श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

81 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

अर्जुन उवाच

अर्थाद् धर्मश्च कामश्च स्वर्गश्चैव नराधिप ।

प्राणयात्रापि लोकस्य विना ह्यर्थं न सिध्यति ॥

नरेश्वर! धनसे ही धर्म, काम और स्वर्गकी सिद्धि होती है । लोगोंके जीवनका निर्वाह भी बिना धनके नहीं होता ।

शान्तिपर्व, अध्याय 8, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 70 नीति–व्यवहार

युधिष्ठिर उवाच

कृत्वा हि विविधं कर्म तत्तद् विविधलक्षणम् ।

पार्थिवैर्नृपतिः स्वल्पैः कारणैरेव बध्यते ॥

भाँति-भाँतिके भिन्न-भिन्न कर्म करके विख्यात हुआ राजा भी किन्हीं छोटे-मोटे कारणोंसे ही दूसरे राजाओंद्वारा मार डाला जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 9, श्लोक 35 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 78
कर्म की अनिवार्यता

भीम उवाच

अथ चेदात्मभाग्येषु नान्येषां सिद्धिमश्नुते ।

तस्मात् कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मणः ॥

यदि अपने भाग्यमें दूसरोंके कर्मोंसे प्राप्त हुई सिद्धि नहीं आती, तब तो सभीको कर्म ही करना चाहिये । अकर्मण्य पुरुषको कभी कोई सिद्धि नहीं मिलती ।

शान्तिपर्व, अध्याय 10, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 83

भीम उवाच

अवेक्षस्व यथा स्वैः स्वैः कर्मभिर्व्यापृतं जगत् ।

तस्मात् कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मणः ॥

देखिये और विचार कीजिये कि सारा संसार किस तरह अपने कर्मोंमें लगा हुआ है; अतः आपको भी क्षत्रियोचित कर्तव्यका ही पालन करना चाहिये । जो कर्मोंको छोड़ बैठता है, उसे कभी सिद्धि नहीं मिलती ।

शान्तिपर्व, अध्याय 10, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 83

नकुल उवाच

अभिमानकृतं कर्म नैतत् फलवदुच्यते ।

त्यागयुक्तं महाराज सर्वमेव महाफलम् ॥

महाराज! यही कर्म यदि अभिमानपूर्वक किया जाय तो वह सफल नहीं होता, और त्यागपूर्वक किया हुआ सारा कर्म ही महान् फलदायक होता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 12, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 93

यदासौ सर्वभूतानां न द्रुह्यति न काङ्क्षति ।

कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥

‘जब वह मन, वाणी और क्रियाद्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंमेंसे किसीके साथ न तो द्रोह करता है और न किसीकी अभिलाषा ही रखता है, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है’

शान्तिपर्व, अध्याय 21, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 140 धर्म–आचरण

व्यास उवाच

न बुद्धिशास्त्राध्ययनेन शक्यं ।

प्राप्तुं विशेषं मनुजैरकाले ।

मूर्खोऽपि चाप्नोति कदाचिदर्थान् ।

कालो हि कार्यं प्रति निर्विशेषः ॥

बुद्धि अथवा शास्त्राध्ययनसे भी मनुष्य असमयमें किसी विशेष वस्तुको नहीं पा सकता और समय आनेपर कभी-कभी मूर्ख भी अभीष्ट पदार्थोंको प्राप्त कर लेता है; अतः काल ही कार्यकी सिद्धिमें सामान्य कारण है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 25, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 162

व्यास उवाच

नाभूतिकालेषु फलं ददन्ति ।

शिल्पानि मन्त्राश्च तथौषधानि ।

तान्येव कालेन समाहितानि ।

सिद्ध्यन्ति वर्धन्ति च भूतिकाले ॥

अवनतिके समय शिल्पकलाएँ, मन्त्र तथा औषध भी कोई फल नहीं देते हैं । वे ही जब उन्नतिके समय उपयोगमें लाये जाते हैं, तब कालकी प्रेरणासे सफल होते और वृद्धिमें सहायक बनते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 25, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 162

अश्मा उवाच

सन्ति पुत्राः सुबहवो दरिद्राणामनिच्छताम् ।

नास्ति पुत्रः समृद्धानां विचित्रं विधिचेष्टितम् ॥

जो दरिद्र हैं और संतानकी इच्छा नहीं रखते हैं, उनके तो बहुत-से पुत्र हो जाते हैं और जो धनवान् हैं, उनमेंसे किसी-किसीको एक पुत्र भी नहीं प्राप्त होता । विधाताकी चेष्टा बड़ी विचित्र है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 28, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 181

व्यास उवाच

अथापि पुरुषः कर्ता कर्मणोः शुभपापयोः ।

न परो विद्यते तस्मादेवमेतच्छुभं कृतम् ॥

() यदि कहो पुण्य और पापकर्मोंका कर्ता उसे करनेवाला पुरुष ही है, दूसरा कोई (ईश्वर) नहीं तो ऐसा माननेपर भी तुमने यह शुभ कर्म ही किया है; क्योंकि तुम्हारे द्वारा पापियों और उनके समर्थकोंका ही वध हुआ है, इसके सिवा, उनके प्रारब्धका फल ही उन्हें इस रूपमें मिला है तुम तो निमित्तमात्र हो ।

शान्तिपर्व, अध्याय 32, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 225

व्यास उवाच

शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकम् ।

अतिरिच्येत यो यत्र तत्कर्ता लभते फलम् ॥

मनुष्य शुभ और अशुभ जो कर्म करता है, उसके पाँच महाभूत साक्षी होते हैं । उन शुभ और अशुभ कर्मोंका फल मृत्युके पश्चात् उसे प्राप्त होता है । उन दोनों प्रकारके कर्मोंमें जो अधिक होता है, उसीका फल कर्ताको प्राप्त होता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 35, श्लोक 40 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 245

