श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६
ज्ञान–विवेक
आत्मबोध और विवेक
88 पद्य
महाभारत — खण्ड ६
भीष्म उवाच
परतन्त्रं कथं हेतुमात्मानमनुपश्यसि ।
कर्मणां हि महाभाग सूक्ष्मं ह्येतदतीन्द्रियम् ॥
भीष्मजी कहते हैं — महाभाग! तुम तो सदा परतन्त्र हो (काल, अदृष्ट और ईश्वरके अधीन हो), फिर अपनेको शुभाशुभ कर्मोंका कारण क्यों समझते हो? वास्तवमें कर्मोंका कारण क्या है, यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म तथा इन्द्रियोंकी पहुँचसे बाहर है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
काल उवाच
कर्मदायादवाँल्लोकः कर्मसम्बन्धलक्षणः ।
कर्माणि चोदयन्तीह यथान्योन्यं तथा वयम् ॥
संसारमें कर्म ही मनुष्योंका पुत्र-पौत्रके समान अनुगमन करनेवाला है । कर्म ही दुःख-सुखके सम्बन्धका सूचक है । इस जगत् में कर्म ही जैसे परस्पर एक-दूसरेको प्रेरित करते हैं, वैसे ही हम भी कर्मोंसे ही प्रेरित हुए हैं ।
ब्रह्मा उवाच
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च ॥
आत्मा ही अपना बन्धु है, आत्मा ही अपना शत्रु है तथा आत्मा ही अपने कर्म और अकर्मका साक्षी है ।
भीष्म उवाच
तस्मात् सद्भिर्न वक्तव्यं कस्यचित् किंचिदग्रतः ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य दुर्ज्ञेया ह्यकृतात्मभिः ॥
इसलिये सत्पुरुषोंको कभी किसीके सामने कोई उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है । जिन्होंने अपने अन्तःकरणको शुद्ध एवं वशीभूत नहीं कर लिया है, उनके लिये धर्मकी गतिको समझना बहुत ही कठिन है ।
अम्बा उवाच
वाय्वम्बुभुजोऽपि सतो ।
नरस्य दुःखक्षयः कुतस्तस्य ।
भवति हि सुरासुरगुरौ ।
यस्य न विश्वेश्वरे भक्तिः ॥
कोई जल या हवा पीकर ही रहनेवाला क्यों न हो, जिसकी सुरासुरगुरु भगवान् विश्वनाथमें भक्ति न हो, उसके दुःखोंका नाश कैसे हो सकता है?
श्रीभगवान् उवाच
एवं ध्यायन्ति विद्वांसः परं तत्त्वं सनातनम् ।
तद् विशेषमिति ख्यातं यदजं ज्ञानमक्षरम् ॥
अजन्मा, अविनाशी, ज्ञानमय तथा सर्वश्रेष्ठ रूपसे विख्यात जो सनातन परम तत्त्व है, उसका ज्ञानी पुरुष इसी रूपमें ध्यान करते हैं (जैसा कि आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ)
श्रीकृष्ण उवाच
त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये ।
ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्त्वा जितेन्द्रियाः ॥
आपमें बोध और मननकी शक्ति विद्यमान है । जो लोग आपकी शरणमें आकर सर्वथा आपके आश्रित रहते हैं, वे ध्यानपरायण, नित्य योगयुक्त, सत्यसंकल्प तथा जितेन्द्रिय होते हैं ।
तण्डि उवाच
दुर्विज्ञेयमसंख्येयं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।
योनिं विश्वस्य जगतस्तमसः परतः परम् ॥
उनका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है । वे अप्रमेय हैं । जिन्होंने अपने अन्तःकरणको पवित्र एवं वशीभूत नहीं किया है, उनके लिये वे सर्वथा दुर्लभ हैं । वे ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं । अज्ञानमय अन्धकारसे अत्यन्त परे हैं ।
तण्डि मुनि ने उग्र तपस्या के द्वारा प्राप्त किए गए ईश्वर के दर्शन के उपरान्त उनकी स्तुति करते हुए कहा।
तण्डि उवाच
मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम् ।
अग्राह्यमचलं शुद्धं बुद्धिग्राह्यं मनोमयम् ॥
वे ही मनु, इन्द्र, अग्नि, मरुद्गण, सम्पूर्ण विश्व तथा ब्रह्माजीकी भी गति हैं । मन और इन्द्रियोंके द्वारा उनका ग्रहण नहीं हो सकता । वे अग्राह्य, अचल, शुद्ध, बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य तथा मनोमय हैं ।
तण्डि मुनि ने ब्रह्म के दर्शन प्राप्त करने के बाद उनकी स्तुति की।
तण्डि उवाच
मृत्युर्यमो हुताशश्च कालः संहारवेगवान् ।
कालस्य परमा योनिः कालश्चायं सनातनः ॥
मृत्यु, यम, अग्नि, संहारके लिये वेगशाली काल, कालके परम कारण तथा सनातन काल भी — ये महादेव ही हैं ।
वासुदेव उवाच
ईश्वरं सम्प्रपद्यन्ते द्विजा भावितभावनाः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि यो भक्तः परमेश्वरे ।
सदृशोऽरण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥
जिनका अन्तःकरण पवित्र है, वे ही द्विज महादेवजीकी शरण लेते हैं । जो परमेश्वर शिवका भका है, वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी पवित्र अन्तःकरणवाले वनवासी मुनियोंके समान है ।
सिद्ध उवाच
वर्णाश्रमा यथा सर्वे धर्मज्ञानविवर्जिताः ।
क्रतवश्च यथासोमास्तथा गङ्गां विना जगत् ॥
