श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५
नीति–व्यवहार
लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म
128 पद्य
महाभारत — खण्ड ५
युधिष्ठिर उवाच
संयुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधहर्षासमञ्जसाः ।
न ते जयफलं किंचिद् भोक्तारो जातु कर्हिचित् ॥
जो लोग कामना और खीझसे युक्त हो क्रोध और हर्षके कारण अपना संतुलन खो बैठते हैं, वे कभी कहीं किंचिन्मात्र भी विजयका फल नहीं भोग सकते ।
अर्जुन उवाच
अर्थाद् धर्मश्च कामश्च स्वर्गश्चैव नराधिप ।
प्राणयात्रापि लोकस्य विना ह्यर्थं न सिध्यति ॥
नरेश्वर! धनसे ही धर्म, काम और स्वर्गकी सिद्धि होती है । लोगोंके जीवनका निर्वाह भी बिना धनके नहीं होता ।
अर्जुन उवाच
असम्मोहाय मर्त्यानामर्थसंरक्षणाय च ।
मर्यादा स्थापिता लोके दण्डसंज्ञा विशाम्पते ॥
प्रजानाथ! मनुष्योंको प्रमादसे बचाने और उनके धनकी रक्षा करनेके लिये लोकमें जो मर्यादा स्थापित की गयी है, उसीका नाम दण्ड है ।
अर्जुन उवाच
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मप्रवचनं कृतम् ।
अहिंसासाधुहिंसेति श्रेयान् धर्मपरिग्रहः ॥
लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये ही धर्मका प्रतिपादन किया गया है । सर्वथा हिंसा न की जाय अथवा दुष्टकी हिंसा की जाय, यह प्रश्न उपस्थित होनेपर जिसमें धर्मकी रक्षा हो, वही कार्य श्रेष्ठ मानना चाहिये ।
वैशम्पायन → युधिष्ठिर
सुमन्त्रिते सुनीते च सर्वतश्चोपपादिते ।
पौरुषे कर्मणि कृते नास्त्यधर्मो युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! अच्छी तरह मन्त्रणा की गयी हो, सुन्दर नीतिसे काम लिया गया हो और सब ओरसे पुरुषार्थपूर्वक प्रयत्न किये गये हों (उस अवस्थामें यदि प्रजाको कोई कष्ट हो जाय) तो राजाको उसका पाप नहीं लगता ।
व्यास उवाच
न वै देयमनुक्रोशाद् दीनायाप्यपकारिणे ।
आप्ताचरित इत्येव धर्म इत्येव वा पुनः ॥
पर जो दूसरोंका बुरा करनेवाला हो वह यदि दीन हो तो भी उसे दया करके नहीं देना चाहिये । यह शिष्टोंका आचार है और यही धर्म है ।
भीष्म उवाच
ऋषीणामपि राजेन्द्र सत्यमेव परं धनम् ।
तथा राज्ञां परं सत्यान्नान्यद् विश्वासकारणम् ॥
राजेन्द्र! ऋषियोंके लिये भी सत्य ही परम धन है । इसी प्रकार राजाओंके लिये सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा साधन नहीं है, जो प्रजावर्गमें उसके प्रति विश्वास उत्पन्न करा सके ।
भीष्म उवाच
तस्मान्नित्यं दया कार्या चातुर्वर्ण्य विपश्चिता ।
धर्मात्मा सत्यवाक् चैव राजा रञ्जयति प्रजाः ॥
अतः विद्वान् राजाको चारों वर्णोंपर सदा दया करनी चाहिये, धर्मात्मा और सत्यवादी नरेश ही प्रजाको प्रसन्न रख पाता है ।
भीष्म उवाच
यथा हि गर्भिणी हित्वा स्वं प्रियं मनसोऽनुगम् ।
गर्भस्य हितमाधत्ते तथा राज्ञाप्यसंशयम् ॥
वर्तितव्यं कुरुश्रेष्ठ सदा धर्मानुवर्तिना ।
स्वं प्रियं तु परित्यज्य यद् यल्लोकहितं भवेत् ॥
जैसे गर्भवती स्त्री अपने मनको अच्छे लगने वाले प्रिय भोजन आदिका भी परित्याग करके केवल गर्भस्थ बालकके हितका ध्यान रखती है, उसी प्रकार धर्मात्मा राजाको भी चाहिये कि निःसंदेह वैसा ही बर्ताव करे । कुरुश्रेष्ठ! राजा अपनेको प्रिय लगनेवाले विषयका परित्याग करके जिसमें सब लोगोंका हित हो वही कार्य करे ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
लोकरञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः ।
सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ॥
अतः इस लोकमें प्रजावर्गको प्रसन्न रखना ही राजाओंका सनातन धर्म है । सत्यकी रक्षा और व्यवहारकी सरलता ही राजोचित कर्तव्य है ।
भीष्म उवाच
अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः ।
राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव ॥
जिसमें क्रोधका अभाव होता है, जो दुर्व्यसनोंसे दूर रहता है, जिसका दण्ड भी कठोर नहीं होता तथा जो अपनी इन्द्रियोंपर विजय पा लेता है, वह राजा हिमालयके समान सम्पूर्ण प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है ।
भीष्म उवाच
स्वदारतुष्टस्त्वृतुकालगामी ।
नियोगसेवी न शठो न जिह्मः ।
मिताशनो देवरतः कृतज्ञः ।
सत्यो मृदुश्चानृशंसः क्षमावान् ॥
गृहस्थको चाहिये कि वह अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हुए संतुष्ट रहे । ऋतुकालमें ही पत्नीके साथ समागम करे । शास्त्रोंकी आज्ञाका पालन करता रहे । शठता और कुटिलतासे दूर रहे । परिमित आहार ग्रहण करे । देवताओंकी आराधनामें तत्पर रहे । उपकार करनेवालोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट करे । सत्य बोले । सबके प्रति मृदुभाव रखे । किसीके प्रति क्रूर न बने और सदा क्षमाभाव रखे ।
सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च ।
धर्मस्तथार्थश्च रतिः स्वदारैः ।
निषेवितव्यानि सुखानि लोके ।
ह्यस्मिन् परे चैव मतं ममैतत् ॥
‘गृहस्थ पुरुष इस लोकमें सत्य, सरलता, अतिथि सत्कार, धर्म, अर्थ, अपनी पत्नीके प्रति अनुराग तथा सुखका सेवन करे । ऐसा होनेपर ही उसे परलोकमें भी सुख प्राप्त होते हैं, यह मेरा मत है’
भीष्म उवाच
यः स्याद् दान्तः सोमपश्चार्यशीलः ।
सानुक्रोशः सर्वसहो निराशीः ।
ऋजुर्मृदुरनृशंसः क्षमावान् ।
सवै विप्रो नेतरः पापकर्मा ॥
जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, सोमयाग करके सोमरस पीनेवाला, सदाचारी, दयालु, सब कुछ सहन करनेवाला, निष्काम, सरल, मृदु, क्रूरतारहित और क्षमाशील हो, वही ब्राह्मण कहलाने योग्य है । उससे भिन्न जो पापाचारी है, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिये ।
भीष्म उवाच
कृतज्ञो दृढभक्तिः स्यात् संविभागी जितेन्द्रियः ।
ईक्षितः प्रतिवीक्षेत मृदु वल्गु च सुष्ठु च ॥
राजा उपकार करनेवालोंके प्रति कृतज्ञ और अपने भक्तोंपर सुदृढ़ स्नेह रखनेवाला हो । उपभोगमें आनेवाली वस्तुओंको यथायोग्य विभाजन करके उन्हें काममें ले । इन्द्रियोंको वशमें रखे । जो उसकी ओर देखे, उसे वह भी देखे एवं स्वभावसे ही मृदु, मधुर और सरल हो ।
भीष्म उवाच
यथा पुत्रास्तथा पौत्रा द्रष्टव्यास्ते न संशयः ।
