके लिये हर्ष एवं विषाद न करे ।
हंस उवाच
वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः ।
दमस्योपनिषन्मोक्ष एतत् सर्वानुशासनम् ॥
वेदाध्ययनका सार है सत्यभाषण, सत्यभाषणका सार है इन्द्रियसंयम और इन्द्रियसंयमका फल है मोक्ष । यही सम्पूर्ण शास्त्रोंका उपदेश है ।
हंस उवाच
नाहं शप्तः प्रतिशपामि कंचिद् ।
दमं द्वारं ह्यमृतस्येह वेद्मि ।
गुह्यं ब्रह्म तदिदं वो ब्रवीमि ।
न मानुषाच्छ्रेष्ठतरं हि किंचित् ॥
कोई मुझे शाप दे दे तो भी मैं बदलेमें उसे शाप नहीं देता । इन्द्रियसंयमको ही मोक्षका द्वार मानता हूँ । इस समय तुमलोगोंको एक बहुत गुप्त बात बता रहा हूँ, सुनो । मनुष्ययोनिसे बढ़कर कोई उत्तम योनि नहीं है ।
हंस उवाच
सत्यं दमं ह्यार्जवमानृशंस्यं ।
धृतिं तितिक्षामतिसेवमानः ।
स्वाध्यायनित्योऽस्पृहयन् परेषामेकान्तशील्यूर्ध्वगतिर्भवेत् सः ॥
जो सत्य, इन्द्रिय-संयम, सरलता, दया, धैर्य और क्षमाका अधिक सेवन करता है, सदा स्वाध्यायमें लगा रहता है, दूसरेकी वस्तु नहीं लेना चाहता तथा एकान्तमें निवास करता है, वह ऊर्ध्वगतिको प्राप्त होता है ।
हंस उवाच
आचक्षेऽहं मनुष्येभ्यो देवेभ्यः प्रतिसंचरन् ।
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ॥
मैं चारों ओर घूमकर मनुष्यों और देवताओंसे कहा करता हूँ कि जैसे जहाज समुद्रसे पार होनेका साधन है, उसी प्रकार सत्य ही स्वर्गलोकमें पहुँचनेकी सीढ़ी है ।
भीष्म उवाच
नाभ्यां कण्ठे च शीर्ष च हृदि वक्षसि पार्श्वयोः ।
दर्शने श्रवणे चापि घ्राणे चामितविक्रम ॥
स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहितः ।
आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युङ्क्ते सम्यग्विशाम्पते ॥
स शीघ्रमचलप्रख्यं कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम् ।
उत्तमं योगमास्थाय यदीच्छति विमुच्यते ॥
अमित पराक्रमी नरेश! योगके महान् व्रतमें एकाग्रचित्त रहनेवाला जो योगी नाभि, कण्ठ, मस्तक, हृदय, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग, नेत्र, कान और नासिका आदि स्थानोंमें धारणाके द्वारा सूक्ष्म आत्माको परमात्माके साथ भलीभाँति संयुक्त करता है, वह यदि इच्छा करे तो अपने पर्वताकार विशाल शुभाशुभ कर्मोंको शीघ्र ही भस्म करके उत्तम योगका आश्रय लेकर मुक्त हो जाता है ।
भीष्म उवाच
यस्तु तिष्ठति कौन्तेय धारणासु यथाविधि ।
मरणं जन्म दुःखं च सुखं च स विमुञ्चति ॥
कुन्तीनन्दन! जो विधिपूर्वक योगकी धारणाओंमें स्थिर रहता है, वह जन्म, मृत्यु, दुःख और सुखके बन्धनोंसे छुटकारा पा जाता है ।
भीष्म उवाच
परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् ।
सत्यार्जवरतानां वै सर्वभूतदयावताम् ॥
कुन्तीकुमार! जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित, सत्यवादी, सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं, उन महात्माओंको वही परमगति मिलती है ।
भीष्म उवाच
इन्द्रियाण्येव बुध्यन्ते स्वदेहे देहिनां नृप ।
कारणान्यात्मनस्तानि सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः ॥
नरेश्वर! देहधारियोंके अपने-अपने शरीरमें जो इन्द्रियाँ हैं, वे ही विशेष-विशेष विषयोंको देखती या अनुभव करती हैं; वे ही आत्माको विभिन्न ज्ञान करानेमें कारण हैं; क्योंकि वह सूक्ष्म आत्मा उन इन्द्रियोंद्वारा ही बाह्य विषयोंका दर्शन या प्रकाशन करता है (मुक्तावस्थामें मन और इन्द्रियोंसे सम्बन्ध न रहनेके कारण ही उसमें इन्द्रियजनित विशेष ज्ञानका अभाव देखा जाता है)
