श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २
धर्म–आचरण
कर्तव्य और सदाचरण
92 पद्य
महाभारत — खण्ड २
वैशम्पायन उवाच
अनीचैर्नाप्यविषयैर्नाधर्मिष्ठैर्विशेषतः ।
ये गुणाः कीर्तिता लोके धर्मकामार्थसम्भवाः ।
लोकाचारेषु सम्भूता वेदोक्ताः शिष्टसम्मताः ॥
उत्तम, प्रसिद्ध एवं विशेषतः धर्मिष्ठ मनुष्योंने लोकमें धर्म, अर्थ और कामकी उत्पत्तिके हेतुभूत जो वेदोक्त गुण (साधन) बताये हैं वे ही लोकाचारमें प्रकट होते हैं — लोगोंद्वारा काममें लाये जाते हैं और शिष्ट पुरुष उन्हींका आदर करते हैं ।
युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि ।
धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः ॥
‘युधिष्ठिर! इस प्रकार आपके लिये किसी भी वस्तुकी अभिलाषा करनी उचित नहीं है । यदि आपको धर्मसे ही प्रयोजन हो तो धनकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दें’
शौनक उवाच
तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च ।
तस्माद् धर्मानिमान् सर्वान् नाभिमानात् समाचरेत् ॥
वेदकी यह आज्ञा है कि कर्म करो और कर्म छोड़ो; अतः आगे बताये जानेवाले इन सभी धर्मोंका अहंकारशून्य होकर अनुष्ठान करना चाहिये ।
शौनक उवाच
इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः ।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥
यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग — ये धर्मके आठ मार्ग हैं ।
शौनकजी ने युधिष्ठिर से कहा।
विदुर उवाच
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र ।
राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति ।
धर्मे राजन् वर्तमानः स्वशक्त्या ।
पुत्रान् सर्वान् पाहि पाण्डोः सुतांश्च ॥
विदुरजीने कहा — नरेन्द्र! धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंकी प्राप्तिका मूल कारण धर्म ही है । धर्मात्मा पुरुष इस राज्यकी जड़ भी धर्मको ही बतलाते हैं, अतः महाराज! आप धर्मके मार्गपर स्थिर रहकर यथाशक्ति अपने तथा पाण्डुके सब पुत्रोंका पालन कीजिये ।
मार्कण्डेय → तात
भूपाश्च नाभागभगीरथादयो ।
महीमिमां सागरान्तां विजित्य ।
सत्येन तेऽप्यजयंस्तात लोकान् ।
नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥
नाभाग और भगीरथ आदि राजाओंने भी समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको जीतकर सत्यके द्वारा उत्तम लोकोंपर विजय पायी । इसलिये तात! अपनेको बलका स्वामी मानकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ।
मार्कण्डेय उवाच
धात्रा विधियों विहितः पुराणै ।
स्तं पूजयन्तो नरवर्य सन्तः ।
सप्तर्षयः पार्थ दिवि प्रभान्ति ।
नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥
मनुष्योंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार! विधाताने पुरातन वेदवाक्योंद्वारा जो अग्निहोत्र आदि कर्मोंका विधान किया है, उसका समादर करनेके कारण ही साधु सप्तर्षिगण देवलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं । अतः अपनेको शक्तिशाली मानकर कभी अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ।
वैशम्पायन उवाच
चरन् नैःश्रेयसं धर्मं प्रजापालनकारितम् ।
नाध्यगच्छद् बलिर्लोके तीर्थमन्यत्र वै द्विजात् ॥
राजा बलिको प्रजापालनजनित कल्याणकारी धर्मका आचरण करनेके लिये ब्राह्मणका आश्रय लेनेके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं जान पड़ा था ।
युधिष्ठिर उवाच
तस्माच्छश्वत् त्यजेत् क्रोधं पुरुषः सम्यगाचरन् ।
श्रेयान् स्वधर्मानपगो न क्रुद्ध इति निश्चितम् ॥
अतः सदाचारी पुरुष सदा क्रोधका परित्याग करे । अपने वर्णधर्मके अनुसार न चलनेवाला मनुष्य (अपेक्षाकृत) अच्छा, किंतु क्रोधी नहीं अच्छा — यह निश्चय है ।
द्रौपदी उवाच
अनन्या हि नरव्याघ्र नित्यदा धर्ममेव ते ।
बुद्धिः सततमन्वेति च्छायेव पुरुषं निजा ॥
नरश्रेष्ठ! जैसे अपनी छाया सदा मनुष्यके पीछे चलती है, उसी प्रकार आपकी बुद्धि सदा अनन्यभावसे धर्मका ही अनुसरण करती है ।
युधिष्ठिर उवाच
नाहं कर्मफलान्वेषी राजपुत्रि चराम्युत ।
ददामि देयमित्येव यजे यष्टव्यमित्युत ॥
राजकुमारी! मैं कर्मोंके फलकी इच्छा रखकर उनका अनुष्ठान नहीं करता; अपितु ‘देना कर्तव्य है’ यह समझकर दान देता हूँ और यज्ञको भी कर्तव्य मानकर ही उसका अनुष्ठान करता हूँ ।
युधिष्ठिर उवाच
अस्तु वात्र फलं मा वा कर्तव्यं पुरुषेण यत् ।
गृहे वा वसता कृष्णे यथाशक्ति करोमि तत् ॥
कृष्णे! यहाँ उस कर्मका फल हो या न हो, गृहस्थ आश्रममें रहनेवाले पुरुषका जो कर्तव्य है, मैं उसीका यथाशक्ति कर्तव्यबुद्धिसे पालन करता हूँ ।
युधिष्ठिर ने द्रौपदी से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
धर्मं चरामि सुश्रोणि न धर्मफलकारणात् ।
आगमाननतिक्रम्य सतां वृत्तमवेक्ष्य च ॥
धर्म एव मनः कृष्णे स्वभावाच्चैव मे धृतम् ।