भक्तिश्चैषां न कर्तव्या व्यवहारे प्रदर्शिते ॥
निःसंदेह राजाको चाहिये कि वह अपनी प्रजाको पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति स्नेहदृष्टिसे देखे; परंतु जब न्याय करनेका अवसर प्राप्त हो, तब उसे स्नेहवश पक्षपात नहीं करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
श्रोतुं चैव न्यसेद् राजा प्राज्ञान् सर्वार्थदर्शिनः ।
व्यवहारेषु सततं तत्र राज्यं प्रतिष्ठितम् ॥
राजा न्याय करते समय सदा वादी-प्रतिवादीकी बातोंको सुननेके लिये अपने पास सर्वार्थदर्शी विद्वान् पुरुषोंको बिठाये रखे; क्योंकि विशुद्ध न्यायपर ही राज्य प्रतिष्ठित होता है ।
भीष्म उवाच
यस्यां भवन्ति भूतानि तद् विद्धि मनुजर्षभ ।
एष एव परो धर्मो यद् राजा दण्डनीतिमान् ॥
नरश्रेष्ठ! तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिये कि समस्त प्राणी दण्डनीतिके आधारपर ही टिके हुए हैं । राजा दण्डनीतिसे युक्त हो उसीके अनुसार चले-यही उसका सबसे बड़ा धर्म है ।
भीष्म उवाच
चरेद् धर्मानकटुको मुञ्चेत् स्नेहं न चास्तिकः ।
अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत् काममनुद्धतः ॥
(अब मैं क्रमशः उन गुणोंका वर्णन करता हूँ)-धर्मका आचरण करे, किंतु कटुता न आने दे ।-आस्तिक रहते हुए दूसरोंके साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े ।-क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही अर्थ-संग्रह करे ।-मर्यादाका अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे ।
भीष्म उवाच
आर्जवेन च सम्पन्नो धृत्या बुद्ध्या च भारत ।
यथार्थं प्रतिगृह्णीयात् कामक्रोधौ च वर्जयेत् ॥
भरतनन्दन! राजाको चाहिये कि वह सरल स्वभावसे सम्पन्न हो, धैर्य तथा बुद्धिके बलसे सत्यको ही ग्रहण करे और काम-क्रोधका परित्याग कर दे ।
भीष्म उवाच
दापयित्वा करं धर्म्यं राष्ट्रं नीत्या यथाविधि ।
तथैतं कल्पयेद् राजा योगक्षेममतन्द्रितः ॥
प्रजासे धर्मानुकूल कर ग्रहण करके राज्यका नीतिके अनुसार विधिपूर्वक पालन करते हुए राजाको आलस्य छोड़कर प्रजावर्गके योगक्षेमकी व्यवस्था करनी चाहिये ।
भीष्म उवाच
कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजानुतिष्ठति ।
न स धर्मं न चाप्यर्थं प्रतिगृह्णाति बालिशः ॥
जो राजा काम और क्रोधका आश्रय लेकर धन पैदा करना चाहता है, वह मूर्ख न तो धर्मको पाता है और न धन ही उसके हाथ लगता है ।
भीष्म उवाच
मा स्म लुब्धांश्च मूर्खाश्च कामार्थे च प्रयूयुजः ।
अलुब्धान् बुद्धिसम्पन्नान् सर्वकर्मसु योजयेत् ॥
तुम लोभी और मूर्ख मनुष्योंको काम और अर्थके साधनमें न लगाओ । जो लोभरहित और बुद्धिमान् हों, उन्हींको समस्त कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
अल्पं हि सारभूयिष्ठं यत् कर्मोदारमेव तत् ।
कृतमेवाकृताच्छ्रेयो न पापीयोऽस्त्यकर्मणः ॥
कोई काम देखनेमें छोटा होनेपर भी यदि उसमें सार अधिक हो तो वह महान् ही है । न करनेकी अपेक्षा कुछ करना ही अच्छा है; क्योंकि कर्तव्य-कर्म न करनेवालेसे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं है ।
भीष्म उवाच
यमाश्रित्य नरा राजन् वर्तयेयुर्यथासुखम् ।
अनाथास्तप्यमानाश्च दस्युभिः परिपीडिताः ॥
तमेव पूजयेयुस्ते प्रीत्या स्वमिव बान्धवम् ।
अभीरभीक्ष्णं कौरव्य कर्ता सन्मानमर्हति ॥
डाकुओंसे पीड़ित होकर कष्ट पाते हुए अनाथ मनुष्यगण जिसकी शरणमें जाकर सुखपूर्वक रह सकें, उसीको अपने बन्धु-वान्धवके समान मानकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसका आदर-सत्कार करना उनके लिये उचित है; क्योंकि कुरुनन्दन! जो निर्भय होकर बारंबार दूसरोंका संकट निवारण कर सके, वही राजोचित सम्मान पानेके योग्य है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
सम्मानयेत् पूजयेच्च वाचा नित्यं च कर्मणा ।
कुर्याच्च प्रियमेतेभ्यो नाप्रियं किञ्चिदाचरेत् ॥
राजाका कर्तव्य है कि वह सदा अपने जातीय बन्धुओंका वाणी और क्रियाद्वारा आदर-सत्कार करे । वह प्रतिदिन उनका प्रिय ही करता रहे । कभी कोई अप्रिय कार्य न करे ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
अयं तवार्थो ह्रियते यो ब्रूयादक्षमान्वितः ।
सम्बुबोधयिषुर्मित्रं सदश्वमिव सारथिः ।
अतिमन्युप्रसक्तो हि प्रसह्य हितकारणात् ।
तथाविधस्य सुहृदा क्षन्तव्यं स्वं विजानता ।
ऐश्वर्यमिच्छता नित्यं पुरुषेण बुभूषता ॥
‘जैसे सारथि अच्छे घोड़ेको सचेत करता है, उसी प्रकार यदि कोई मित्र मित्रको समझानेके लिये आया हो, मित्रकी हानि देखकर जो अत्यन्त दुखी हो और उसे सहन न कर सकनेके कारण जो हठपूर्वक अपने सुहृद् राजाका हितसाधन करनेके लिये उसके पास आकर कहे कि’ राजन्! तुम्हारे इस धनका अपहरण हो रहा है ‘तो सदा ऐश्वर्य और उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले विज्ञ एवं सुहृद् पुरुषको अपने उस हितकारी मित्रकी बात सुननी चाहिये और उसके अपराधको क्षमा कर देना चाहिये’
भीष्म उवाच
धर्मार्थकामज्ञमुपेत्य पृच्छेद् ।
युक्त गुरुं ब्राह्मणमुत्तरार्थम् ।
निष्ठा कृता तेन यदा सहः स्यात् ।
तं मन्त्रमार्गं प्रणयेदसक्तः ॥
राजा सावधान होकर धर्म, अर्थ और कामके ज्ञाता ब्राह्मणगुरुके समीप जा उनका उत्तर जाननेके लिये उनकी राय पूछे । जब वे कोई निर्णय दे दें और वह सब लोगोंको एक मतसे स्वीकार हो जाय, तब राजा दूसरे किसी विचारमें न पड़कर उसी मन्त्रमार्ग (विचारपद्धति) को कार्यरूपमें परिणत करे ।
भीष्म उवाच
धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः संधिविग्रहिको भवेत् ।
मतिमान् धृतिमान् ह्रीमान् रहस्यविनिगूहिता ॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नः शुक्लोऽमात्यः प्रशस्यते ।
एतैरेव गुणैर्युक्तस्तथा सेनापतिर्भवेत् ॥
सन्धि-विग्रहके अवसरको जाननेवाला, धर्मशास्त्रका तत्त्वज्ञ, बुद्धिमान्, धीर, लज्जावान्, रहस्यको गुप्त रखनेवाला, कुलीन, साहसी तथा शुद्ध हृदयवाला मन्त्री ही उत्तम माना जाता है । सेनापति भी इन्हीं गुणोंसे युक्त होना चाहिये ।
भीष्म → युधिष्ठिर
उच्चावचकरा दाप्या महाराज्ञा युधिष्ठिर ।
यथा यथा न सीदेरंस्तथा कुर्यान्महीपतिः ।
फलं कर्म च सम्प्रेक्ष्य ततः सर्वं प्रकल्पयेत् ॥