भीष्म → युधिष्ठिर
सत्त्वस्य च गुणान् कृत्स्नान् रजसश्च गुणान् पुनः ।
गुणांश्च तमसः सर्वान् गुणान् बुद्धेश्च भारत ॥
गुणांश्च मनसश्चापि नभसश्च गुणांश्च सः ।
गुणान् वायोश्च धर्मात्मंस्तेजसश्च गुणान् पुनः ॥
अपां गुणांस्तथा पार्थ पार्थिवांश्च गुणानपि ।
सर्वाण्येव गुणैर्व्याप्य क्षेत्रज्ञेषु युधिष्ठिर ॥
मनोऽनुयाति क्षेत्रज्ञं कर्मणी च शुभाशुभे ।
शिष्या इव महात्मानमिन्द्रियाणि च तं प्रभो ॥
प्रकृतिं चाप्यतिक्रम्य गच्छत्यात्मानमव्ययम् ।
परं नारायणात्मानं निर्द्वद्वं प्रकृतेः परम् ॥
भरतनन्दन! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर! परब्रह्म परमात्मा सात्त्विक, राजस और तामस गुणोंको एवं बुद्धि, मन, आकाश, वायु, तेज, जल, और पृथ्वी — इन सबके सम्पूर्ण गुणोंको तथा अन्य सब वस्तुओंको भी अपने गुणोंद्वारा व्याप्त करके सभी क्षेत्रज्ञों (जीवात्माओं) में स्थित हैं, प्रभो! जैसे शिष्य अपने गुरुके पीछे चलते हैं, उसी प्रकार मन, इन्द्रियाँ और शुभाशुभ कर्म भी उस जीवात्माके पीछे-पीछे चलते हैं । जब जीवात्मा इन्द्रियों और प्रकृतिको भी लाँघकर जाता है, तब उस नारायणस्वरूप अविनाशी परमात्माको प्राप्त हो जाता है, जो द्वन्द्वरहित और मायासे अतीत है ।
भीष्म उवाच
अत्र ते संशयो मा भूज्ज्ञानं सांख्यं परं मतम् ।
अक्षरं ध्रुवमेवोक्तं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥
सांख्यज्ञान सबसे उत्कृष्ट माना गया है । इस विषयमें तुम्हें तनिक भी संशय नहीं होना चाहिये । इसमें अक्षर, ध्रुव एवं पूर्ण सनातन ब्रह्मका ही प्रतिपादन हुआ है ।
भीष्म → राजन
शमश्च दृष्टः परमं बलं च ।
ज्ञानं च सूक्ष्मं च यथावदुक्तम् ।
तपांसि सूक्ष्माणि सुखानि चैव ।
सांख्ये यथावद् विहितानि राजन् ॥
राजन्! प्रत्यक्ष प्राप्त मन और इन्द्रियोंका संयम, उत्तम बल, सूक्ष्मज्ञान तथा परिणाममें सुख देनेवाले जो सूक्ष्म तप बतलाये गये हैं, उन सबका सांख्यशास्त्रमें यथावत् वर्णन किया गया है ।
वसिष्ठ उवाच
अविधिश्च विधिश्चैव समुत्पन्नौ तथैकतः ।
विद्याविद्येति विख्याते श्रुतिशास्त्रार्थचिन्तकैः ॥
अविधि (ज्ञान) और विधि (कर्म) की उत्पत्ति भी उस परमात्मासे ही हुई है । श्रुति तथा शास्त्रके अर्थका विचार करनेवाले विद्वानोंने उन्हें विद्या और अविद्या बतलाया है ।
वसिष्ठ उवाच
एतदक्षरमित्युक्तं क्षरतीदं यथा जगत् ।
जगन्मोहात्मकं प्राहुरव्यक्ताद् व्यक्तसंज्ञकम् ॥
इससे भिन्न जो तत्त्व है, उसे अक्षर कहा गया है । इस प्रकार उस अव्यक्त अक्षरसे उत्पन्न हुआ यह व्यक्तसंज्ञक मोहात्मक जगत् क्षरित होनेके कारण क्षर नाम धारण करता है ।
वसिष्ठ उवाच
सर्गप्रलयधर्मिण्या असर्गप्रलयात्मकः ।
गोचरे वर्तते नित्यं निर्गुणं गुणसंज्ञितम् ॥
यद्यपि सृष्टि और प्रलय प्रकृतिके ही धर्म हैं । पुरुष तो उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित है तथापि उस प्रकृतिके संसर्गवश पुरुष भी उस सृष्टि और प्रलयरूप धर्मसे सम्बद्ध-सा जान पड़ता है । इन्द्रियोंका विषय न होनेपर भी इन्द्रियगोचर-सा हो जाता है तथा निर्गुण होनेपर भी गुणवान्-सा जान पड़ता है ।
वसिष्ठ उवाच
एवमव्यक्तविषयं क्षरमाहुर्मनीषिणः ।