धर्मवाणिज्यको हीनो जघन्यो धर्मवादिनाम् ॥
सुश्रोणि! मैं धर्मका फल पानेके लोभसे धर्मका आचरण नहीं करता, अपितु साधु पुरुषोंके आचार-व्यवहारको देखकर शास्त्रीय मर्यादाका उल्लंघन न करके स्वभावसे ही मेरा मन धर्मपालनमें लगा है । द्रौपदी! जो मनुष्य कुछ पानेकी इच्छासे धर्मका व्यापार करता है, वह धर्मवादी पुरुषोंकी दृष्टिमें हीन और निन्दनीय है ।
युधिष्ठिर ने द्रौपदी से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
न धर्मफलमाप्नोति यो धर्मं दोग्धुमिच्छति ।
यश्चैनं शङ्कते कृत्वा नास्तिक्यात् पापचेतनः ॥
जो पापात्मा मनुष्य नास्तिकतावश धर्मका अनुष्ठान करके उसके विषयमें शंका करता है अथवा धर्मको दुहना चाहता है अर्थात् धर्मके नामपर स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है, उसे धर्मका फल बिलकुल नहीं मिलता ।
युधिष्ठिर उवाच
यस्तु नित्यं कृतमतिर्धर्ममेवाभिपद्यते ।
अशङ्कमानः कल्याणि सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ॥
कल्याणी! जो सदा धर्मके विषयमें पूर्ण निश्चय रखनेवाला है और सब प्रकारकी आशंकाएँ छोड़कर धर्मकी ही शरण लेता है, वह परलोकमें अक्षय अनन्त सुखका भागी होता है अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।
युधिष्ठिर उवाच
तपश्च ब्रह्मचर्यं च यज्ञः स्वाध्याय एव च ।
दानमार्जवमेतानि यदि स्युरफलानि वै ॥
नाचरिष्यन् परे धर्मं परे परतरे च ये ।
विप्रलम्भोऽयमत्यन्तं यदि स्युरफलाः क्रियाः ॥
ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वासुरराक्षसाः ।
ईश्वराः कस्य हेतोस्ते चरेयुर्धर्ममादृताः ॥
यदि तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, स्वाध्याय, दान और सरलता आदि धर्म निष्फल होते तो पहले जो श्रेष्ठ और श्रेष्ठतर पुरुष हुए हैं वे धर्मका आचरण नहीं करते । यदि धार्मिक क्रियाओंका कुछ फल नहीं होता, वे सब निरी ठगविद्या होतीं तो ऋषि, देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस प्रभावशाली होते हुए भी किसलिये आदरपूर्वक धर्मका आचरण करते ।
युधिष्ठिर उवाच
न फलादर्शनाद् धर्मः शङ्कितव्यो न देवताः ।
यष्टव्यं च प्रयत्नेन दातव्यं चानसूयता ॥
धर्मका फल तुरंत दिखायी न दे तो इसके कारण धर्म एवं देवताओंपर आशंका नहीं करनी चाहिये । दोषदृष्टि न रखते हुए यत्नपूर्वक यज्ञ और दान करते रहना चाहिये ।
युधिष्ठिर ने द्रौपदी से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
तस्मात् ते संशयः कृष्णे नीहार इव नश्यतु ।
व्यवस्य सर्वमस्तीति नास्तिक्यं भावमुत्सृज ॥
इसलिये कृष्णे! सब कुछ सत्य है, ऐसा निश्चय करके तुम्हारा धर्मविषयक संदेह कुहरेकी भाँति नष्ट हो जाना चाहिये । तुम अपने इस नास्तिकतापूर्ण विचारको त्याग दो ।
भीम उवाच
धर्ममूलं जगद् राजन् नान्यद् धर्माद् विशिष्यते ।
धर्मश्चार्थेन महता शक्यो राजन् निषेवितुम् ॥
महाराज! इस जगत्का मूल कारण धर्म ही है । इस जगत्में धर्मसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है । उस धर्मका अनुष्ठान भी महान् धनसे ही हो सकता है ।
युधिष्ठिर उवाच
मम प्रतिज्ञां च निबोध सत्यां ।
वृणे धर्मममृताज्जीविताच्च ।
राज्यं च पुत्राश्च यशो धनं च ।
सर्वं न सत्यस्य कलामुपैति ॥
किंतु भीमसेन! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो । मैं जीवन और अमरत्वकी अपेक्षा भी धर्मको ही बढ़कर समझता हूँ। राज्य, पुत्र, यश और धन — ये सब-के-सब सत्यधर्मकी सोलहवीं कलाको भी नहीं पा सकते ।
युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा।
वैशम्पायन → तात
कस्त्वं तातेह सम्प्राप्तो धनुष्मान् कवची शरी ।
निबद्धासितलत्राणः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥
नेह शस्त्रेण कर्तव्यं शान्तानामेष आलयः ।
विनीतक्रोधहर्षाणां ब्राह्मणानां तपस्विनाम् ॥
तात! तुम कौन हो? जो धनुष-बाण, कवच, तलवार तथा दस्तानेसे सुसज्जित हो क्षत्रियधर्मका अनुगमन करते हुए यहाँ आये हो । यहाँ अस्त्र-शस्त्रकी आवश्यकता नहीं है । यह तो क्रोध और हर्षको जीते हुए तपस्यामें तत्पर शान्त ब्राह्मणोंका स्थान है ।
बृहदश्व उवाच
वंशभोज्यमिदं राज्यमर्थितव्यं यथा तथा ।
येन केनाप्युपायेन वृद्धानामिति शासनम् ॥
यह राज्य हमारी वंशपरम्पराके उपभोगमें आनेवाला है । जिस किसी उपायसे भी जैसे-तैसे इसका उद्धार करना चाहिये; ऐसा वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ।
पुलस्त्य उवाच
मनसा तानि गच्छेत सर्वतीर्थसमीक्षया ।
एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ।
ऋषिभिर्देवकल्पैश्च स्नातानि सुकृतैषिभिः ।
एवं त्वमपि कौरव्य विधिनानेन सुव्रत ।
व्रज तीर्थानि नियतः पुण्यं पुण्येन वर्धयन् ।
भावितैः करणैः पूर्वमास्तिक्याच्छ्रुतिदर्शनात् ।
प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शास्त्रानुदर्शिभिः ।
नाव्रती नाकृतात्मा च नाशुचिर्न च तस्करः ।