व्यास उवाच

जानता तु कृतं पापं गुरु सर्वं भवत्युत ।

अज्ञानात् स्वल्पको दोषः प्रायश्चित्तं विधीयते ॥

जान-बूझकर किया हुआ सारा पाप भारी होता है और अनजानमें वैसा पाप बन जानेपर कम दोष लगता है । इस प्रकार भारी और हलके पापके अनुसार ही उसके प्रायश्चित्तका विधान है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 35, श्लोक 45 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 246

कामं नैतत् तवाख्येयं प्राणिनां प्रभवाप्ययौ ।

उपदेष्टुं भवान् शक्तो देवानामपि भारत ॥

‘भरतनन्दन! अवश्य ही आपके सामने यह कहना उचित न होगा कि’ सभी प्राणियोंके जन्म और मरण प्रारब्धके अनुसार नियत हैं। अतः आपको दैवका विधान समझकर अपने मनमें कोई दुःख नहीं मानना चाहिये । आपको कोई क्या उपदेश देगा? आप तो देवताओंको भी उपदेश देनेमें समर्थ हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 50, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 338

युधिष्ठिर उवाच

कालसंचोदितो लोकः कालपर्यायनिश्चितः ।

उत्तमाधममध्यानि कर्माणि कुरुतेऽवशः ॥

कालके उलट-फेरसे प्रभावित तथा स्वभावसे प्रेरित हुआ मनुष्य विवश-सा होकर उत्तम, मध्यम और अधम कर्म करता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 62, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 426 माया–संसार

इन्द्र उवाच

अन्यथा वर्तमानस्य नासौ वृत्तिः प्रकल्प्यते ।

कर्मणा वर्धते धर्मो यथाधर्मस्तथैव सः ॥

जो ब्राह्मण इसके विपरीत आचरण करता है, उसके लिये ब्राह्मणोचित वृत्तिकी व्यवस्था नहीं की जाती । कर्मसे ही धर्मकी वृद्धि होती है । जो जिस प्रकारके धर्मको अपनाता है, वह वैसा ही हो जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 65, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 443
राजा का अग्निस्वरूप

बृहस्पति उवाच

यदा ह्यासीदतः पापान् दहत्युग्रेण तेजसा ।

मिथ्योपचरितो राजा तदा भवति पावकः ॥

जब पापात्मा मनुष्य राजाके साथ मिथ्या बर्ताव करके उसे ठगते हैं, तब वह अग्निस्वरूप हो जाता है और अपने उग्र तेजसे समीप आये हुए उन पापियोंको जलाकर भस्म कर देता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 68, श्लोक 42 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 466 लीला–रहस्य

भीष्म उवाच

चातुर्वर्ण्ये स्वकर्मस्थे मर्यादानामसंकरे ।

दण्डनीतिकृते क्षेमे प्रजानामकुतोभये ॥

स्वाम्ये प्रयत्नं कुर्वन्ति त्रयो वर्णा यथाविधि ।

तस्मादेव मनुष्याणां सुखं विद्धि समाहितम् ॥

इस प्रकार दण्डनीतिके प्रभावसे जब चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मोंमें संलग्न रहते हैं, धर्ममर्यादामें संकीर्णता नहीं आने पाती और प्रजा सब ओरसे निर्भय एवं कुशलपूर्वक रहने लगती है, तब तीनों वर्णोंके लोग विधिपूर्वक स्वास्थ्य-रक्षाका प्रयत्न करते हैं । युधिष्ठिर! इसीमें मनुष्योंका सुख निहित है, यह तुम्हें ज्ञात होना चाहिये ।

शान्तिपर्व, अध्याय 69, श्लोक 77–78 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 483 धर्म–आचरण

भीष्म उवाच

दण्डनीतिं परित्यज्य यदा कार्त्स्न्येन भूमिपः ।

प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्तेत तदा कलिः ॥

जब राजा समूची दण्डनीतिका परित्याग करके अयोग्य उपायोंद्वारा प्रजाको कष्ट देने लगता है, तब कलियुगका आरम्भ हो जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 69, श्लोक 91 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 484 माया–संसार
कर्म का महत्व

भीष्म उवाच

अल्पं हि सारभूयिष्ठं यत् कर्मोदारमेव तत् ।

कृतमेवाकृताच्छ्रेयो न पापीयोऽस्त्यकर्मणः ॥

कोई काम देखनेमें छोटा होनेपर भी यदि उसमें सार अधिक हो तो वह महान् ही है । न करनेकी अपेक्षा कुछ करना ही अच्छा है; क्योंकि कर्तव्य-कर्म न करनेवालेसे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 75, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 518 नीति–व्यवहार
पाप का फल

उतथ्य उवाच

यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पौत्रेषु नप्तृषु ।

न हि पापं कृतं कर्म सद्यः फलति गौरिव ॥

यदि पापका फल अपनेको नहीं मिला तो वह पुत्रों तथा नाती-पोतोंको अवश्य मिलता है । जैसे पृथ्वीमें बोया हुआ बीज तुरंत फल नहीं देता, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी तत्काल फल नहीं देता (समय आनेपर ही उसका फल मिलता है)

शान्तिपर्व, अध्याय 91, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 617
प्रारब्ध की प्रधानता

