श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

ज्ञान–विवेक

आत्मबोध और विवेक

191 पद्य

श्रीरामचरितमानस

सत्सङ्ग का महत्व

बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥

सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥

सत्संगके बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजीकी कृपाके बिना वह सत्संग सहजमें मिलता नहीं । सत्संगति आनन्द और कल्याणकी जड़ है । सत्संगकी सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 24 सत्सङ्ग–सन्त महिमा
सत्पुरुष का विवेक

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ॥

संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥

विधाताने इस जड-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 6 श्रीरामचरितमानस पृ. 28 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी । तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी ॥

हरि हर पद रति मति न कुतरकी । तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की ॥

जिन्हें न तो प्रभुके चरणोंमें प्रेम है और न अच्छी समझ ही है, उनको यह कथा सुननेमें फीकी लगेगी । जिनकी श्रीहरि (भगवान् विष्णु) और श्रीहर (भगवान् शिव) के चरणोंमें प्रीति है और जिनकी बुद्धि कुतर्क करनेवाली नहीं है [जो श्रीहरि-हरमें भेदकी या ऊँच-नीचकी कल्पना नहीं करते], उन्हें श्रीरघुनाथजीकी यह कथा मीठी लगेगी ।

बालकाण्ड, चौपाई 9.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 31 भक्ति

एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानंद पर धामा ॥

ब्यापक बिस्वरूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ॥

जो परमेश्वर एक हैं, जिनके कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम हैं और जो सबमें व्यापक एवं विश्वरूप हैं, उन्हीं भगवान्ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकारकी लीला की है ।

बालकाण्ड, चौपाई 13.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 36

समुझत सरिस नाम अरु नामी । प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी ॥

नाम रूप दुइ ईस उपाधी । अकथ अनादि सुसामुझि साधी ॥

समझनेमें नाम और नामी दोनों एक-से हैं, किन्तु दोनोंमें परस्पर स्वामी और सेवकके समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामीमें पूर्ण एकता होनेपर भी जैसे स्वामीके पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नामके पीछे नामी चलते हैं । प्रभु श्रीरामजी अपने ‘राम’ नामका ही अनुगमन करते हैं, नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं) । नाम और रूप दोनों ईश्वरकी उपाधि हैं; ये (भगवान्के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुन्दर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धिसे ही इनका [दिव्य अविनाशी] स्वरूप जाननेमें आता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 21.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 45 भक्ति

को बड़ छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू ॥

देखिअहिं रूप नाम आधीना । रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना ॥

इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है । इनके गुणोंका तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे । रूप नामके अधीन देखे जाते हैं, नामके बिना रूपका ज्ञान नहीं हो सकता ।

बालकाण्ड, चौपाई 21.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 45

रूप बिसेष नाम बिनु जानें । करतल गत न परहिं पहिचानें ॥

सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें । आवत हृदयँ सनेह बिसेषें ॥

कोई-सा विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेलीपर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता और रूपके बिना देखे भी नामका स्मरण किया जाय तो विशेष प्रेमके साथ वह रूप हृदयमें आ जाता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 21.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 45
नाम जप से ब्रह्मसुख

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥

ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥

ब्रह्माके बनाये हुए इस प्रपञ्च (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिनमें] जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 22.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 45 नाम महिमा साधना–योग
नाम की सर्वोच्चता

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा । अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥

मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ॥

निर्गुण और सगुण — ब्रह्मके दो स्वरूप हैं । ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं । मेरी सम्मतिमें नाम इन दोनोंसे बड़ा है, जिसने अपने बलसे दोनोंको अपने वशमें कर रखा है ।

बालकाण्ड, चौपाई 23.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 47 लीला–रहस्य

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि । रामकथा कलि कलुष बिभंजनि ॥

रामकथा कलि पंनग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ॥

रामकथा पण्डितोंको विश्राम देनेवाली, सब मनुष्योंको प्रसन्न करनेवाली और कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली है । रामकथा कलियुगरूपी साँपके लिये मोरनी है और विवेकरूपी अग्निके प्रकट करनेके लिये अरणि (मन्थन की जानेवाली लकड़ी) है, (अर्थात् इस कथासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है)

बालकाण्ड, चौपाई 31.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 55 भक्ति
सद्गुरु की महिमा

सदगुर ग्यान बिराग जोग के । बिबुध बैद भव भीम रोग के ॥

जननि जनक सिय राम प्रेम के । बीज सकल ब्रत धरम नेम के ॥

ज्ञान, वैराग्य और योगके लिये सद्गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोगका नाश करनेके लिये देवताओंके वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं । ये श्रीसीतारामजीके प्रेमके उत्पन्न करनेके लिये माता-पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमोंके बीज हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 32(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 56 गुरु महिमा
मन्त्र और महामणि की महिमा

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥

हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥

विषयरूपी साँपका जहर उतारनेके लिये मन्त्र और महामणि हैं । ये ललाटपर लिखे हुए कठिनतासे मिटनेवाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं । अज्ञानरूपी अन्धकारके हरण करनेके लिये सूर्यकिरणोंके समान और सेवकरूपी धानके पालन करनेमें मेघके समान हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 32(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 57 भक्ति साधना–योग
मोह-मद और कुतर्क की बाधा

बन बहु बिषम मोह मद माना । नदीं कुतर्क भयंकर नाना ॥

मोह, मद और मान ही बहुत-से बीहड़ वन हैं और नाना प्रकारके कुतर्क ही भयानक नदियाँ हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 38.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 63 माया–संसार

जुग बिच भगति देवधुनि धारा । सोहति सहित सुबिरति बिचारा ॥

त्रिविध ताप त्रासक तिमुहानी । राम सरूप सिंधु समुहानी ॥

दोनोंके बीचमें भक्तिरूपी गङ्गाजीकी धारा ज्ञान और वैराग्यके सहित शोभित हो रही है । ऐसी तीनों तापोंको डरानेवाली यह तिमुहानी नदी रामस्वरूपरूपी समुद्रकी ओर जा रही है ।

बालकाण्ड, चौपाई 40.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 65 भक्ति
पवित्र जल के गुण

काम कोह मद मोह नसावन । बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन ॥

सादर मज्जन पान किए तें । मिटहिं पाप परिताप हिए तें ॥

यह जल काम, क्रोध, मद और मोहका नाश करनेवाला और निर्मल ज्ञान और वैराग्यका बढ़ानेवाला है । इसमें आदरपूर्वक स्नान करनेसे और इसे पीनेसे हृदयमें रहनेवाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 43(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 67 काम–क्रोध–लोभ–मोह

संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव ॥

होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव ॥

हे प्रभो! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता ।

बालकाण्ड, दोहा 45 श्रीरामचरितमानस पृ. 70 नीति–व्यवहार

ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद ॥

सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद ॥

जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है, और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है?

बालकाण्ड, दोहा 50 श्रीरामचरितमानस पृ. 74

जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान ॥

परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान ॥

यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञानके अभिमानसे इस प्रकार होड़ करते हैं तो वे कल्पभरके लिये नरकमें पड़ते हैं । भला, कहीं जीव भी ईश्वरके समान (सर्वथा स्वतन्त्र) हो सकता है?

बालकाण्ड, दोहा 69 श्रीरामचरितमानस पृ. 89
ईश्वर और जीव का भेद

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना । कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना ॥

सुरसरि मिलें सो पावन जैसें । ईस अनीसहि अंतरु तैसें ॥

गङ्गाजलसे भी बनायी हुई मदिराको जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते । पर वही गङ्गाजीमें मिल जानेपर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीवमें भी वैसा ही भेद है ।

बालकाण्ड, चौपाई 70.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 89
गुरुवाक्य की निष्ठा

नारद बचन न मैं परिहरऊँ । बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ ॥

गुर के बचन प्रतीति न जेही । सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही ॥

अतः मैं नारदजीके वचनोंको नहीं छोडूंगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती । जिसको गुरुके वचनोंमें विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्नमें भी सुगम नहीं होती ।

पार्वतीजी ने नारदजी से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 80.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 97 गुरु महिमा
मन की निष्ठा

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम ॥

जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम ॥

माना कि महादेवजी अवगुणोंके भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणोंके धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसीसे काम है ।

बालकाण्ड, दोहा 80 श्रीरामचरितमानस पृ. 98 माया–संसार

जननिहि बिकल बिलोकि भवानी । बोली जुत बिबेक मृदु बानी ॥

अस बिचारि सोचहि मति माता । सो न टरइ जो रचइ बिधाता ॥

माताको विकल देखकर पार्वतीजी विवेकयुक्त कोमल वाणी बोलीं — हे माता! जो विधाता रच देते हैं, वह टलता नहीं; ऐसा विचारकर तुम सोच मत करो!

