श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

नीति–व्यवहार

लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म

80 पद्य

श्रीरामचरितमानस

भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस अपलोक बिभूती ॥

सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू ॥

गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ॥

भले और बुरे अपनी-अपनी करनीके अनुसार सुन्दर यश और अपयशकी सम्पत्ति पाते हैं । अमृत, चन्द्रमा, गङ्गाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुगके पापोंकी नदी अर्थात् कर्मनाशा और हिंसा करनेवाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं; किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 5.4-5 श्रीरामचरितमानस पृ. 27
सज्जन की उदारता

जग बहु नर सर सरि सम भाई । जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई ॥

सज्जन सकृत सिंधु सम कोई । देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ॥

हे भाई! जगत्में तालाबों और नदियोंके समान मनुष्य ही अधिक हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़से बढ़ते हैं (अर्थात् अपनी ही उन्नतिसे प्रसन्न होते हैं) । समुद्र-सा तो कोई एक विरला ही सज्जन होता है जो चन्द्रमाको पूर्ण देखकर (दूसरोंका उत्कर्ष देखकर) उमड़ पड़ता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 8.7 श्रीरामचरितमानस पृ. 31
कीर्ति का परोपकारी स्वरूप

कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥

राम सुकीरति भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥

कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गङ्गाजीकी तरह सबका हित करनेवाली हो । श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्ति तो बड़ी सुन्दर (सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है । यह असामञ्जस्य है (अर्थात् इन दोनोंका मेल नहीं मिलता), इसकी मुझे चिन्ता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 14(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 37 धर्म–आचरण
कुसङ्ग का दुष्परिणाम

कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला ॥

गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥

घोर कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है; उन कुसंगियोंके वचन ही बाघ, सिंह और साँप हैं । घरके काम-काज और गृहस्थीके भाँति-भाँतिके जंजाल ही अत्यन्त दुर्गम बड़े-बड़े पहाड़ हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 38.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 63 काम–क्रोध–लोभ–मोह

संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव ॥

होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव ॥

हे प्रभो! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता ।

बालकाण्ड, दोहा 45 श्रीरामचरितमानस पृ. 70 ज्ञान–विवेक

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि ॥

बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि ॥

प्रीतिकी सुन्दर रीति देखिये कि जल भी [दूधके साथ मिलकर] दूधके समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद [प्रेम] जाता रहता है ।

बालकाण्ड, सोरठा 57(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 80
सत्ता और अहङ्कार

बड़ अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमानु हृदयँ तब आवा ॥

नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥

जब दक्षने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदयमें अत्यन्त अभिमान आ गया । जगत्में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो ।

ब्रह्माजी ने दक्ष को प्रजापतियों का नायक बनाया तब दक्ष के हृदय में अभिमान आ गया।

बालकाण्ड, चौपाई 60.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 82
विरोध का सम्मान

जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा । जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा ॥

तदपि बिरोध मान जहँ कोई । तहाँ गएँ कल्यानु न होई ॥

यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरुके घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जानेसे कल्याण नहीं होता ।

शिवजी ने सती को समझाया कि जहाँ विरोध माना जाता हो, वहाँ बिना बुलाये जाना उचित नहीं है।

बालकाण्ड, चौपाई 62.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 84 धर्म–आचरण
समर्थ की निर्दोषता

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं । रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥

गङ्गाजीमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता । सूर्य, अग्नि और गङ्गाजीकी भाँति समर्थको कुछ दोष नहीं लगता ।

बालकाण्ड, चौपाई 69.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 89 धर्म–आचरण

धरम धुरंधर नीति निधाना । तेज प्रताप सील बलवाना ॥

तेहि के भए जुगल सुत बीरा । सब गुन धाम महा रनधीरा ॥

वह धर्मकी धुरीको धारण करनेवाला, नीतिकी खान, तेजस्वी, प्रतापी, सुशील और बलवान् था, उसके दो वीर पुत्र हुए, जो सब गुणोंके भण्डार और बड़े ही रणधीर थे ।

बालकाण्ड, चौपाई 153.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 161 धर्म–आचरण

सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती । कस न राम तुम्ह राखहु नीती ॥