मुनि उवाच

अनागतं यन्न ममेति विद्यादतिक्रान्तं यन्न ममेति विद्यात् ।

दिष्टं बलीय इति मन्यमाना ।

स्ते पण्डितास्तत्सतां स्थानमाहुः ॥

जो वस्तु भविष्यमें मिलनेवाली है, उसे यही माने कि ‘वह मेरी नहीं है’ तथा जो मिलकर नष्ट हो चुकी हो, उसके विषयमें भी यही भाव रखे कि ‘वह मेरी नहीं थी ।’ जो ऐसा मानते हैं कि ‘प्रारब्ध ही सबसे प्रबल है,’ वे ही विद्वान् हैं और उन्हें सत्पुरुषोंका आश्रय कहा गया है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 104, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 697 वैराग्य
धन वृद्धि के आठ साधन

भीष्म उवाच

धृतिर्दाक्ष्यं संयमो बुद्धिरात्मा ।

धैर्यं शौर्यं देशकालाप्रमादः ।

अल्पस्य वा बहुनो वा विवृद्धौ ।

धनस्यैतान्यष्ट समिन्धनानि ॥

धारणाशक्ति, चतुरता, संयम, बुद्धि, शरीर, धैर्य, शौर्य तथा देश-कालकी परिस्थितिसे असावधान न रहना — ये आठ गुण थोड़े या अधिक धनको बढ़ानेके मुख्य साधन हैं अर्थात् धनरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये ईंधन हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 120, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 790 नीति–व्यवहार

भीष्म उवाच

धनेन जयते लोकावुभौ परमिमं तथा ।

सत्यं च धर्मवचनं यथा नास्त्यधनस्तथा ॥

धनसे मनुष्य इहलोक और परलोक दोनोंपर विजय पाता है तथा सत्य और धर्मका भी सम्पादन कर लेता है, परंतु निर्धनको इस कार्यमें वैसी सफलता नहीं मिलती । उसका अस्तित्व नहीं के बराबर होता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 130, श्लोक 43 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 852

कायव्य उवाच

राष्ट्रोपरोधेन वृद्धिं कुर्वन्ति केचन ।

तदैव तेऽनुमार्यन्ते कुणपे कृमयो यथा ॥

जो लोग राष्ट्रको हानि पहुँचाकर अपनी उन्नतिके लिये प्रयत्न करते हैं, वे मुर्दोंमें पड़े हुए कीड़ोंके समान उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 135, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 870

पापं कर्म कृतं किंचिद् यदि तस्मिन् न दृश्यते ।

नृपते तस्य पुत्रेषु पौत्रेष्वपि च नप्तृषु ॥

‘राजन्! यदि यहाँ किये हुए पापकर्मका कोई फल कर्ताको मिलता न दिखायी दे तो यह समझना चाहिये कि उसके पुत्रों, पोतों और नातियोंको उसका फल भोगना पड़ेगा’

शान्तिपर्व, अध्याय 139, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 914

पूजनी उवाच

दैवं पुरुषकारश्च स्थितावन्योन्यसंश्रयात् ।

उदाराणां तु सत्कर्म दैवं क्लीबा उपासते ॥

दैव और पुरुषार्थ दोनों एक-दूसरेके सहारे रहते हैं, परंतु उदार विचारवाले पुरुष सर्वदा शुभ कर्म करते हैं और नपुंसक दैवके भरोसे पड़े रहते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 139, श्लोक 82 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 924

पूजनी उवाच

तस्मात् सर्वं व्यपोह्यार्थं कार्य एव पराक्रमः ।

सर्वस्वमपि संत्यज्य कार्यमात्महितं नरैः ॥

अतः काल, दैव और स्वभाव आदि सारे पदार्थोंका भरोसा छोड़कर पराक्रम ही करना चाहिये । मनुष्यको सर्वस्वकी बाजी लगाकर भी अपने हितका साधन ही करना चाहिये ।

शान्तिपर्व, अध्याय 139, श्लोक 84 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 924 नीति–व्यवहार

भीष्म उवाच

कर्मणा येन तेनैव मृदुना दारुणेन च ।

उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥

मनुष्य कोमल या कठोर, जिस किसी भी उपायसे सम्भव हो, दीनदशासे अपना उद्धार करे । इसके बाद शक्तिशाली हो पुनः धर्माचरण करे ।

शान्तिपर्व, अध्याय 140, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 934 धर्म–आचरण

शौनक उवाच

विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते ।

नैतत् कार्यं पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते ॥

यदि कोई शास्त्रविरुद्ध कर्म बन जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करनेवाला पुरुष पापसे मुक्ता हो जाता है । यदि दूसरी बार पाप बन जाय तो ‘अब फिर ऐसा काम नहीं करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करनेसे वह पापमुक्त हो सकता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 152, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 998

गृध्र उवाच

यत् करोति शुभं कर्म तथा कर्म सुदारुणम् ।

तत् कर्तेव समश्नाति बान्धवानां किमत्र ह ॥

प्राणी जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका फल भी करनेवाला ही भोगता है । इसमें भाई-बन्धुओंका क्या है?

शान्तिपर्व, अध्याय 153, श्लोक 41 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1007

ब्राह्मण उवाच

पूर्वदेहकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् ।

प्राज्ञं मूढं तथा शूरं भजते यादृशं कृतम् ॥

मनुष्य बुद्धिमान् हो, मूर्ख हो अथवा शूरवीर हो, उसने पूर्वजन्ममें जैसा शुभ या अशुभ कर्म किया है, उसका वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 174, श्लोक 47 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1133

भीष्म उवाच

नैवास्याग्निर्न चारिष्टो न मृत्युर्न च दस्यवः ।

प्रभवन्ति धनत्यागाद् विमुक्तस्य निराशिषः ॥

परंतु जो मनुष्य धनको त्यागकर उसकी आसक्तिसे मुक्त हो गया है और मनमें किसी तरहकी कामना नहीं रखता, उसपर न अग्निका जोर चलता है, न अरिष्टकारी ग्रहोंका, न मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ सकती है, न डाकू और लुटेरे ही ।