पञ्चविंशतिमो योऽयं ज्ञानादेव प्रवर्तते ॥
इस प्रकार ज्ञानी पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए पदार्थोंको क्षर कहते हैं । उपर्युका चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न जो पचीसवाँ तत्त्व — परमपुरुष परमात्मा बताया गया है, वही अक्षर है । उसकी प्राप्ति ज्ञानसे ही होती है ।
वसिष्ठ उवाच
एवं द्वन्द्वान्यथैतानि समावर्तन्ति नित्यशः ।
ममैवैतानि जायन्ते धावन्ते तानि मामिति ॥
निस्तर्तव्यान्यथैतानि सर्वाणीति नराधिप ।
मन्यतेऽयं ह्यबुद्धत्वात् तथैव सुकृतान्यपि ॥
भोक्तव्यानि मयैतानि देवलोकगतेन वै ।
इहैव चैनं भोक्ष्यामि शुभाशुभफलोदयम् ॥
इस प्रकार प्रकृतिकी प्रेरणासे स्वभावतः सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंकी सदा पुनरावृत्ति होती रहती है; किंतु जीवात्मा अज्ञानवश यह मान बैठता है कि ये सारे द्वन्द्व मुझपर ही धावा करते हैं और मुझे इनसे निस्तार पानेकी चेष्टा करनी चाहिये । (ऐसा मानकर वह दुखी होता है) नरेश्वर! प्रकृतिसे संयुक्त हुआ पुरुष अज्ञानवश यह मान लेता है कि मैं देवलोकमें जाकर अपने समस्त प्रण्योंके फलका उपभोग करूँगा और पूर्वजन्मके किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका जो फल प्रकट हो रहा है, उसे यहीं भोगूँगा ।
वसिष्ठ उवाच
अतपास्तप आत्मानमगतिर्गतिमात्मनः ।
अभवो भवमात्मानमभयो भयमात्मनः ।
अक्षरः क्षरमात्मानमबुद्धिस्त्वभिमन्यते ॥
वह कभी तप नहीं करता तो भी अपनेको तपस्वी मानता है । कहीं गमन नहीं करता तो भी अपनेको आने-जानेवाला समझता है । संसाररहित होकर भी अपनेको संसारी और निर्भय होकर भी अपनेको भयभीत मानता है । यद्यपि वह अक्षर (अविनाशी) है तो भी अपनेको क्षर (नाशवान्) समझता है तथा बुद्धिसे परे होनेपर भी बुद्धिमत्ताका अभिमान रखता है ।
वसिष्ठ उवाच
बुद्धिद्रव्येण दृश्येत मनोदीपेन लोककृत् ।
महतस्तमसस्तात पारे तिष्ठन्नतामसः ॥
स तमोनुद इत्युक्तः सर्वज्ञैर्वेदपारगैः ।
विमलो वितमस्कश्च निर्लिङ्गोऽलिङ्गसंज्ञितः ॥
योग एष हि योगानां किमन्यद् योगलक्षणम् ।
एवं पश्यं प्रपश्यन्ति आत्मानमजरं परम् ॥
सूक्ष्म बुद्धिरूप धन-सम्पन्न पुरुष ही मनोमय दीपकके द्वारा उस लोकस्रष्टा परमात्माका साक्षात्कार कर सकते हैं । वह परमात्मा महान् अन्धकारसे परे और तमोगुणसे रहित है; इसलिये वेदके पारगामी सर्वज्ञ पुरुषोंने उसे तमोनुद (अज्ञान नाशक) कहा है । वह निर्मल, अज्ञानरहित, लिंगहीन और अलिंग नामसे प्रसिद्ध (उपाधिशून्य) है । यही योगियोंका योग है । इसके सिवा योगका और क्या लक्षण हो सकता है । इस तरह साधना करनेवाले योगी सबके द्रष्टा अजर-अमर परमात्माका दर्शन करते हैं ।
सर्वमव्यक्तमित्युक्तमसर्वः पञ्चविंशकः ।
य एनमभिजानन्ति न भयं तेषु विद्यते ॥
‘सर्व’ नाम है अव्यक्त प्रकृतिका और उससे भिन्न पचीसवें तत्त्व परमात्माको असर्व कहा गया है । जो उन्हें इस प्रकार जानते हैं, उन्हें आवागमनका भय नहीं होता है ।
वसिष्ठ उवाच
अविद्यामाहुरव्यक्तं सर्गप्रलयधर्मि वै ।
सर्गप्रलयनिर्मुक्तां विद्यां वै पञ्चविंशकः ॥
मुनियोंने सृष्टि और प्रलयरूप धर्मवाले कार्यसहित अव्यक्तको ही अविद्या कहा है तथा चौबीस तत्त्वोंसे परे जो पचीसवाँ तत्त्व परम पुरुष परमात्मा है, जो सृष्टि और प्रलयसे रहित है, उसीको विद्या कहते हैं ।
वसिष्ठ उवाच