स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः ।
त्वया तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना ।
पिता पितामहश्चैव सर्वे च प्रपितामहाः ।
पितामहपुरोगाश्च देवाः सर्षिगणा नृप ।
तव धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाभितोषिताः ।
अवाप्स्यसि त्वं लोकान् वै वसूनां वासवोपम ।
कीर्तिं च महतीं भीष्म प्राप्स्यसे भुवि शाश्वतीम् ॥
सम्पूर्ण तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मनुष्य जहाँ जाना सम्भव न हो उन अगम्य तीर्थोंमें मनसे यात्रा करे, अर्थात् मनसे उन तीर्थोंका चिन्तन करे । वसुगण, साध्यगण, आदित्यगण, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार तथा देवोपम महर्षियोंने भी पुण्य लाभकी इच्छासे उन तीर्थोंमें स्नान किया है । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुनन्दन! इसी प्रकार तुम भी विधिपूर्वक शौच-संतोषादि नियमोंका पालन करते और पुण्यसे पुण्यको बढ़ाते हुए उन तीर्थोंकी यात्रा करो । आस्तिकता और वेदोंके अनुशीलनसे पहले अपने इन्द्रियोंको पवित्र करके शास्त्रज्ञ साधु पुरुष ही उन तीर्थोंको प्राप्त करते हैं । कुरुनन्दन! जो ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन नहीं करता, जिसने अपने चित्तको वशमें नहीं किया, जो अपवित्र आचार-विचारवाला और चोर है, जिसकी बुद्धि वक्र है, ऐसा मनुष्य श्रद्धा न होनेके कारण तीर्थोंमें स्नान नहीं करता । तुम धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा नित्य सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हो । धर्मज्ञ! तुमने पिता-पितामह प्रपितामह, ब्रह्मा आदि देवता तथा महर्षिगण इन सबको सदा स्वधर्मपालनसे संतुष्ट किया है, अतः इन्द्रके समान तेजस्वी नरेश! तुम वसुओंके लोकमें जाओगे । भीष्म! तुम्हें इस पृथ्वीपर विशाल एवं अक्षय कीर्ति प्राप्त होगी ।
बलदेव उवाच
अयं स धर्मप्रभवो नरेन्द्रो ।
धर्मे धृतः सत्यधृतिः प्रदाता ।
चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो ।
धर्मादपेतस्तु कथं विवर्धेत् ॥
ये राजा युधिष्ठिर साक्षात् धर्मके पुत्र हैं । धर्म ही इनका आधार है । ये सदा सत्यका आश्रय लेते और दान देते रहते हैं । कुन्तीकुमार युधिष्ठिर राज्य और सुख छोड़ सकते हैं, (परंतु धर्मका त्याग नहीं कर सकते) भला, धर्मसे दूर होकर कोई कैसे अभ्युदयका भागी हो सकता है?
वासुदेव उवाच
न ह्येष कामान्न भयान्न लोभाद् ।
युधिष्ठिरो जातु जह्यात् स्वधर्मम् ।
भीमार्जुना चातिरथौ यमौ च ।
तथैव कृष्णा द्रुपदात्मजेयम् ॥
कामना, भय अथवा लोभ किसी भी कारणसे युधिष्ठिर अपना धर्म कदापि नहीं छोड़ सकते । उसी तरह अतिरथी वीर भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा यह द्रुपदकुमारी कृष्णा भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकती ।
श्येन → राजन
गुरुलाघवमादाय धर्माधर्मविनिश्चये ।
यतो भूयांस्ततो राजन् कुरुष्व धर्मनिश्चयम् ॥
राजन्! धर्म और अधर्मका निर्णय करते समय पुण्य और पापके गौरव-लाघवपर ही दृष्टि रखकर विचार कीजिये तथा जिसमें अधिक पुण्य हो उसीको आचरणमें लाने योग्य धर्म ठहराइये ।
अष्टावक्र उवाच
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥
अधिक वर्षोंकी अवस्था होनेसे, बाल पकनेसे, धन बढ़ जानेसे और अधिक भाई-बन्धु हो जानेसे भी कोई बड़ा हो नहीं सकता; ऋषियोंने ऐसा नियम बनाया है कि हम ब्राह्मणोंमें जो अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय करनेवाला तथा वक्ता है, वही बड़ा है ।
युधिष्ठिर उवाच
सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीयसा ।
ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभयस्य च ॥
स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माययाभिजिघांसतः ।
अपि वज्रधरस्यापि भवेत् कालविषोपमः ॥
जो छोटे लोगोंके आक्षेप करनेपर भी सदा क्षमाशील होनेके कारण उस आक्षेपको सह लेता है तथा सरल मार्गसे अपनी शरणमें आनेवाले लोगोंको सुख पहुँचाकर उन्हें अभयदान देता है, वही अर्जुन, जब कोई कुटिल मार्गका आश्रय ले छल-कपटसे उसपर आघात करना चाहता है तब वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उसके लिये काल और विषके समान भयंकर हो जाता है ।
हनुमान् उवाच
वयं धर्म न जानीमस्तिर्यग्योनिमुपाश्रिताः ।
नरास्तु बुद्धिसम्पन्ना दयां कुर्वन्ति जन्तुषु ॥
हमलोग तो पशुयोनिके प्राणी हैं, अतः धर्मकी बात नहीं जानते; परंतु मनुष्य बुद्धिमान् होते हैं, अतः वे सब जीवोंपर दया करते हैं ।
हनुमानजी ने भीमसेन से कहा।
हनुमान् उवाच
क्रूरेषु कर्मसु कथं देहवाक्चित्तदूषिषु ।
धर्मघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥
किंतु पता नहीं, तुम्हारे-जैसे बुद्धिमान्लोग धर्मका नाश करनेवाले तथा मन, वाणी और शरीरको भी दूषित कर देनेवाले क्रूर कर्मोंमें कैसे प्रवृत्त होते हैं?