बालकाण्ड, चौपाई 97.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 113
रामभक्त का लक्षण

सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं । रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं ॥

बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू ॥

शिवजीके चरणकमलोंमें जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्रीरामचन्द्रजीको स्वप्नमें भी अच्छे नहीं लगते । विश्वनाथ श्रीशिवजीके चरणोंमें निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्तका लक्षण है ।

मुनि याज्ञवल्क्य ने मुनि भरद्वाज से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 104.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 120 भक्ति
प्रभु की महिमा

प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम ॥

जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम ॥

हे प्रभो! आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं । सब कलाओं और गुणोंके निधान हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्यके भण्डार हैं । आपका नाम शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष है ।

पार्वतीजी ने शिवजी से प्रार्थना की।

बालकाण्ड, दोहा 107 श्रीरामचरितमानस पृ. 123 शरणागति
भ्रम का निवारण

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें ॥

जेहि जानें जग जाइ हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ॥

जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सीमें साँपका भ्रम हो जाता है; और जिसके जान लेनेपर जगत्‌का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागनेपर स्वप्नका भ्रम जाता रहता है ।

शिवजी ने प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथजी का चरित्र वर्णन करते हुए कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 112.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 127
सगुण-निर्गुण की एकता

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा । गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ॥

अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई ॥

सगुण और निर्गुणमें कुछ भी भेद नहीं है-मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं । जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तोंके प्रेमवश सगुण हो जाता है ।

शिवजी ने पार्वती जी से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 116.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 130

बिषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥

सब कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥

विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके देवता और जीवात्मा — ये सब एककी सहायतासे एक चेतन होते हैं । (अर्थात् विषयोंका प्रकाश इन्द्रियोंसे, इन्द्रियोंका इन्द्रियोंके देवताओंसे और इन्द्रियदेवताओंका चेतन जीवात्मासे प्रकाश होता है ।) इन सबका जो परम प्रकाशक है (अर्थात् जिससे इन सबका प्रकाश होता है), वही अनादि ब्रह्म अयोध्यानरेश श्रीरामचन्द्रजी हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 117.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 131
परमेश्वर का स्वरूप

प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू । जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥

राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्ब रहित सब उर पुर बासी ॥

हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने पहले आपसे पूछी थी, वही कहिये । [यह सत्य है कि] श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्म हैं, चिन्मय (ज्ञानस्वरूप) हैं, अविनाशी हैं, सबसे रहित और सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करनेवाले हैं ।

पार्वतीजी ने शिवजी से अपना पहला प्रश्न फिर पूछा।

बालकाण्ड, चौपाई 120(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 134 लीला–रहस्य भक्ति

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ॥

तदपि संत मुनि बेद पुराना । जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥

तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही । समुझि परइ जस कारन मोही ॥

जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ॥

हे सयानी! सुनो, हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणीसे श्रीरामचन्द्रजीकी तर्कना नहीं की जा सकती । तथापि संत, मुनि, वेद और पुराण — अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा कुछ कहते हैं, और जैसा कुछ मेरी समझमें आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ । जब-जब धर्मका ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 121.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 135

रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान ॥

तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान ॥

भगवान् रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले — हे मुनिराज! आपका स्मरण करनेसे दूसरोंके मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं [फिर आपके लिये तो कहना ही क्या है?] ।

बालकाण्ड, दोहा 128 श्रीरामचरितमानस पृ. 141 भक्ति
ज्ञानियों का मोह

सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें । ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें ॥

ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा । तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा ॥

हे मुनि! सुनिये, मोह तो उसके मनमें होता है जिसके हृदयमें ज्ञान-वैराग्य नहीं है । आप तो ब्रह्मचर्यव्रतमें तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं । भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है?

भगवान् ने नारदजी से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 129.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 141 वैराग्य

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी । सो न पाव मुनि भगति हमारी ॥

अस उर धरि महि बिचरहु जाई । अब न तुम्हहि माया निअराई ॥

हे मुनि! पुरारि (शिवजी) जिसपर कृपा नहीं करते, वह मेरी भक्ति नहीं पाता । हृदयमें ऐसा निश्चय करके जाकर पृथ्वीपर विचरो । अब मेरी माया तुम्हारे निकट नहीं आवेगी ।

बालकाण्ड, चौपाई 138.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 149 भक्ति

उर अभिलाष निरंतर होई । देखिअ नयन परम प्रभु सोई ॥

अगुन अखंड अनंत अनादी । जेहि चिंतहिं परमारथबादी ॥

हृदयमें निरन्तर यही अभिलाषा हुआ करती कि हम [कैसे] उन परम प्रभुको आँखोंसे देखें, जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी (ब्रह्मज्ञानी, तत्त्ववेत्ता) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 144.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 154 भक्ति

प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई । जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई ॥

तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी । ब्रह्म सकल उर अंतरजामी ॥

परन्तु हे प्रभु! बहुत ढिठाई हो रही है, यद्यपि हे भक्तोंका हित करनेवाले! वह ढिठाई भी आपको अच्छी ही लगती है । आप ब्रह्मा आदिके भी पिता (उत्पन्न करनेवाले), जगत्के स्वामी और सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले ब्रह्म हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 150.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 159 भक्ति

जे सुनि सादर नर बड़भागी । भव तरिहहिं ममता मद त्यागी ॥

आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया । सोउ अवतरिहि मोरि यह माया ॥

जिन (चरित्रों) को बड़े भाग्यशाली मनुष्य आदरसहित सुनकर, ममता और मद त्यागकर, भवसागरसे तर जायँगे । आदिशक्ति यह मेरी [स्वरूपभूता] माया भी, जिसने जगत्को उत्पन्न किया है, अवतार लेगी ।

बालकाण्ड, चौपाई 152.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 160 वैराग्य

हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना । भूप बिबेकी परम सुजाना ॥

करइ जे धरम करम मन बानी । बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी ॥

[राजाके] हृदयमें किसी फलकी टोह (कामना) न थी । राजा बड़ा ही बुद्धिमान् और ज्ञानी था । वह ज्ञानी राजा कर्म, मन और वाणीसे जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान् वासुदेवके अर्पित करके करता था ।

बालकाण्ड, चौपाई 156.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 163 भक्ति
तप की शक्ति

जनि आचरजु करहु मन माहीं । सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं ॥

तपबल तें जग सृजइ बिधाता । तपबल बिष्नु भए परित्राता ॥

हे पुत्र! मनमें आश्चर्य मत करो, तपसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तपके बलसे ब्रह्मा जगत्को रचते हैं । तपहीके बलसे विष्णु संसारका पालन करनेवाले बने हैं ।

कपटी तपस्वी (एकतनु मुनि) ने राजा प्रतापभानु से तप की महिमा बताते हुए कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 163.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 169 साधना–योग
तप की महिमा

तपबल संभु करहिं संघारा । तप तें अगम न कछु संसारा ॥

भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा । कथा पुरातन कहै सो लागा ॥

तपहीके बलसे रुद्र संहार करते हैं । संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तपसे न मिल सके । यह सुनकर राजाको बड़ा अनुराग हुआ । तब वह (तपस्वी) पुरानी कथाएँ कहने लगा ।

कपटी तपस्वी (एकतनु मुनि) ने राजा प्रतापभानु से तप की महिमा बताते हुए कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 163.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 169 साधना–योग

तपबल बिप्र सदा बरिआरा । तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा ॥

जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा । तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा ॥

तपके बलसे ब्राह्मण सदा बलवान् रहते हैं । उनके क्रोधसे रक्षा करनेवाला कोई नहीं है । हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणोंको वशमें कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जायँगे ।

बालकाण्ड, चौपाई 165.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 171 धर्म–आचरण
ईश्वर की सर्वव्यापकता

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना । प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥

देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥

मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान् सब जगह समान रूपसे व्यापक हैं, प्रेमसे वे प्रकट हो जाते हैं । देश, काल, दिशा, विदिशामें बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों ।

शिवजी ने पार्वतीजी से कहा कि देवताओं की सभा में उन्होंने यह बात कही थी।

बालकाण्ड, चौपाई 185.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 188 भक्ति लीला–रहस्य
परमेश्वर का दिव्य अवतार

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार ॥

निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥

ब्राह्मण, गौ, देवता और संतोंके लिये भगवान्ने मनुष्यका अवतार लिया । वे [अज्ञानमयी, मलिना] माया और उसके गुण (सत्, रज, तम) और [बाहरी तथा भीतरी] इन्द्रियोंसे परे हैं । उनका [दिव्य] शरीर अपनी इच्छासे ही बना है [किसी कर्मबन्धनसे परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थोंके द्वारा नहीं] ।

बालकाण्ड, दोहा 192 श्रीरामचरितमानस पृ. 195 लीला–रहस्य

ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप ॥

भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप ॥

जो व्यापक, अकल (निरवयव), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण हैं; तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान् भक्तोंके लिये नाना प्रकारके अनुपम (अलौकिक) चरित्र करते हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 205 श्रीरामचरितमानस पृ. 206 लीला–रहस्य
राजकुमारों का सौंदर्य

देखन बागु कुअँर दुइ आए । बय किसोर सब भाँति सुहाए ॥

स्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥

[उसने कहा—] दो राजकुमार बाग देखने आये हैं । किशोर अवस्थाके हैं और सब प्रकारसे सुन्दर हैं । वे साँवले और गोरे [रंगके] हैं; उनके सौन्दर्यको मैं कैसे बखानकर कहूँ । वाणी बिना नेत्रकी है और नेत्रोंके वाणी नहीं है ।

एक सखी ने सीताजी के पास आकर दोनों राजकुमारों की सुन्दरता का वर्णन किया।

बालकाण्ड, चौपाई 229.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 226 लीला–रहस्य
भवानी की असीम महिमा

नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ॥

भव भव बिभव पराभव कारिनि । बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ॥

आपका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है । आपके असीम प्रभावको वेद भी नहीं जानते । आप संसारको उत्पन्न, पालन और नाश करनेवाली हैं । विश्वको मोहित करनेवाली और स्वतन्त्ररूपसे विहार करनेवाली हैं ।

सीताजी ने भवानीजी के मन्दिर में उनके चरणों की वन्दना करते हुए यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 235.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 232 माया–संसार
भगवद्दर्शन का फल