शान्तिपर्व, अध्याय 176, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1145 वैराग्य

भीष्म उवाच

न युष्मास्विह मे प्रीतिः कामलोभानुसारिषु ।

तस्मादुत्सृज्य कामान् वै सत्त्वमेवाश्रयाम्यहम् ॥

पंचभूतगण! अहंकार आदिके साथ तुम सब लोग काम और लोभके पीछे लगे रहनेवाले हो । अतः तुमपर यहाँ मेरा रत्तीभर भी स्नेह नहीं है । इसलिये मैं समस्त कामनाओंको छोड़कर केवल अब सत्त्वगुणका आश्रय ले रहा हूँ ।

शान्तिपर्व, अध्याय 177, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1152 वैराग्य

भीष्म उवाच

सुखमसुखमलाभमर्थलाभं ।

रतिमरतिं मरणं च जीवितं च ।

विधिनियतमवेक्ष्य तत्त्वतोऽहं ।

व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥

सुख-दुःख, लाभ-हानि, अनुकूल और प्रतिकूल तथा जीवन और मरण — ये सब दैवके अधीन हैं । इस प्रकार यथार्थरूपसे जानकर मैं शुद्धभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ ।

शान्तिपर्व, अध्याय 179, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1164

युधिष्ठिर उवाच

यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा तपस्तप्तं तथैव च ।

गुरूणां वापि शुश्रूषा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! यदि दान, यज्ञ, तप अथवा गुरुशुश्रूषा पुण्यकर्म है और उसका कुछ फल होता है तो वह मुझे बताइये ।

शान्तिपर्व, अध्याय 181, श्लोक 1 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1178
कर्मफल का व्यक्तिगत भोग

भीष्म उवाच

येन येन यथा यद् यत् पुरा कर्म समीहितम् ।

तत्तदेकतरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ॥

जिस-जिस मनुष्यने अपने-अपने पूर्वजन्मोंमें जैसे-जैसे कर्म किये हैं, वह अपने ही किये हुए उन कर्मोंका फल सदा अकेला ही भोगता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 181, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1179

भीष्म उवाच

स्वकर्मफलनिक्षेपं विधानपरिरक्षितम् ।

भूतग्राममिमं कालः समन्तात् परिकर्षति ॥

अपने-अपने कर्मका फल एक धरोहरके समान है, जो कर्मजनित अदृष्टके द्वारा सुरक्षित रहता है । उपयुक्त अवसर आनेपर यह काल इस कर्मफलको प्राणिसमुदायके पास खींच लाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 181, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1179

भीष्म उवाच

अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च ।

स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम् ॥

जैसे फूल और फल किसीकी प्रेरणाके बिना ही अपने समयपर वृक्षोंमें लग जाते हैं, उसी प्रकार पहलेके किये हुए कर्म भी अपने फलभोगके समयका उल्लंघन नहीं करते ।

शान्तिपर्व, अध्याय 181, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1179
धन सञ्चय की व्यर्थता

भीष्म उवाच

आशया संचितं द्रव्यं दुःखेनैवोपभुज्यते ।

तद् बुधा न प्रशंसन्ति मरणं न प्रतीक्षते ॥

किसी विशेष कामनाकी पूर्तिकी आशासे जो धन संचित करके रखा गया है, उसका उपभोग दुःखपूर्वक ही किया जाता है; अतः विद्वान् पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि मृत्यु किसीकी कामना-पूर्तिके अवसरकी प्रतीक्षा नहीं करती है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 193, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1237 वैराग्य

भीष्म उवाच

यः करोत्यनभिसंधिपूर्वकं ।

तच्च निर्णुदति यत्पुराकृतम् ।

नाप्रियं तदुभयं कुतः प्रियं ।

तस्य तज्जनयतीह सर्वतः ॥

जो निष्काम भावसे कर्म करता है, उसका वह कर्म पहलेके किये हुए समस्त कर्म-संस्कारोंका नाश कर देता है । पूर्वजन्म और इस जन्मके किये हुए वे दोनों प्रकारके कर्म उस पुरुषके लिये न तो अप्रिय फल उत्पन्न करते हैं और न तो प्रिय फलके ही जनक होते हैं (क्योंकि कर्तापनके अभिमान और फलकी आसक्तिसे शून्य होनेके कारण उनका उन कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं रह जाता)

शान्तिपर्व, अध्याय 194, श्लोक 61 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1247

विरूप उवाच

नायं धारयते किञ्चिज्जिज्ञासा त्वत्कृते कृता ।

कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् ॥

सर्वमन्योन्यनिष्कर्षे निघृष्टं पश्यतस्तव ।

गच्छ लोकान् जितान् स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ॥

यह मेरा साथी कुछ भी धारण नहीं करता अथवा मुझपर भी इसका कोई ऋण नहीं है । यह सब खेल तो हमलोगोंने आपकी परीक्षा लेनेके लिये किया था । काल, धर्म, मृत्यु, काम, - सब एक-दूसरेकी कसौटीपर - - -क्रोध और आप दोनों ये सब के-आपके देखते देखते कसेगये हैं । अब जहाँ आपकी इच्छा हो, अपने कर्मसे जीते हुए उन लोकोंमें जाइये ।

शान्तिपर्व, अध्याय 199, श्लोक 116–117 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1282 ज्ञान–विवेक