हनुमानजी ने भीमसेन से कहा।
हनुमान् → तात
कृतं नाम युगं तात यत्र धर्मः सनातनः ।
कृतमेव न कर्तव्यं तस्मिन् काले युगोत्तमे ॥
हनुमान्जी बोले — तात! सबसे पहला कृतयुग है । उसमें सनातनधर्मकी पूर्ण स्थिति रहती है । उसका कृतयुग नाम इसलिये पड़ा है कि उस उत्तम युगके लोग अपना सब कर्तव्यकर्म सम्पन्न ही कर लेते थे । उनके लिये कुछ करना शेष नहीं रहता था (अतः ‘कृतम् एव सर्वं शुभं यस्मिन् युगे’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार वह ‘कृतयुग’ कहलाया)
हनुमान् उवाच
न सामऋग्यजुर्वर्णाः क्रिया नासीच्च मानवी ।
अभिध्याय फलं तत्र धर्मः संन्यास एव च ॥
ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रवर्णोंका पृथक्-पृथक् विभाग नहीं था । कोई मानवी क्रिया (कृषि आदि) भी नहीं होती थी । उस समय चिन्तन करनेमात्रसे सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती थी । सत्ययुगमें एक ही धर्म था, स्वार्थका त्याग ।
हनुमानजी ने भीमसेन को सत्ययुग का धर्म बताया।
हनुमान् उवाच
अधर्मो यत्र धर्माख्यो धर्मश्चाधर्मसंज्ञितः ।
स विज्ञेयो विभागेन यत्र मुह्यन्त्यबुद्धयः ॥
कहीं अधर्म ही धर्म कहलाता है और कहीं धर्म भी अधर्म कहा जाता है । अतः धर्म और अधर्मके स्वरूपका पृथक्-पृथक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । बुद्धिहीनलोग इसमें मोहित हो जाते हैं ।
हनुमान् उवाच
एष तेऽभिहितः पार्थ घोरो धर्मो दुरन्वयः ।
तं स्वधर्मविभागेन विनयस्थोऽनुपालय ॥
कुन्तीनन्दन! यह मैंने तुम्हें कठोर राज्य-धर्मका उपदेश दिया है । इसके मर्मको समझना अत्यन्त कठिन है । तुम अपने धर्मके विभागानुसार विनीतभावसे इसका पालन करो ।
धनद उवाच
धृतिमन्तश्च दक्षाश्च स्वे स्वे कर्मणि भारत ।
पराक्रमविधानज्ञा नरा कृतयुगेऽभवन् ॥
भारत! सत्ययुगमें सब मनुष्य धैर्यवान्, अपने-अपने कार्यमें कुशल तथा पराक्रमविधिके ज्ञाता थे ।
समाप्तकर्मा सहितः सुहृद्भिर्जित्वा सपत्नान् प्रतिलभ्य राज्यम् ।
शैलेन्द्र भूयस्तपसे जितात्मा ।
द्रष्टा तवास्मीति मतिं चकार ॥
‘शैलेन्द्र! अब अपने मन और बुद्धिको संयममें रखनेवाला मैं शत्रुओंको जीतकर अपना खोया हुआ राज्य पानेके बाद सुहृदोंके साथ अपना सब कार्य सम्पन्न करके पुनः तपस्याके लिये लौटनेपर आपका दर्शन करूँगा’ । इस प्रकार युधिष्ठिरने निश्चय किया ।
सर्प → राजन
ब्रह्म च ब्राह्मणत्वं च येन त्वाहमचूचुदम् ।
सत्यं दमस्तपो दानमहिंसा धर्मनित्यता ।
साधकानि सदा पुंसां न जातिर्न कुलं नृप ।
अरिष्ट एष ते भ्राता भीमसेनो महाबलः ।
स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ॥
राजन्! उनका ब्रह्म-ज्ञान और ब्राह्मणत्व देखकर भी मुझे बड़ा विस्मय हुआ । इसीलिये इस विषयमें मैंने तुमसे पहले प्रश्न किया था । राजन्! सत्य, इन्द्रियसंयम, तपस्या, दान, अहिंसा और धर्मपरायणता — ये सद्गुण ही सदा मनुष्योंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले हैं, जाति और कुल नहीं । ये रहे तुम्हारे भाई महाबली भीमसेन, जो सर्वथा सकुशल हैं । महाराज! तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं पुनः स्वर्गलोकको जाऊँगा ।
राजा नहुष ने युधिष्ठिर से कहा।
वैशम्पायन → राजन
धर्मः परः पाण्डव राज्यलाभात् ।
तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन् ।
सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं ।
जितस्त्वयायं च परश्च लोकः ॥
राजन्! पाण्डुनन्दन! राज्यलाभकी अपेक्षा धर्म महान् है । धर्मकी वृद्धिके लिये तपको ही प्रधान साधन बताया गया है । आप सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंके साथ-साथ स्वधर्मका पालन करते हैं, अतः आपने इस लोक और परलोक दोनोंको जीत लिया है ।
मार्कण्डेय उवाच
ये धर्ममेव प्रथमं चरन्ति ।
धर्मेण लब्ध्वा च धनानि काले ।
दारानवाप्य क्रतुभिर्यजन्ते ।
तेषामयं चैव परश्च लोकः ॥
जो लोग कर्तव्य-बुद्धिसे पहले धर्मका ही आचरण करते हैं और उस धर्मसे ही (न्याययुक्त) धनका उपार्जन कर यथासमय स्त्रीसे विवाह करके उसके साथ यज्ञ-याग और ईश्वरभक्ति आदिका अनुष्ठान करते हैं, उनके लिये इहलोक और परलोक दोनों ही सुखद हैं ।
सरस्वती उवाच
यः सप्त वर्षाणि जुहोति तार्क्ष्य ।
हव्यं त्वग्नौ नियतः साधुशीलः ।
सप्तावरान् सप्त पूर्वान् पुनाति ।
पितामहानात्मना कर्मभिः स्वैः ॥
तार्क्ष्य! जो सदाचारी पुरुष संयम-नियमका पालन करते हुए सात वर्षोंतक अग्निमें आहुति देता है, वह अपने सत्कर्मोंद्वारा अपने साथ ही सात पीढ़ीतककी भावी संतानोंको और सात पीढ़ी पूर्वतकके पितामहोंको भी पवित्र कर देता है ।
सरस्वती ने तार्क्ष्य मुनि से कहा।
देवगण → ब्रह्मन