धरम सेतु पालक तुम्ह ताता । प्रेम बिबस सेवक सुखदाता ॥

यह सुनकर मुनीश्वर विश्वामित्रजीने प्रेमसहित वचन कहे-हे राम! तुम नीतिकी रक्षा कैसे न करोगे; हे तात! तुम धर्मकी मर्यादाका पालन करनेवाले और प्रेमके वशीभूत होकर सेवकोंको सुख देनेवाले हो ।

बालकाण्ड, चौपाई 298.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 218 धर्म–आचरण
श्रेष्ठ पुरुष के लक्षण

जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी । नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी ॥

मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं । ते नरबर थोरे जग माहीं ॥

रणमें शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात् जो लड़ाईके मैदानसे भागते नहीं), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टिको नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँसे ‘नाहीं’ नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसारमें थोड़े हैं ।

श्रीरामजी अपने छोटे भाई से बातें कर रहे हैं।

बालकाण्ड, चौपाई 231.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 228 धर्म–आचरण

जगु भल कहिहि भाव सब काहू । हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू ॥

एहिं लालसाँ मगन सब लोगू । बरु साँवरो जानकी जोगू ॥

संसार उन्हें भला कहेगा, क्योंकि यह बात सब किसीको अच्छी लगती है । हठ करनेसे अन्तमें भी हृदय जलेगा । सब लोग इसी लालसामें मग्न हो रहे हैं कि जानकीजीके योग्य वर तो यह साँवला ही है ।

बालकाण्ड, चौपाई 249.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 245

नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू । जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू ॥

बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा । गारी देत न पावहु सोभा ॥

इतनेपर भी सन्तोष न हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिये । क्रोध रोककर असह्य दुःख मत सहिये । आप वीरताका व्रत धारण करनेवाले, धैर्यवान् और क्षोभरहित हैं । गाली देते शोभा नहीं पाते ।

बालकाण्ड, चौपाई 274.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 265

राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ॥

छुअतहिं टूट पिनाक पुराना । मैं केहि हेतु करौं अभिमाना ॥

श्रीरामचन्द्रजीने कहा — हे मुनि! विचारकर बोलिये । आपका क्रोध बहुत बड़ा है । और मेरी भूल बहुत छोटी है । पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया । मैं किस कारण अभिमान करूँ?

बालकाण्ड, चौपाई 283.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 272
बहुओं का सत्कार

नृप सब भाँति सबहि सनमानी । कहि मृदु बचन बोलाईं रानी ॥

बधू लरिकनीं पर घर आईं । राखेहु नयन पलक की नाईं ॥

राजाने सबका सब प्रकारसे सम्मान करके, कोमल वचन कहकर रानियोंको बुलाया और कहा — बहुएँ अभी बच्ची हैं, पराये घर आयी हैं । इनको इस तरहसे रखना जैसे नेत्रोंको पलकें रखती हैं (जैसे पलकें नेत्रोंकी सब प्रकारसे रक्षा करती हैं और उन्हें सुख पहुँचाती हैं, वैसे ही इनको सुख पहुँचाना)

राजा दशरथजी ने रानियों को बुलाकर बहुओं के प्रति व्यवहार का निर्देश दिया।

बालकाण्ड, चौपाई 355.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 338 सेवा–करुणा–विनय

बिमल बंस यहु अनुचित एकू । बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू ॥

प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई । हरउ भगत मन कै कुटिलाई ॥

पर इस निर्मल वंशमें यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयोंको छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़ेका ही (मेरा ही) होता है । [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका यह सुन्दर प्रेमपूर्ण पछतावा भक्तोंके मनकी कुटिलताको हरण करे ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 10.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 354 वैराग्य
मन्थरा का प्रतिशोध

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा । बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा ॥

कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥

विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरेको क्या दोष] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ । कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! (अर्थात् रानी तो होनेसे रही)

मन्थरा ने कैकेयी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 16.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 358 कर्म–प्रारब्ध

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी । रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी ॥

रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते ॥

हे रानी! तुमने जो कहा कि मुझे सीता-राम प्रिय हैं और रामको तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है । परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गये । समय फिर जानेपर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 17.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 359