विद्या प्रकृतिरव्यक्तं तत्त्वानां परमेश्वरी ।
विद्या ज्ञेया नरश्रेष्ठ विधिश्च परमः स्मृतः ॥
नरश्रेष्ठ! अव्यक्त नामवाली जो परमेश्वरी प्रकृति है, वह सम्पूर्ण तत्त्वोंकी विद्या है । यह विद्या जानने योग्य है । इसीको ज्ञानकी परम विधि कहते हैं ।
वसिष्ठ उवाच
यदा तु गुणजालं तत् प्राकृतं वै जुगुप्सते ।
पश्यते च परं पश्यं तदा पश्यन्न संत्यजेत् ॥
जब वह प्राकृत गुणसमुदायको कुत्सित समझकर उससे विरत हो जाता है, उस समय वह परम दर्शनीय परमात्माका दर्शन पा जाता है और उसको देखकर फिर भी उसका त्याग नहीं करता अर्थात् उससे अलग नहीं होता ।
वसिष्ठ उवाच
अयमत्र भवेद् बन्धुरनेन सह मे क्षमम् ।
साम्यमेकत्वमायातो यादृशस्तादृशस्त्वहम् ॥
वास्तवमें इस जगत्के भीतर यह परमात्मा ही मेरा बन्धु है । इसीके साथ मेरी मैत्री हो सकती है । पहले मैं कैसा भी क्यों न रहा होऊँ, इस समय तो मैं इसकी समानता और एकताको प्राप्त हो चुका हूँ, जैसा वह है वैसा ही मैं हूँ ।
वसिष्ठ उवाच
एवं परमसम्बोधात् पञ्चविंशोऽनुबुद्धवान् ।
अक्षरत्वं नियच्छेत त्यक्त्वा क्षरमनामयम् ॥
इस प्रकार उत्तम विवेकके द्वारा अपने शुद्ध स्वरूपका ज्ञान प्राप्तकर चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवाँ आत्मा क्षरभाव (विनाशशीलता) का त्याग करके निरामय अक्षरभावको प्राप्त होता है ।
वसिष्ठ उवाच
निःसङ्गात्मानमासाद्य षड्विंशकमजं विभुम् ।
विभुस्त्यजति चाव्यक्तं यदा त्वेतद् विबुद्ध्यते ।
चतुर्विंशमसारं च षड्विंशस्य प्रबोधनात् ॥
छब्बीसवाँ तत्त्व परमात्मा अजन्मा, सर्वव्यापी और संगदोषसे रहित है । उसकी शरण लेकर जब जीवात्मा उसके स्वरूपका साक्षात्कार कर लेता है, तब परमात्म-ज्ञानके प्रभावसे स्वयं भी सर्वव्यापी हो जाता है तथा चौबीस तत्त्वोंसे युक्त प्रकृतिको असार समझकर त्याग देता है ।
वसिष्ठ उवाच
कराल मा ते भयमस्तु किञ्चिदेतच्छ्रुतं ब्रह्म परं त्वयाद्य ।
यथावदुक्तं परमं पवित्रं ।
विशोकमत्यन्तमनादिमध्यम् ।
अगाधजन्मामरणं च राजन् ।
निरामयं वीतभयं शिवं च ।
समीक्ष्य मोहं त्यज वाद्य सर्व ।
ज्ञानस्य तत्त्वार्थमिदं विदित्वा ॥
कराल! तुमने मुझसे आज परब्रह्मका ज्ञान सुना है; अतः तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये । वह परब्रह्म परम पवित्र, शोकरहित, आदि, मध्य और अन्तसे शून्य, जन्म-मृत्युसे बचानेवाला, निरामय, निर्भय तथा कल्याणमय है। राजन्! उसका मैंने यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया है । वही सम्पूर्ण ज्ञानोंका तात्त्विक अर्थ है । ऐसा जानकर उसका ज्ञान प्राप्त करके आज मोहका परित्याग कर दो ।
ऋषि उवाच
यथा ज्ञाने परिचयः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ।
तथा धर्मे परिचयः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ॥
जैसे ज्ञानका फल चाहनेवालेके लिये ज्ञानसे परिचित होना आवश्यक है, उसी प्रकार धर्मका फल चाहनेवाले मनुष्यको भी धर्मका परिचय प्राप्त करना चाहिये ।
याज्ञवल्क्य उवाच
मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ।
तथेन्द्रियाणि सर्वाणि पश्यन्तीत्यभिचक्षते ॥
जिस समय मन व्यग्र रहता है, उस समय आँख देखती हुई भी नहीं देख पाती । लोग भ्रमवश ही ऐसा कहते हैं कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विषयोंको प्रत्यक्ष करती हैं ।
याज्ञवल्क्य उवाच