प्राप्नुवन्ति नरा विप्र यत् कृत्वा कर्म शोभनम् ।
सत्यं दानं तपश्चोग्रमहिंसा चैव जन्तुषु ॥
मद्विधानेन विहिता मम देहविहारिणः ।
मयाऽऽविर्भूतविज्ञाना विचेष्टन्ते न कामतः ॥
ब्रह्मन्! जिस शुभ कर्मोंके आचरणसे मनुष्यको कल्याणकी प्राप्ति होती है, वे सत्य, दान, उग्र तपस्या और किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेका स्वभाव — ये सब मेरे ही विधानसे निर्मित हुए हैं और मेरे ही शरीरमें विहार करते हैं । मैं समस्त प्राणियोंके ज्ञानको जब प्रकट कर देता हूँ, तभी वे चेष्टाशील होते हैं, अन्यथा अपनी इच्छासे वे कुछ नहीं कर सकते ।
मार्कण्डेय → राजन
दयावान् सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयकः ।
सत्यवादी मृदुर्दान्तः प्रजानां रक्षणे रतः ।
चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन् देवांश्च पूजय ॥
मार्कण्डेयजीने कहा — राजन्! तुम सब प्राणियोंपर दया करो । सबके हितैषी बने रहो । सबपर प्रेमभाव रखो और किसीमें दोषदृष्टि मत करो । सत्यवादी, कोमलस्वभाव, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर रहकर धर्मका आचरण करो । अधर्मको दूरसे ही त्याग दो तथा देवता और पितरोंकी आराधना करते रहो ।
वामदेव → राजन
नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति ।
वाचा राजन् मनसा कर्मणा वा ।
यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वांस्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥
वामदेवने कहा — राजन्! मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा कोई भी अनुशासन या दण्ड ब्राह्मणोंपर लागू नहीं हो सकता । जो इस प्रकार जानकर कष्टसहनपूर्वक ब्राह्मणकी सेवा करता है; वह उस ब्राह्मणसेवारूप कर्मसे ही श्रेष्ठ होता और जीवित रहता है ।
वामदेव ने राजा से कहा।
तस्मात् कल्याणवृत्तः स्या ।
दनन्ताय नरः सदा ।
विहाय चित्तं पापिष्ठं ।
धर्ममेव समाश्रयेत् ॥
‘इसलिये मनुष्यको सदा कल्याणकारी सत्कर्मोंमें ही लगे रहना चाहिये । इससे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है । पापपूर्ण चित्त (चिन्तन या विचार)-का परित्याग करके सदा धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये’
मार्कण्डेय उवाच
न ज्ञातिभ्यो दया यस्य शुक्लदेहोऽविकल्मषः ।
हिंसा सा तपसस्तस्य नानाशित्वं तपः स्मृतम् ॥
जिसने व्रत, उपवास आदिके द्वारा शरीरको तो शुद्ध कर लिया और जो नाना प्रकारके पापकर्म भी नहीं करता, किंतु जिसके मनमें अपने कुटुम्बी जनोंके प्रति दया नहीं आती, उसकी वह निर्दयता उसके तपका नाश करनेवाली है; केवल भोजन छोड़ देनेका ही नाम तपस्या नहीं है ।
उत्तङ्क उवाच
पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते ।
न तथा दृश्यतेऽरण्ये माभूत् ते बुद्धिरीदृशी ॥
क्योंकि आपके लिये यहाँ रहकर प्रजाओंका पालन करनेमें जो महान् धर्म देखा जाता है, वैसा वनमें रहकर तपस्या करनेमें नहीं दिखायी देता । अतः आपकी ऐसी समझ नहीं होनी चाहिये ।
उत्तङ्क उवाच
ईदृशो न हि राजेन्द्र धर्मः क्वचन दृश्यते ।
प्रजानां पालने यो वै पुरा राजर्षिभिः कृतः ॥
राजेन्द्र! पूर्वकालके राजर्षियोंने जिस धर्मका पालन किया है, वह प्रजाजनोंके पालनमें ही सुलभ है । ऐसा धर्म और किसी कार्यमें नहीं दिखायी देता ।
वैशम्पायन → ब्रह्मन
मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज ।
स्त्रीणां धर्मात् सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम् ॥
ब्रह्मन्! पुत्रोंद्वारा माता-पिताकी सेवा तथा स्त्रियोंद्वारा की हुई पतिकी सेवा बहुत कठिन है । स्त्रियोंके इस कठोर धर्मसे बढ़कर और कोई दुष्कर कार्य मुझे नहीं दिखायी देता है ।
स्त्री उवाच
सत्यार्जवे धर्ममाहुः परं धर्मविदो जनाः ।
दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।
श्रुतिप्रमाणो धर्मः स्यादिति वृद्धानुशासनम् ॥
धर्मज्ञ पुरुष सत्य और सरलताको सर्वोत्तम धर्म बताते हैं । सनातनधर्मके स्वरूपको जानना तो अत्यन्त कठिन है, परंतु वह सत्यमें प्रतिष्ठित है । जो वेदोंके द्वारा प्रमाणित हो, वही धर्म है — यह वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ।
व्याध उवाच
ये जीवन्ति स्वधर्मेण संयुञ्जन्ति च पार्थिवाः ।
न किंचिदुपजीवन्ति दान्ता उत्थानशीलिनः ॥
जो राजा अपने धर्मका पालन करते हुए जीवन-निर्वाह करते हैं, धर्ममें ही संयुक्त रहते हैं, किसी दूसरेकी कोई वस्तु अपने उपयोगमें नहीं लाते तथा सदा अपनी इन्द्रियोंपर संयम रखते हैं, वे ही उन्नतिशील होते हैं ।
व्याध उवाच
न पापे प्रतिपापः स्यात् साधुरेव सदा भवेत् ।
आत्मनैव हतः पापो यः पापं कर्तुमिच्छति ॥