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू । जनि अबला जिमि करुना करहू ॥

तनु तिय तनय धामु धनु धरनी । सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी ॥

या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये । यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये-पीटिये नहीं । सत्यव्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी-सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 35.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 375 धर्म–आचरण
गुरु की आज्ञा का महत्त्व

सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ॥

सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥

स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है ।

श्रीरामजी ने सीताजी को वन जाने से रोकने के लिए यह शीतल सीख दी।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 63 श्रीरामचरितमानस पृ. 398 गुरु महिमा

लागि सासु पग कह कर जोरी । छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी ॥

दीन्हि प्रानपति मोहिसिख सोई । जेहि बिधि मोर परम हित होई ॥

सासके पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं-हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठाईको क्षमा कीजिये । मुझे प्राणपतिने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 64.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 399 धर्म–आचरण

रहहु करहु सब कर परितोषू । नतरु तात होइहि बड़ दोषू ॥

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी । सो नृपु अवसि नरक अधिकारी ॥

अतः तुम यहीं रहो और सबका सन्तोष करते रहो । नहीं तो हे तात! बड़ा दोष होगा । जिसके राज्यमें प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरकका अधिकारी होता है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 71.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 404
सच्चे मित्र की पहचान

बारहिं बार जोरि जुग पानी । कहत रामु सब सन मृदु बानी ॥

सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जेहि तें रहै भुआल सुखारी ॥

श्रीरामचन्द्रजी बार-बार दोनों हाथ जोड़कर सबसे कोमल वाणी कहते हैं कि मेरा सब प्रकारसे हितकारी मित्र वही होगा जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें ।

श्रीरामचन्द्रजी ने सबको समझाया।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 80.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 412 सेवा–करुणा–विनय

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं । बिप्र धेनु हित संकट सहहीं ॥

नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका । घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका ॥

जो अवगुणोंको छोड़कर सबके गुणोंको ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौके लिये संकट सहते हैं, नीति-निपुणतामें जिनकी जगत्में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 131.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 454 धर्म–आचरण

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं । दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ॥

धीरज धरहु बिबेकु बिचारी । छाड़िअ सोच सकल हितकारी ॥

मूर्खलोग सुखमें हर्षित होते और दुःखमें रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मनमें दोनोंको समान समझते हैं । हे सबके हितकारी (रक्षक)! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोकका परित्याग कीजिये ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 150.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 470 ज्ञान–विवेक

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥

सोचिअ नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥

सोच उस ब्राह्मणका करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोगमें ही लीन रहता है । उस राजाका सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 172.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 488 धर्म–आचरण

सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा । सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा ॥

भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें । बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें ॥

यह सुनकर निषादराज गुहने कहा — बूढ़ा ठीक कह रहा है । जल्दीमें (बिना विचारे) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं । भरतजीका शील-स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करनेमें हितकी बहुत बड़ी हानि है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 192.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 504

बिषई जीव पाइ प्रभुताई । मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ॥

भरतु नीति रत साधु सुजाना । प्रभु पद प्रेमु सकल जग जाना ॥

परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूपको प्रकट कर देते हैं । भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु (आप) के चरणोंमें उनका प्रेम है, इस बातको सारा जगत् जानता है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 228.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 535 भक्ति
विवेकपूर्ण कर्म का महत्व

अनुचित उचित काजु किछु होऊ । समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ॥

सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ॥

परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं । वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं ।

लक्ष्मणजी के बाहुबल की प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी ने यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 231.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 538 ज्ञान–विवेक

मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता ॥

जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू । हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ॥

मुझ सेवककी तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है (मेरे दिन अच्छे नहीं हैं) और विधाता प्रतिकूल है । यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म (अधर्म) होगा, क्योंकि सेवकका धर्म शिवजीके पर्वत कैलाससे भी भारी (निबाहनेमें कठिन) है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 253.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 557 धर्म–आचरण

सब कर हित रुख राउरि राखें । आयसु किएँ मुदित फुर भाषें ॥

प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई । माथें मानि करौं सिख सोई ॥

आपका रुख रखनेमें और आपकी आज्ञाको सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करनेमें ही सबका हित है । पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षाको माथेपर चढ़ाकर करूँ ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 258.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 561 धर्म–आचरण