जैसे धर्म और ज्ञानसे रहित होनेपर सम्पूर्ण वर्णों और आश्रमोंकी शोभा नहीं होती है तथा जैसे सोमरसके बिना यज्ञ सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार गङ्गाके बिना जगत्की शोभा नहीं है ।
भीष्म उवाच
यच्चैव मानुषे लोके यच्च देवेषु किञ्चन ।
सर्वं तु तपसा साध्यं ज्ञानेन नियमेन च ॥
मनुष्यलोकमें तथा देवलोकमें जो कुछ भी भोग्य वस्तुएँ हैं, वे सब ज्ञान, नियम और तपस्यासे प्राप्त होनेवाली हैं ।
भीष्म → युधिष्ठिर
योनिसंकलुषे जातं नानाभावसमन्वितम् ।
कर्मभिः सज्जनाचीर्णैर्विज्ञेया योनिशुद्धता ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! जो कलुषित योनिमें उत्पन्न हुआ है, वह ऐसी नाना प्रकारकी चेष्टाओंसे युक्त होता है, जो सत्पुरुषोंके आचारसे विपरीत हैं; अतः उसके कर्मोंसे ही उसकी पहचान होती है । इसी प्रकार सज्जनोचित आचरणोंसे योनिकी शुद्धताका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
आर्यरूपसमाचारं चरन्तं कृतके पथि ।
सुवर्णमन्यवर्णं वा स्वशीलं शास्ति निश्चये ॥
जो कृत्रिम मार्गका आश्रय लेकर श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुरूप आचरण करता है, वह सोना है या काँच — शुद्ध वर्णका है या संकर वर्णका? इसका निश्चय करते समय उसका स्वभाव ही सब कुछ बता देता है ।
वैशम्पायन उवाच
ज्ञानं विज्ञानमारोग्यं रूपं सम्पत् तथैव च ।
सौभाग्यं चैव तपसा प्राप्यते भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! ज्ञान, विज्ञान, आरोग्य, रूप, सम्पत्ति तथा सौभाग्य भी तपस्यासे प्राप्त होते हैं ।
वैशम्पायन उवाच
क्रतुभिश्चोपवासैश्च त्रिदिवं याति भारत ।
लभते च शिवं ज्ञानं फलपुष्पप्रदो नरः ॥
भारत! यज्ञ और उपवास करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है तथा फल-फूलका दान करनेवाला मानव कल्याणमय मोक्षस्वरूप ज्ञान प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म उवाच
मुनयः सत्यनिरता मुनयः सत्यविक्रमाः ।
मुनयः सत्यशपथास्तस्मात् सत्यं विशिष्यते ॥
ऋषि-मुनि सत्यपरायण, सत्यपराक्रमी और सत्यप्रतिज्ञ होते हैं । इसलिये सत्य सबसे श्रेष्ठ है ।
ब्रह्मा उवाच
ब्रह्मचर्येण तपसा यत्नेन च दमेन च ।
दानैश्च विविधैः पुण्यैस्तथा तीर्थानुसेवनात् ॥
तपसा महता चैव सुकृतेन च कर्मणा ।
शक्यः समासादयितुं गोलोकः पुष्करेक्षण ॥
कमलनयन इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तपस्या, यत्न, इन्द्रियसंयम, नाना प्रकारके दान, पुण्य, तीर्थसेवन, महान् तप और अन्यान्य शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे ही गोलोककी प्राप्ति हो सकती है ।
ब्रह्माजी ने इन्द्र से कहा।
भीष्म → राजन
मासार्धमासोपवासाद् यत् तपो मन्यते जनः ।
आत्मतन्त्रोपघाती यो न तपस्वी न धर्मवित् ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! जो लोग पंद्रह दिन या एक महीनेतक उपवास करके उसे तपस्या मानते हैं, वे व्यर्थ ही अपने शरीरको कष्ट देते हैं । वास्तवमें केवल उपवास करनेवाले न तपस्वी हैं, न धर्मज्ञ ।
शुक्र उवाच
अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यस्तृप्तिं ददाति च ।
मनो ग्लपयते तीव्रं विषं गन्धेन सर्वशः ॥
अमृत वह है, जिसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है । जो तत्काल तृप्ति प्रदान करता है और विष वह है जो अपनी गन्धसे चित्तमें सर्वथा तीव्र ग्लानि पैदा करता है ।
शुक्राचार्य ने राजा से कहा।
भीष्म उवाच
तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम् ।
अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दमः शमः ॥
कामना और याचनाका अभाव, सरलता, सत्य, मृदुता, अहिंसा, समस्त प्राणियोंके प्रति क्रूरताका अभाव-दया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह — ये ही इस मानस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाली पवित्रताके लक्षण हैं ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से परम पवित्र मानस तीर्थ के वर्णन के अवसर पर कहा।
भीष्म उवाच
तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते ।
नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मता ।
शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः ॥
किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है । भगवान् नारायण अथवा भगवान् शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है । पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा ।
भीष्म उवाच