ज्ञानिनां सम्भवं श्रेष्ठं स्थानमव्रणमच्युतम् ।
अतीन्द्रियमबीजं च जन्ममृत्युतमोनुदम् ॥
जहाँ किसी प्रकारका कष्ट नहीं है, जहाँसे कभी पतन नहीं होता है, जो इन्द्रियातीत है, जहाँ बन्धनमें डालनेवाला कोई कारण नहीं है तथा जो जन्म, मृत्यु और अज्ञानका विनाश करनेवाला है, वह श्रेष्ठ स्थान (परमपद) ज्ञानियोंको ही प्राप्त हो सकता है ।
भीष्म उवाच
यदुपनिषदमुपाकरोत् तथासौ ।
जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्यः ।
यदुपगणितशाश्वताव्ययं त ।
च्छुभममृतत्वमशोकमर्च्छति ॥
पूर्वकालमें याज्ञवल्क्य मुनिने राजा जनकको जिस उपनिषद् (ज्ञान) का उपदेश दिया था, उसका मनन करनेसे मनुष्य पूर्वकथित सनातन अविनाशी, शुभ, अमृतमय तथा शोकरहित परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।
जनक उवाच
ज्ञानेन कुरुते यत्नं यत्नेन प्राप्यते महत् ।
महद् द्वन्द्वप्रमोक्षाय सा सिद्धिर्या वयोऽतिगा ॥
मनुष्य ज्ञानके द्वारा मुक्ति पानेके लिये यत्न करता है । उस यत्नसे महान् आत्मज्ञानकी प्राप्ति होती है । वह महान् आत्मज्ञान ही सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे छुटकारा दिलानेका साधन है, वही सिद्धि है, जो काल (मृत्यु) को भी लाँघ जानेवाली है ।
जनक उवाच
मोक्षे हि त्रिविधा निष्ठा दृष्टान्यैर्मोक्षवित्तमैः ।
ज्ञानं लोकोत्तरं यच्च सर्वत्यागश्च कर्मणाम् ॥
अलौकिक जो ज्ञान है, अलौकिक जो संन्यास है तथा जो कर्मोंका अलौकिक अनुष्ठान है अर्थात् निष्काम भावसे कर्मोंका करना है — इन तीन प्रकारकी निष्ठाओंको ही मोक्षवेत्ता विद्वानोंने मोक्षका उपाय देखा और समझा है ।
जनक उवाच
अथ सत्याधिपत्येऽपि ज्ञानेनैवेह केवलम् ।
मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो देहे परमके स्थिताः ॥
मनुष्यरूप उत्तम शरीरमें स्थित हुए प्राणी प्रभुत्व रखते हुए भी केवल ज्ञानके ही बलसे यहाँ समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं ।
सुलभा उवाच
ज्ञानं ज्ञेयेषु भिन्नेषु यदा भेदेन वर्तते ।
तत्रातिशायिनी बुद्धिस्तत् सौक्ष्म्यमिति वर्तते ॥
जहाँ अनेक भिन्न-भिन्न ज्ञेय (अर्थ) उपस्थित हों और ‘यह घट है, यह पट है’ इस प्रकार वस्तुओंका पृथक्-पृथक् ज्ञान होता हो, ऐसे स्थलोंमें यथार्थ निर्णय करनेवाली जो बुद्धि है, उसीका नाम सौक्ष्म्य है ।
सुलभा उवाच
तानि तानि तु संचिन्त्य सङ्गस्थानान्यरिंदम ।
आत्मनाऽऽत्मनि सम्पश्येत् किमन्यन्मुक्तलक्षणम् ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! नाना प्रकारके जो-जो पदार्थ हैं, उन सबको आसक्तिके स्थान समझकर अपने द्वारा अपनेहीमें अपनेको देखे । इसके सिवा मुक्तका और क्या लक्षण हो सकता है?
सुलभा उवाच
ननु नाम त्वया मोक्षः कृत्स्नः पञ्चशिखाच्छ्रुतः ।
सोपायः सोपनिषदः सोपासङ्गः सनिश्चयः ॥
तस्य ते मुक्तसङ्गस्य पाशानाक्रम्य तिष्ठतः ।
छत्रादिषु विशेषेषु पुनः सङ्गः कथं नृप ॥
नरेश्वर! जब आपने महर्षि पंचशिखाचार्यसे उपाय (निदिध्यासन), उपनिषद् (उसके श्रवण-मनन), उपासंग (यम-नियम आदि योगाङ्ग) और निश्चय (ब्रह्म और जीवात्माकी एकताका अनुभव) — इन सबके सहित सम्पूर्ण मोक्षशास्त्रका श्रवण किया है, आप आसक्तियोंसे मुक्त हो गये हैं और सम्पूर्ण बन्धनोंको काटकर खड़े हैं, तब आपकी छत्र-चवँर आदि विशेष-विशेष वस्तुओंमें आसक्ति कैसे हो रही है?