यदि कोई अपने साथ बुरा बर्ताव करे तो स्वयं भी बदलेमें उसके साथ बुराई न करे । सबके साथ सदा सद्व्यवहार ही करे । जो पापी दूसरोंका अहित करना चाहता है वह स्वयं ष्ट हो जाता है ।
व्याध उवाच
कर्म चैतदसाधूनां वृजिनानामसाधुवत् ।
न धर्मोऽस्तीति मन्वानाः शुचीनवहसन्ति ये ॥
अश्रद्दधाना धर्मस्य ते नश्यन्ति न संशयः ।
महादृतिरिवाध्मातः पापो भवति नित्यदा ॥
यह (दूसरोंका अहित करना) तो दुराचारीकी भाँति दुर्व्यसनोंमें आसक्त हुए पापी पुरुषोंका ही कार्य है । ‘धर्म कोई चीज नहीं है’ ऐसा मानकर जो शुद्ध आचार-विचारवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी हँसी उड़ाते हैं, वे धर्मपर अश्रद्धा रखनेवाले मनुष्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं । पापी मनुष्य लुहारकी बड़ी धौंकनीके समान सदा ऊपरसे फूले दिखायी देते हैं (परंतु वास्तवमें सारहीन होते हैं)
व्याध उवाच
कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम् ।
धर्ममित्येव संतुष्टास्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ॥
जो काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कुटिलताको वशमें करके केवल धर्मको ही अपनाकर संतुष्ट रहते हैं, वे शिष्ट कहलाते हैं और उन्हींका शिष्ट पुरुष आदर करते हैं ।
व्याध ने द्विजश्रेष्ठ से शिष्ट पुरुषों के आचार-व्यवहार का वर्णन करते हुए कहा।
व्याध उवाच
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् ।
अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।
सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥
अहिंसा और सत्यभाषण — ये समस्त प्राणियोंके लिये अत्यन्त हितकर हैं । अहिंसा सबसे महान् धर्म है, परंतु वह सत्यमें ही प्रतिष्ठित है । सत्यके ही आधारपर श्रेष्ठ पुरुषोंके सभी कार्य आरम्भ होते हैं ।
मार्कण्डेय → ब्रह्मन
स्वकर्म त्यजतो ब्रह्मन्नधर्म इह दृश्यते ।
स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्मः स इति निश्चयः ॥
ब्रह्मन्! अपने कर्मका परित्याग करनेवालेको यहाँ अधर्मकी प्राप्ति देखी जाती है । जो अपने कर्ममें तत्पर है, उसीका बर्ताव धर्मपूर्ण है, ऐसा सिद्धान्त है ।
वक्तुं बहुविधं शक्यं धर्माधर्मेषु कर्मसु ।
स्वकर्मनिरतो यो हि स यशः प्राप्नुयान्महत् ॥
‘धर्म और अधर्मसम्बन्धी कार्योंके विषयमें और भी बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं । अतएव जो अपने कुलोचित कर्ममें लगा हुआ है, वही महान् यशका भागी होता है’
व्याध उवाच
पापं कुर्वन् पापवृत्तः पापस्यान्तं न गच्छति ।
तस्मात् पुण्यं यतेत् कर्तुं वर्जयीत च पापकम् ॥
पाप करनेवाले मनुष्यको पापकी आदत हो जाती है, फिर उसके पापका अन्त नहीं होता । अतः मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्य कर्म करनेका ही प्रयत्न करे और पापको सर्वथा त्याग दे ।
व्याध → ब्रह्मन
शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः ।
वैश्यत्वं लभते ब्रह्मन् क्षत्रियत्वं तथैव च ॥
ब्रह्मन्! शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्य भी यदि उत्तम गुणोंका आश्रय ले, तो वह वैश्य तथा क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है ।
व्याध उवाच
नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेद् धर्मं रक्षेच्च मत्सरात् ।
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥
सदा तपको क्रोधसे, धर्मको द्वेषसे, विद्याको मान-अपमानसे और अपने-आपको प्रमादसे बचाना चाहिये ।
व्याध उवाच
आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् ।
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं व्रतपरं व्रतम् ॥
क्रूरताका अभाव (दया) सबसे महान् धर्म है, क्षमा सबसे बड़ा बल है, सत्य सबसे उत्तम व्रत है और परमात्माके तत्त्वका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है ।
व्याध उवाच
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम ।
भवेयुरग्नयस्तस्य परिचीर्णास्तु नित्यशः ।
गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य एष धर्मः सनातनः ॥
द्विजश्रेष्ठ! जो इन सबके प्रति उत्तम बर्ताव करेगा, उस गृहस्थ-धर्मका पालन करनेवालेके द्वारा सदा सब अग्नियोंकी सेवा सम्पन्न होती रहेगी । यही सनातन धर्म है ।
वैशम्पायन उवाच
अन्त्यालापमसंतोषं परव्यापारसंकथाम् ।
अतिहासातिरोषौ च क्रोधस्थानं च वर्जये ।
निरताहं सदा सत्ये भर्तृणामुपसेवने ॥
नीच पुरुषोंसे बात नहीं करती, मनमें असंतोषको स्थान नहीं देती और परायी चर्चासे दूर रहती हूँ । न अधिक हँसती हूँ और न अधिक क्रोध करती हूँ। क्रोधका अवसर ही नहीं आने देती । सदा सत्य बोलती और पतियोंकी सेवामें लगी रहती हूँ ।