प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषतः ।
तथा निष्किंचनत्वं च मनसश्च प्रसन्नता ॥
इस जगत्में प्रज्ञान ही शरीर शुद्धिका विशेष साधन है । इसी प्रकार अकिंचनता और मनकी प्रसन्नता भी शरीरको शुद्ध करनेवाले हैं ।
भीष्म उवाच
मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च ।
स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिनः ॥
जो प्रसन्न एवं शुद्ध मनसे ब्रह्मज्ञानरूपी जलके द्वारा मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान ही तत्त्वदर्शी ज्ञानीका स्नान माना गया है ।
भीष्म उवाच
एवं वै परमं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ।
प्राणा यथाऽऽत्मनोऽभीष्टा भूतानामपि वै तथा ॥
इस प्रकार मनीषी पुरुष अहिंसारूप परमधर्मकी प्रशंसा करते हैं । जैसे मनुष्यको अपने प्राण प्रिय होते हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको अपने-अपने प्राण प्रिय जान पड़ते हैं ।
भीष्म उवाच
आत्मौपम्येन मन्तव्यं बुद्धिमद्भिः कृतात्मभिः ।
मृत्युतो भयमस्तीति विदुषां भूतिमिच्छताम् ॥
किं पुनर्हन्यमानानां तरसा जीवितार्थिनाम् ।
अरोगाणामपापानां पापैर्मांसोपजीविभिः ॥
अतः जो बुद्धिमान् और पुण्यात्मा है, उन्हें चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान समझें । जब अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंको भी मृत्युका भय बना रहता है, तब जीवित रहनेकी इच्छावाले नीरोग और निरपराध प्राणियोंको, जो मांसपर जीविका चलानेवाले पापी पुरुषोंद्वारा बलपूर्वक मारे जाते हैं, क्यों न भय प्राप्त होगा ।
भीष्म उवाच
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः प्रजार्थिभिरुदाहृतः ।
यथोक्तं राजशार्दूल न तु तन्मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥
नृपश्रेष्ठ! प्रजार्थी पुरुषोंने प्रवृत्तिरूप धर्मका प्रतिपादन किया है, परन्तु वह मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले विरक्त पुरुषोंके लिये अभीष्ट नहीं है ।
महेश्वर उवाच
येषां धर्माश्रिता बुद्धिः श्रद्दधानाश्च ये नराः ।
तेषां स्यादुपदेष्टव्यः सरहस्यो महाफलः ॥
जिनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहती है और जो मनुष्य परम श्रद्धालु हैं, उन्हींको इस महान् फलदायक रहस्ययुक्त धर्मका उपदेश देना चाहिये ।
विष्णु उवाच
ये च धर्माः शुभाः पुण्याः सरहस्या उदाहृताः ।
तेषां धर्मफलं तस्य यः पठेत जितेन्द्रियः ॥
यहाँ जिन-जिन पवित्र एवं कल्याणकारी धर्मोंका रहस्योंसहित वर्णन किया गया है, उन सबका जो इन्द्रियसंयमपूर्वक पाठ करेगा, उसे उन धर्मोंका पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा ।
विष्णु उवाच
कृत्वापि पापकं कर्म महापातकवर्जितम् ।
रहस्यधर्मं श्रुत्वेमं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
मनुष्य महापातकको छोड़कर अन्य पापोंका आचरण करके भी यदि इस रहस्य-धर्मको सुन लेगा तो उन सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा ।
श्रीमहेश्वर उवाच
अतः परतरं नास्ति नावरं न तिरोग्रतः ।
अदुःखमसुखं सौम्यमजरामरमव्ययम् ॥
इस परमहंस धर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले आत्म-ज्ञानसे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं है । यह परमहंस-ज्ञान किसीसे निष्कृष्ट नहीं है । परमहंस-ज्ञानके सम्मुख परमात्मा तिरोहित नहीं है । यह दुःख-सुखसे रहित सौम्य अजर-अमर और अविनाशी पद है ।
महेश्वर ने उमा से कहा।
श्रीभगवान् उवाच
सर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु ज्ञेयोऽऽत्मा संयतेन्द्रियैः ।
कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ॥
सभी आर्षधर्मोंमें इन्द्रियसंयमपूर्वक आत्मज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है । फिर काम और क्रोधको भी जीतना चाहिये । ऐसा मेरा मत है ।
श्रीमहेश्वर उवाच
यस्तु बुद्धः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवान् शुचिः ।
धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलमश्नुते ॥
जो पुरुष अपने वर्णधर्मका पालन करते हुए बोध प्राप्त करता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, पवित्र तथा धर्मज्ञ होकर धर्ममें ही लगा रहता है, वही धर्मके वास्तविक फलका उपभोग करता है ।
महेश्वर ने उमा से कहा।
श्रीमहेश्वर उवाच
ब्राह्मः स्वभावः सुश्रोणि समः सर्वत्र मे मतिः ।
निर्गुणं निर्मलं ब्रह्म यत्र तिष्ठति स द्विजः ॥