सुधा समुद्र समीप बिहाई । मृगजलु निरखि मरहु कत धाई ॥

करहु जाई जा कहुँ जोइ भावा । हम तौ आजु जनम फलु पावा ॥

समीप आये हुए (भगवद्दर्शनरूप) अमृतके समुद्रको छोड़कर तुम [जगज्जननी जानकीको पत्नीरूपमें पानेकी दुराशारूप मिथ्या] मृगजलको देखकर दौड़कर क्यों मरते हो? फिर [भाई!] जिसको जो अच्छा लगे वही जाकर करो । हमने तो [श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन करके] आज जन्म लेनेका फल पा लिया (जीवन और जन्मको सफल कर लिया)

बालकाण्ड, चौपाई 246.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 241 भक्ति

गुनह लखन कर हम पर रोषू । कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू ॥

टेढ़ जानि सब बंद काहू । बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू ॥

[श्रीरामचन्द्रजीने मन-ही-मन कहा—] गुनाह (दोष) तो लक्ष्मणका और क्रोध मुझपर करते हैं! कहीं-कहीं सीधेपनमें भी बड़ा दोष होता है । टेढ़ा जानकर सब लोग किसीकी भी वन्दना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमाको राहु भी नहीं ग्रसता ।

बालकाण्ड, चौपाई 281.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 270
पुण्यात्मा का सुख

सुन बोले गुर अति सुखु पाई । पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई ॥

जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं । जद्यपि ताहि कामना नाहीं ॥

सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले — पुण्यात्मा पुरुषके लिये पृथ्वी सुखोंसे छायी हुई है । जैसे नदियाँ समुद्रमें जाती हैं, यद्यपि समुद्रको नदीकी कामना नहीं होती ।

राजा ने वसिष्ठजी को सारी कथा सुना दी तब गुरु बोले।

बालकाण्ड, चौपाई 294.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 280 वैराग्य

इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं । है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं ॥

हम सब सकल सुकृत कै रासी । भए जग जनमि जनकपुर बासी ॥

जिन्ह जानकी राम छबि देखी । को सुकृती हम सरिस बिसेषी ॥

पुनि देखब रघुबीर बिआहू । लेब भली बिधि लोचन लाहू ॥

इनके समान जगत्में न कोई हुआ, न कहीं है, न होनेका ही है । हम सब भी सम्पूर्ण पुण्योंकी राशि हैं, जो जगत्में जन्म लेकर जनकपुरके निवासी हुए, और जिन्होंने जानकीजी और श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखी है । हमारे-सरीखा विशेष पुण्यात्मा कौन होगा! और अब हम श्रीरघुनाथजीका विवाह देखेंगे और भलीभाँति नेत्रोंका लाभ लेंगे ।

बालकाण्ड, चौपाई 310.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 293
ब्रह्मस्वरूप की महिमा

करहिं जोग जोगी जेहि लागी । कोहु मोहु ममता मदु त्यागी ॥

ब्यापकु ब्रह्म अलखु अबिनासी । चिदानंदु निरगुन गुनरासी ॥

योगी लोग जिनके लिये क्रोध, मोह, ममता और मदको त्यागकर योगसाधन करते हैं, जो सर्वव्यापक, ब्रह्म, अव्यक्त, अविनाशी, चिदानन्द, निर्गुण और गुणोंकी राशि हैं … ।

जनकजी ने विश्वामित्र आदि मुनियों के सामने श्रीरामचन्द्रजी की महिमा गायी।

बालकाण्ड, चौपाई 341.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 326
ब्रह्म की अनिर्वचनीयता

मन समेत जेहि जान न बानी । तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ॥

महिमा निगम नेति कहि कहई । जो तिहुँ काल एकरस रहई ॥

जिनको मनसहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमाको वेद ‘नेति’ कहकर वर्णन करता है और जो [सच्चिदानन्द] तीनों कालोंमें एकरस (सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं … ।

जनकजी ने विश्वामित्र आदि मुनियों के सामने श्रीरामचन्द्रजी की महिमा गायी।

बालकाण्ड, चौपाई 341.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 326
कर्म और सुख-दुःख

बिसमय हरष रहित रघुराऊ । तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ ॥

जीव करम बस सुख दुख भागी । जाइअ अवध देवहित लागी ॥

श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्षसे रहित हैं । आप तो श्रीरामजीके सब प्रभावको जानती ही हैं । जीव अपने कर्मवश ही सुख-दुःखका भागी होता है । अतएव देवताओंके हितके लिये आप अयोध्या जाइये ।

देवताओं ने पछताती हुई सरस्वतीजी से फिर विनती करके कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 12.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 355 कर्म–प्रारब्ध

भावी बस प्रतीति उर आई । पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई ॥

का पूँछहु तुम्ह अबहुँ न जाना । निज हित अनहित पसु पहिचाना ॥

होनहारवश कैकेयीके मनमें विश्वास हो गया । रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी । [मन्थरा बोली—] क्या पूछती हो? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा? अपने भले-बुरेको (अथवा मित्र-शत्रुको) तो पशु भी पहचान लेते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 19.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 361
सत्य की महिमा

नहिं असत्य सम पातक पुंजा । गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा ॥

सत्यमूल सब सुकृत सुहाए । बेद पुरान बिदित मनु गाए ॥

असत्यके समान पापोंका समूह भी नहीं है । क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़के समान हो सकती हैं । ‘सत्य’ ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों)-की जड़ है । यह बात वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और मनुजीने भी यही कहा है ।

कैकेयी ने हँसकर यह बात कही।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 28.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 369

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु । अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु ॥

एक धरम परमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने ॥

जो हठ करके (कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखोंके पात्र हो गये । स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा । एक (दूसरे) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 48.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 385 धर्म–आचरण

गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस ॥

हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस ॥

[मेरी आज्ञा मानकर घरपर रहनेसे] गुरु और वेदके द्वारा सम्मत धर्म [के आचरण] का फल तुम्हें बिना ही क्लेशके मिल जाता है । किन्तु हठके वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 61 श्रीरामचरितमानस पृ. 397 धर्म–आचरण
आज्ञा पालन का महत्त्व

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ ॥

लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥

जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेनेका लाभ पाया है; नहीं तो जगत्में जन्म व्यर्थ ही है ।

श्रीरामचन्द्रजी ने भाई लक्ष्मण को हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभी से नाता तोड़े हुए खड़े देखा तब वचन बोले।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 70 श्रीरामचरितमानस पृ. 404 धर्म–आचरण
कर्म का फल

बोले लखन मधुर मृदु बानी । ग्यान बिराग भगति रस सानी ॥

काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सबु भ्राता ॥

तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले — हे भाई! कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है । सब अपने ही किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं ।

लक्ष्मणजी ने निषादराज को समझाते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 92.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 421 कर्म–प्रारब्ध

अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू । काहुहि बादि न देइअ दोसू ॥

मोह निसाँ सबु सोवनिहारा । देखिअ सपन अनेक प्रकारा ॥

ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिये और न किसीको व्यर्थ दोष ही देना चाहिये । सब लोग मोहरूपी रात्रिमें सोनेवाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेकों प्रकारके स्वप्न दिखायी देते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 93.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 422
परमार्थ का स्वरूप

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ॥

सखा परम परमारथु एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥

विवेक होनेपर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञानका नाश होनेपर) श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होता है । हे सखा! मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 93.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 422 भक्ति

राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अलख अनादि अनूपा ॥

सकल बिकार रहित गतभेदा । कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ॥

श्रीरामजी परमार्थस्वरूप (परमवस्तु) परब्रह्म हैं । वे अविगत (जाननेमें न आनेवाले), अलख (स्थूल दृष्टिसे देखनेमें न आनेवाले), अनादि (आदिरहित), अनुपम (उपमारहित), सब विकारोंसे रहित और भेदशून्य हैं, वेद जिनका नित्य ‘नेति नेति’ कहकर निरूपण करते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 93.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 422
प्रेम और परमार्थ का मिलन

राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ॥

मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ । मिलत धरें तन कह सबु कोऊ ॥

श्रीरामजीने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदयसे लगा लिया । [उसे इतना आनन्द हुआ] मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो । सब कोई [देखनेवाले] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ (परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं ।

रामचन्द्रजी के प्रेमी एक तपस्वी को पहचानकर प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसे हृदय से लगा लिया।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 111.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 437 भक्ति

जौं ए कंद मूल फल खाहीं । बादि सुधादि असन जग माहीं ॥

एक कहहिं ए सहज सुहाए । आपु प्रगट भए बिधि न बनाए ॥

जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत्में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं । कोई एक कहते हैं — ये स्वभावसे ही सुन्दर हैं [इनका सौन्दर्य-माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है] । ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्माके बनाये नहीं हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 120.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 445 माया–संसार
परम पुरुष की अद्वितीयता

जहँ लगि बेद कही बिधि करनी । श्रवन नयन मन गोचर बरनी ॥

देखहु खोजि भुअन दस चारी । कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी ॥

हमारे कानों, नेत्रों और मनके द्वारा अनुभवमें आनेवाली विधाताकी करनीको जहाँतक वेदोंने वर्णन करके कहा है, वहाँतक चौदहों लोकोंमें ढूँढ़ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं? [कहीं भी नहीं हैं, इसीसे सिद्ध है कि ये विधाताके चौदहों लोकोंसे अलग हैं और अपनी महिमासे ही आप निर्मित हुए हैं] ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 120.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 445