युधिष्ठिर! महाराजको चाहिये कि वह लोगोंकी हैसियतके अनुसार भारी और हलका कर लगावे । भूपालको उतना ही कर लेना चाहिये, जितनेसे प्रजा संकटमें न पड़ जाय । उनका कार्य और लाभ देखकर ही सब कुछ करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
यथा तासां च मन्येत श्रेय आत्मन एव च ।
तथा कर्माणि सर्वाणि राजा राष्ट्रेषु वर्तयेत् ॥
जिस प्रकारसे काम करनेपर प्रजाओंकी तथा अपनी भी भलाई समझमें आवे, वैसे ही समस्त कार्योंका राजा अपने राष्ट्रमें प्रचार करे ।
भीष्म उवाच
यथा शल्यकवानाखुः पदं धूनयते सदा ।
अतीक्ष्णेनाभ्युपायेन तथा राष्ट्रं समापिबेत् ॥
जैसे तीखे दाँतोंवाला चूहा सोये हुए मनुष्यके पैरके मांसको ऐसी कोमलतासे काटता है कि वह मनुष्य केवल पैरको कम्पित करता है, उसे पीड़ाका ज्ञान नहीं हो पाता । उसी प्रकार राजा कोमल उपायोंसे ही राष्ट्रसे कर ले, जिससे प्रजा दुखी न हो ।
भीष्म उवाच
न चास्थाने न चाकाले करांस्तेभ्यो निपातयेत् ।
आनुपूर्व्येण सान्त्वेन यथाकालं यथाविधि ॥
राजाको चाहिये कि परिस्थिति और समयके प्रतिकूल प्रजापर करका बोझ न डाले । समयके अनुसार प्रजाको समझा-बुझाकर उचित रीतिसे क्रमशः कर वसूल करे ।
भीष्म → राजन
उपायान् प्रब्रवीम्येतान् न मे माया विवक्षिता ।
अनुपायेन दमयन् प्रकोपयति वाजिनः ॥
राजन्! मैं ये उत्तम उपाय बतला रहा हूँ । मुझे छल-कपट या कूटनीतिकी बात बताना यहाँ अभीष्ट नहीं है । जो लोग उचित उपायका आश्रय न लेकर मनमाने तौरपर घोड़ोंका दमन करना चाहते हैं, वे उन्हें कुपित कर देते हैं (इसी तरह जो अयोग्य उपायसे प्रजाको दबाते हैं, वे उनके मनमें रोष उत्पन्न कर देते हैं)
भीष्म उवाच
एवं दण्डं च कोशं च मित्रं भूमिं च लप्स्यसि ।
सत्यार्जवपरो राजन् मित्रकोशबलान्वितः ॥
नरेश्वर! ऐसा करनेसे तुम्हें दण्डधारणकी शक्ति, खजाना, मित्र तथा राज्यकी भी प्राप्ति होगी। तुम सत्य और सरलतामें तत्पर रहकर मित्र, कोश और बलसे सम्पन्न हो जाओगे ।
वामदेव उवाच
न पूर्णोऽस्मीति मन्येत धर्मतः कामतोऽर्थतः ।
बुद्धितो मित्रतश्चापि सततं वसुधाधिपः ॥
राजाको चाहिये कि वह सदा धर्म, अर्थ, काम, बुद्धि और मित्रोंसे सम्पन्न होनेपर भी कभी अपनेको पूर्ण न माने-सदा उन सबके संग्रहको बढ़ानेकी ही चेष्टा करे ।
वामदेव उवाच
भोगेषूदयमानस्य भूतेषु च दयावतः ।
वर्धते त्वरमाणस्य विषयो रक्षितात्मनः ॥
जिसके वैभव-भोग दिनोंदिन बढ़ रहे हों, जो सब प्राणियोंपर दया रखता हो, काम करनेमें फुर्तीला हो और अपने शरीरकी रक्षाका ध्यान रखता हो, उस राजाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ।
भीष्म उवाच
क्षमा वै साधुमायाति न ह्यसाधून्क्षमा सदा ।
क्षमायाश्चाक्षमायाश्च पार्थ विद्धि प्रयोजनम् ॥
कुन्तीनन्दन! सत्पुरुषोंको ही सदा क्षमा करना आता है, दुष्टोंको नहीं । क्षमा करने और न करनेका प्रयोजन बताता हूँ; इसे सुनो और समझो ।
भीष्म → युधिष्ठिर
द्वेष्यो भवति भूतानामुग्रो राजा युधिष्ठिर ।
मृदुमप्यवमन्यन्ते तस्मादुभयमाचरेत् ॥
युधिष्ठिर! राजा यदि उग्रस्वभावका हो जाय तो वह समस्त प्राणियोंके द्वेषका पात्र बन जाता है और यदि सर्वथा कोमल हो जाय तो सभी उसकी अवहेलना करने लगते हैं; इसलिये उसे आवश्यकतानुसार उग्रता और कोमलता दोनोंसे काम लेना चाहिये ।
बृहस्पति उवाच
आर्तिरार्ते प्रिये प्रीतिरेतावन्मित्रलक्षणम् ।
विपरीतं तु बोद्धव्यमरिलक्षणमेव तत् ॥
यदि मित्रके पीड़ित होनेपर किसीको स्वयं भी पीड़ा होती हो और मित्रके प्रसन्न रहनेपर उसके मनमें भी प्रसन्नता छायी रहती हो तो यही मित्रके लक्षण हैं । इसके विपरीत जो किसीको पीड़ित देखकर प्रसन्न होता और प्रसन्न देखकर पीड़ाका अनुभव करता है तो समझना चाहिये कि यह शत्रुके लक्षण हैं ।
भीष्म उवाच
प्राज्ञान् शूरान् महोत्साहान् कर्मसु स्थिरपौरुषान् ।
मानयन्तः सदा युक्ता विवर्धन्ते गणा नृप ॥
नरेश्वर! संघराज्यके सदस्य सदा बुद्धिमान्, शूरवीर, महान् उत्साही और सभी कार्योंमें दृढ़ पुरुषार्थका परिचय देनेवाले लोगोंका सदा सम्मान करते हुए राज्यकी उन्नतिके लिये उद्योगशील बने रहते हैं । इसीलिये वे शीघ्र आगे बढ़ जाते हैं ।
भीष्म उवाच
यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः ।
मायाचारो मायया बाधितव्यः ।
साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥
जो मनुष्य जिसके साथ जैसा बर्ताव करे, उसके साथ भी उसे वैसा ही बर्ताव करना चाहिये; यह धर्म (न्याय) है। कपटपूर्ण आचरण करनेवालेको वैसे ही आचरणके द्वारा दबाना उचित है और सदाचारीको सद्व्यवहारके द्वारा ही अपनाना चाहिये ।
भीष्म उवाच
शुचेरपि हि युक्तस्य दोष एव निपात्यते ।
मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः ।
उत्पाद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीनशत्रवः ॥
कोई कितना ही शुद्ध और उद्योगी क्यों न हो, लोग उसपर दोषारोपण कर ही देते हैं । अपने धार्मिक कर्मोंमें लगे हुए वनवासी मुनिके भी शत्रु, मित्र और उदासीन — ये तीन पक्ष पैदा हो जाते हैं ।
भीष्म उवाच
न दुष्करमिदं पुत्र यत् प्रभुर्घातयेत् परम् ।
श्लाघनीया यशस्या च लोके प्रभवतां क्षमा ॥
बेटा! यदि शक्तिशाली राजा दूसरेको मरवा डाले तो यह उसके लिये कोई कठिन काम नहीं है; परंतु शक्तिशाली पुरुषोंमें यदि क्षमाका भाव हो तो संसारमें उसीकी बड़ाई की जाती है और उसीसे राजाओंका यश बढ़ता है ।
भीष्म उवाच
एवमेव यदा विद्वान् मन्यतेऽतिबलं रिपुम् ।
संश्रयेद् वैतसीं वृत्तिमेतत् प्रज्ञानलक्षणम् ॥
इस प्रकार विद्वान् राजा जब शत्रुके बलको अपनेसे अधिक समझे, तब बेंतका ही ढंग अपना ले; अर्थात् उसके सामने नतमस्तक हो जाय । यही बुद्धिमानीका लक्षण है ।
भीष्म उवाच
एवं राज्ञा मतिमता विदित्वा सत्यशौचताम् ।
आर्जवं प्रकृतिं सत्यं श्रुतं वृत्तं कुलं दमम् ॥
अनुक्रोशं बलं वीर्यं प्रभावं प्रश्रयं क्षमाम् ।
भृत्या ये यत्र योग्याः स्युस्तत्र स्थाप्याः सुरक्षिताः ॥
इसी प्रकार बुद्धिमान् राजाको चाहिये कि वह पहले अपने सेवकोंकी सच्चाई, शुद्धता, सरलता, स्वभाव, शास्त्रज्ञान, सदाचार, कुलीनता, जितेन्द्रियता, दया, बल, पराक्रम, प्रभाव, विनय तथा क्षमा आदिका पता लगाकर जो सेवक जिस कार्यके योग्य जान पड़ें, उन्हें उसीमें लगावे और उनकी रक्षाका पूरा-पूरा प्रबन्ध कर दे ।