सुश्रोणि! ब्रह्मका स्वभाव सर्वत्र समान है । जिसके भीतर उस निर्गुण और निर्मल ब्रह्मका ज्ञान है, वही वास्तवमें ब्राह्मण है, ऐसा मेरा विचार है ।
श्रीमहेश्वर उवाच
नाधर्मेण न धर्मेण बध्यन्ते छिन्नसंशयाः ।
प्रलयोत्पत्तितत्त्वज्ञाः सर्वज्ञाः सर्वदर्शिनः ॥
जिनके सब प्रकारके संदेह दूर हो गये हैं, जो प्रलय और उत्पत्तिके तत्त्वको जाननेवाले, सर्वज्ञ और सर्वद्रष्टा हैं, वे महात्मा न तो धर्मसे बँधते हैं और न अधर्मसे ।
महेश्वर ने उमा से कहा।
भीष्म उवाच
विमुक्ता धूतपाप्मानो निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।
मानार्हा मानिता नित्यं ज्ञानविद्भिर्महात्मभिः ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मण सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त और निष्पाप हैं । उनके चित्तपर द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता । वे सब प्रकारके परिग्रहका त्याग करनेवाले और सम्मान पानेके योग्य हैं । ज्ञानी महात्मा उन्हें सदा ही आदर देते हैं ।
अर्जुन उवाच
कुर्यां भूतानि तुष्टोऽहं क्रुद्धो नाशं तथानये ।
कर्मणा मनसा वाचा न मत्तोऽस्ति वरो द्विजः ॥
कार्तवीर्य अर्जुनने कहा — मैं प्रसन्न होनेपर प्राणियोंकी सृष्टि कर सकता हूँ और कुपित होनेपर उनका नाश कर सकता हूँ। मन, वाणी और क्रियाद्वारा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है ।
भीष्म उवाच
स एव पार्थाय श्वेतमश्वं प्रायच्छत् ।
स एवाश्वानथ सर्वांश्चकार ।
स बन्धुरस्तस्य रथस्त्रिचक्रस्त्रिवृच्छिराश्चतुरश्वस्त्रिनाभिः ॥
इन्होंने ही अर्जुनको श्वेत अश्व प्रदान किया था । इन्होंने ही समस्त अश्वोंकी सृष्टि की थी । ये ही संसाररूपी रथको बाँधनेवाले बन्धन हैं । सत्त्व, रज और तम — ये तीन गुण ही इस रथके चक्र हैं। ऊर्ध्व, मध्य और अधः — जिसकी गति है। काल, अदृष्ट, इच्छा और संकल्प — ये चार जिसके घोड़े हैं । सफेद, काला और लाल रंगका त्रिविध कर्म ही जिसकी नाभि है । वह संसार-रथ इन श्रीकृष्णके ही अधिकारमें है ।
भीष्म उवाच
हेतूनामन्तमासाद्य विपुलं ज्ञानमुत्तमम् ।
ज्योतिः सर्वस्य लोकस्य विपुलं प्रतिपद्यते ॥
न त्वेव गमनं राजन् हेतुतो गमनं तथा ।
अग्राह्यमनिबद्धं च वाचा सम्परिवर्जयेत् ॥
जब सारे तर्क समाप्त हो जाते हैं तभी उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होती है । वह ज्ञान ही सम्पूर्ण जगत्के लिये उत्तम ज्योति है । राजन्! कोरे तर्कसे जो ज्ञान होता है, वह वास्तवमें ज्ञान नहीं है; अतः उसको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये । जिसका वेदके द्वारा प्रतिपादन नहीं किया गया हो, उस ज्ञानका परित्याग कर देना ही उचित है ।
भीष्म जी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
ज्ञानपूर्वकृतं कर्म च्छादयन्ते ह्यसाधवः ।
ज्ञानपूर्वं विनश्यन्ति गूहमाना महाजने ॥
दुष्ट मनुष्य जान-बूझकर किये हुए पापकर्मोंको भी दूसरेसे छिपानेका प्रयत्न करते हैं; किंतु महापुरुषोंके सामने अपने किये हुए पापोंको गुप्त रखनेके कारण वे नष्ट हो जाते हैं ।
भीष्म उवाच
तदा त्वस्य भवेद् बुद्धिर्धर्मार्थस्य प्रदर्शनात् ।
तदाश्वसीत धर्मात्मा दृढबुद्धिर्न विश्वसेत् ॥
जब धर्मका फल देखकर मनुष्यकी बुद्धिमें धर्मकी श्रेष्ठताका निश्चय हो जाता है, तभी उसका धर्मके प्रति विश्वास बढ़ता है और तभी उसका मन धर्ममें लगता है । जबतक धर्ममें बुद्धि दृढ़ नहीं होती तबतक कोई उसपर विश्वास नहीं करता ।
भीष्म उवाच
न ह्यधर्मतयाधर्मं दद्यात् कालः कथंचन ।
तस्माद् विशुद्धमात्मानं जानीयाद् धर्मचारिणम् ॥
काल किसी तरह धर्मको अधर्म नहीं बना सकता अर्थात् धर्म करनेवालेको दुःख नहीं दे सकता । इसलिये धर्माचरण करनेवाले पुरुषको विशुद्ध आत्मा ही समझना चाहिये ।
भीष्म → तात
अध्रुवो हि कथं लोकः स्मृतो धर्मः कथं ध्रुवः ।
यत्र कालो ध्रुवस्तात तत्र धर्मः सनातनः ॥
तात! यदि कहो, धर्म तो नित्य माना गया है, फिर उससे स्वर्ग आदि अनित्य लोकोंकी प्राप्ति कैसे होती है? और यदि होती है तो वह नित्य कैसे है? तो इसका उत्तर यह है कि जब धर्मका संकल्प नित्य होता है अर्थात् अनित्य कामनाओंका त्याग करके निष्कामभावसे धर्मका अनुष्ठान किया जाता है, उस समय किये हुए धर्मसे सनातन लोक (नित्य परमात्मा)-की ही प्राप्ति होती है ।
स कथं सर्वधर्मज्ञः सर्वागमविशारदः ।
परिमुह्यसि भूयस्त्वमज्ञानादिव भारत ॥
‘भारत! इस प्रकार सब धर्मोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् होकर भी तुम अज्ञानवश बारंबार मोहमें क्यों पड़ते हो?’