जिन्हजिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ ॥

भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ ॥

प्यारे पथिक सीताजीसहित दोनों भाइयोंको जिन-जिन लोगोंने देखा, उन्होंने भवका अगम मार्ग (जन्म-मृत्युरूपी संसारमें भटकनेका भयानक मार्ग) बिना ही परिश्रम आनन्दके साथ तै कर लिया (अर्थात् वे आवागमनके चक्रसे सहज ही छूटकर मुक्त हो गये)

अयोध्याकाण्ड, दोहा 123 श्रीरामचरितमानस पृ. 448 शरणागति
परमेश्वर का अगोचर स्वरूप

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ॥

अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥

हे राम! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर, बुद्धिसे परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है । वेद निरन्तर उसका ‘नेति नेति’ कहकर वर्णन करते हैं ।

ज्ञानी मुनि वाल्मीकि ने श्री राम से कहा।

अयोध्याकाण्ड, सोरठा 126 श्रीरामचरितमानस पृ. 451 लीला–रहस्य
ईश्वरीय कृपा और साक्षात्कार

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन । जानहिं भगत भगत उर चंदन ॥

वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है । हे रघुनन्दन! हे भक्तोंके हृदयके शीतल करनेवाले चन्दन! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 128.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 451 शरणागति भक्ति

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं । दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ॥

धीरज धरहु बिबेकु बिचारी । छाड़िअ सोच सकल हितकारी ॥

मूर्खलोग सुखमें हर्षित होते और दुःखमें रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मनमें दोनोंको समान समझते हैं । हे सबके हितकारी (रक्षक)! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोकका परित्याग कीजिये ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 150.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 470 नीति–व्यवहार

जीवत सकल जनम फल पाए । अंत अमरपति सदन सिधाए ॥

अस अनुमानि सोच परिहरहू । सहित समाज राज पुर करहू ॥

जीवनकालमें ही उन्होंने जन्म लेनेके सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्तमें वे इन्द्रलोकको चले गये । ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाजसहित नगरका राज्य करो ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 161.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 479 धर्म–आचरण

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग ॥

सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥

उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्गका त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 172 श्रीरामचरितमानस पृ. 488 वैराग्य
भक्ति का महत्व

साधु समाज न जाकर लेखा । राम भगत महुँ जासु न रेखा ॥

जायँ जिअत जग सो महिभारू । जननी जौबन बिटप कुठारू ॥

साधुओंके समाजमें जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजीके भक्तोंमें जिसका स्थान नहीं, वह जगत्में पृथ्वीका भार होकर व्यर्थ ही जीता है । वह माताके यौवनरूपी वृक्षके काटनेके लिये कुल्हाड़ामात्र है ।

निषादराज ने श्रीरामजी के लिए प्राणसमर्पण का निश्चय करके यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 190.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 503 वैराग्य

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु ॥

कबिहि अगमजिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु ॥

भरतजीका उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते । कविके लिये तो वह वैसा ही अगम है जैसा अहंता और ममतासे मलिन मनुष्योंके लिये ब्रह्मानन्द!

अयोध्याकाण्ड, दोहा 225 श्रीरामचरितमानस पृ. 533 भक्ति
विवेकपूर्ण कर्म का महत्व

अनुचित उचित काजु किछु होऊ । समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ॥

सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ॥

परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं । वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं ।

लक्ष्मणजी के बाहुबल की प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी ने यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 231.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 538 नीति–व्यवहार

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु ॥

ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु ॥

सुन्दर मुनिमण्डलीके बीचमें सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 239 श्रीरामचरितमानस पृ. 545 भक्ति

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं । बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं ॥

कहि जग गति मायिक मुनिनाथा । कहे कछुक परमारथ गाथा ॥

सीताजी और सब रानियाँ स्नेहके मारे व्याकुल हैं । तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेके लिये कहा । फिर मुनिनाथ वसिष्ठजीने जगत्‌की गतिको मायिक कहकर (अर्थात् जगत् मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर) कुछ परमार्थकी कथाएँ (बातें) कहीं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 247.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 551 माया–संसार

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु । कोउ न राम सम जान जथारथु ॥

बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ॥

नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थको श्रीरामजीके समान यथार्थ (तत्त्वसे) कोई नहीं जानता । ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 254.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 557

मातु मंदि मैं साधु सुचाली । उर अस आनत कोटि कुचाली ॥

फरइ कि कोदव बालि सुसाली । मुकता प्रसव कि संबुक काली ॥

माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूँ, ऐसा हृदयमें लाना ही करोड़ दुराचारोंके समान है । क्या कोदोंकी बाली उत्तम धान फल सकती है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है?

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 261.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 563

तात जायँ जियँ करहु गलानी । ईस अधीन जीव गति जानी ॥

तीनि काल तिभुअन मत मोरें । पुन्यसिलोक तात तर तोरें ॥

हे तात! तुम अपने हृदयमें व्यर्थ ही ग्लानि करते हो । जीवकी गतिको ईश्वरके अधीन जानो । मेरे मतमें [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों और [स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल] तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 263.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 565 शरणागति

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोकु परलोकु नसाई ॥

दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई । जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ॥

हृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक (यहाँके सुख, यश आदि) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है (मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती) । माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका सेवन नहीं किया है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 263.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 565 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥

हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥

पक्षी और पशु मुनियोंके पास [बेधड़क] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकोंको देखते ही भाग जाते हैं । मित्र और शत्रुको पशु-पक्षी भी पहचानते हैं । फिर मनुष्यशरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 264.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 566 धर्म–आचरण
परमार्थ का सार

स्वारथु नाथ फिरें सबही का । किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका ॥

यह स्वारथ परमारथ सारू । सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू ॥

हे नाथ! आपके लौटनेमें सभीका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करनेमें करोड़ों प्रकारसे कल्याण है । यही स्वार्थ और परमार्थका सार (निचोड़) है, समस्त पुण्योंका फल और सम्पूर्ण शुभ गतियोंका शृङ्गार है ।

भरतजी ने श्रीरामचन्द्रजी से अयोध्या लौटने की विनती करते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 268.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 569 भक्ति

बोरति ग्यान बिराग करारे । बचन ससोक मिलत नद नारे ॥

सोच उसास समीर तरंगा । धीरज तट तरुबर कर भंगा ॥

यह करुणाकी नदी [इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती है । शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें (आहें) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरङ्गे हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम वृक्षोंको तोड़ रही हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 276.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 575 वैराग्य

बिषम बिषाद तोरावति धारा । भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा ॥

केवट बुध बिद्या बड़ि नावा । सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा ॥

भयानक विषाद (शोक) ही उस नदीकी तेज धारा है । भय और भ्रम (मोह) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं । विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है । परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं, (उस विद्याका उपयोग नहीं कर सकते हैं), किसीको उसकी अटकल ही नहीं आती है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 276.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 575
प्रेमयुक्त ज्ञान की महिमा

सोह न राम पेम बिनु ग्यानू । करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥

मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए । राम घाट सब लोग नहाए ॥

श्रीरामजीके प्रेमके बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधारके बिना जहाज । वसिष्ठजीने विदेहराज (जनकजी) को बहुत प्रकारसे समझाया । तदनन्तर सब लोगोंने श्रीरामजीके घाटपर स्नान किया ।

महर्षि वसिष्ठ ने विदेहराज को समझाया।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 277.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 577 भक्ति
ईश्वरीय विधान की अपरिवर्तनीयता

ईस रजाइ सीस सबही कें । उतपति थिति लय बिषहु अमी कें ॥

देबि मोह बस सोचिअ बादी । बिधि प्रपंच अस अचल अनादी ॥

ईश्वरकी आज्ञा सभीके सिरपर है । उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लय (संहार) तथा अमृत और विषके भी सिरपर है (ये सब भी उसीके अधीन हैं) । हे देवि! मोहवश सोच करना व्यर्थ है । विधाताका प्रपञ्च ऐसा ही अचल और अनादि है ।

कौसल्याजी ने देवी सुमित्राजी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 282.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 581 माया–संसार

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु । बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु ॥

मोह मगन मति नहिं बिदेह की । महिमा सिय रघुबर सनेह की ॥

जनकजीका ज्ञानरूपी चिरंजीवी (मार्कण्डेय) मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो उस श्रीरामप्रेमरूपी बालकका सहारा पाकर बच गया । वस्तुतः [ज्ञानिशिरोमणि] विदेहराजकी बुद्धि मोहमें मग्न नहीं है । यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है [जिसने उन-जैसे महान् ज्ञानीके ज्ञानको भी विकल कर दिया] ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 286.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 585 भक्ति

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ । जहँ न राम पद पंकज भाऊ ॥

जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू । जहँ नहिं राम पेम परधानू ॥

जहाँ श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाय । जिसमें श्रीरामप्रेमकी प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 291.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 589 भक्ति

पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं । सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं ॥

राउर बदि भल भव दुख दाहू । प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू ॥

हे गोसाईं! आपके प्रेम और सम्बन्धसे अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनन्द) से युक्त हैं । आपके लिये भवदुःख (जन्म-मरणके दुःख) की ज्वालामें जलना भी अच्छा है और प्रभु (आप) के बिना परमपद (मोक्ष) का लाभ भी व्यर्थ है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 314.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 608 भक्ति
ज्ञानियों की विरक्ति

मुनिगन गुर धुर धीर जनक से । ग्यान अनल मन कसें कनक से ॥

जे बिरंचि निरलेप उपाए । पदुम पत्र जिमि जग जल जाए ॥

मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी-सरीखे धीरधुरन्धर जो अपने मनोंको ज्ञानरूपी अग्निमें सोनेके समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजीने निर्लेप ही रचा और जो जगत्रूपी जलमें कमलके पत्तेकी तरह ही (जगत् में रहते हुए भी जगत्से अनासक्त) पैदा हुए … ।

मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी श्रीरामजी और भरतजी के अपार प्रेम को देखकर वैराग्य और विवेकसहित उस प्रेम में मग्न हो गए।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 317.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 611 वैराग्य

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति ॥

चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति ॥

फिर भरतजी तो [स्वयं] श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके पात्र हैं । वे इस (भोगैश्वर्यत्यागरूप) करनीसे बड़े नहीं हुए (अर्थात् उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है) । [पृथ्वीपरका जल न पीनेकी] टेकसे चातककी और नीर-क्षीर-विवेककी विभूति (शक्ति) से हंसकी भी सराहना होती है ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 324 श्रीरामचरितमानस पृ. 617 भक्ति

परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मंजु मुद मंगल करनू ॥

हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू ॥

भरतजीका परम पवित्र आचरण (चरित्र) मधुर, सुन्दर और आनन्द-मङ्गलोंका करनेवाला है । कलियुगके कठिन पापों और क्लेशोंको हरनेवाला है । महामोहरूपी रात्रिको नष्ट करनेके लिये सूर्यके समान है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 326.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 618 धर्म–आचरण

उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति ॥

पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति ॥

हे पार्वती! श्रीरामजीके गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं । परन्तु जो भगवान्से विमुख हैं और जिनका धर्ममें प्रेम नहीं है, वे महामूढ़ [उन्हें सुनकर] मोहको प्राप्त होते हैं ।

अरण्यकाण्ड, सोरठा 1 श्रीरामचरितमानस पृ. 622 वैराग्य

तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए ॥

मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए ॥

जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई ॥

रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई ॥

मुनि अत्यन्त प्रेमसे पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रोंको श्रीरामजीके मुखकमलमें लगाये हुए हैं । [मनमें विचार रहे हैं कि] मैंने ऐसे कौन-से जप-तप किये थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियोंसे परे प्रभुके दर्शन पाये । जप, योग और धर्म-समूहसे मनुष्य अनुपम भक्तिको पाता है । श्रीरघुवीरके पवित्र चरित्रको तुलसीदास रात-दिन गाता है ।

अरण्यकाण्ड, छन्द (6(क) के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 630 भक्ति
श्रीराम की महिमा

संशय सर्पसर्प ग्रसनग्रसन उरगादः । शमन सुकर्कश तर्क विषादः ॥

भव भंजन रंजन सुर यूथः । त्रातु सदा नो कृपा वरूथः ॥

जो संशयरूपी सर्पको ग्रसनेके लिये गरुड़ हैं, अत्यन्त कठोर तर्कसे उत्पन्न होनेवाले विषादका नाश करनेवाले हैं, आवागमनको मिटानेवाले और देवताओंके समूहको आनन्द देनेवाले हैं, वे कृपाके समूह श्रीरामजी सदा हमारी रक्षा करें ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 11.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 636 काम–क्रोध–लोभ–मोह
माया का स्वरूप

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई । सुनहु तात मति मन चित लाई ॥

मैं अरु मोर तोर तैं माया । जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ॥

(श्रीरामजीने कहा—) हे तात! मैं थोड़ेहीमें सब समझाकर कहे देता हूँ । तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो । मैं और मेरा, तू और तेरा-यही माया है, जिसने समस्त जीवोंको वशमें कर रखा है ।

श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 15.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 641 माया–संसार
माया का स्वरूप

गो गोचर जहँ लगि मन जाई । सो सब माया जानेहु भाई ॥

तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ । बिद्या अपर अबिद्या दोऊ ॥

एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा । जा बस जीव परा भवकूपा ॥

एक रचइ जग गुन बस जाकें । प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें ॥

इन्द्रियोंके विषयोंको और जहाँतक मन जाता है, हे भाई! उस सबको माया जानना । उसके भी-एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदोंको तुम सुनो, एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यन्त दुःखरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा हुआ है । और एक (विद्या) जिसके वशमें गुण है और जो जगत्की रचना करती है, वह प्रभुसे ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है ।

श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 15.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 641 माया–संसार

एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा । जा बस जीव परा भवकूपा ॥

एक रचइ जग गुन बस जाकें । प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें ॥

एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यन्त दुःखरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा हुआ है । और एक (विद्या) जिसके वशमें गुण है और जो जगत्की रचना करती है, वह प्रभुसे ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 15.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 641
परम वैराग्य और सच्चा ज्ञान

ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं । देख ब्रह्म समान सब माहीं ॥

कहिअ तात सो परम बिरागी । तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी ॥

ज्ञान वह है जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी [दोष] नहीं है और जो सबमें समानरूपसे ब्रह्मको देखता है । हे तात! उसीको परम वैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियोंको और तीनों गुणोंको तिनकेके समान त्याग चुका हो ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 15.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 642 वैराग्य

धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना । ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ॥

जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई । सो मम भगति भगत सुखदाई ॥

धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योगसे ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्षका देनेवाला है — ऐसा वेदोंने वर्णन किया है । और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तोंको सुख देनेवाली है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 16.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 642 धर्म–आचरण

सो सुतंत्र अवलंब न आना । तेहि आधीन ग्यान बिग्याना ॥

भगति तात अनुपम सुखमूला । मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ॥

वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसको (ज्ञान-विज्ञान आदि किसी) दूसरे साधनका सहारा (अपेक्षा) नहीं है । ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं । हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुखकी मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल (प्रसन्न) होते हैं ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 16.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 642 भक्ति

निगम नेति सिव ध्यान न पावा । मायामृग पाछें सो धावा ॥

कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई । कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई ॥

वेद जिनके विषयमें ‘नेति नेति’ कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यानमें नहीं पाते (अर्थात् जो मन और वाणीसे नितान्त परे हैं), वे ही श्रीरामजी मायासे बने हुए मृगके पीछे दौड़ रहे हैं । वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है । कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 27.6 श्रीरामचरितमानस पृ. 658

सातवँ सम मोहि मय जग देखा । मोतें संत अधिक करि लेखा ॥

आठव जथालाभ संतोषा । सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥

सातवीं भक्ति है जगत्भरको समभावसे मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतोंको मुझसे भी अधिक करके मानना । आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसीमें संतोष करना और स्वप्नमें भी पराये दोषोंको न देखना ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 36.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 669 भक्ति

गुनातीत सचराचर स्वामी । राम उमा सब अंतरजामी ॥

कामिन्ह कै दीनता देखाई । धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजी गुणातीत (तीनों गुणोंसे परे), चराचर जगत्के स्वामी और सबके अन्तरकी जाननेवाले हैं । [उपर्युक्त बातें कहकर] उन्होंने कामी लोगोंकी दीनता (बेबसी) दिखलायी है और धीर (विवेकी) पुरुषोंके मनमें वैराग्यको दृढ़ किया है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 39(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 673 वैराग्य

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥

पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा । पंपा नाम सुभग गंभीरा ॥

हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ — हरिका भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न [की भाँति झूठा] है । फिर प्रभु श्रीरामजी पंपा नामक सुन्दर और गहरे सरोवरके तीरपर गये ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 39(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 674 वैराग्य

प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता । प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥

मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी । बालक सुत सम दास अमानी ॥

सयाना हो जानेपर उस पुत्रपर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती (अर्थात् मातृपरायण शिशुकी तरह फिर उसको बचानेकी चिन्ता नहीं करती; क्योंकि वह मातापर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है) । ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्रके समान है और [तुम्हारे-जैसा] अपने बलका मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्रके समान है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 43.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 678 धर्म–आचरण

जनहि मोर बल निज बल ताही । दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥

यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं । पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं ॥

मेरे सेवकको केवल मेरा ही बल रहता है और उसे (ज्ञानीको) अपना बल होता है । पर काम-क्रोधरूपी शत्रु तो दोनोंके लिये हैं । [भक्तके शत्रुओंको मारनेकी जिम्मेवारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बलको माननेवाले ज्ञानीके शत्रुओंका नाश करनेकी जिम्मेवारी मुझपर नहीं है ।] ऐसा विचारकर पण्डितजन (बुद्धिमान् लोग) मुझको ही भजते हैं । वे ज्ञान प्राप्त होनेपर भी भक्तिको नहीं छोड़ते ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 43.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 678 भक्ति

जेन भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी । ग्यान रंक नर मंद अभागी ॥

पुनि सादर बोले मुनि नारद । सुनहु राम बिग्यान बिसारद ॥

संतन्ह के लच्छन रघुबीरा । कहहु नाथ भव भंजन भीरा ॥

सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ । जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ ॥

जो मनुष्य भ्रमको त्यागकर ऐसे प्रभुको नहीं भजते, वे ज्ञानके कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं । फिर नारद मुनि आदरसहित बोले — हे विज्ञान-विशारद श्रीरामजी! सुनिये, हे रघुवीर! हे भव भय (जन्म-मरणके भय)-का नाश करनेवाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतोंके लक्षण कहिये । [श्रीरामजीने कहा—] हे मुनि! सुनो, मैं संतोंके गुणोंको कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वशमें रहता हूँ ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 45.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 679 शरणागति
सन्तों के लक्षण

षट बिकार जित अनघ अकामा । अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥

अमित बोध अनीह मितभोगी । सत्यसार कबि कोबिद जोगी ॥

वे संत [काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — इन] छः विकारों (दोषों) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिञ्चन (सर्वत्यागी), बाहर-भीतरसे पवित्र, सुखके धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान्, योगी … ।