व्यास उवाच
श्रुतं समस्तमश्नुते प्रकुर्वतः शुभाः क्रियाः ।
तदेतदर्थदर्शनं कृतज्ञमर्थसंहितम् ॥
जो समस्त शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करता और तदनुसार शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें लगा रहता है, उसीके लिये इस ज्ञानका उपदेश किया गया है; क्योंकि कृतज्ञ पुरुषको जो भी उपदेश दिया जाता है, वही सफल होता है ।
जनक → ब्रह्मन
न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत् ।
न विना गुरुसम्बन्धं ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ॥
जनकने कहा — ब्रह्मन्! जैसे ज्ञान-विज्ञानके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सद्गुरुसे सम्बन्ध हुए बिना ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।
शुकदेवजी के प्रश्न के उत्तर में जनक ने कहा।
जनक उवाच
गुरुः प्लावयिता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते ।
विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभयं त्यजेत् ॥
गुरु इस संसारसागरसे पार उतारनेवाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान यहाँ नौकाके समान बताया जाता है । मनुष्य उस ज्ञानको पाकर भवसागरसे पार और कृतकृत्य हो जाता है । जैसे नदीको पार कर लेनेपर मनुष्य नाव और नाविक दोनोंको छोड़ देता है, उसी प्रकार मुक्त हुआ पुरुष गुरु और ज्ञान दोनोंको छोड़ दे ।
जनक ने शुकदेवजी से कहा।
जनक उवाच
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब मनुष्य मन, वाणी तथा क्रियाके द्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापभाव नहीं करता अर्थात् समस्त प्राणियोंमें द्वेषरहित हो जाता है, उस समय वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।
जनक उवाच
संयोज्य मनसाऽऽत्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहनीम् ।
त्यक्त्वा कामं च मोहं च तदा ब्रह्मत्वमश्नुते ॥
जब मोहमें डालनेवाली ईर्ष्या, काम एवं मोहका त्याग करके साधक अपने मनको आत्मामें लगा देता है, उस समय वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ।
जनक उवाच
यदा श्राव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाप्ययम् ।
समो भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब यह साधक सुनने और देखने योग्य पदार्थोंमें तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान भाववाला हो जाता है एवं सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, उस समय वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।
जनक उवाच
यदा स्तुतिं च निन्दां च समत्वेनैव पश्यति ।
काञ्चनं चायसं चैव सुखं दुःखं तथैव च ॥
शीतमुष्णं तथैवार्थमनर्थं प्रियमप्रियम् ।
जीवितं मरणं चैव ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जिस समय मनुष्य निन्दा और स्तुतिको समान भावसे समझता है, सोना-लोहा, सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, अर्थ-अनर्थ, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरणमें भी उसकी समान दृष्टि हो जाती है, उस समय वह साक्षात् ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।
नारद उवाच
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः ।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥
विद्याके समान कोई नेत्र नहीं है । सत्यके समान कोई तप नहीं है । रागके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागके सदृश कोई सुख नहीं है ।
नारद उवाच
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थान् यश्चरत्यात्मवशैरिह ।
असज्जमानः शान्तात्मा निर्विकारः समाहितः ॥
आत्मभूतैरतद्भूतः सह चैव विनैव च ।
स विमुक्तः परं श्रेयो नचिरेणाधितिष्ठति ॥
जो अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा यहाँ अनासक्त भावसे विषयोंका अनुभव करता है, जिसका चित्त शान्त, निर्विकार और एकाग्र है तथा जो आत्मस्वरूप प्रतीत होनेवाले देह और इन्द्रियाँ हैं, उनके साथ रहकर भी उनसे तद्रूप न हो अलग-सा ही रहता है, वह मुक्त है और उसे बहुत शीघ्र परम कल्याणकी प्राप्ति होती है ।