सिद्ध उवाच
ततः सचेतनो जन्तुर्नाभिजानाति किंचन ।
तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वेव मर्मसु ।
स जीवो निरधिष्ठानश्चाल्यते मातरिश्वना ॥
तब अन्तकाल उपस्थित होनेपर प्राणी सचेतन होनेपर भी कुछ समझ नहीं पाता; क्योंकि तम (अविद्या)-के द्वारा उसकी ज्ञानशक्ति आवृत्त हो जाती है । मर्मस्थान भी अवरुद्ध हो जाते हैं । उस समय जीवके लिये कोई आधार नहीं रह जाता और वायु उसे अपने स्थानसे विचलित कर देती है ।
सिद्ध उवाच
ब्राह्मणा ज्ञानसम्पन्ना यथावच्छ्रुतनिश्चयाः ।
इतरं कृतपुण्यं वा तं विजानन्ति लक्षणैः ॥
जिन्होंने वेद-शास्त्रोंके सिद्धान्तोंका यथावत् अध्ययन किया है, वे ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मण लक्षणोंके द्वारा यह जान लेते हैं कि अमुक जीव पुण्यात्मा रहा है और अमुक जीव पापी ।
सिद्ध उवाच
नच्छ्रुत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं बुध्येथाः कर्मनिश्चयम् ।
तारारूपाणि सर्वाणि यत्रैतच्चन्द्रमण्डलम् ॥
यत्र विभ्राजते लोके स्वभासा सूर्यमण्डलम् ।
स्थानान्येतानि जानीहि जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥
इसको सुननेसे तुम्हें कर्मोंकी गतिका निश्चय हो जायगा और नैष्ठिकी बुद्धि प्राप्त होगी । जहाँ ये समस्त तारे हैं, जहाँ वह चन्द्रमण्डल प्रकाशित होता है और जहाँ सूर्यमण्डल जगत्में अपनी प्रभासे उद्भासित हो रहा है, ये सब-के-सब पुण्यकर्मा पुरुषोंके स्थान हैं, ऐसा जानो [पुण्यात्मा मुनष्य उन्हीं लोकोंमें जाकर अपने पुण्योंका फल भोगते हैं] ।
ब्राह्मण उवाच
ततस्तु क्षीयते चैव पुनश्चान्यत् प्रचीयते ।
यावत् तन्मोक्षयोगस्थं धर्मं नैवावबुध्यते ॥
उपभोगसे प्राचीन कर्मका तो क्षय होता है और फिर दूसरे नये-नये कर्मोंका संचय बढ़ जाता है । जबतक मोक्षकी प्राप्तिमें सहायक धर्मका उसे ज्ञान नहीं होता, तबतक यह कर्मोंकी परम्परा नहीं टूटती है ।
ब्राह्मण उवाच
सुखदुःखे यथा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति ।
कायं चामेध्यसंघातं विनाशं कर्मसंहितम् ॥
यच्च किंचित्सुखं तच्च दुःखं सर्वमिति स्मरन् ।
संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम् ॥
जो मनुष्य सुख और दुःख दोनोंको अनित्य समझता है, शरीरको अपवित्र वस्तुओंका समूह समझता है और मृत्युको कर्मका फल समझता है तथा सुखके रूपमें प्रतीत होनेवाला जोकुछ भी है वह सब दुःख ही दुःख है, ऐसा मानता है, वह घोर एवं दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायगा ।
सिद्ध ब्राह्मण ने काश्यप से कहा।
ब्राह्मण उवाच
जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात् सम्प्रपश्यति ।
स तमुत्सृज्य देहे स्वं धारयन् ब्रह्म केवलम् ॥
आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव ।
तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्षं याति ततो मयि ॥
तत्त्वज्ञ जीव अपने-आपको शरीरसे पृथक् देखता है । वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करे — उसकी पृथक्ताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है । उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था । जो इस प्रकार परमात्माका दर्शन करता है, वह उसीका आश्रय लेकर अन्तमें मुझमें ही मुक्त हो जाता है (अर्थात् अपने-आपमें ही परमात्माका अनुभव करने लगता है)
वासुदेव उवाच
नैतत् पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणेति मे मतिः ।
नरेणाकृतसंज्ञेन विशुद्धेनान्तरात्मना ॥
कुन्तीनन्दन! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जिसका चित्त व्यग्र है, जिसे ज्ञानका उपदेश नहीं प्राप्त है, वह मनुष्य इस विषयको सुगमतापूर्वक नहीं समझ सकता । जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, वही इसे जान सकता है ।
वासुदेव उवाच
मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिताः ।
नैष्कर्म्यं न च लोकेऽस्मिन् मुहूर्तमपि लभ्यते ॥
किंतु जिन्हें ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्मके द्वारा मोहका ही संग्रह करते हैं । इस लोकमें कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किये रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है ।
ब्राह्मण उवाच
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं मन एव च ।
न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति ॥
इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन — वे किसी बातका निश्चय नहीं कर सकते । निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है ।
ब्राह्मण उवाच
मनसा गम्यते यच्च यच्च वाचा निगद्यते ।
श्रोत्रेण श्रूयते यच्च चक्षुषा यच्च दृश्यते ।
स्पर्शेन स्पृश्यते यच्च घ्राणेन घ्रायते च यत् ।
मनःषष्ठानि संयम्य हवींष्येतानि सर्वशः ।
गुणवत्पावको मह्यं दीव्यतेऽन्तःशरीरगः ॥