नारद मुनि ने श्रीरामजी से सन्तों के लक्षणों के बारे में पूछा, तब श्रीरामजी ने सन्तों के गुणों का वर्णन किया।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 45.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 680 धर्म–आचरण

बिरति बिबेक बिनय बिग्याना । बोध जथारथ बेद पुराना ॥

दंभ मान मद करहिं न काऊ । भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ॥

तथा वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान (परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) और वेद-पुराणका यथार्थ ज्ञान रहता है । वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 46(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 680 वैराग्य
अनन्य सेवक की बुद्धि

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ॥

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ॥

और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान्‌का रूप है ।

श्रीरघुनाथजी ने हनुमानजी को उठाकर हृदय से लगाया और उन्हें सम्बोधित करते हुए यह कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 3 श्रीरामचरितमानस पृ. 686 भक्ति शरणागति

जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं । अंत राम कहि आवत नाहीं ॥

जासु नाम बल संकर कासी । देत सबहि सम गति अबिनासी ॥

मुनिगण जन्म-जन्ममें (प्रत्येक जन्ममें) [अनेकों प्रकारका] साधन करते रहते हैं । फिर भी अन्तकालमें उन्हें ‘राम’ नहीं कह आता (उनके मुखसे रामनाम नहीं निकलता) । जिनके नाम बलसे शङ्करजी काशीमें सबको समानरूपसे अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 10.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 694 साधना–योग

तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया ॥

छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम सरीरा ॥

ताराको व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजीने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली । [उन्होंने कहा—] पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु — इन पाँच तत्त्वोंसे यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 11.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 695

प्रगट सो तनु तव आगें सोवा । जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ॥

उपजा ग्यान चरन तब लागी । लीन्हेसि परम भगति बर मागी ॥

वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है । फिर तुम किसके लिये रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्‌के चरणों लगी और उसने परम भक्तिका वर माँग लिया ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 11.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 695 भक्ति

महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं ॥

कृषी निरावहिं चतुर किसाना । जिमि बुध तजहिं मोह मद माना ॥

भारी वर्षासे खेतोंकी क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होनेसे स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं । चतुर किसान खेतोंको निरा रहे हैं (उनमेंसे घास आदिको निकालकर फेंक रहे हैं) । जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मानका त्याग कर देते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 15(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 699

रस रस सूख सरित सर पानी । ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी ॥

जानि सरद रितु खंजन आए । पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए ॥

नदी और तालाबोंका जल धीरे-धीरे सूख रहा है । जैसे ज्ञानी (विवेकी) पुरुष ममताका त्याग करते हैं । शरद् ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये । जैसे समय पाकर सुन्दर सुकृत आ जाते हैं (पुण्य प्रकट हो जाते हैं)

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 16.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 700

लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया । सो नर तुम्ह समान रघुराया ॥

यह गुन साधन तें नहिं होई । तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ॥

और लोभकी फाँसीसे जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी! वह मनुष्य आपहीके समान है । ये गुण साधनसे नहीं प्राप्त होते । आपकी कृपासे ही कोई-कोई इन्हें पाते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 21.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 704 भक्ति

जामवंत अंगद दुख देखी । कहीं कथा उपदेस बिसेषी ॥

तात राम कहुँ नर जनि मानहु । निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु ॥

जाम्बवान्ने अंगदका दुःख देखकर विशेष उपदेशकी कथाएँ कहीं । [वे बोले—] हे तात! श्रीरामजीको मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 26.6 श्रीरामचरितमानस पृ. 709 भक्ति

मुनि एक नाम चंद्रमा ओही । लागी दया देखि करि मोही ॥

बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा । देहजनित अभिमान छड़ावा ॥

वहाँ चन्द्रमा नामके एक मुनि थे । मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी । उन्होंने बहुत प्रकारसे मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित (देहसम्बन्धी) अभिमानको छुड़ा दिया ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 28.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 710 वैराग्य

त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही । तासु नारि निसिचर पति हरिही ॥

तासु खोज पठइहि प्रभु दूता । तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ॥

[उन्होंने कहा—] त्रेतायुगमें साक्षात् परब्रह्म मनुष्यशरीर धारण करेंगे । उनकी स्त्रीको राक्षसोंका राजा हर ले जायगा । उसकी खोजमें प्रभु दूत भेजेंगे । उनसे मिलनेपर तू पवित्र हो जायगा ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 28.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 710 लीला–रहस्य

भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिंजे नर अरु नारि ॥

तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि ॥

श्रीरघुवीरका यश भव (जन्म-मरण)-रूपी रोगकी [अचूक] दवा है । जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिराके शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथोंको सिद्ध करेंगे ।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 30(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 713 भक्ति

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा । पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥

जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी) को भुलाकर [विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 8.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 723 भक्ति

जीति को सकइ अजय रघुराई । माया तें असि रचि नहिं जाई ॥

सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥

रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥

लागीं सुनैं श्रवन मन लाई । आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥

[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती । सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं । इसी समय हनुमान्जी मधुर वचन बोले, वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया । वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं । हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 13.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 728 माया–संसार
हनुमान जी का आत्म-बन्धन

जासु नाम जप सुनहु भवानी । भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ॥

तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धनको काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके कार्यके लिये हनुमान्जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया ।

शिवजी ने भवानी से कहा।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 20.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 734 नाम महिमा

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना । ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥

यह संबाद जासु उर आवा । रघुपति चरन भगति सोइ पावा ॥

हे उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती! यह स्वामी-सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति पा गया ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 34.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 746 भक्ति
श्रीराम की व्यापकता

तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥

ब्रह्म अनामय अज भगवंता । ब्यापक अजित अनादि अनंता ॥

हे तात! राम मनुष्योंके ही राजा नहीं हैं । वे समस्त लोकोंके स्वामी और कालके भी काल हैं । वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान् हैं; वे निरामय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 39(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 751 लीला–रहस्य

ममता तरुन तमी अँधिआरी । राग द्वेष उलूक सुखकारी ॥

तब लगि बसति जीव मन माहीं । जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ॥

ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओंको सुख देनेवाली है । वह (ममतारूपी रात्रि) तभीतक जीवके मनमें बसती है, जबतक प्रभु (आप) का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 47.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 758

ममता रत सन ग्यान कहानी । अति लोभी सन बिरति बखानी ॥

क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा । ऊसर बीज बएँ फल जथा ॥

ममतामें फँसे हुए मनुष्यसे ज्ञानकी कथा, अत्यन्त लोभीसे वैराग्यका वर्णन, क्रोधीसे शम (शान्ति) की बात और कामीसे भगवान्‌की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसरमें बीज बोनेसे होता है (अर्थात् ऊसरमें बीज बोनेकी भाँति यह सब व्यर्थ जाता है)

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 58.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 768 वैराग्य

लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड ॥

भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ॥

लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीरामजीको क्यों नहीं भजता?

लङ्काकाण्ड, दोहा (आरम्भ का, अङ्कहीन) श्रीरामचरितमानस पृ. 774 भक्ति

सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥

संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥

जो शिवसे द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्नमें भी मुझे नहीं पाता । शङ्करजीसे विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 2.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 776 भक्ति

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान ॥

ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥

श्रीरघुवीरके प्रतापसे पत्थर भी समुद्रपर तैर गये । ऐसे श्रीरामजीको छोड़कर जो किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं वे [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 3 श्रीरामचरितमानस पृ. 777 भक्ति

फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद ॥

मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥

यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं, तो भी बेत फूलता-फलता नहीं । इसी प्रकार चाहे ब्रह्माके समान भी ज्ञानी गुरु मिलें, तो भी मूर्खके हृदयमें चेत (ज्ञान) नहीं होता ।

लङ्काकाण्ड, सोरठा 16(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 789 साधना–योग
काल का प्रभाव

काल दंड गहि काहु न मारा । हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ॥

निकट काल जेहि आवत साईं । तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं ॥

काल दण्ड (लाठी) लेकर किसीको नहीं मारता । वह धर्म, बल, बुद्धि और विचारको हर लेता है । हे स्वामी! जिसका काल (मरण-समय) निकट आ जाता है, उसे आपहीकी तरह भ्रम हो जाता है ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 37.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 810 काल–मृत्यु

देहिं परम गति सो जियँ जानी । अस कृपाल को कहहु भवानी ॥

अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी । नर मतिमंद ते परम अभागी ॥

ऐसा हृदयमें जानकर वे उन्हें परमगति (मोक्ष) देते हैं । हे भवानी! कहो तो ऐसे कृपालु [और] कौन हैं? प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 45.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 818 भक्ति

पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा । पावक सायक सपदि चलावा ॥

भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं । ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं ॥

फिर कृपालु श्रीरामजीने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया । जैसे ज्ञानके उदय होनेपर [सब प्रकारके] सन्देह दूर हो जाते हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 47.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 820

एक बान काटी सब माया । जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥

कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके । भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥

तब श्रीरामजीने एक ही बाणसे सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है । तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिसे वानर-भालुओंकी ओर देखा, [जिससे] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं रुकते थे ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 52.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 825 लीला–रहस्य

गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास ॥

सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-मृत्यु) की फाँसीको काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्वनिवास (विश्वके आधार) प्रभु कहीं बन्धनमें आ सकते हैं?