मनु उवाच

मत्स्यो यथा स्रोत इवाभिपाती ।

तथा कृतं पूर्वमुपैति कर्म ।

शुभे त्वसौ तुष्यति दुष्कृते तु ।

न तुष्यते वै परमः शरीरी ॥

जैसे मछली जलके बहावके साथ बह जाती है, उसी प्रकार मनुष्य पहिलेके किये हुए कर्मका अनुसरण करता है । उसे उस कर्मप्रवाहमें बहना पड़ता है; परंतु उस दशामें वह श्रेष्ठ देहधारी जीव शुभ फल मिलनेपर तो संतुष्ट होता है और अशुभ फल प्राप्त होनेपर दुखी हो जाता है (यह उसकी मूढता ही तो है)

शान्तिपर्व, अध्याय 201, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1299

मनु उवाच

ज्ञानपूर्वा भवेल्लिप्सा लिप्सापूर्वाभिसंधिता ।

अभिसंधिपूर्वकं कर्म कर्ममूलं ततः फलम् ॥

मनुष्यको पहले तो विषयका ज्ञान होता है; फिर उसके मनमें उसे पानेकी इच्छा उत्पन्न होती है । उसके बाद ‘इस कार्यको सिद्ध करूँ’ यह निश्चय और प्रयत्न आरम्भ होता है । फिर कर्म सम्पन्न होता और उसका फल मिलता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 206, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1320

मनु उवाच

सर्वैरयं चेन्द्रियैः सम्प्रयुक्तो ।

देहं प्राप्तः पञ्चभूताश्रयः स्यात् ।

नासामर्थ्याद् गच्छति कर्मणेह ।

हीनस्तेन परमेणाव्ययेन ॥

सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे संयुक्त होकर यह देहधारी जीव पंचभूतस्वरूप शरीरके आश्रित हो जाता है । ज्ञान और उपासना आदिकी शक्तिके बिना वह केवल कर्मोंद्वारा परमात्माको नहीं पाता । अतः वह उस अविनाशी परमेश्वरसे वंचित रह जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 206, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1324 भक्ति

भीष्म उवाच

अथवा मनसः सङ्गं पश्येद् भूतानुकम्पया ।

तत्राप्युपेक्षां कुर्वीत ज्ञात्वा कर्मफलं जगत् ॥

अथवा प्राणियोंपर दया करते रहने से भी मोहवश उनके प्रति मनमें आसक्ति हो जाती है । इस बातपर दृष्टिपात करे और यह समझकर कि सारा जगत् अपने-अपने कर्मोंका फल भोग रहा है, सबके प्रति उपेक्षाभाव रखे ।

शान्तिपर्व, अध्याय 215, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1385 वैराग्य

भीष्म उवाच

यत् कृतं स्याच्छुभं कर्म पापं वा यदि वाश्नुते ।

तस्माच्छुभानि कर्माणि कुर्याद् वा बुद्धिकर्मभिः ॥

मनुष्य शुभ या अशुभ जैसा भी कर्म करता है उसका फल उसे स्वयं ही भोगना पड़ता है; इसलिये मन, बुद्धि और क्रियाके द्वारा सदा शुभ कर्मोंका ही आचरण करे ।

शान्तिपर्व, अध्याय 215, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1385 धर्म–आचरण

भीष्म उवाच

परप्रत्ययसर्गे तु नियतिर्नानुवर्तते ।

भावान्तप्रभवप्रज्ञा आसते ये विपर्ययम् ॥

जिनको ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया है, उनका प्रारब्ध अनुसरण नहीं करता है अर्थात् वे प्रारब्धके बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। परंतु जो इसके विपरीत स्थितिमें हैं अर्थात् जिनका अज्ञान दूर नहीं हुआ है, वे प्रारब्धवश जन्म-मृत्यु के चक्करमें पड़े रहते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 217, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1397

भीष्म उवाच

यदर्थं धर्मसंसर्गः कर्मणां च फलोदयः ।

तमनाश्वासिकं मोहं विनाशि चलमध्रुवम् ॥

उन्होंने कहा — ‘जिसके लिये धर्मका आचरण किया जाता है, जो कर्मोंके फलका उदय होनेपर प्राप्त होता है, वह इहलोक या परलोकका भोग नश्वर है । उसपर आस्था करना उचित नहीं । वह मोहरूप, चंचल और अस्थिर है’

शान्तिपर्व, अध्याय 218, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1404 माया–संसार

बलि उवाच

न कर्म भविताप्येतत् कृतं मम शतक्रतो ।

ऋद्धिर्वाऽप्यथवा नर्द्धिः पर्यायकृतमेव तत् ॥

शतक्रतो! इस समय मैं इस परिस्थितिमें हूँ और जो कर्म मेरे इस शरीरसे हो रहा है, यह सब मेरा किया हुआ नहीं है । समृद्धि और निर्धनता (प्रारब्धके अनुसार) बारी-बारीसे सबपर आती है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 224, श्लोक 36 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1471
काल का प्रभाव

बलि उवाच

लाभालाभौ सुखं दुःखं कामक्रोधौ भवाभवौ ।

वधबन्धप्रमोक्षं च सर्वं कालेन लभ्यते ॥

पुरुषको लाभ-हानि, सुख-दुःख, काम-क्रोध, अभ्युदयपराभव, वध, कैद और कैदसे छुटकारा — यह सब काल (प्रारब्ध) से ही प्राप्त होते हैं ।

बलि ने इन्द्र से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 227, श्लोक 83 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1498 काल–मृत्यु