जो मनसे अवगत होता है, वाणीद्वारा जिसका कथन होता है, जिसे कानसे सुना और आँखसे देखा जाता है, जिसको त्वचासे छूआ और नासिकासे सूँघा जाता है । इन मन्तव्य आदि छहों विषयरूपी हविष्योंका मन आदि छहों इन्द्रियोंके संयमपूर्वक अपने-आपमें होम करना चाहिये । उस होमके अधिष्ठानभूत गुणवान् पावकरूप परमात्मा मेरे तन-मनके भीतर प्रकाशित हो रहे हैं ।
ब्राह्मण उवाच
अपेतव्रतकर्मा तु केवलं ब्रह्मणि स्थितः ।
ब्रह्मभूतश्चरल्लोंके ब्रह्मचारी भवत्ययम् ॥
जो व्रत और कर्मोंका त्याग करके केवल ब्रह्ममें स्थित है, वह ब्रह्मस्वरूप होकर संसारमें विचरता रहता है, वही मुख्य ब्रह्मचारी है ।
ब्राह्मण उवाच
ब्रह्मैव समिधस्तस्य ब्रह्माग्निर्ब्रह्मसम्भवः ।
आप ब्रह्म गुरुर्ब्रह्म स ब्रह्मणि समाहितः ॥
ब्रह्म ही उसकी समिधा है, ब्रह्म ही अग्नि है, ब्रह्मसे ही वह उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म ही उसका जल और ब्रह्म ही गुरु है । उसकी चित्तवृत्तियाँ सदा ब्रह्ममें ही लीन रहती हैं ।
ब्राह्मण उवाच
एतदेवेदृशं सूक्ष्मं ब्रह्मचर्यं विदुर्बुधाः ।
विदित्वा चान्वपद्यन्त क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिताः ॥
विद्वानोंने इसीको सूक्ष्म ब्रह्मचर्य बतलाया है । तत्त्वदर्शीका उपदेश पाकर प्रबुद्ध हुए आत्मज्ञानी पुरुष इस ब्रह्मचर्यके स्वरूपको जानकर सदा उसका पालन करते रहते हैं ।
ब्राह्मण उवाच
शममप्यत्र शंसन्ति विद्यारण्यविदो जनाः ।
तदारण्यमभिप्रेत्य यथाधीरभिजायत ॥
विद्या (ज्ञान)-के ही प्रभावसे ब्रह्मरूपी वनका स्वरूप समझमें आता है । इस बातको जाननेवाले मनुष्य इस वनमें प्रवेश करनेके उद्देश्यसे शम (मनोनिग्रह)-की ही प्रशंसा करते हैं, जिससे बुद्धि स्थिर होती है ।
ब्राह्मण उवाच
तेभ्यश्चान्यांस्तेषु नित्यांश्च भावान् ।
भूतात्मानं लक्षयेरन् शरीरे ।
तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्तः ।
कथंचित् ।
कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च ॥
इन बाह्य इन्द्रियों और विषयोंसे भिन्न जो स्वप्न और सुषुप्तिके वासनामय विषय एवं इन्द्रियाँ हैं तथा उनमें भी जो नित्यभाव हैं, उनसे भी विलक्षण जो भूतात्मा है, उसको शरीरके भीतर योगीजन देख पाते हैं । उसी भूतात्मामें स्थित हुआ मैं कहीं किसी तरह भी काम, क्रोध, जरा और मृत्युसे ग्रस्त नहीं होता ।
अलर्क उवाच
यदिदं चापलात् कर्म सर्वान् मर्त्यांश्चिकीर्षति ।
मनः प्रति सुतीक्ष्णाग्रानहं मोक्ष्यामि सायकान् ॥
यह मन चंचलताके कारण सभी मनुष्योंसे तरह-तरहके कर्म कराता है, अतः अब मैं मनपर ही तीखे बाणोंका प्रहार करूँगा ।
ब्राह्मण → देवि
त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः ।
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ॥
तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः ।
श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥
ब्राह्मणने कहा — देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम—- ये तीन मेरे शत्रु हैं । ये-वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं । हर्ष, प्रीति और आनन्द — ये तीन सात्त्विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव-से तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह — ये तीन तामस गुण हैं ।
ब्राह्मण ने देवि से कहा।
ब्राह्मण उवाच
इदं कार्यमिदं नेति न मोक्षेषूपदिश्यते ।
पश्यतः शृण्वतो बुद्धिरात्मनो येषु जायते ॥
यह कर्तव्य है, यह कर्तव्य नहीं है — यह बात मोक्षके साधनोंमें नहीं कही जाती । जिन साधनोंमें देखने और सुननेवालेकी बुद्धि आत्माके स्वरूपमें निश्चित होती है, वही यथार्थ साधन है ।
गुरु उवाच
ज्ञानं त्वेव परं विद्मः संन्यासं तप उत्तमम् ।
यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानतत्त्वं विनिश्चयात् ।
सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥
हम ज्ञानको ही परब्रह्म और संन्यासको उत्तम तप जानते हैं । जो अबाधित ज्ञानतत्त्वको निश्चयपूर्वक जानकर अपनेको सब प्राणियोंके भीतर स्थित देखता है, वह सर्वगति (सर्वव्यापक) माना जाता है ।
गुरु उवाच
प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतविधानवित् ।
निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः ॥
जो माया और सत्त्वादि गुणोंके तत्त्वको जानता है, जिसे सब भूतोंके विधानका ज्ञान है और जो ममता तथा अहंकारसे रहित हो गया है, वह मुक्त हो जाता है — इसमें संदेह नहीं है ।
ब्रह्मा उवाच
सत्याद् भूतानि जातानि स्थावराणि चराणि च ।
तपसा तानि जीवन्ति इति तद् वित्त सुव्रताः ।
स्वां योनिं समतिक्रम्य वर्तन्ते स्वेन कर्मणा ॥
ब्रह्माजीने कहा — उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षियो! ऐसा जानो कि चराचर जीव सत्यस्वरूप परमात्मासे उत्पन्न हुए हैं और तपरूप कर्मसे जीवन धारण करते हैं । वे अपने कारणस्वरूप ब्रह्मको भूलकर अपने कर्मोंके अनुसार आवागमनके चक्रमें घूमते हैं ।