लङ्काकाण्ड, दोहा 73 श्रीरामचरितमानस पृ. 845

चरित राम के सगुन भवानी । तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी ॥

अस बिचारि जे तग्य बिरागी । रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी ॥

हे भवानी! श्रीरामजीकी इन सगुण लीलाओंके विषयमें बुद्धि और वाणीके बलसे तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता । ऐसा विचारकर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही करते हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 74(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 845 भक्ति

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन । आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥

पर उपदेस कुसल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥

रावणने उनको ज्ञानका उपदेश किया । वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा (बातें) शुभ और पवित्र है । दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं । पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेशके अनुसार आचरण भी करते हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 78.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 850 धर्म–आचरण

सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥

बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥

शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं । सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं । बल, विवेक, दम (इन्द्रियोंका वशमें होना) और परोपकार — ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरीसे रथमें जोड़े हुए हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 80(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 853 नीति–व्यवहार

अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥

निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकसके समान है । शम (मनका वशमें होना), [अहिंसादि] यम और [शौचादि] नियम — ये बहुत-से बाण हैं । ब्राह्मणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है । इसके समान विजयका दूसरा उपाय नहीं है ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 80(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 853 साधना–योग

जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा ॥

संसार महँ पूरुष त्रिविध पाटल रसाल पनस समा ॥

एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं ॥

एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं ॥

व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो । क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं-पाटल (गुलाब), आम और कटहलके समान । एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल दोनों देते हैं और एक (कटहल) में केवल फल ही लगते हैं । इसी प्रकार [पुरुषोंमें] एक कहते हैं [करते नहीं], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक (तीसरे) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं ।

लङ्काकाण्ड, छन्द (90 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 865 नीति–व्यवहार

जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं ॥

जेहि नमत सिवब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ॥

आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं ॥

तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥

दैत्यरूपी वनको जलानेके लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरिको तुमने मनुष्य करके जाना । शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान्‌को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा । तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर तथा पापसमूहमय रहा! इतनेपर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजीने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ ।

लङ्काकाण्ड, छन्द (104 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 884 वैराग्य
परमेश्वर के दिव्य स्वरूप

तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी । सदा एकरस सहज उदासी ॥

अकल अगुन अज अनघ अनामय । अजित अमोघसक्ति करुनामय ॥

आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभावसे ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखण्ड, निर्गुण (मायिक गुणोंसे रहित), अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और दयामय हैं ।

रावण-वध के बाद देवताओं ने श्रीरघुनाथजी की स्तुति की।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 110.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 891 लीला–रहस्य

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना । चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना ॥

ताते उमा मोच्छ नहिं पायो । दसरथ भेद भगति मन लायो ॥

श्रीरघुनाथजीने पहलेके (जीवित कालके) प्रेमको विचारकर, पिताकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दृढ़ ज्ञान करा दिया । हे उमा! दशरथजीने भेद-भक्तिमें अपना मन लगाया था, इसीसे उन्होंने [कैवल्य] मोक्ष नहीं पाया ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 112.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 894 भक्ति

मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद ॥

कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद ॥

जिनको मुनि ध्यानमें भी नहीं पाते, जिन्हें वेद नेति नेति कहते हैं, वे ही कृपाके समुद्र श्रीरामजी वानरोंके साथ अनेकों प्रकारके विनोद कर रहे हैं ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 117(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 900 भक्ति

समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान ॥

बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान ॥

जो सुजान लोग श्रीरघुवीरकी समरविजयसम्बन्धी लीलाको सुनते हैं, उनको भगवान् नित्य विजय, विवेक और विभूति (ऐश्वर्य) देते हैं ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 121(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 905

अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं ॥

अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें । प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥

जिन्हें आपके चरणकमलोंमें प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलिन (उदास) और दु:खी रहते हैं । और जिन्हें आपकी लीला-कथाका आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 194(क).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 926 भक्ति

नहिं राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥

एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥

उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ; न मान है, न मद । उनको सम्पत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) समान है । इसीसे मुनिलोग योग (साधन) का भरोसा सदाके लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नताके साथ आपके सेवक बन जाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 194(क).7 श्रीरामचरितमानस पृ. 926 वैराग्य
परम सत्य का स्वरूप

ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार ॥

सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥

जो [बौद्धिक] ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे परे और अजन्मा हैं तथा माया, मन और गुणोंके परे हैं, वही सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 25 श्रीरामचरितमानस पृ. 937 लीला–रहस्य

यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास ॥

पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास ॥

यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदयमें जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछेसे किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, सन्तोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाशको प्राप्त होते (नष्ट हो जाते) हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 31 श्रीरामचरितमानस पृ. 942

आस त्रास इरिषादि निवारक । बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥

भूप मौलि मनि मंडन धरनी । देहि भगति संसृति सरि तरनी ॥

आप [विषयोंकी] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्यके विस्तार करनेवाले हैं । हे राजाओंके शिरोमणि एवं पृथ्वीके भूषण श्रीरामजी! संसृति (जन्म-मृत्युके प्रवाह)-रूपी नदीके लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 35.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 945 वैराग्य

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक ॥

गुन यह उभय न देखिअहिं देखि सो अबिबेक ॥

हे तात! सुनो, मायासे रचे हुए ही अनेक (सब) गुण और दोष हैं (इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है) । गुण (विवेक) इसीमें है कि दोनों ही न देखे जायँ, इन्हें देखना ही अविवेक है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 41 श्रीरामचरितमानस पृ. 951

जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ ॥

सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥

जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागरसे न तरे, वह कृतघ्न और मन्द-बुद्धि है और आत्महत्या करनेवालेकी गतिको प्राप्त होता है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 44 श्रीरामचरितमानस पृ. 953

ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका । साधन कठिन न मन कहुँ टेका ॥

करत कष्ट बहु पावइ कोऊ । भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ ॥

ज्ञान अगम (दुर्गम) है, [और] उसकी प्राप्तिमें अनेकों विघ्न हैं । उसका साधन कठिन है और उसमें मनके लिये कोई आधार नहीं है । बहुत कष्ट करनेपर कोई उसे पा भी लेता है, तो वह भी भक्तिरहित होनेसे मुझको प्रिय नहीं होता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 45.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 954

सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित । सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित ॥

दच्छ सकल लच्छन जुत सोई । जाकें पद सरोज रति होई ॥

वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणोंका घर और अखण्ड विज्ञानवान् है; वही चतुर और सब सुलक्षणोंसे युक्त है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 49.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 957

श्रवनवंत अस को जग माहीं । जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं ॥

ते जड़ जीव निजात्मक घाती । जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती ॥

जगत्में कानवाला ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजीके चरित्र न सुहाते हों । जिन्हें श्रीरघुनाथजीकी कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्माकी हत्या करनेवाले हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 53.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 961 वैराग्य

कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई । सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ॥

ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ । जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ ॥

श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तोंमें कोई एक ही सम्यक् (यथार्थ) ज्ञानको प्राप्त करता है । और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है । जगत्में कोई विरला ही ऐसा (जीवन्मुक्त) होगा ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 54.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 962 वैराग्य

धन्य सती पावन मति तोरी । रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी ॥

सुनहु परम पुनीत इतिहासा । जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा ॥

हे सती! तुम धन्य हो; तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त पवित्र है । श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें तुम्हारा कम प्रेम नहीं है (अत्यधिक प्रेम है) । अब वह परम पवित्र इतिहास सुनो, जिसे सुननेसे सारे लोकके भ्रमका नाश हो जाता है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 55.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 963 भक्ति

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा । किएँ जोग तप ग्यान बिरागा ॥

उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥

बिना प्रेमके केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादिके करनेसे श्रीरघुनाथजी नहीं मिलते । [अतएव तुम सत्संगके लिये वहाँ जाओ जहाँ] उत्तर दिशामें एक सुन्दर नील पर्वत है । वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 62(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 968 भक्ति

ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान ॥

ताहि मोह माया नर पावर करहिं गुमान ॥

जो ज्ञानियोंमें और भक्तोंमें शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान्‌के वाहन हैं, उन गरुड़को भी मायाने मोह लिया । फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 62(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 969 माया–संसार
श्रीराम के दिव्य स्वरूप

सोइ सच्चिदानंद घन रामा । अज बिग्यान रूप बल धामा ॥

ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥

श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दघन हैं जो अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप और बलके धाम, सर्वव्यापक एवं व्याप्य (सर्वरूप), अखण्ड, अनन्त, सम्पूर्ण, अमोघशक्ति (जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और छ: ऐश्वर्योंसे युक्त भगवान् हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 72(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 977 लीला–रहस्य

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी । ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥

इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥

प्रकृतिसे परे, प्रभु (सर्वसमर्थ), सदा सबके हृदयमें बसनेवाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं । यहाँ (श्रीराममें) मोहका कारण ही नहीं है । क्या अन्धकारका समूह कभी सूर्य सामने जा सकता है?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 72(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 977

नाथ इहाँ कछु कारन आना । सुनहु सो सावधान हरिजाना ॥

ग्यान अखंड एक सीताबर । माया बस्य जीव सचराचर ॥

हे नाथ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है । हे भगवान्‌के वाहन गरुड़जी! उसे सावधान होकर सुनिये । एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप हैं और जड-चेतन सभी जीव मायाके वश हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 78(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 983
अखण्ड ज्ञान और माया

जौं सब के रह ग्यान एकरस । ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥

माया बस्य जीव अभिमानी । ईस बस्य माया गुन खानी ॥

यदि जीवोंको एकरस (अखण्ड) ज्ञान रहे, तो कहिये, फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [सत्त्व, रज, तम — इन] तीनों गुणोंकी खान माया ईश्वरके वशमें है ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 78(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 983 माया–संसार
परतन्त्र जीव और स्वतन्त्र ईश्वर

परबस जीव स्वबस भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता ॥

मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥

जीव परतन्त्र है, भगवान् स्वतन्त्र हैं; जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं । यद्यपि मायाका किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान्के भजन बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 78(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 983 कर्म–प्रारब्ध

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥

हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित ब्याप तेहि बिद्या ॥

हे पक्षिराज! इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता । श्रीहरिके सेवकको अविद्या नहीं व्यापती । प्रभुकी प्रेरणासे उसे विद्या व्यापती है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 79(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 984 भक्ति

माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि ॥

जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि ॥

मायासे उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे । मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण (प्रकृतिके गुणोंसे रहित) और [गुणातीत दिव्य] गुणोंकी खान ब्रह्म जानना ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 85(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 990

सोई सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ ॥

ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥

उस सुखका लवलेशमात्र जिन्होंने एक बार स्वप्नमें भी प्राप्त कर लिया, हे पक्षिराज! वे सुन्दर बुद्धिवाले सज्जन पुरुष उसके सामने ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 88(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 992

जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥

प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥

प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 89(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 993 भक्ति
गुरु और भक्ति का महत्व

बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु ॥

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥

गुरुके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? अथवा वैराग्यके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? इसी तरह वेद और पुराण कहते हैं कि श्रीहरिकी भक्तिके बिना क्या सुख मिल सकता है?