द्रौपदी उवाच
भिक्षाबलिश्राद्धमिति स्थालीपाकाश्च पर्वसु ।
मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मम ॥
तान् सर्वाननुवर्तेऽहं दिवारात्रमतन्द्रिता ।
विनयान् नियमांश्चैव सदा सर्वात्मना श्रिता ॥
मैं दिन-रात आलस्य त्यागकर भिक्षा-दान, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध, पर्वकालोचित स्थालीपाकयज्ञ, मान्य पुरुषोंका आदर-सत्कार, विनय, नियम तथा अन्य जो-जो धर्म मुझे ज्ञात हैं, उन सबका सब प्रकारसे उद्यत होकर पालन करती हूँ ।
द्रौपदी ने सत्यभामा से कहा।
वैशम्पायन उवाच
क्रियेत कस्मादपरे च कुर्युर्वित्तं न दद्युः पुरुषाः कथंचित् ।
प्राप्यार्थकालं च भवेदनर्थः ।
कथं न तत् स्यादिति तत् कुतः स्यात् ॥
यदि यह विश्वास हो जाय तो हम लोभके वश होकर न करनेयोग्य काम क्यों करें और दूसरे भी क्यों करें एवं बुद्धिमान् मनुष्य भी उपार्जित धनका दान क्यों न करें? अर्थके उपयोगका समय प्राप्त होनेपर यदि उसका सदुपयोग न किया जाय तो वह अनर्थका हेतु हो जाता है । अतः विचार करना चाहिये कि उस धनका सदुपयोग क्यों नहीं होता और कैसे हो?
कथं न भिद्येत न च स्रवेत ।
न च प्रसिच्येदिति रक्षितव्यम् ।
अरक्ष्यमाणं शतधा प्रकीर्येद् ।
ध्रुवं न नाशोऽस्ति कृतस्य लोके ॥
‘यदि प्राप्त हुए धनका यथावत् वितरण न किया जायगा तो वह कच्चे घड़ेमें रखे हुए जलकी भाँति चूकर व्यर्थ नष्ट क्यों न होगा? यह सोचकर उसकी रक्षा करना ही कर्तव्य है । यदि यथायोग्य विभाजनके द्वारा धनकी रक्षा न की जायगी तो वह सैकड़ों प्रकारसे बिखर जायगा । जगत्में किये हुए कर्म-फलका नाश नहीं होता — यह निश्चित है । (इससे यही सिद्ध होता है कि उसका यथायोग्य वितरण कर देना ही उचित है)’
व्यास उवाच
सत्यमार्जवमक्रोधः संविभागो दमः शमः ।
अनसूयाविहिंसा च शौचमिन्द्रियसंयमः ।
पावनानि महाराज नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥
महाराज! सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, देवता और अतिथियोंको देकर अन्न आदि ग्रहण करना, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, दूसरोंके दोष न देखना, हिंसा न करना, बाहर-भीतरकी पवित्रता रखना तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखना — ये पुण्यात्मा पुरुषोंके सद्गुण सबको पवित्र करनेवाले हैं ।
युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यक्षधर्मा भगवान् यस्य तुष्टो हि कर्मभिः ।
सफलं तस्य जन्माहं मन्ये सद्धर्मचारिणः ॥
मनुष्योंके धर्मको प्रत्यक्ष देखने और जाननेवाले भगवान् जिसके कर्मोंसे संतुष्ट होते हैं, उसी श्रेष्ठ धर्मात्मा पुरुषका जन्म सफल है, ऐसा मैं मानता हूँ ।
द्रौपदी उवाच
धनुर्धराग्र्यो धृतिमान् यशस्वी ।
जितेन्द्रियो वृद्धसेवी नृवीरः ।
भ्राता च शिष्यश्च युधिष्ठिरस्य ।
धनंजयो नाम पतिर्ममैषः ॥
यो वै न कामान्न भयान्न लोभात् ।
त्यजेद् धर्म न नृशंसं च कुर्यात् ।
स एष वैश्वानरतुल्यतेजाः ।
कुन्तीसुतः शत्रुसहः प्रमाथी ॥
ये जो तीसरे वीर पुरुष दिखायी दे रहे हैं, वे मेरे पति धनंजय हैं । इन्हें समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माना गया है । ये धैर्यवान्, यशस्वी, जितेन्द्रिय, वृद्धपुरुषोंके सेवक तथा महाराज युधिष्ठिरके भाई और शिष्य हैं । अर्जुन कभी काम, भय अथवा लोभवश न तो अपना धर्म छोड़ सकते हैं और न कोई निष्ठुरतापूर्ण कार्य ही कर सकते हैं । इनका तेज अग्निके समान है । ये कुन्तीनन्दन धनंजय समस्त शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ और सभी दुष्टोंका दमन करनेमें दक्ष हैं ।
सावित्री उवाच
वरं वृणीष्वाश्वपते मद्रराज यदीप्सितम् ।
न प्रमादश्च धर्मेषु कर्तव्यस्ते कथञ्चन ॥
मद्रराज अश्वपते! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर माँगो । धर्मोके पालनमें तुम्हें कभी किसी तरह भी प्रमाद नहीं करना चाहिये ।
यम उवाच
नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति ।
धर्मं च वासं च परिश्रमं च ।
विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति ।
तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥
जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, वे वनमें रहकर धर्मपालन, गुरुकुलवास तथा कष्टसहनरूप तपस्या नहीं कर सकते हैं । जितेन्द्रिय पुरुष ही यह सब कुछ करनेमें समर्थ हैं । महात्मालोग विवेक विचारसे ही धर्म-प्राप्ति बताते हैं, अतः सभी सत्पुरुष धर्मको ही श्रेष्ठ मानते हैं ।
यमराज ने सावित्री से कहा।
सावित्री उवाच