भीष्म उवाच
नाहंवादी न निर्द्वन्द्वो न यत्किंचनकारकः ।
कृते कर्मण्यमात्यानां कर्ता भृत्यजनप्रियः ॥
वह अहंकार छोड़ दे, द्वन्द्वोंसे प्रभावित न हो, जो ही मनमें आवे वही न करने लगे, मन्त्रियोंके किये हुए कर्मका अनुमोदन करे और सेवकोंपर प्रेम रखे ।
भीष्म उवाच
साधवः कुलजाः शूरा ज्ञानवन्तोऽनसूयकाः ।
अक्षद्राः शुचयो दक्षाः स्युर्नराः पारिपार्श्वकाः ॥
साधु, कुलीन, शूरवीर, ज्ञानवान्, अदोषदर्शी, अच्छे स्वभाववाले, पवित्र और कार्यदक्ष मनुष्योंको ही राजा अपना पार्श्ववर्ती सेवक बनावे ।
भीष्म उवाच
तैक्ष्ण्यं जिह्मत्वमादाल्भ्यं सत्यमार्जवमेव च ।
मध्यस्थः सत्त्वमातिष्ठंस्तथा वै सुखमृच्छति ॥
राजा मध्यस्थ-भावसे रहकर तीक्ष्णता, कुटिल नीति, अभय-दान, सत्य, सरलता तथा श्रेष्ठभावका अवलम्बन करे । ऐसा करनेसे ही वह सुखका भागी होता है ।
भीष्म उवाच
व्यवसायं समाधाय सूर्यो रश्मीनिवायतान् ।
धर्ममेवाभिरक्षेत कृत्वा तुल्ये प्रियाप्रिये ॥
जैसे सूर्य अपनी विस्तृत किरणोंका आश्रय ले सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार राजा प्रिय और अप्रियको समान समझकर सुदृढ़ उद्योगका अवलम्बन करके धर्मकी ही रक्षा करे ।
भीष्म उवाच
धृतिर्दाक्ष्यं संयमो बुद्धिरात्मा ।
धैर्यं शौर्यं देशकालाप्रमादः ।
अल्पस्य वा बहुनो वा विवृद्धौ ।
धनस्यैतान्यष्ट समिन्धनानि ॥
धारणाशक्ति, चतुरता, संयम, बुद्धि, शरीर, धैर्य, शौर्य तथा देश-कालकी परिस्थितिसे असावधान न रहना — ये आठ गुण थोड़े या अधिक धनको बढ़ानेके मुख्य साधन हैं अर्थात् धनरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये ईंधन हैं ।
भीष्म → राजन
दण्डेन रक्ष्यमाणा हि राजन्नहरहः प्रजाः ।
राजानं वर्धयन्तीह तस्माद् दण्डः परायणम् ॥
राजन्! दण्डसे सुरक्षित रहती हुई प्रजा ही इस जगत् में अपने राजाको प्रतिदिन धन-धान्यसे सम्पन्न करती रहती है । इसलिये दण्ड ही सबको आश्रय देनेवाला है ।
भीष्म उवाच
भर्तृप्रत्यय उत्पन्नो व्यवहारस्तथापरः ।
तस्माद् यः स हितो दृष्टो भर्तृप्रत्ययलक्षणः ॥
स्वामी अथवा विचारकके विश्वासके अनुसार जो व्यवहार उत्पन्न होता है, वह (वादी-प्रतिवादीद्वारा उठाये हुए विवादसे उत्पन्न व्यवहारकी अपेक्षा) भिन्न है । उससे जो दण्ड दिया जाता है, उसका नाम है ‘भर्तृप्रत्ययलक्षण’ वह सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर देखा गया है (यह पहला भेद है)
वसुहोम उवाच
विभज्य दण्डः कर्तव्यो धर्मेण न यदृच्छया ।
दुष्टानां निग्रहो दण्डो हिरण्यं बाह्यतः क्रिया ॥
अतः धर्मके अनुसार न्याय-अन्यायका विचार करके ही दण्डका विधान करना चाहिये, मनमानी नहीं करनी चाहिये । दुष्टोंका दमन करना ही दण्डका मुख्य उद्देश्य है, स्वर्णमुद्राएँ लेकर खजाना भरना नहीं । दण्डके तौरपर सुवर्ण (धन) लेना तो बाह्यंग — गौण कर्म है ।
वसुहोम उवाच
व्यङ्गत्वं व शरीरस्य वधो नाल्पस्य कारणात् ।
शरीरपीडास्तास्ताश्च देहत्यागो विवासनम् ॥
किसी छोटे-से अपराधपर प्रजाका अंग-भंग करना, उसे मार डालना, उसे तरह-तरहकी यातनाएँ देना तथा उसको देहत्यागके लिये विवश करना अथवा देशसे निकाल देना कदापि उचित नहीं है ।
प्रह्लाद उवाच
ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते संयच्छन्ति च मां सदा ।
ते मां काव्यपथे युक्तं शुश्रूषुमनसूयकम् ॥
धर्मात्मानं जितक्रोधं नियतं संयतेन्द्रियम् ।
समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥
वे ब्राह्मण विश्वस्त होकर मुझे नीतिका उपदेश देते और सदा संयममें रखते हैं । मैं सदा ही यथाशक्ति शुक्राचार्यके बताये हुए नीतिमार्गपर चलता, ब्राह्मणोंकी सेवा करता, किसीके दोष नहीं देखता और धर्ममें मन लगाता हूँ । क्रोधको जीतकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें किये रहता हूँ । अतः जैसे मधुकी मक्खियाँ शहदके छत्तेको फूलोंके रससे सींचती रहती हैं, उसी प्रकार उपदेश देनेवाले ब्राह्मण मुझे शास्त्रके अमृतमय वचनोंसे सींचा करते हैं ।
प्रह्लाद ने उस ब्रह्मवादी ब्राह्मण से कहा।
धृतराष्ट्र उवाच
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ॥
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दया करना और यथाशक्ति दान देना — यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं ।
धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को शील के स्वरूप और उसे पाने के उपाय के विषय में बताया।
भीष्म उवाच
स्थापयेदेव मर्यादां जनचित्तप्रसादिनीम् ।
अल्पेऽप्यर्थे च मर्यादा लोके भवति पूजिता ॥
राजाको ऐसी ही मर्यादा स्थापित करनी चाहिये, जो सब लोगोंके चित्तको प्रसन्न करनेवाली हो । लोकमें छोटे-से काममें भी मर्यादाका ही मान होता है ।
भीष्म उवाच
परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् ।
देशकालावभिप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ॥
जो पुरुष सोच-समझकर या जान-बूझकर काम करनेवाला तथा सतत सावधान रहनेवाला है, वह अभीष्ट देश और कालका ठीक-ठीक उपयोग करता है और उनके सहयोगसे इच्छानुसार फल प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म उवाच
तस्माद् विश्वसितव्यं च विग्रहं च समाचरेत् ।
देशं कालं च विज्ञाय कार्याकार्यविनिश्चये ॥
अतः देश-कालको समझकर कर्तव्य-अकर्तव्यका निश्चय करके किसीपर विश्वास और किसीके साथ युद्ध करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
संधातव्यं बुधैर्नित्यं व्यवस्य च हितार्थिभिः ।
अमित्रैरपि संधेयं प्राणा रक्ष्या हि भारत ॥
भारत! कर्तव्यका विचार करके सदा हित चाहनेवाले विद्वान् मित्रोंके साथ संधि करनी चाहिये और आवश्यकता पड़नेपर शत्रुओंसे भी संधि कर लेनी चाहिये; क्योंकि प्राणोंकी रक्षा सदा ही कर्तव्य है ।
भीष्म उवाच
यो ह्यमित्रैर्नरो नित्यं न संदध्यादपण्डितः ।
न सोऽर्थं प्राप्नुयात् किंचित् फलान्यपि च भारत ॥
भारत! जो मूर्ख मानव शत्रुओंके साथ कभी किसी भी दशामें संधि ही नहीं करता, वह अपने किसी भी उद्देश्यको सिद्ध नहीं कर सकता और न कोई फल ही पा सकता है ।