लरिकाइहि तें रघुबर बानी । पालत नीति प्रीति पहिचानी ॥

सील सकोच सिंधु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥

श्रीरामजीकी लड़कपनसे ही यह बान है कि वे प्रेमको पहचानकर नीतिका पालन करते हैं । श्रीरघुनाथजी शील और संकोचके समुद्र हैं । वे सुन्दर मुखके [या सबके अनुकूल रहनेवाले], सुन्दर नेत्रवाले [या सबको कृपा और प्रेमकी दृष्टिसे देखनेवाले] और सरलस्वभाव हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 274.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 574 धर्म–आचरण

जानउँ सदा भरत कुलदीपा । बार बार मोहि कहेउ महीपा ॥

कसें कनकु मनि पारिख पाएँ । पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ ॥

मैं भरतको सदा कुलका दीपक जानती हूँ । महाराजने भी बार-बार मुझे यही कहा था । सोना कसौटीपर कसे जानेपर और रत्न पारखी (जौहरी) के मिलनेपर ही पहचाना जाता है । वैसे ही पुरुषकी परीक्षा समय पड़नेपर उसके स्वभावसे ही (उसका चरित्र देखकर) हो जाती है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 283.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 582
सेवाधर्म की कठिनता

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । सेवाधरमु कठिन जगु जाना ॥

स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू । बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू ॥

वेद, शास्त्र और पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है । स्वामिधर्ममें (स्वामीके प्रति कर्तव्यपालनमें) और स्वार्थमें विरोध है (दोनों एक साथ नहीं निभ सकते) । वैर अंधा होता है और प्रेमको ज्ञान नहीं रहता [मैं स्वार्थवश कहूँगा या प्रेमवश, दोनोंमें ही भूल होनेका भय है] ।

भरतजी ने समाज के सम्मुख श्री रामचन्द्रजी से यह वचन कहे।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 293.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 591 सेवा–करुणा–विनय
मुखिया का कर्तव्य

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ॥

पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥

तुलसीदासजी कहते हैं — [श्रीरामजीने कहा—] मुखिया मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेको तो एक (अकेला) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगोंका पालन-पोषण करता है ।

श्रीरामजी ने भाई भरत को राजधर्म समझाते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 315 श्रीरामचरितमानस पृ. 610 धर्म–आचरण

राजधरम सरबसु एतनोई । जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥

बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥

राजधर्मका सर्वस्व (सार) भी इतना ही है । जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है । श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया । परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 316.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 610 धर्म–आचरण
सच्चे गुणों की परीक्षा

धीरज धर्म मित्र अरु नारी । आपद काल परिखिअहिं चारी ॥

बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना । अंध बधिर क्रोधी अति दीना ॥

ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना । नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥

एकइ धर्म एक ब्रत नेमा । कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥

धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री — इन चारोंकी विपत्तिके समय ही परीक्षा होती है । वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन, ऐसे भी पतिका अपमान करनेसे स्त्री यमपुरमें भाँति-भाँतिके दुःख पाती है । शरीर, वचन और मनसे पतिके चरणोंमें प्रेम करना स्त्रीके लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है ।

अनसूयाजी ने सीताजी को पतिव्रत-धर्म समझाते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 5(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 627 धर्म–आचरण

सेवक सुख चह मान भिखारी । ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी ॥

लोभी जसु चह चार गुमानी । नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी ॥

सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी (जिसे जूए, शराब आदिका व्यसन हो) धन और व्यभिचारी शुभगति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल-अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाशको दुहकर दूध लेना चाहते हैं (अर्थात् असम्भव बातको सम्भव करना चाहते हैं)

अरण्यकाण्ड, चौपाई 17.8 श्रीरामचरितमानस पृ. 644
विवेकहीन कर्म का फल

करसि पान सोवसि दिनु राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥

राजनीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥

बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ । श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ ॥

संग तें जती कुमंत्र ते राजा । मान ते ग्यान पान तें लाजा ॥

प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी । नासहिं बेगि नीति अस सुनी ॥

शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है । तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिरपर खड़ा है? नीतिके बिना राज्य और धर्मके बिना धन प्राप्त करनेसे, भगवान्‌को समर्पण किये बिना उत्तम कर्म करनेसे और विवेक उत्पन्न किये बिना विद्या पढ़नेसे परिणाममें श्रम ही हाथ लगता है । विषयोंके सङ्गसे संन्यासी, बुरी सलाहसे राजा, मानसे ज्ञान, मदिरापानसे लज्जा, नम्रताके बिना (नम्रता न होनेसे) प्रीति और मद (अहङ्कार) से गुणवान् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार नीति मैंने सुनी है ।

शूर्पणखा ने रावण की सभा में उसे फटकारते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 21(क).4-5 श्रीरामचरितमानस पृ. 651 कर्म–प्रारब्ध

प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी । नासहिं बेगि नीति अस सुनी ॥

नम्रताके बिना (नम्रता न होनेसे) प्रीति और मद (अहङ्कार) से गुणवान् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार नीति मैंने सुनी है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 21(क).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 652
शत्रु, रोग और पाप को छोटा न समझें

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि ॥

अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन ॥

शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्पको छोटा करके नहीं समझना चाहिये । ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकारसे विलाप करके रोने लगी ।

शूर्पणखा ने रावण की सभा के बीच व्याकुल होकर विलाप करते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, सोरठा 21(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 652

नवनि नीच कै अति दुखदाई । जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ॥

भयदायक खल कै प्रिय बानी । जिमि अकाल के कुसुम भवानी ॥

नीचका झुकना (नम्रता) भी अत्यन्त दुःखदायी होता है । जैसे अङ्कुश, धनुष, साँप और बिल्लीका झुकना । हे भवानी! दुष्टकी मीठी वाणी भी [उसी प्रकार] भय देनेवाली होती है, जैसे बिना ऋतुके फूल!

अरण्यकाण्ड, चौपाई 24.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 654

सापत ताड़त परुष कहंता । बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ॥

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना । सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥

शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं । शील और गुणसे हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है । और गुणगणोंसे युक्त और ज्ञानमें निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 34.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 668 धर्म–आचरण
तीन प्रबल दुर्गुण

तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ ॥

मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ॥

हे तात! काम, क्रोध और लोभ-ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं । ये विज्ञानके धाम मुनियोंके भी मनोंको पलभरमें क्षुब्ध कर देते हैं ।

श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, दोहा 38(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 673 काम–क्रोध–लोभ–मोह

फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ ॥

पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ ॥

फलोंके बोझसे झुककर सारे वृक्ष पृथ्वीके पास आ लगे हैं, जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर [विनयसे] झुक जाते हैं ।

अरण्यकाण्ड, दोहा 40 श्रीरामचरितमानस पृ. 675 सेवा–करुणा–विनय

निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं । पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ॥

सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती । सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती ॥

कानोंसे अपने गुण सुननेमें सकुचाते हैं, दूसरोंके गुण सुननेसे विशेष हर्षित होते हैं । सम और शीतल हैं, न्यायका कभी त्याग नहीं करते । सरलस्वभाव होते हैं और सभीसे प्रेम रखते हैं ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 46(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 680
मित्रता का धर्म

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ॥

निज दुख गिरि सम रज करि जाना । मित्रक दुख रज मेरु समाना ॥

जो लोग मित्रके दुःखसे दुःखी नहीं होते, उन्हें देखनेसे ही बड़ा पाप लगता है । अपने पर्वतके समान दुःखको धूलके समान और मित्रके धूलके समान दुःखको सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने ।

श्रीरघुनाथजी ने सुग्रीव से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 7.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 689
सच्चे मित्र का धर्म

जिन्ह के असि मति सहज न आई । ते सठ कत हठि करत मिताई ॥

कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा ॥

जिन्हें स्वभावसे ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसीसे मित्रता करते हैं? मित्रका धर्म है कि वह मित्रको बुरे मार्गसे रोककर अच्छे मार्गपर चलावे । उसके गुण प्रकट करे और अवगुणोंको छिपावे ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 7.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 690

देत लेत मन संक न धरई । बल अनुमान सदा हित करई ॥

बिपति काल कर सतगुन नेहा । श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ॥