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, सोरठा 89(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 993 गुरु महिमा

बिनु बिग्यान कि समता आवइ । कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ ॥

श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई । बिनु महि गंध कि पावइ कोई ॥

विज्ञान (तत्त्वज्ञान) के बिना क्या समभाव आ सकता है? आकाशके बिना क्या कोई अवकाश (पोल) पा सकता है? श्रद्धाके बिना धर्म [का आचरण] नहीं होता क्या पृथ्वीतत्त्वके बिना कोई गन्ध पा सकता है?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 90(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 994

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ॥

राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥

बिना विश्वासके भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते (ढरते) नहीं और श्रीरामजीकी कृपाके बिना जीव स्वप्नमें भी शान्ति नहीं पाता ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 90(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 994 भक्ति शरणागति
गुरु की महत्ता

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंचि संकर सम होई ॥

संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता । दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥

गुरुके बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो । [गरुड़जीने कहा—] हे तात! मुझे सन्देहरूपी सर्पने डस लिया था और [साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरें आती हैं, वैसे ही] बहुत-सी कुतर्करूपी दुःख देनेवाली लहरें आ रही थीं ।

गरुड़जी ने काकभुशुण्डिजी से कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 93(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 997 गुरु महिमा साधना–योग

श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक ॥

तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥

वेदसम्मत तथा वैराग्य और ज्ञानसे युक्त जो हरिभक्तिका मार्ग है, मोहवश मनुष्य उसपर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथोंकी कल्पना करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 100(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1005 भक्ति

क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान ॥

मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान ॥

बिना द्वैतबुद्धिके क्रोध कैसा और बिना अज्ञानके क्या द्वैतबुद्धि हो सकती है? मायाके वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वरके समान हो सकता है?

उत्तरकाण्ड, दोहा 111(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1020 माया–संसार

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक । सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक ॥

राजु कि रहइ नीति बिनु जानें । अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें ॥

परमात्माको जाननेवाले कहीं जन्म-मरण [के चक्कर] में पड़ सकते हैं? भगवान्‌की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है? श्रीहरिके चरित्र वर्णन करनेपर क्या पाप रह सकते हैं?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 112(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1020 नीति–व्यवहार

पावन जस कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥

लाभु कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना ॥

बिना पुण्यके क्या पवित्र यश [प्राप्त] हो सकता है? बिना पापके भी क्या कोई अपयश पा सकता है? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते हैं उस हरि-भक्तिके समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 112(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1021 भक्ति

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ॥

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! जो श्रीरामजीके चरणोंके प्रेमी हैं और काम, अभिमान तथा क्रोधसे रहित हैं, वे जगत्‌को अपने प्रभुसे भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें?

उत्तरकाण्ड, दोहा 112(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1022 भक्ति
राम रहस्य का ज्ञान

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ । कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ ॥

राम रहस्य ललित बिधि नाना । गुप्त प्रगट इतिहास पुराना ॥

काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभावसे उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा । अनेकों प्रकारके सुन्दर श्रीरामजीके रहस्य (गुप्त मर्मके चरित्र और गुण), जो इतिहास और पुराणोंमें गुप्त और प्रकट हैं (वर्णित और लक्षित हैं)

उत्तरकाण्ड, चौपाई 114(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1023 काल–मृत्यु

जे असि भगति जानि परिहरहीं । केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥

ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी । खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥

जो भक्तिकी ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञानके लिये श्रम (साधन) करते हैं, वे मूर्ख घरपर खड़ी हुई कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये मदारके पेड़को खोजते फिरते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 115(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1025 भक्ति

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई । जे सुख चाहहिं आन उपाई ॥

ते सठ महासिंधु बिनु तरनी । पैरि पार चाहहिं जड़ करनी ॥

हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर दूसरे उपायोंसे सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड़ करनीवाले (अभागे) बिना ही जहाजके तैरकर महासमुद्रके पार जाना चाहते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 115(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1025 भक्ति

भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥

नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥

भक्ति और ज्ञानमें कुछ भी भेद नहीं है । दोनों ही संसारसे उत्पन्न क्लेशोंको हर लेते हैं । हे नाथ! मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं । हे पक्षिश्रेष्ठ! उसे सावधान होकर सुनिये ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 115(क).7 श्रीरामचरितमानस पृ. 1026 भक्ति

ग्यान बिराग जोग बिग्याना । ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥

पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती । अबला अबल सहज जड़ जाती ॥

हे हरिवाहन! सुनिये; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान — ये सब पुरुष हैं; पुरुषका प्रताप सब प्रकारसे प्रबल होता है । अबला (माया) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति (जन्म) से ही जड़ (मूर्ख) होती है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 115(क).8 श्रीरामचरितमानस पृ. 1026 वैराग्य

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ ॥

जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ ॥

श्रीरघुनाथजीका यह रहस्य (गुप्त मर्म) जल्दी कोई भी नहीं जान पाता । श्रीरघुनाथजीकी कृपासे जो इसे जान जाता है, उसे स्वप्नमें भी मोह नहीं होता ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 116(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1027
जीव की अविनाशी स्थिति

सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनइ न जाइ बखानी ॥

ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥

हे तात! यह अकथनीय कहानी (वार्ता) सुनिये । यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती । जीव ईश्वरका अंश है । [अतएव] वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभावसे ही सुखकी राशि है ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को जीव का स्वरूप समझाते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 117(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1027 माया–संसार

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥

आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥

प्रबल अबिद्या कर परिवारा । मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥

तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा । उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥

‘सोऽहमस्मि’ (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखण्ड (तैलधारावत् कभी न टूटनेवाली) वृत्ति है वही [उस ज्ञानदीपककी] परम प्रचण्ड दीपशिखा (लौ) है । [इस प्रकार] जब आत्मानुभवके सुखका सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसारके मूल भेदरूपी भ्रमका नाश हो जाता है, और महान् बलवती अविद्याके परिवार मोह आदिका अपार अन्धकार मिट जाता है । तब वही (विज्ञानरूपिणी) बुद्धि [आत्मानुभवरूप] प्रकाशको पाकर हृदयरूपी घरमें बैठकर उस जड़-चेतनकी गाँठको खोलती है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 118(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1030

प्रबल अबिद्या कर परिवारा । मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥

तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा । उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥

और महान् बलवती अविद्याके परिवार मोह आदिका अपार अन्धकार मिट जाता है । तब वही (विज्ञानरूपिणी) बुद्धि [आत्मानुभवरूप] प्रकाशको पाकर हृदयरूपी घरमें बैठकर उस जड़-चेतनकी गाँठको खोलती है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 118(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1030
ज्ञान मार्ग की कठिनता

ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा ॥

जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ॥

ज्ञानका मार्ग कृपाण (दुधारी तलवार) की धारके समान है । हे पक्षिराज! इस मार्गसे गिरते देर नहीं लगती । जो इस मार्गको निर्विघ्न निबाह ले जाता है, वही कैवल्य (मोक्ष) रूप परमपदको प्राप्त करता है ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से ज्ञान-मार्ग की कठिनाई बताते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 119(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1031 साधना–योग

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि ॥

भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ॥

हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! मैं सेवक हूँ और भगवान् मेरे सेव्य (स्वामी) हैं, इस भावके बिना संसाररूपी समुद्रसे तरना नहीं हो सकता । ऐसा सिद्धान्त विचारकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंका भजन कीजिये ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 119(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1032 भक्ति

नर तन सम नहिं कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही ॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी । ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥

मनुष्य-शरीरके समान कोई शरीर नहीं है । चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं । यह मनुष्य-शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्षकी सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको देनेवाला है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 1035 धर्म–आचरण
मोह और मानसिक रोग

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥

काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥

सब रोगोंकी जड़ मोह (अज्ञान) है । उन व्याधियोंसे फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं । काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को मानस-रोगों के विषय में बताते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).15 श्रीरामचरितमानस पृ. 1037 काम–क्रोध–लोभ–मोह साधना–योग

जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई । जब उर बल बिराग अधिकाई ॥

सुमति छुधा बाढ़इ नित नई । बिषय आस दुर्बलता गई ॥

हे गोसाईं! मनको नीरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता मिट जाय ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 122(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 1038 वैराग्य