भीष्म उवाच
यस्त्वमित्रेण संदध्यान्मित्रेण च विरुध्यते ।
अर्थयुक्तिं समालोक्य सुमहद् विन्दते फलम् ॥
जो स्वार्थसिद्धिका अवसर देखकर शत्रुसे तो संधि कर लेता है और मित्रोंके साथ विरोध बढ़ा लेता है, वह महान् फल प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म उवाच
यो विश्वसिति मित्रेषु न विश्वसिति शत्रुषु ।
अर्थयुक्तिमविज्ञाय यः प्रीतौ कुरुते मनः ।
मित्रे वा यदि वा शत्रौ तस्यापि चलिता मतिः ॥
जो मनुष्य स्वार्थके सम्बन्धका विचार किये बिना ही मित्रोंपर केवल विश्वास और शत्रुओंपर केवल अविश्वास करता जाता है तथा जो शत्रु हो या मित्र, जो सबके प्रति प्रेमभाव ही स्थापित करने लगता है, उसकी बुद्धि भी चंचल ही समझनी चाहिये ।
लोमश उवाच
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ।
समागतश्चरेद् युक्त्या कृतार्थो न च विश्वसेत् ॥
अपने और शत्रुके प्रयोजन यदि समान हों तो बलवान् शत्रुके साथ संधि करके उससे मिलकर युक्तिपूर्वक अपना काम बनावे और कार्य पूरा हो जानेपर फिर कभी उसका विश्वास न करे ।
भीष्म उवाच
क्षत्रिये संगतं नास्ति न प्रीतिर्न च सौहृदम् ।
कारणात् सान्त्वयन्त्येते कृतार्थाः संत्यजन्ति च ॥
क्षत्रियमें संगति निभानेकी भावना नहीं होती । उसमें न प्रेम होता है, न सौहार्द । ये किसी हेतु या स्वार्थसे ही दूसरोंको सान्त्वना देते हैं। जब इनका काम निकल जाता है, तब ये आश्रित व्यक्तिको त्याग देते हैं ।
पूजनी → राजन
सकृत् कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्बतः ।
न तद् बुधाः प्रशंसन्ति श्रेयस्तत्रापसर्पणम् ॥
पूजनी बोली — राजन्! एक बार किसीका अपराध करके फिर वहीं आश्रय लेकर रहे तो विद्वान् पुरुष उसके इस कार्यकी प्रशंसा नहीं करते हैं । वहाँसे भाग जानेमें ही उसका कल्याण है ।
पूजनी उवाच
सान्त्वे प्रयुक्ते सततं कृतवैरे न विश्वसेत् ।
क्षिप्रं स बध्यते मूढो न हि वैरं प्रशाम्यति ॥
जब किसीसे वैर बँध जाय तो उसकी चिकनी-चुपड़ी बातोंमें आकर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे वैरकी आग तो बुझती नहीं, वह विश्वास करनेवाला मूर्ख शीघ्र ही मारा जाता है ।
पूजनी उवाच
सर्वेषां कृतवैराणामविश्वासः सुखोदयः ।
एकान्ततो न विश्वासः कार्यो विश्वासघातकैः ॥
जो लोग आपसमें वैर रखनेवाले हैं, उन सबके लिये सुखकी प्राप्तिका उपाय यही है कि परस्पर विश्वास न करे । विश्वासघाती मनुष्योंका सर्वथा विश्वास तो करना ही नहीं चाहिये ।
पूजनी उवाच
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।
विश्वासाद् भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति ।
कामं विश्वासयेदन्यान् परेषां च न विश्वसेत् ॥
जो विश्वासपात्र न हो, उसपर विश्वास न करे। जो विश्वासका पात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि विश्वाससे उत्पन्न होनेवाला भय विश्वास करनेवालेका मूलोच्छेद कर डालता है । अपने प्रति दूसरोंका विश्वास भले ही उत्पन्न कर ले; किंतु स्वयं दूसरोंका विश्वास न करे ।
पूजनी उवाच
माता पिता बान्धवानां वरिष्ठौ ।
भार्या जरा बीजमात्रं तु पुत्रः ।
भ्राता शत्रुः क्लिन्नपाणिर्वयस्य ।
आत्मा ह्येकः सुखदुःखस्य भोक्ता ॥
माता और पिता स्वाभाविक स्नेह होनेके कारण बान्धवगणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, पत्नी वीर्यकी नाशक (होनेसे) वृद्धावस्थाका मूर्तिमान् रूप है, पुत्र अपना ही अंश है, भाई (धनमें हिस्सा बँटानेके कारण) शत्रु समझा जाता है और मित्र तभीतक मित्र है, जबतक उसका हाथ गीला रहता है अर्थात् जबतक उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहता है; केवल आत्मा ही सुख और दुःखका भोग करनेवाला कहा गया है ।
पूजनी उवाच
पूजितस्यार्थमानाभ्यां जन्तोः पूर्वापकारिणः ।
मनो भवत्यविश्वस्तं कर्म त्रासयतेऽबलान् ॥
जो पहलेका अपकार करनेवाला प्राणी है, वह दान और मानसे पूजित हो तो भी उसका मन विश्वस्त नहीं होता । अपना किया हुआ अनुचित कर्म ही दुर्बल प्राणियोंको डराता रहता है ।
पूजनी उवाच
कृतवैरे न विश्वासः कार्यस्त्विह सुहृद्यपि ।
छन्नं संतिष्ठते वैरं गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥
जिसने वैर बाँध लिया हो, ऐसे सुहृद्पर भी इस जगत्में विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जैसे लकड़ीके भीतर आग छिपी रहती है, उसी प्रकार उसके हृदयमें वैरभाव छिपा रहता है ।
पूजनी उवाच
वैरमन्तिकमासाद्य यः प्रीतिं कर्तुमिच्छति ।
मृन्मयस्येव भग्नस्य यथा संधिर्न विद्यते ॥
इस प्रकार मरणान्त वैर ठन जानेपर जो प्रेम करना चाहता है, उसका वह प्रेम उसी प्रकार असम्भव है, जैसे मिट्टीका बर्तन एक बार फूट जानेपर फिर नहीं जुटता है ।
पूजनी उवाच
निश्चयः स्वार्थशास्त्रेषु विश्वासश्चासुखोदयः ।
उशना चैव गाथे द्वै प्रह्लादायाब्रवीत् पुरा ॥
विश्वास दुःख देनेवाला है, यही नीतिशास्त्रोंका निश्चय है । प्रचीनकालमें शुक्राचार्यने भी प्रह्लादसे दो गाथाएँ कही थीं, जो इस प्रकार हैं ।
पूजनी उवाच
ये वैरिणः श्रद्दधते सत्ये सत्येतरेऽपि वा ।
वध्यन्ते श्रद्दधानास्तु मधु शुष्कतृणैर्यथा ॥
जैसे सूखे तिनकोंसे ढके हुए गड्ढेके ऊपर रखे हुए मधुको लेने जानेवाले मनुष्य मारे जाते हैं, उसी प्रकार जो लोग वैरीकी झूठी या सच्ची बातपर विश्वास करते हैं, वे भी बेमौत मरते हैं ।
पूजनी उवाच
तस्मात् सर्वं व्यपोह्यार्थं कार्य एव पराक्रमः ।
सर्वस्वमपि संत्यज्य कार्यमात्महितं नरैः ॥
अतः काल, दैव और स्वभाव आदि सारे पदार्थोंका भरोसा छोड़कर पराक्रम ही करना चाहिये । मनुष्यको सर्वस्वकी बाजी लगाकर भी अपने हितका साधन ही करना चाहिये ।
पूजनी उवाच
नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते ।
दाक्ष्येण कुर्वतः कर्म संयमात् प्रतितिष्ठति ॥
बुद्धिमान्के पास थोड़ा-सा धन हो तो वह भी सदा बढ़ता रहता है । वह दक्षतापूर्वक काम करते हुए संयमके द्वारा प्रतिष्ठित होता है ।
भीष्म उवाच
वाङ्मात्रेण विनीतः स्याद् हृदयेन यथा क्षुरः ।
श्लक्ष्णपूर्वाभिभाषी च कामक्रोधौ विवर्जयेत् ॥
राजा केवल बातचीतमें ही अत्यन्त विनयशील हो, हृदयको छूरेके समान तीखा बनाये रखे; पहले मुसकराकर मीठे वचन बोले तथा काम-क्रोधको त्याग दे ।