ब्रह्मा उवाच
ज्योतिराकाशमादित्यो वायुरिन्द्रः प्रजापतिः ।
नोपैति यावदध्यात्मं तावदेतान् न पश्यति ॥
जबतक अध्यात्मज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक मनुष्य इन ज्योति, आकाश, वायु, सूर्य, इन्द्र और प्रजापति आदिके यथार्थ तत्त्वको नहीं जानता (आत्मज्ञान होनेपर इनका यथार्थ ज्ञान हो जाता है)
ब्रह्मा उवाच
महानात्मा तथाव्यक्तमहंकारस्तथैव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च महाभूतानि पञ्च च ॥
विशेषाः पञ्चभूतानामिति सर्गः सनातनः ।
चतुर्विंशतिरेका च तत्त्वसंख्या प्रकीर्तिता ॥
अव्यक्त प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, दस इन्द्रियाँ, एक मन, पञ्च महाभूत और उनके शब्द आदि विशेष गुण — यह चौबीस तत्त्वोंका सनातन सर्ग है । तथा एक जीवात्मा — इस प्रकार तत्त्वोंकी संख्या पचीस बतलायी गयी है ।
ब्रह्मा उवाच
कोन्वेतद् बुध्यते साधु कोन्वेतत् साधु पश्यति ।
अतत्त्वे तत्त्वदर्शी यस्तमसस्तत्त्वलक्षणम् ॥
जो अतत्त्वमें तत्त्व-दृष्टि रखनेवाला है, ऐसा कौन-सा मनुष्य इस विषयको अच्छी तरह देख और समझ सकता है? यह विपरीत दृष्टि ही तमोगुणकी यथार्थ पहचान है ।
ब्रह्मा उवाच
मुधा दानं मुधा यज्ञो मुधाऽधीतं मुधा व्रतम् ।
मुधा प्रतिग्रहश्चैव मुधा धर्मो मुधा तपः ॥
एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोकेऽस्मिन् सत्त्वसंश्रयाः ।
ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्थास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥
सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप — ये सब व्यर्थ हैं — ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत् में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं ।
ब्रह्मा उवाच
अव्यक्तनामानि गुणांश्च तत्त्वतो ।
यो वेद सर्वाणि गतीश्च केवलाः ।
विमुक्तदेहः प्रविभागतत्त्ववित् ।
समुच्यते सर्वगुणैर्निरामयः ॥
जो मनुष्य प्रकृतिके इन नामों, सत्त्वादि गुणों और सम्पूर्ण विशुद्ध गतियोंको ठीक-ठीक जानता है, वह गुण-विभागके तत्त्वका ज्ञाता है । उसके ऊपर सांसारिक दुःखोंका प्रभाव नहीं पड़ता । वह देह-त्यागके पश्चात् सम्पूर्ण गुणोंके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ।
ब्रह्मा उवाच
तत्र बुद्धिविदो लोकाः सद्भावनिरताश्च ये ।
ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसंधा जितेन्द्रियाः ॥
ज्ञानवन्तश्च ये केचिदलुब्धा जितमन्यवः ।
प्रसन्नमनसो धीरा निर्ममा निरहंकृताः ॥
विमुक्ताः सर्व एवैते महत्त्वमुपयान्त्युत ।
आत्मनो महतो वेद यः पुण्यां गतिमुत्तमाम् ॥
संसारमें जो कोई भी मनुष्य बुद्धिमान्, सद्भाव-परायण, ध्यानी, नित्य योगी, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, ज्ञानवान् लोभहीन, क्रोधको जीतनेवाले, प्रसन्नचित्त, धीर तथा ममता और अहंकारसे रहित हैं, वे सब मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं । जो सर्वश्रेष्ठ परमात्माकी महिमाको जानता है, उसे पुण्यदायक उत्तम गति मिलती है ।
ब्रह्मा उवाच
त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसना वाक् च संयताः ।
विशुद्धं च मनो यस्य बुद्धिश्चाव्यभिचारिणी ॥
अष्टौ यस्याग्नयो ह्येते न दहने मनः सदा ।
स तद् ब्रह्म शुभं याति तस्माद् भूयो न विद्यते ॥
जिसकी त्वचा, नासिका, कान, आँख, रसना और वाक् — ये इन्द्रियाँ वशमें हों, मन शुद्ध हो और बुद्धि एक निश्चयपर स्थिर रहनेवाली हो तथा जिसके मनको उपर्युक्त इन्द्रियादिरूप आठ अग्नियाँ संतप्त न करती हों, वह पुरुष उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त होता है, जिससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ।
ब्रह्मा उवाच
कामानात्मनि संयम्य क्षीणतृष्णः समाहितः ।
सर्वभूतसुहृन्मित्रो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
जो कामनाओंको अपने भीतर लीन करके तृष्णासे रहित, एकाग्रचित तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् और मित्र होता है, वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है ।
ब्रह्मा उवाच
अलिङ्गग्रहणो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ।
तस्मादलिङ्गः क्षेत्रज्ञः केवलं ज्ञानलक्षणः ॥
नित्य क्षेत्रज्ञ आत्माका कोई ज्ञापक लिंग नहीं है; क्योंकि वह (स्वयंप्रकाश और) निर्गुण है । अतः क्षेत्रज्ञ अलिंग (किसी विशेष लक्षणसे रहित) है; अतः केवल ज्ञान ही उसका लक्षण (स्वरूप) माना गया है ।
ब्रह्मा उवाच
इष्टं दत्तं तपोऽधीतं व्रतानि नियमाश्च ये ।
सर्वमेतद् विनाशान्तं ज्ञानस्यान्तो न विद्यते ॥
जितने भी यज्ञ, दान, तप, अध्ययन, व्रत और नियम हैं, उन सबका अन्तमें विनाश होता है, केवल ज्ञानका अन्त नहीं होता ।