व्यास उवाच

अधर्मं धर्मकामो हि करोति ह्यविचक्षणः ।

धर्मं वाधर्मसंकाशं शोचन्निव करोति सः ।

धर्मं करोमीति करोत्यधर्ममधर्मकामश्च करोति धर्मम् ।

उभे बालः कर्मणी न प्रजानन् ।

स जायते म्रियते चापि देही ॥

जो मूढ़ है, वह धर्मकी इच्छा रखकर भी अधर्म करता है अथवा शोकमग्न-सा होकर अधर्मतुल्य धर्मका सम्पादन करता है । मूर्ख या अविवेकी मनुष्य न जाननेके कारण ‘मैं धर्म कर रहा हूँ’ ऐसा समझकर अधर्म करता है और अधर्मकी इच्छा रखकर धर्म करता है, इस प्रकार अज्ञानपूर्वक दोनों तरहके कर्म करनेवाला देहधारी मनुष्य बारंबार जन्म लेता और मरता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 235, श्लोक 31–32 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1557 ज्ञान–विवेक

व्यास उवाच

एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ।

ज्ञानवानेव कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति ॥

व्यासजी कहते हैं — बेटा! यह ब्राह्मणकी अत्यन्त प्राचीनकालसे चली आयी हुई वृत्ति है, जो शास्त्रविहित है । ज्ञानवान् मनुष्य ही सर्वत्र कर्म करता हुआ सिद्धि प्राप्त करता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 238, श्लोक 1 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1571 ज्ञान–विवेक

भीष्म उवाच

कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ ।

विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥

कर्मके फल हैं सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु कर्मद्वारा मनुष्य इन्हींको पाते हैं, परंतु ज्ञानके द्वारा उन्हें उस परमपदकी प्राप्ति होती है, जहाँ जानेसे सदाके लिये शोकसे मुक्त हो जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 241, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1588 ज्ञान–विवेक

तुलाधार उवाच

स एव सुभगो भूत्वा पुनर्भवति दुर्भगः ।

व्यापत्तिं कर्मणां दृष्ट्वा जुगुप्सन्ति जनाः सदा ॥

जो स्वर्गादिकी कामना करके धर्मकार्य करते हैं, वे ही स्वर्गादि फलोंको पाकर सौभाग्यवान् कहलाते हैं, फिर वे ही पुण्यक्षीण होनेके पश्चात् जब स्वर्गसे नीचे गिरते हैं, तब दुर्भाग्यसे दूषित माने जाते हैं, इस प्रकार कर्मोंका विनाश देखकर विज्ञ पुरुष सदा ही सकाम कर्मोंकी निन्दा करते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 262, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1689

तुलाधार उवाच

विगुणं च पुनः कर्म ज्याय इत्यनुशुश्रुम ।

सर्वभूतोपघातश्च फलभावे च संयमः ॥

हमने सुना है कि यदि कर्ममें किसी प्रकारकी त्रुटि हो जानेके कारण वह गुणहीन हो जाय तो भी यदि वह निष्कामभावसे किया जा रहा है तो श्रेष्ठ ही है अर्थात् वह कल्याणकारी ही होता है । निष्कामभावसे किये जानेवाले कर्ममें यदि कुत्ते आदि अपवित्र पशुओंके द्वारा स्पर्श हो जानेसे कोई बाधा भी आ जाय तथापि वह कर्म नष्ट नहीं होता, वह श्रेष्ठतम ही माना जाता है, अतः प्रत्येक कर्ममें फलकी भावना या कामनापर संयम — नियन्त्रण रखना आवश्यक है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 263, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1695

भीष्म → युधिष्ठिर

यथा शरीरं न ग्लायेन्नेयान्मृत्युवशं यथा ।

तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत् ॥

भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! कर्मोंमें इस प्रकार प्रवृत्त होना चाहिये, जिससे शरीरकी शक्ति सर्वथा क्षीण न हो जाय, जिससे वह मृत्युके अधीन न हो जाय; क्योंकि मनुष्य शरीरके समर्थ होनेपर ही धर्मका पालन कर सकता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 265, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1707 धर्म–आचरण

कपिल उवाच

शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः ।

कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति ॥

कपिलजीने कहा — कर्म स्थूल और सूक्ष्म शरीरकी शुद्धि करनेवाले हैं, किंतु ज्ञान परम गतिरूप है । जब कर्मोंद्वारा चित्तके रागादि दोष जल जाते हैं, तब मनुष्य रस-स्वरूप ज्ञानमें स्थित हो जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 270, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1753 ज्ञान–विवेक

मृते वा त्वयि जीवे वा यदा भोक्ष्यति वै जनः ।

स्वकृतं ननु बुद्ध्यैवं कर्तव्यं हितमात्मनः ॥

‘तुम जीवित रहो या मर जाओ । तुम्हारा प्रत्येक स्वजन जब अपनी-अपनी करनीका ही फल भोगेगा, तब इस बातको जानकर तुम्हें भी अपने कल्याणके लिये साधनमें लग जाना चाहिये’

शान्तिपर्व, अध्याय 288, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1904

पराशर उवाच

आयुर्न सुलभं लब्ध्वा नावकर्षेद् विशाम्पते ।

उत्कर्षार्थं प्रयतेत नरः पुण्येन कर्मणा ॥

प्रजानाथ! मनुष्य-शरीरकी आयु सुलभ नहीं है — वह दुर्लभ वस्तु है, उसे पाकर आत्माको नीचे नहीं गिराना चाहिये । मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्यकर्मके अनुष्ठानद्वारा आत्माके उत्थानके लिये सदा प्रयत्न करता रहे ।

शान्तिपर्व, अध्याय 291, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1919 धर्म–आचरण

पराशर उवाच

अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत् ।

पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वयं कृतम् ।

तस्मात् पापं न सेवेत कर्म दुःखफलोदयम् ॥

अनजानमें जो पाप बन जाय उसे तपस्याके द्वारा नष्ट कर दे; क्योंकि अपना किया हुआ पापकर्म पापरूप दुःखके रूपमें ही फलता है । अतः दुःखमय फल देनेवाले पापकर्मका कदापि सेवन न करे ।