भीष्म उवाच
प्रत्युपस्थितकालस्य सुखस्य परिवर्जनम् ।
अनागतसुखाशा च नैव बुद्धिमतां नयः ॥
जिसके सुलभ होनेका समय आ गया हो, उस सुखको त्याग देना और भविष्यमें मिलनेवाले सुखकी आशा करना — यह बुद्धिमानोंकी नीति नहीं है ।
भीष्म उवाच
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडानुबन्धास्त्रय एव च ।
अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडाश्च परिवर्जयेत् ॥
धर्म, अर्थ और काम — इन त्रिविध पुरुषार्थोंके सेवनमें लोभ, मूर्खता और दुर्बलता — यह तीन प्रकारकी बाधा-अड़चन उपस्थित होती है । उसी प्रकार उनके शान्ति, सर्वहितकारी कर्म और उपभोग — ये तीन ही प्रकारके फल होते हैं । इन (तीनों प्रकारके) फलोंको शुभ जानना चाहिये; परंतु (उक्त तीनों प्रकारकी) बाधाओंसे यत्नपूर्वक बचना चाहिये ।
भीष्म उवाच
मृदुरित्यवजानन्ति तीक्ष्ण इत्युद्विजन्ति च ।
तीक्ष्णकाले भवेत् तीक्ष्णो मृदुकाले मृदुर्भवेत् ॥
राजा सदा कोमल रहे तो लोग उसकी अवहेलना करते हैं और सदा कठोर बना रहे तो उससे उद्विग्न हो उठते हैं, अतः जब कठोरता दिखाने का समय हो तो वह कठोर बने और जब कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेका अवसर हो तो कोमल बन जाय ।
भीष्म उवाच
पार्श्वतः करणं प्राज्ञो विष्टम्भित्वा प्रकारयेत् ।
जनस्तच्चरितं धर्मं विजानात्यन्यथान्यथा ॥
बुद्धिमान् पुरुष विचार करते समय पहले अपने प्रत्येक कार्यको गुप्त रखकर उसे प्रारम्भ करे; फिर उसे सर्वत्र प्रकाशित करे; अन्यथा उसके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मको लोग किसी और ही रूपमें समझने लगते हैं ।
मुनि उवाच
नरः पापसमाचारस्त्यक्तव्यो दूरतो बुधैः ।
आत्मानं योऽभिसंधत्ते सोऽन्यस्य स्यात् कथं हितः ॥
वास्तवमें जो पापाचारी हो, उसे विज्ञ पुरुषोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये । जो अपने आपको धोखा देता है, वह दूसरेका हितैषी कैसे हो सकता है?
भीष्म उवाच
आत्मनीष्टे तथानिष्टे रिपौ च समता तथा ।
इच्छाद्वेषक्षयं प्राप्य कामक्रोधक्षयं तथा ॥
अपने प्रिय मित्रमें तथा अप्रिय शत्रुमें भी समानभाव रखना ‘समता’ है । इच्छा (राग), द्वेष, काम और क्रोधको मिटा देना ही समताकी प्राप्तिका उपाय है ।
भीष्म उवाच
अक्षमायाः क्षमायाश्च प्रियाणीहाप्रियाणि च ।
क्षमते सम्मतः साधुः साध्वाप्नोति च सत्यवाक् ॥
जो सहने और न सहनेयोग्य व्यवहारों तथा प्रिय एवं अप्रिय वचनोंको भी समानरूपसे सहन कर लेता है, वही सर्वसम्मत क्षमाशील श्रेष्ठ पुरुष है । सत्यवादी पुरुषको ही उत्तम रीतिसे क्षमाभावकी प्राप्ति होती है ।
भीष्म उवाच
सर्वथा क्षमिणा भाव्यं तथा सत्यपरेण च ।
वीतहर्षभयक्रोधो धृतिमाप्नोति पण्डितः ॥
मनुष्यको सदा क्षमाशील होना तथा सत्यमें तत्पर रहना चाहिये । जिसने हर्ष, भय और क्रोध तीनोंको त्याग दिया है, उस विद्वान् पुरुषको ही ‘धैर्य’ की प्राप्ति होती है ।
भीष्म → तात
सत्यत्यागात् तु मात्सर्यमहितानां च सेवया ।
एतत् तु क्षीयते तात साधूनामुपसेवनात् ॥
सत्यका त्याग और दुष्टोंका साथ करनेसे मात्सर्य-दोषकी उत्पत्ति होती है । तात! श्रेष्ठ पुरुषोंकी सेवा और संगति करनेसे उसका नाश हो जाता है ।
विदुर → राजन
धर्मो राजन् गुणः श्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते ।
कामो यवीयानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
राजन्! धर्म ही श्रेष्ठ गुण है, अर्थको मध्यम बताया जाता है और काम सबकी अपेक्षा लघु है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ।
वैशम्पायन उवाच
तस्माद् धर्मप्रधानेन साध्योऽर्थः संयतात्मना ।
विश्वस्तेषु हि भूतेषु कल्पते सर्वमेव हि ॥
इसलिये मनुष्य अपने मनको संयममें रखकर जीवनमें धर्मको प्रधानता देते हुए पहले धर्माचरण करके ही फिर धनका साधन करे; क्योंकि धर्मपरायण पुरुषपर ही समस्त प्राणियोंका विश्वास होता है और जब सभी प्राणी विश्वास करने लगते हैं तब मनुष्यका सारा काम स्वतः सिद्ध हो जाता है ।
वैशम्पायन उवाच
धर्मं समाचरेत् पूर्वं ततोऽर्थं धर्मसंयुतम् ।
ततः कामं चरेत् पश्चात् सिद्धार्थः स हि तत्परम् ॥
अतः सबसे पहले धर्मका आचरण करे; फिर धर्मयुक्त धनका संग्रह करे । इसके बाद दोनोंकी अनुकूलता रखते हुए कामका सेवन करे । इस प्रकार त्रिवर्गका संग्रह करनेसे मनुष्य सफलमनोरथ हो जाता है ।
भीष्म उवाच
ये च दोषसमायुक्ता नराः प्रोक्ता मयानघ ।
तेषामप्यधमा राजन् कृतघ्ना मित्रघातकाः ।
त्यक्तव्यास्तु दुराचाराः सर्वेषामिति निश्चयः ॥
निष्पाप नरेश! मैंने जो दोषयुक्त मनुष्य बताये हैं, उन सबमें अधम होते हैं कृतघ्न । वे मित्रोंकी हत्यातक कर डालते हैं । ऐसे दुराचारी नराधमोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये । यह सबका निश्चय है ।
भीष्म → वत्स
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
अहो दुःखमिति ध्यायन् शोकस्यापचितिं चरेत् ॥
भीष्मजीने कहा — वत्स! जब धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तब ‘ओह! संसार कैसा दुःखमय है’ यह सोचकर मनुष्य शोकको दूर करनेवाले शम-दम आदि साधनोंका अनुष्ठान करे ।
पुत्र उवाच
अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगादयम् ।
अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति ॥
इसलिये जो कल्याणकारी कार्य हो, उसे आज ही कर डालिये । आपका यह समय हाथसे निकल न जाय; क्योंकि सारे काम अधूरे ही पड़े रह जायँगे और मौत आपको खींच ले जायगी ।
भीष्म उवाच
श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो मोहयत्यविचक्षणम् ।
सा तस्य चित्तं हरति शारदाभ्रमिवानिलः ॥
सदा धन-सम्पत्तिका सहवास मूर्ख मनुष्यके चित्तको लुभाकर उसे मोहमें ही डाले रहता है । जैसे वायु शरद् ऋतुके बादलोंको उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार वह सम्पत्ति मनुष्यके मनको हर लेती है ।
भीष्म उवाच
गृहारम्भो हि दुःखाय न सुखाय कदाचन ।
सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥
घर बनानेका खटपट करना दुःखका ही कारण है । उससे कभी सुख नहीं मिलता । देखो, साँप दूसरोंके बनाये हुए घर (बिल) में प्रवेश करके सुखसे रहता है । (अतः अनिकेत रहने — घर-द्वारके चक्करमें न पड़नेका उपदेश देनेके कारण सर्प गुरु हुआ)
भीष्म उवाच
सर्वे लाभाः साभिमाना इति सत्यवती श्रुतिः ।
संतोषणीयरूपोऽसि लोभाद् यदभिमन्यसे ॥
संसारमें जितने लाभ हैं, वे सभी अभिमानपूर्ण हैं, ऐसा सत्य अर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका कथन है (अर्थात् मैंने यह लाभ अपने पुरुषार्थसे किया है, ऐसा अहंकार प्रायः सभी मनुष्य कर लेते हैं) । आपका स्वरूप तो संतोष रखनेके योग्य है । आप लोभवश ही उसकी अवहेलना करते हैं ।
भीष्म उवाच
अलमन्यैरुपालम्भैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः ।
पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मनः ॥
दूसरोंको उलाहना देने तथा लोगोंके अन्यान्य अपराधोंकी चर्चा करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है । जो काम सुन्दर, अनुकूल और अपने लिये हितकर जान पड़े, वही कर्म करना चाहिये ।
भृगु उवाच
न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः ।
नान्योन्यं बध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः ।
परो ह्यधर्मो नैवास्ति संदेहो नापि जायते ॥
वहाँ किसीके मनमें परायी स्त्रियोंके प्रति लोभ नहीं होता । सब लोग अपनी ही स्त्रियोंमें अनुरक्त रहते हैं। वहाँके निवासी धनके लिये एक दूसरेका वध नहीं करते । किसीको बन्धनमें नहीं डालते । उन्हें कभी महान् विस्मय नहीं होता । अधर्मका तो वहाँ नाम भी नहीं है । वहाँ किसीके मनमें संदेह नहीं पैदा होता है ।
भीष्म उवाच
तृष्णाभिभूतस्तैर्बद्धस्तानेवाभिपरिप्लवन् ।
संसारतन्त्रवाहिन्यस्तत्र बुध्येत योषितः ॥
तृष्णासे अभिभूत तथा काम, क्रोध आदि दोषोंसे बद्ध होकर उन्हींका अनुसरण करता हुआ मनुष्य (महान् दुःख उठाता रहता है । यदि उनसे छूटनेकी इच्छा हो तो) स्त्रियोंको संसाररूपी वस्त्रको बुननेवाली तन्तुवाहिनी समझे और उनसे दूर रहे ।
भीष्म उवाच
वाक्प्रबद्धो हि संसारो विरागाद् व्याहरेद् यदि ।
बुद्ध्याप्यनुगृहीतेन मनसा कर्म तामसम् ॥
संसारका सारा व्यवहार वाणीसे ही बँधा हुआ है, अतः सदा उत्तम वाणी ही बोले और यदि वैराग्य हो तो बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके अपने किये हुए हिंसादि तामस कर्मोंको भी लोगोंसे कह दे (क्योंकि प्रकाशित कर देनेसे पापकी मात्रा घट जाती है)
भीष्म उवाच
अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता ।
सत्यं दानमनायासो नैष मार्गे दुरात्मनाम् ॥
किसीके दोष न देखना, हृदयमें क्षमाभाव रखना, शान्ति, संतोष, मीठे वचन बोलना, सत्य, दान तथा क्रियामें परिश्रमका बोध न होना-से सद्गुण हैं । दुरात्मा पुरुष इस मार्गसे नहीं चलते हैं ।
जैगीषव्य उवाच
अनीर्षवो न चान्योन्यं विहिंसन्ति कदाचन ।
न च जातूपतप्यन्ते धीराः परसमृद्धिभिः ॥
उनके मनमें एक-दूसरेके प्रति ईर्ष्या नहीं होती । वे कभी हिंसा नहीं करते तथा वे धीर पुरुष दूसरोंकी समृद्धियोंसे कभी मन-ही-मन जलते नहीं हैं ।
जैगीषव्य उवाच
अमित्राश्च न सन्त्येषां ये चामित्रा न कस्यचित् ।
य एवं कुर्वते मर्त्याः सुखं जीवन्ति सर्वदा ॥
न उनके कोई शत्रु होते हैं और न वे ही किसीके शत्रु होते हैं । जो मनुष्य ऐसा करते हैं, वे सदा सुखसे जीवन बिताते हैं ।
व्यास उवाच
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा ।
चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनोवाचं च कर्मणा ।
अप्रमादाद् भयं जह्याद् दम्भं प्राज्ञोपसेवनात् ॥
मनुष्य धैर्यका सहारा लेकर शिश्न और उदरकी रक्षा करे अर्थात् विषयभोग और भोजनकी चिन्ता दूर कर दे । नेत्रोंकी सहायतासे हाथ और पैरोंकी, मनके द्वारा नेत्र और कानोंकी तथा कर्मके द्वारा मन और वाणीकी रक्षा करे अर्थात् इनको शुद्ध बनावे । सावधानीके द्वारा भयका और विद्वान् पुरुषोंके सेवनसे दम्भका त्याग करे ।
व्यास उवाच
यदर्थं पृथगध्यास्ते मनस्तत्परिषीदति ।
पृथग्भूतं मनो बुद्ध्या मनो भवति केवलम् ॥
बुद्धि जिस विषयका अवलम्बन करती है, मन भी उसीका आश्रय लेता है । मन जब बुद्धिसे पृथक् होता है, तब केवल मन रह जाता है ।
सत्यवान् उवाच
तत्त्वाभेदेन यच्छास्त्रं तत् कार्यं नान्यथाविधम् ।
असमीक्ष्यैव कर्माणि नीतिशास्त्रं यथाविधि ॥
जो दण्ड-विधान शरीरके पाँचों तत्त्वोंको अलग-अलग न कर सके अर्थात् किसीके प्राण न ले, उसीका प्रयोग करना चाहिये । नीतिशास्त्रकी आलोचना और अपराधीके कार्यपर भलीभाँति विचार किये बिना ही इसके विपरीत कोई दण्ड नहीं देना चाहिये ।
सत्यवान् उवाच
आत्मानमसमाधाय समाधित्सति यः परान् ।
विषयेष्विन्द्रियवशं मानवाः प्रहसन्ति तम् ॥
जो राजा स्वयं विषय भोगनेके लिये इन्द्रियोंका दास हो रहा है, अपने मनको काबूमें नहीं रख पाता, वह यदि दूसरोंको सदाचारका उपदेश देने लगे तो लोग उसकी हँसी उड़ाते हैं ।
पुत्र उवाच
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्निकम् ।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम् ॥
इसलिये जिस कामको कल करना हो, उसे आज ही कर ले । जिसे अपराह्णमें करना हो, उसे पूर्वाह्णमें ही कर डाले; क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसका काम पूरा हो गया या नहीं ।
नारद उवाच
यत् तु निश्रेयसं सम्यक् तच्चैवासंशयात्मकम् ।
अनुग्रहं च मित्राणाममित्राणां च निग्रहम् ।
संग्रहं च त्रिवर्गस्य श्रेय आहुर्मनीषिणः ॥
जो अच्छी तरह कल्याण करनेवाला साधन होता है, वह सर्वथा संशयरहित होता है । सुहृदोंपर अनुग्रह करना, शत्रुभाव रखनेवाले दुष्टोंको दण्ड देना तथा धर्म, अर्थ और कामका संग्रह करना — इसे मनीषी पुरुष श्रेय कहते हैं ।
नारद उवाच
दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च संविभागोऽतिथिष्वपि ।
असंत्यागश्च भृत्यानां श्रेय एतदसंशयम् ॥
देवताओं, पितरों और अतिथियोंको उनका भाग देना तथा भरण-पोषण करनेयोग्य व्यक्तियोंका त्याग न करना — यह कल्याणका निश्चित साधन है ।
पराशर उवाच
अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत् ।
पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वयं कृतम् ।