देने-लेनेमें मनमें शंका न रखे । अपने बलके अनुसार सदा हित ही करता रहे । विपत्तिके समयमें तो सदा सौगुना स्नेह करे । वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्रके गुण (लक्षण) ये हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 7.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 690

आगें कह मृदु बचन बनाई । पाछें अनहित मन कुटिलाई ॥

जाकर चित अहि गति सम भाई । अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई ॥

जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ पीछे बुराई करता है तथा मनमें कुटिलता रखता है — हे भाई! [इस तरह] जिसका मन साँपकी चालके समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्रको तो त्यागनेमें ही भलाई है ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 7.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 690
अधर्म की मर्यादा

अनुज बधू भगिनी सुत नारी । सुनु सठ कन्या सम ए चारी ॥

इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई । ताहि बधें कछु पाप न होई ॥

[श्रीरामजीने कहा—] हे मूर्ख! सुन, छोटे भाईकी स्त्री, बहिन, पुत्रकी स्त्री और कन्या — ये चारों समान हैं । इनको जो कोई बुरी दृष्टिसे देखता है, उसे मारनेमें कुछ भी पाप नहीं होता ।

श्रीरामजी ने बालि से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 9.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 693
श्रीराम का परोपकारी स्वभाव

उमा राम सम हित जग माहीं । गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं ॥

सुर नर मुनि सब कै यह रीती । स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥

हे पार्वती! जगत्में श्रीरामजीके समान हित करनेवाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है । देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थके लिये ही सब प्रीति करते हैं ।

शिवजी ने पार्वतीजी से श्रीराम की सुहृदता का वर्णन करते हुए कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 12.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 696 धर्म–आचरण

जानतहूँ अस प्रभु परिहरहीं । काहे न बिपति जाल नर परहीं ॥

पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई । बहु प्रकार नृपनीति सिखाई ॥

जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभुको त्याग देते हैं, वे क्यों न विपत्तिके जालमें फँसें? फिर श्रीरामजीने सुग्रीवको बुला लिया और बहुत प्रकारसे उन्हें राजनीतिकी शिक्षा दी ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 12.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 696

मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु । रामचंद्र कर काजु सँवारेहु ॥

भानु पीठि सेइअ उर आगी । स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी ॥

मन, वचन तथा कर्मसे उसीका (सीताजीका पता लगानेका) उपाय सोचना । श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सम्पन्न (सफल) करना । सूर्यको पीठसे और अग्निको हृदयसे (सामनेसे) सेवन करना चाहिये । परन्तु स्वामीकी सेवा तो छल छोड़कर सर्वभावसे (मन, वचन, कर्मसे) करनी चाहिये ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 23.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 705 साधना–योग
सच्चे परामर्श का महत्त्व

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ॥

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥

मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि [अप्रसन्नताके] भय या [लाभकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] प्रिय बोलते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं); तो [क्रमश:] राज्य, शरीर और धर्म — इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है ।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 37 श्रीरामचरितमानस पृ. 750 धर्म–आचरण
सुमति और कुमति का फल

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं । नाथ पुरान निगम अस कहहीं ॥

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना । जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ॥

हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदयमें रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकारकी सम्पदाएँ (सुखकी स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाममें विपत्ति (दुःख) रहती है ।

विभीषण ने रावण से कहा।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 40.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 753
दुष्ट सङ्ग का त्याग

बरु भल बास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥

अब पद देखि कुसल रघुराया । जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया ॥

हे तात! नरकमें रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका संग [कभी] न दे । [विभीषणजीने कहा—] हे रघुनाथजी! अब आपके चरणोंका दर्शन कर कुशलसे हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझपर दया की है ।

श्रीरामजी ने लङ्केश से पूछा कि तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है, तब विभीषणजी ने यह वचन कहे।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 46.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 758 धर्म–आचरण

तात बचन मम सुनु अति आदर । जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ॥

प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं । ऐसे नर निकाय जग अहहीं ॥

हे तात! मेरे वचनोंको बहुत आदरसे (बड़े गौरसे) सुनिये । मुझे मनमें कायर न समझ लीजियेगा । जगत्में ऐसे मनुष्य झुंड के झुंड (बहुत अधिक) हैं, जो प्यारी (मुँहपर मीठी लगनेवाली) बात ही सुनते और कहते हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 9.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 782