नारद उवाच
आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशीस्त्वमचापलम् ।
एतदाहुःपरं श्रेय आत्मज्ञस्य जितात्मनः ॥
जो आत्मतत्त्वका ज्ञाता तथा मनको वशमें रखनेवाला है, उसके लिये यही परम कल्याणका साधन बताया गया है कि वह किसी वस्तुका संग्रह न करे, संतोष रखे तथा कामना और चंचलताको त्याग दे ।
नारद उवाच
त्यज धर्ममधर्मं च तथा सत्यानृते त्यज ।
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तं त्यज ॥
धर्म और अधर्मको छोड़ो । सत्य और असत्यको भी त्याग दो और उन दोनोंका त्याग करके जिसके द्वारा त्याग करते हो, उसको भी त्याग दो ।
नारद उवाच
त्यज धर्ममसंकल्पादधर्मं चाप्यलिप्सया ।
उभे सत्यानृते बुद्ध्या बुद्धिं परमनिश्चयात् ॥
संकल्पके त्यागद्वारा धर्मको और लिप्साके अभावद्वारा अधर्मको भी त्याग दो । फिर बुद्धिके द्वारा सत्य और असत्यका त्याग करके परमतत्त्वके निश्चयद्वारा बुद्धिको भी त्याग दो ।
नारद उवाच
न तु योगमृते शक्या प्राप्तुं सा परमा गतिः ।
अवबन्धो हि बुद्धस्य कर्मभिर्नोपपद्यते ॥
परंतु योगके बिना उस परम गतिको नहीं प्राप्त किया जा सकता । बुद्धिमान्का कर्मोंके निकृष्ट बन्धनसे बँधा रहना उचित नहीं है ।
श्रीभगवान् उवाच
ये हीनाः सप्तदशभिर्गुणैः कर्मभिरेव च ।
कलाः पञ्चदश त्यक्ता ते मुक्ता इति निश्चयः ॥
जो पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण तथा मन और बुद्धिरूप सत्रह गुणोंसे, सब कर्मोंसे रहित हो पंद्रह कलाओंको त्याग करके स्थित हैं, वे ही मुक्त हैं, यह शास्त्रका सिद्धान्त है ।
भीष्म उवाच
न दृश्यश्चक्षुषा योऽसौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च ।
न प्रेयश्चैव गन्धेन रसेन च विवर्जितः ॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव न गुणास्तं भजन्ति वै ।
यश्च सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते ॥
भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न विनश्यति ।
अजो नित्यः शाश्वतश्च निर्गुणो निष्कलस्तथा ॥
द्विर्द्वादशेभ्यस्तत्त्वेभ्यः ख्यातो यः पञ्चविंशकः ।
पुरुषो निष्क्रियश्चैव ज्ञानदृश्यश्च कथ्यते ॥
यं प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता वै द्विजसत्तमाः ।
स वासुदेवो विज्ञेयः परमात्मा सनातनः ॥
जो नेत्रोंसे देखा नहीं जाता, त्वचासे जिसका स्पर्श नहीं होता, गन्ध ग्रहण करनेवाली घ्राणेन्द्रियसे जो सूँघनेमें नहीं आता, जो रसनेन्द्रियकी पहुँचसे परे है; सत्त्व, रज और तम नामक गुण जिसपर कोई प्रभाव नहीं डाल पाते, जो सर्वव्यापी, साक्षी और सम्पूर्ण जगत्का आत्मा कहलाता है, सम्पूर्ण प्राणियोंका नाश हो जानेपर भी जो स्वयं नष्ट नहीं होता है, जिसे अजन्मा, नित्य, सनातन, निर्गुण और निष्कल बताया गया है, जो चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवें तत्त्वके रूपमें विख्यात है, जिसे अन्तर्यामी पुरुष, निष्क्रिय तथा ज्ञानमय नेत्रोंसे ही देखने योग्य बताया जाता है, जिसमें प्रवेश करके श्रेष्ठ द्विज यहाँ मुक्त हो जाते हैं, वही सनातन परमात्मा है । उसीको वासुदेव नामसे जानना चाहिये ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर को परमात्मा का स्वरूप बताया।
भीष्म उवाच
मां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता भक्तास्तु ये मम ।
अहं हि पुरुषो ज्ञेयो निष्क्रियः पञ्चविंशकः ॥
यहाँ जो मेरे भक्त हैं, वे मुझमें ही प्रवेश करके मुक्त होते हैं । मैं ही पचीसवें तत्त्व निष्क्रिय पुरुषरूपसे जानने योग्य हूँ ।
श्रीभगवान् उवाच
एष चैतत् परं ब्रह्म ज्ञेयो विज्ञानचक्षुषा ।
एवमेतत् पुरा दृष्टं मया वै ज्ञानचक्षुषा ॥
ये ही परब्रह्म हैं। विज्ञानमय नेत्रसे ही इनका दर्शन एवं ज्ञान हो सकता है । पूर्वकालमें मैंने ज्ञानदृष्टिसे ही इनका इस प्रकार साक्षात्कार किया था ।
श्रीभगवान् उवाच
जानाम्यध्यात्मयोगांश्च योऽहं यस्माच्च भारत ।
निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाऽऽभ्युदयिकोऽपि च ।
नराणामयनं ख्यातमहमेकः सनातनः ॥
भारत! मैं अध्यात्मयोगोंको जानता हूँ तथा मैं कौन हूँ और कहाँसे आया हूँ — इस बातका भी मुझे ज्ञान है । लौकिक अभ्युदयका साधक प्रवृत्तिधर्म ओर निःश्रेयस प्रदान करनेवाला निवृत्तिधर्म भी मुझसे अज्ञात नहीं है । एकमात्र मैं सनातन पुरुष ही सम्पूर्ण मनुष्योंका सुविख्यात आश्रयभूत नारायण हूँ ।
भगवान ने अर्जुन से अपने स्वरूप और ज्ञान के विषय में कहा।
श्रीभगवान् उवाच
निर्वाणं परमं ब्रह्म धर्मोऽसौ पर उच्यते ।
तस्मान्न च्युतपूर्वोऽहमच्युतस्तेन कर्मणा ॥
परम शान्तिमय जो ब्रह्म है, वही परम धर्म कहा गया है । उससे पहले कभी मैं च्युत नहीं हुआ हूँ, इसलिये लोग मुझे ‘अच्युत’ कहते हैं ।
श्रीभगवान् उवाच
विरिञ्च इति यत् प्रोक्तं कापिलज्ञानचिन्तकैः ।
स प्रजापतिरेवाहं चेतनात् सर्वलोककृत् ॥
कपिल मुनिके द्वारा प्रतिपादित सांख्यशास्त्रका विचार करनेवाले विद्वानोंने जिसे विरिंच कहा है, यह सर्वलोकस्रष्टा प्रजापति ‘विरिंच’ मैं ही हूँ, क्योंकि मैं ही सबको चेतना प्रदान करता हूँ ।
ब्रह्मा उवाच
नारायणपरा वेदा यज्ञा नारायणात्मकाः ।
तपो नारायणपरं नारायणपरा गतिः ॥
वेदोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है । यज्ञ नारायणके ही स्वरूप हैं । तपस्याके परम फल भगवान् नारायण ही हैं तथा नारायणकी प्राप्ति ही सर्वोत्तम गति है ।
वैशम्पायन → राजन
मनश्च प्रथितं राजन् पञ्चेन्द्रियसमीरणम् ।
एष लोकविधिर्धीमानेष लोकविसर्गकृत् ॥
राजन्! पाँचों इन्द्रियोंका प्रेरक जो विख्यात मन है, वह भी श्रीहरि ही हैं । ये बुद्धिमान् श्रीहरि ही सम्पूर्ण जगत्के प्रेरक और स्रष्टा हैं ।
वैशम्पायन उवाच
एवमेकं सांख्ययोगं वेदारण्यकमेव च ।
परस्पराङ्गान्येतानि पाञ्चरात्रं च कथ्यते ।
एष एकान्तिनां धर्मो नारायणपरात्मकः ॥
इस प्रकार आत्मा और अनात्माका विवेक करानेवाला सांख्य, चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपदेश देनेवाला योग, जीव और ब्रह्मके अभेदका बोध करानेवाला वेदोंका आरण्यकभाग (उपनिषद्) तथा भक्तिमार्गका प्रतिपादन करनेवाला पाञ्चरात्र आगम — ये सब शास्त्र एक लक्ष्यके साधक होनेके कारण एक बताये जाते हैं । ये सब एक-दूसरेके अंग हैं । सारे कर्मोंको भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंमें समर्पित कर देना यह एकान्त भक्तोंका धर्म है ।
वैशम्पायन उवाच
धर्माणां विविधानां च कर्ता ज्ञानकरस्तथा ।
भविष्यसि तपोयुक्तो न च रागाद् विमोक्ष्यसे ॥
तुम नाना प्रकारके धर्मोंके प्रवर्तक, ज्ञानदाता और तपस्वी होओगे, परंतु रागसे सर्वथा मुक्त नहीं रहोगे ।
ब्रह्मा उवाच
तथा तं पुरुषं विश्वं परमं सुमहत्तमम् ।
निर्गुणं निर्गुणा भूत्वा प्रविशन्ति सनातनम् ॥
जो लोग साधन करते-करते गुणातीत हो जाते हैं, वे ही उस विश्वरूप, अत्यन्त महान्, सनातन एवं निर्गुण परम पुरुषमें प्रवेश करते हैं ।
ब्रह्मा उवाच
अशरीरः शरीरेषु सर्वेषु निवसत्यसौ ।
वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्यति कर्मभिः ॥
वे स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे रहित होकर भी सम्पूर्ण शरीरोंमें निवास करते हैं और उन शरीरोंमें रहते हुए भी कभी उनके कर्मोंसे लिप्त नहीं होते हैं ।
ब्रह्मा उवाच
एको हुताशो बहुधा समिध्यते ।
एकः सूर्यस्तपसो योनिरेका ।
एको वायुर्बहुधा वाति लोके ।
महोदधिश्चाम्भसां योनिरेकः ।
पुरुषश्चैको निर्गुणो विश्वरूपस्तं निर्गुणं पुरुषं चाविशन्ति ॥
अग्नि एक ही है; परंतु वह अनेक रूपोंमें प्रज्वलित एवं प्रकाशित होती है । एक ही सूर्य सारे जगत्को ताप एवं प्रकाश देते हैं । तप अनेक प्रकारका है; परंतु उसका मूल एक ही है । एक ही वायु इस जगत् में विविध रूपसे प्रवाहित होती है तथा समस्त जलोंकी उत्पत्ति और लयका स्थान समुद्र भी एक ही है । उसी प्रकार वह निर्गुण विश्वरूप पुरुष भी एक ही है । उसी निर्गुण पुरुषमें सबका लय होता है ।