ब्रह्मा उवाच
इन्द्रियाण्युपसंहृत्य कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
क्षीणेन्द्रियमनोबुद्धिर्निरीहः सर्वतत्त्ववित् ॥
जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकर इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटा ले । इन्द्रिय, मन और बुद्धिको दुर्बल करके निश्चेष्ट हो जाय । सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करे ।
ब्रह्मा उवाच
निराशीर्निर्गुणः शान्तो निरासक्तो निराश्रयः ।
आत्मसङ्गी च तत्त्वज्ञो मुच्यते नात्र संशयः ॥
जो निष्काम, निर्गुण, शान्त, अनासक्त, निराश्रय, आत्मपरायण और तत्त्वका ज्ञाता होता है, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।
ब्रह्मा उवाच
न तत्र क्रमते बुद्धिर्नेन्द्रियाणि न देवताः ।
वेदा यज्ञाश्च लोकाश्च न तपो न व्रतानि च ॥
यत्र ज्ञानवतां प्राप्तिरलिङ्गग्रहणा स्मृता ।
तस्मादलिङ्गधर्मज्ञो धर्मतत्त्वमुपाचरेत् ॥
उस आत्मतत्त्वतक बुद्धि, इन्द्रिय और देवताओंकी भी पहुँच नहीं होती । जहाँ केवल ज्ञानवान् महात्माओंकी ही गति है, वहाँ वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रतका भी प्रवेश नहीं होता; क्योंकि वह बाह्य चिह्नसे रहित मानी गयी है । इसलिये बाह्य चिह्नोंसे रहित धर्मको जानकर उसका यथार्थरूपसे पालन करना चाहिये ।
ब्रह्मा उवाच
तपः प्रदीप इत्याहुराचारो धर्मसाधकः ।
ज्ञानं वै परमं विद्यात् संन्यासं तप उत्तमम् ॥
ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि तपस्या (परमात्म-तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला) दीपक है, आचार धर्मका साधक है, ज्ञान परब्रह्मका स्वरूप है और संन्यास ही उत्तम तप है ।
ब्रह्मा उवाच
यस्तु वेद निराधारं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चयात् ।
सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥
जो तत्त्वका पूर्ण निश्चय करके ज्ञानस्वरूप, निराधार और सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर रहनेवाले आत्माको जान लेता है, वह सर्वव्यापक हो जाता है ।
ब्रह्मा उवाच
उच्छ्वासमात्रमपि चेद् योऽन्तकाले समो भवेत् ।
आत्मानमुपसङ्गम्य सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
जो मनुष्य अन्तकालमें आत्माका ध्यान करके, साँस लेनेमें जितनी देर लगती है, उतनी देर भी, समभावमें स्थित होता है, वह अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है ।
ब्रह्मा उवाच
आयोज्य सर्वसंस्कारान् संयम्यात्मानमात्मनि ।
स तद् ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद् भूयो न विद्यते ॥
जो चित्तको शुद्ध करनेवाले सम्पूर्ण संस्कारोंका सम्पादन करके मनको आत्माके ध्यानमें लगा देता है, वही उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त करता है, जिससे बड़ा कोई नहीं है ।
त्वं हि यज्ञोऽक्षरः सर्वस्त्वं धर्मस्त्वं प्रजापतिः ।
त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥
‘आप ही यज्ञ, अक्षर, सर्वस्वरूप, धर्म, प्रजापति एवं सम्पूर्ण भूतोंकी गति हैं — यह मेरी निश्चित धारणा है’
श्वशुर उवाच
क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्मबुद्धिं व्यपोहति ।
क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह ।
बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्गं जयते ध्रुवम् ॥
भूख मनुष्यकी बुद्धिको चौपट कर देती है । धार्मिक विचारको मिटा देती है । क्षुधासे ज्ञान लुप्त हो जानेके कारण मनुष्य धीरज खो देता है । जो भूखको जीत लेता है, वह निश्चय ही स्वर्गपर विजय पाता है ।
वैशम्पायन उवाच
स राजा राजधर्मांश्च ब्रह्मोपनिषदं तथा ।
अवाप्तवान्नरश्रेष्ठो बुद्धिनिश्चयमेव च ॥
विदुरश्च महाप्राज्ञो ययौ सिद्धिं तपोबलात् ।
धृतराष्ट्रः समासाद्य व्यासं चैव तपस्विनम् ॥
उन नरश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने राजधर्म, ब्रह्मविद्या तथा बुद्धिका यथार्थ निश्चय भी पा लिया था । महाज्ञानी विदुरने तो अपने तपोबलसे सिद्धि प्राप्त की थी; परंतु धृतराष्ट्रने तपस्वी व्यासका आश्रय लेकर सिद्धिलाभ किया था ।
वैशम्पायन उवाच
योगयुक्ता महात्मानस्त्यागधर्ममुपेयुषः ।
अभिजग्मुर्बहून् देशान् सरितः सागरांस्तथा ॥
वे सब-के-सब योगयुक्त महात्मा तथा त्याग-धर्मका पालन करनेवाले थे । उन्होंने अनेक देशों, नदियों और समुद्रोंकी यात्रा की ।
न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् ।
धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये ।
जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥
‘कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे । धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य । इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य’