बचन परम हित सुनत कठोरे । सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे ॥

प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती । सीता देड़ करहु पुनि प्रीती ॥

हे प्रभो! सुननेमें कठोर परन्तु [परिणाममें] परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं । नीति सुनिये, [उसके अनुसार] पहले दूत भेजिये, और [फिर] सीताको देकर श्रीरामजीसे प्रीति [मेल] कर लीजिये ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 9.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 782

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि ॥

जौंमृगपतिबध मेडुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि ॥

प्रीति और वैर बराबरीवालेसे ही करना चाहिये, नीति ऐसी ही है । सिंह यदि मेढकोंको मारे, तो क्या उसे कोई भला कहेगा?

लङ्काकाण्ड, दोहा 23(ग) श्रीरामचरितमानस पृ. 796

भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग ॥

कोटि बिन ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग ॥

जैसे करोड़ों विघ्न आनेपर भी संतका मन नीतिको नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर (अंगद)-का चरण पृथ्वीको नहीं छोड़ता । यह देखकर शत्रु (रावण)-का मद दूर हो गया!

लङ्काकाण्ड, दोहा 34(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 807

साम दान अरु दंड बिभेदा । नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा ॥

नीति धर्म के चरन सुहाए । अस जियँ जानि नाथ पहिं आए ॥

हे नाथ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद — ये चारों राजाके हृदयमें बसते हैं । ये नीति-धर्मके चार सुन्दर चरण हैं । [किन्तु रावणमें धर्मका अभाव है] ऐसा जीमें जानकर ये नाथके पास आ गये हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 38(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 811 धर्म–आचरण

सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥

अस बिचारि जियँ जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥

पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार — ये जगत् में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता । हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात! जागो ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 61.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 832 वैराग्य

सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥

बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥

शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं । सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं । बल, विवेक, दम (इन्द्रियोंका वशमें होना) और परोपकार — ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरीसे रथमें जोड़े हुए हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 80(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 853 ज्ञान–विवेक

जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा ॥

संसार महँ पूरुष त्रिविध पाटल रसाल पनस समा ॥

एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं ॥

एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं ॥

व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो । क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं-पाटल (गुलाब), आम और कटहलके समान । एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल दोनों देते हैं और एक (कटहल) में केवल फल ही लगते हैं । इसी प्रकार [पुरुषोंमें] एक कहते हैं [करते नहीं], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक (तीसरे) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं ।

लङ्काकाण्ड, छन्द (90 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 865 ज्ञान–विवेक

सब उदार सब पर उपकारी । बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥

एकनारि ब्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥

सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक हैं । सभी पुरुषमात्र एकपत्नीव्रती हैं । इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 22.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 934 सेवा–करुणा–विनय
सन्त और असन्त का स्वभाव

संत असंतन्हि कै असि करनी । जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥

काटइ परसु मलय सुनु भाई । निज गुन देइ सुगंध बसाई ॥

संत और असंतोंकी करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दनका आचरण होता है । हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चन्दनको काटती है [क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षोंको काटना है]; किन्तु चन्दन [अपने स्वभाववश] अपना गुण देकर उसे (काटनेवाली कुल्हाड़ीको) सुगन्धसे सुवासित कर देता है ।

श्रीरामजी ने सन्तों के लक्षणों के विषय में बताते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 37.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 947 सत्सङ्ग–सन्त महिमा
सच्चे सन्त के लक्षण

ए सब लच्छन बसहिं जासु उर । जानेहु तात संत संतत फुर ॥

सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं । परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ॥

हे तात! ये सब लक्षण जिसके हृदयमें बसते हों, उसको सदा सच्चा संत जानना । जो शम (मनके निग्रह), दम (इन्द्रियोंके निग्रह), नियम और नीतिसे कभी विचलित नहीं होते और मुखसे कभी कठोर वचन नहीं बोलते … ।

श्रीराम भरत को सच्चे सन्त की पहचान बताते हुए।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 38.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 948 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