शान्तिपर्व, अध्याय 291, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1919 नीति–व्यवहार

पराशर उवाच

पापानुबन्धं यत् कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् ।

तन्न सेवेत मेधावी शुचिः कुशलिनं यथा ॥

पापसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कर्म है उसका कितना ही बड़ा लौकिक सुखरूप फल क्यों न हो; बुद्धिमान् पुरुष उसका कदापि सेवन न करे । वह उससे उसी तरह दूर रहे जैसे पवित्र मनुष्य चाण्डालसे ।

शान्तिपर्व, अध्याय 291, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1920 नीति–व्यवहार
पुण्य कर्मों की वृद्धि

पराशर → राजन

सतोयेऽन्यत् तु यत् तोयं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते ।

वृद्धे वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा ॥

एवं कर्माणि यानीह बुद्धियुक्तानि पार्थिव ।

समानि चैव यानीह तानि पुण्यतमान्यपि ॥

राजन्! उसी जलयुक्त पक्के घड़ेमें यदि दूसरा जल डाला जाय तो पात्रमें रखा हुआ पहलेका जल और नया डाला हुआ जल — दोनों मिलकर बढ़ जाते हैं और इस प्रकार वह घड़ा अधिक जलसे सम्पन्न हो जाता है। उसी तरह यहाँ विवेकपूर्वक किये हुए जो पुण्य कर्म संचित हैं, उन्हींके समान जो नये पुण्य कर्म किये जाते हैं — वे दोनों मिलकर अधिक पुण्यतम कर्म हो जाते हैं (और उनके द्वारा वह पुरुष महान् पुण्यात्मा हो जाता है)

शान्तिपर्व, अध्याय 291, श्लोक 20–21 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1921 भक्ति

पराशर → राजन

कः कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रयच्छति ।

प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना ॥

पराशरजी कहते हैं — राजन्! कौन किसका उपकार करता है और कौन किसको देता है? यह प्राणी सारा कार्य स्वयं अपने ही लिये करता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 292, श्लोक 1 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1923 नीति–व्यवहार

पराशर उवाच

नाधर्मः कारणापेक्षी कर्तारमभिमुञ्चति ।

कर्ता खलु यथाकालं ततः समभिपद्यते ॥

अधर्म फल प्रदानके अवसरकी प्रतीक्षा करनेवाला है, अतः वह कर्ताका पीछा नहीं छोड़ता । समय आनेपर उस कर्ताको उस पापका फल अवश्य भोगना पड़ता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 298, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1957
कर्मों का फल

पराशर उवाच

स्वयंकृतानि कर्माणि जातो जन्तुः प्रपद्यते ।

नाकृत्वा लभते कश्चित् किंचिदत्र प्रियाप्रियम् ॥

जीव जगत्में जन्म लेकर अपने पूर्वकृत कर्मोंका ही फल भोगता है; पूर्वजन्ममें कुछ किये बिना यहाँ कोई भी किसी इष्ट या अनिष्ट फलको नहीं पाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 298, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1960

पराशर उवाच

सर्वः स्वानि शुभाशुभानि नियतं कर्माणि जन्तुः स्वयं ।

गर्भात् सम्प्रतिपद्यते तदुभयं यत् तेन पूर्वं कृतम् ॥

मृत्युश्चापरिहारवान् समगतिः कालेन विच्छेदिना ।

दारोश्चूर्णमिवाश्मसारविहितं कर्मान्तिकं प्रापयेत् ॥

सभी जीव, पूर्वजन्ममें उन्होंने जो कुछ किया है, उन अपने शुभाशुभ कर्मोंके नियत फलोंको गर्भमें प्रवेश करनेके समयसे ही क्रमशः पाने और भोगने लगते हैं । जैसे वायु आरेसे चीरकर बनाये गये लकड़ीके चूरेको उड़ा देती है, उसी प्रकार कभी टाली न जा सकनेवाली मृत्यु विनाशकारी कालकी सहायतासे मनुष्यका अन्त कर देती है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 298, श्लोक 45 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1963 काल–मृत्यु

हंस उवाच

यत् क्रोधनो यजति यद् ददाति ।

यद् वा तपस्तप्यति यज्जुहोति ।

वैवस्वतस्तद्धरतेऽस्य सर्व ।

मोघः श्रमो भवति हि क्रोधनस्य ॥

क्रोधी मनुष्य जो यज्ञ करता है, दान देता है, तप करता है अथवा जो हवन करता है, उसके उन सब कर्मोंके फलको यमराज हर लेते हैं । क्रोध करनेवालेका वह किया हुआ सारा परिश्रम व्यर्थ जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 299, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1970

वसिष्ठ उवाच

सर्वमेतद् विजानन्तो नासर्वस्य प्रबोधनात् ।

व्यक्तीभूता भविष्यन्ति व्यक्तस्य वशवर्तिनः ॥

जो इस सारे प्रपंचको ही जानते हैं, वे इससे भिन्न परमात्माका तत्त्व न जाननेके कारण निश्चय ही शरीरधारी होंगे और शरीर तथा काम-क्रोध आदि दोषोंके वशवर्ती बने रहेंगे ।

शान्तिपर्व, अध्याय 306, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2032

वसिष्ठ उवाच

किं मया कृतमेतावद् योऽहं कालमिमं जनम् ।

मत्स्यो जालं ह्यविज्ञानादनुवर्तितवानिह ॥

(जिस समय जीवात्माको विवेक होता है, उस समय वह यों विचार करने लगता है—) ओह! मैंने यह क्या किया? जैसे मछली अज्ञानवश स्वयं ही जाकर जालमें फँस जाती है, उसी प्रकार मैं भी आजतक यहाँ इस प्राकृत शरीरका ही अनुसरण करता रहा ।