तस्मात् पापं न सेवेत कर्म दुःखफलोदयम् ॥
अनजानमें जो पाप बन जाय उसे तपस्याके द्वारा नष्ट कर दे; क्योंकि अपना किया हुआ पापकर्म पापरूप दुःखके रूपमें ही फलता है । अतः दुःखमय फल देनेवाले पापकर्मका कदापि सेवन न करे ।
पराशर उवाच
पापानुबन्धं यत् कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् ।
तन्न सेवेत मेधावी शुचिः कुशलिनं यथा ॥
पापसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कर्म है उसका कितना ही बड़ा लौकिक सुखरूप फल क्यों न हो; बुद्धिमान् पुरुष उसका कदापि सेवन न करे । वह उससे उसी तरह दूर रहे जैसे पवित्र मनुष्य चाण्डालसे ।
पराशर → राजन
कः कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रयच्छति ।
प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना ॥
पराशरजी कहते हैं — राजन्! कौन किसका उपकार करता है और कौन किसको देता है? यह प्राणी सारा कार्य स्वयं अपने ही लिये करता है ।
पराशर उवाच
अपो हि प्रयतः शीतास्तापिता ज्वलनेन वा ।
शक्तितोऽतिथये दत्त्वा क्षुधार्तायाश्नुते फलम् ॥
जो मौसमका विचार करके अपनी शक्तिके अनुसार प्यासे और भूखे अतिथिको ठंडा या गरम किया हुआ जल और अन्न पवित्रभावसे अर्पण करता है, वह उत्तम फल पाता है ।
पराशर उवाच
येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण धिगस्तु तान् ।
धर्मं वै शाश्वतं लोके न जह्याद् धनकाङ्क्षया ॥
धर्मका पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है । जो अधर्मसे प्राप्त होता है, वह धन तो धिक्कार देने योग्य है। संसारमें धनकी इच्छासे शाश्वत धर्मका त्याग कभी नहीं करना चाहिये ।
पराशर उवाच
न संकरेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद् विचक्षणः ।
धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत् कल्याणमुच्यते ॥
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह धर्म करनेके लिये न्यायको त्यागकर पापमिश्रित मार्गसे धनका संग्रह न करे; क्योंकि उसे कल्याणकारी नहीं बताया जाता है ।
पराशर उवाच
विस्तराः क्लेशसंयुक्ताः संक्षेपास्तु सुखावहाः ।
परार्थं विस्तराः सर्वे त्यागमात्महितं विदुः ॥
क्रियाओंका विस्तार क्लेशदायक होता है और संक्षेप सुखदायक है । सभी कर्मविस्तार परार्थरूप अर्थात् मन और इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये होते हैं, परंतु त्याग अपने लिये हितकर माना गया है ।
पराशर उवाच
संकल्पजो मित्रवर्गो ज्ञातयः कारणात्मकाः ।
भार्या पुत्रश्च दासश्च स्वमर्थमनुयुज्यते ॥
कोई-न-कोई संकल्प (मनोरथ) लेकर ही लोग मित्र बनते हैं, कुटुम्बी जन भी किसी हेतुसे ही नाता रखते हैं, पत्नी, पुत्र और सेवक सभी अपने-अपने स्वार्थका ही अनुसरण करते हैं ।
हंस उवाच
आक्रुश्यमानो नाक्रुश्येन्मन्युरेनं तितिक्षतः ।
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥
साध्यगणोंको हंसरूपमें ब्रह्माजीका उपदेश जो दूसरेके द्वारा गाली दी जानेपर भी बदलेमें उसे गाली नहीं देता, उस क्षमाशील मनुष्यका दबा हुआ क्रोध ही उस गाली देनेवालेको भस्म कर देता है और उसके पुण्यको भी ले लेता है ।
हंस उवाच
अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय आहुः ।
सत्यं वदेद् व्याहृतं तद् द्वितीयम् ।
धर्मं वदेद् व्याहृतं तत् तृतीयं ।
प्रियं वदेद् व्याहृतं तच्चतुर्थम् ॥
व्यर्थ बोलनेकी अपेक्षा मौन रहना अच्छा बताया गया है, (यह वाणीकी प्रथम विशेषता है) सत्य बोलना वाणीकी दूसरी विशेषता है, प्रिय बोलना वाणीकी तीसरी विशेषता है । धर्मसम्मत बोलना यह वाणीकी चौथी विशेषता है (इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है)
वसिष्ठ → राजन
नावेदनिष्ठस्य जनस्य राजन् ।
प्रदेयमेतत् परमं त्वया भवेत् ।
विधित्समानाय विबोधकारण ।
प्रबोधहेतोः प्रणतस्य शासनम् ॥
राजन्! जो मनुष्य वेदमें श्रद्धा रखनेवाला न हो, उसे इस उत्तम ज्ञानका उपदेश तुम्हें नहीं करना चाहिये । जिसे बोधके लिये अधिक प्यास हो तथा जो जिज्ञासुभावसे शरणमें आया हो, वही इस उपदेशको सुननेका अधिकारी है ।
वसिष्ठ उवाच
न देयमेतच्च तथानृतात्मने ।
शठाय क्लीबाय न जिह्मबुद्धये ।
न पण्डितज्ञानपरोपतापिने ।
देयं तु देयं च निबोध यादृशे ॥
असत्यवादी, शठ, नीच, कपटी, अपनेको पण्डित माननेवाले और दूसरेको कष्ट पहुँचानेवाले मनुष्यको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । कैसे पुरुषको इस ज्ञानका उपदेश देना और अवश्य देना चाहिये — यह भी सुन लो ।
ऋषि उवाच
स एव धर्मः सोऽधर्मस्तं तं प्रति नरं भवेत् ।
पात्रकर्मविशेषेण देशकालाववेक्ष्य च ॥
देश, काल, पात्र और कर्मविशेषपर विचार करनेसे एक ही कर्म भिन्न-भिन्न मनुष्यके लिये धर्म और अधर्मरूप हो जाता है ।
व्यास उवाच
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्निकम् ।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वाकृतम् ॥
जो काम कल करना हो, उसे आज ही कर लेना चाहिये और जो दोपहर-बाद करना हो, उसे पहले ही पहरमें पूरा कर डालना चाहिये; क्योंकि मौत यह नहीं देखती कि इसका काम पूरा हुआ है या नहीं ।
भीष्म उवाच
अलमन्यैरुपालब्धैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः ।
पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मनः ॥
दूसरोंको उलाहना देने तथा लोगोंके अन्यान्य अपराधोंकी चर्चा करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है । जो सुन्दर, अनुकूल और अपने लिये हितकर जान पड़े, वही कर्म करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
अहंकारो न कर्तव्यो याज्ये तस्मिन् नराधिपे ।
स्थातव्यं च वशे तस्य स ते छेत्स्यति संशयम् ॥
राजा जनक मेरे यजमान हैं, ऐसा समझकर उनके प्रति अहंकार न प्रकट करना तथा सब प्रकारसे उनकी आज्ञाके अधीन रहना । वे तुम्हारी सब शंकाओंका समाधान कर देंगे ।
भीष्म उवाच
यस्मिन् यस्मिंश्च विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥
भरतश्रेष्ठ! जो-जो मनुष्य जिस-जिस विषय-स्वर्ग या मोक्षके लिये साधन करके उसमें सुनिश्चित सफलताको प्राप्त कर लेता है, उसी साधन या धर्मको वह श्रेष्ठ समझता है, दूसरेको नहीं ।