जो अति आतप ब्याकुल होई । तरु छाया सुख जानइ सोई ॥

जौं नहिं होत मोह अति मोही । मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही ॥

जो धूपसे अत्यन्त व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है । हे तात! यदि मुझे अत्यन्त मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 69(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 974
परमेश्वर की लीला

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ॥

सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥

असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥

जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी ॥

जैसे कोई नट (खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता, हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजीकी यह लीला है, जो राक्षसोंको विशेष मोहित करनेवाली और भक्तोंको सुख देनेवाली है । हे स्वामी! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयोंके वश और कामी हैं, वे ही प्रभुपर इस प्रकार मोहका आरोप करते हैं ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, दोहा 72(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 978 लीला–रहस्य माया–संसार

पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं ॥

अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित ॥

हे गरुड़जी! वेदोंमें मानी हुई ऐसी नीति है और सज्जन भी कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीचसे भी प्रेम करना चाहिये ।

उत्तरकाण्ड, सोरठा 95(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 999

मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा । पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥

मिथ्यारंभ दंभ रत जोई । ता कहूँ संत कहइ सब कोई ॥

जिसको जो अच्छा लग जाय, वही मार्ग है । जो डींग मारता है, वही पण्डित है । जो मिथ्या आरम्भ करता (आडम्बर रचता) है और जो दम्भमें रत है, उसीको सब कोई संत कहते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 98(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1002

सोइ सयान जो परधन हारी । जो कर दंभ सो बड़ आचारी ॥

जो कह झूठ मसखरी जाना । कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना ॥

जो [जिस किसी प्रकारसे] दूसरेका धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान् है । जो दम्भ करता है वही बड़ा आचारी है । जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुगमें वही गुणवान् कहा जाता है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 98(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1002

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥

कोबिद गावहिं असि नीती । खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, ऐसी बात समझकर बुद्धिमान् लोग अधम (नीच) का संग नहीं करते । कवि और पण्डित ऐसी नीति कहते हैं कि दुष्टसे न कलह ही अच्छा है, न प्रेम ही ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 106(क).7 श्रीरामचरितमानस पृ. 1011

उदासीन नित रहिअ गोसाईं । खल परिहरिअ स्वान की नाईं ॥

मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई । गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥

हे गोसाईं! उससे तो सदा उदासीन ही रहना चाहिये । दुष्टको कुत्तेकी तरह दूरसे ही त्याग देना चाहिये । मैं दुष्ट था, हृदयमें कपट और कुटिलता भरी थी । [इसीलिये यद्यपि] गुरुजी हितकी बात कहते थे, पर मुझे वह सुहाती न थी ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 106(क).8 श्रीरामचरितमानस पृ. 1011

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक । सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक ॥

राजु कि रहइ नीति बिनु जानें । अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें ॥

परमात्माको जाननेवाले कहीं जन्म-मरण [के चक्कर] में पड़ सकते हैं? भगवान्‌की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है? श्रीहरिके चरित्र वर्णन करनेपर क्या पाप रह सकते हैं?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 112(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1020 ज्ञान–विवेक
सन्तों का स्वभाव

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥

पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥

जगत्में दरिद्रताके समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलनके समान जगत्में सुख नहीं है । और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना, यह संतोंका सहज स्वभाव है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).7 श्रीरामचरितमानस पृ. 1035 सत्सङ्ग–सन्त महिमा सेवा–करुणा–विनय

पूरन काम राम अनुरागी । तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी ॥

संत बिटप सरिता गिरि धरनी । पर हित हेतु सबन्ह कै करनी ॥

आप पूर्णकाम हैं और श्रीरामजीके प्रेमी हैं । हे तात! आपके समान कोई बड़भागी नहीं है । संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी — इन सबकी क्रिया पराये हितके लिये ही होती है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 125(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1042

नीति निपुन सोइ परम सयाना । श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना ॥

सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा । जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा ॥

जो छल छोड़कर श्रीरघुवीरका भजन करता है, वही नीतिमें निपुण है, वही परम बुद्धिमान् है । उसीने वेदोंके सिद्धान्तको भलीभाँति जाना है । वही कवि, वही विद्वान् तथा वही रणधीर है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 127.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1044