शान्तिपर्व, अध्याय 307, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2037 माया–संसार

व्यास उवाच

यदेव कर्म केवलं पुरा कृतं शुभाशुभम् ।

तदेव पुत्र सार्थिकं भवत्यमुत्र गच्छतः ॥

पुत्र! परलोकमें जाते समय अपना पहलेका किया हुआ जो शुभाशुभ कर्म होता है, केवल वही साथ रहता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 51 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2144

व्यास उवाच

परत्रगामिकस्य ते कृताकृतस्य कर्मणः ।

न साक्षि आत्मना समो नृणामिहास्ति कश्चन ॥

परलोककी यात्रा करते समय तुम्हारे किये और न किये हुए कर्मका साक्षी आत्माके समान मनुष्योंमें दूसरा कोई नहीं है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 53 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2144

व्यास उवाच

न तत्र संविभज्यते स्वकर्मणा परस्परम् ।

तथा कृतं स्वकर्मजं तदेव भुज्यते फलम् ॥

वहाँ अपने कर्मके अनुसार जो फल प्राप्त होता है, उसका किसीके साथ बँटवारा नहीं होता । वहाँ तो अपने किये हुए कर्मोंका ही फल भोगना होता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 58 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2145

व्यास उवाच

यथेह यत् कृतं शुभं विपाप्मभिः कृतात्मभिः ।

तदाप्नुवन्ति मानवास्तथा विशुद्धयोनयः ॥

निष्पाप पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा इस लोकमें जो शुभ कर्म सम्पादित होता है, जन्मान्तरमें विशुद्ध योनिमें जन्म लेकर उसका वैसा ही फल पाते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 60 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2145

भीष्म उवाच

येन येन यथा यद् यत्पुरा कर्म सुनिश्चितम् ।

तत् तदेकतरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ॥

जिस-जिस मनुष्यने अपने-अपने पूर्वजन्मोंमें जैसे-जैसे कर्म किये हैं, वह अपने ही किये हुए उन कर्मोंका फल सदा अकेला ही भोगता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 322, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2153

भीष्म उवाच

स्वकर्मफलनिक्षेपं विधानपरिरक्षितम् ।

भूतग्राममिमं कालः समन्तादपकर्षति ॥

अपने-अपने कर्मका फल एक धरोहरके समान है, वह शास्त्रविधानके अनुसार सुरक्षित रहता है । उपयुक्त अवसर आनेपर यह काल इस प्राणिसमुदायको कर्मानुसार खींच ले जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 322, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2153

भीष्म उवाच

अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च ।

स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम् ॥

जैसे फूल और फल किसीकी प्रेरणाके बिना ही अपने समयपर वृक्षोंमें लग जाते हैं, उसी प्रकार पहलेके किये हुए कर्म भी अपने फलभोगके समयका उल्लंघन नहीं करते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 322, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2153
कर्म का साया

भीष्म उवाच

सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति ।

शेते सह शयानेन येन येन यथा कृतम् ॥

उपतिष्ठति तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति ।

करोति कुर्वतः कर्म च्छायेवानुविधीयते ॥

जिस-जिस मनुष्यने जैसा कर्म किया है, वह उसके पीछे लगा रहता है । यदि कर्ता पुरुष शीघ्रतापूर्वक दौड़ता है तो वह भी उतनी ही तेजीके साथ उसके पीछे जाता है । जब वह सोता है, तब उसका कर्मफल भी उसीके साथ सो जाता है । जब वह खड़ा होता है, तब वह भी उसके पास ही खड़ा रहता है और जब मनुष्य चलता है, तब वह भी उसके पीछे-पीछे चलने लगता है । इतना ही नहीं, कोई कार्य करते समय भी कर्म-संस्कार उसका साथ नहीं छोड़ता । सदा छायाके समान पीछे लगा रहता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 322, श्लोक 8–9 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2153

भीष्म उवाच

बालो युवा वा वृद्धश्च यत् करोति शुभाशुभम् ।

तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि ॥

कोई बालक हो, तरुण हो या बूढ़ा हो, वह जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, जन्म-जन्मान्तरमें उसी अवस्थामें उस-उस कर्मका फल भोगता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 322, श्लोक 15 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2154

नारद उवाच

न म्रियेरन् न जीर्येरन् सर्वे स्युःसर्वकामिनः ।

नाप्रियं प्रति पश्येयुरुत्थानस्य फले सति ॥

यदि प्रयत्नका फल अपने हाथमें होता तो मनुष्य न तो बूढ़े होते और न मरते ही । सबकी समस्त कामनाएँ पूरी हो जातीं और किसीको अप्रिय नहीं देखना पड़ता ।

शान्तिपर्व, अध्याय 331, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2219

जनमेजय उवाच

स्मृत्वा कालपरीमाणं प्रवृत्तिं ये समास्थिताः ।

दोषः कालपरीमाणे महानेष क्रियावताम् ॥

जो लोग नियत कालतक प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलोंको लक्ष्य करके प्रवृत्तिमार्गका आश्रय लेते हैं, उन कर्मपरायण पुरुषोंके लिये यही सबसे बड़ा दोष है कि वे कालकी सीमामें आबद्ध रहकर ही कर्मका फल भोग करते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 340, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2294

नागभार्या उवाच

अभिप्रेतामसंश्लिष्टां कृत्वा चात्महितां क्रियाम् ।

न याति निरयं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ॥

अपनी रुचिके अनुकूल कर्म भी यदि पापके सम्पर्कसे रहित और अपने लिये हितकर हो तो उसे करके कोई भी नरकमें नहीं पड़ता है । ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 360, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2432 धर्म–आचरण