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दयाभाव बनाये रखना और दान देना यह साधु पुरुषोंका सनातन धर्म है ।
सावित्री उवाच
न च प्रसादः सत्पुरुषेषु मोघो ।
न चाप्यर्थो नश्यति नापि मानः ।
यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं ।
तस्मात् सन्तो रक्षितारो भवन्ति ॥
सत्पुरुषोंका प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं जाता । वहाँ किसीको स्वार्थकी हानि नहीं उठानी पड़ती है और न मान-सम्मान ही नष्ट होता है । ये तीनों (प्रसाद, अर्थ और मान) संतोंमें नित्य-निरन्तर बने रहते हैं; इसलिये वे सम्पूर्ण जगत्के रक्षक होते हैं ।
कर्ण उवाच
मद्विधस्य यशस्यं हि न युक्तं प्राणरक्षणम् ।
युक्तं हि यशसा युक्तं मरणं लोकसम्मतम् ॥
मेरे-जैसे शूरवीरको प्राण देकर भी यशकी ही रक्षा करनी चाहिये; अपयश लेकर प्राणोंकी रक्षा करनी कदापि उचित नहीं है । सुयशके साथ यदि मृत्यु हो जाय तो वह वीरोचित एवं सम्पूर्ण लोकके लिये सम्मानकी वस्तु है ।
युधिष्ठिर उवाच
इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव ।
भयं वै मानुषो भावः परित्यागोऽसतामिव ॥
युधिष्ठिर बोले — बाणविद्या क्षत्रियोंका देवत्व है, यज्ञ उनका सत्पुरुषोंका-सा धर्म है, भय मानवीय भाव है और शरणमें आये हुए दुःखियोंका परित्याग कर देना उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण है ।
युधिष्ठिर उवाच
आनृशंस्यं परो धर्मस्त्रयीधर्मः सदाफलः ।
मनो यम्य न शोचन्ति संधिः सद्भिर्न जीर्यते ॥
युधिष्ठिर बोले — लोकमें दया श्रेष्ठ धर्म है, वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है, मनको वशमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते और सत्पुरुषोंके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती ।
युधिष्ठिर उवाच
तपः स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दमः ।
क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वं हीरकार्यनिवर्तनम् ॥
युधिष्ठिर बोले — अपने धर्ममें तत्पर रहना तप है, मनके दमनका ही नाम दम है, सर्दी-गरमी आदि द्वन्द्वोंको सहन करना क्षमा है तथा न करने योग्य कामसे दूर रहना लज्जा है ।
युधिष्ठिर उवाच
ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चित्तप्रशान्तता ।
दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता ॥
युधिष्ठिर बोले — परमात्मतत्त्वका यथार्थ बोध ही ज्ञान है, चित्तकी शान्ति ही शम है, सबके सुखकी इच्छा रखना ही उत्तम दया है और समचित्त होना ही आर्जव (सरलता) है ।
युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न का उत्तर दिया।
युधिष्ठिर उवाच
क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तकः ।
सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः ॥
युधिष्ठिर बोले — क्रोध दुर्जय शत्रु है, लोभ अनन्त व्याधि है तथा जो समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला हो, वही साधु है और निर्दयी पुरुषको ही असाधु माना गया है ।
युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा।
युधिष्ठिर उवाच
यदा धर्मश्च भार्या च परस्परवशानुगौ ।
तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगमः ॥
युधिष्ठिर बोले — जब धर्म और भार्या-ये दोनों परस्पर अविरोधी होकर मनुष्यके वशमें हो जाते हैं, उस समय धर्म, अर्थ और काम — इन तीनों परस्पर विरोधियोंका भी एक साथ रहना सहज हो जाता है ।
युधिष्ठिर उवाच
प्रियवचनवादी प्रियो भवति ।
विमृतिकार्यकरोऽधिकं जयति ।
बहुमित्रकरः सुखं वसते ।
यश्च धर्मरतः स गतिं लभते ॥
युधिष्ठिर बोले — मधुर वचन बोलनेवाला सबको प्रिय होता है, सोच-विचारकर काम करनेवालेको अधिकतर सफलता मिलती है एवं जो बहुत-से मित्र बना लेता है, वह सुखसे रहता है और जो धर्मनिष्ठ है, वह सद्गति पाता है ।
युधिष्ठिर उवाच
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
युधिष्ठिर बोले — यदि धर्मका नाश किया जाय, तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ताको भी नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय, तो वही कर्ताकी भी रक्षा कर लेता है । इसीसे मैं धर्मका त्याग नहीं करता कि कहीं नष्ट होकर वह धर्म मेरा ही नाश न कर दे ।
युधिष्ठिर उवाच
आनृशंस्यं परो धर्मः परमार्थाच्च मे मतम् ।
आनृशंस्यं चिकीर्षामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥
यक्ष! मेरा ऐसा विचार है कि वस्तुतः अनृशंसता (दया तथा समता) ही परम धर्म है । यही सोचकर मैं सबके प्रति दया और समानभाव रखना चाहता हूँ; इसलिये नकुल ही जीवित हो जाय ।
यक्ष उवाच
यशः सत्यं दमः शौचमार्जवं ह्रीरचापलम् ।
दानं तपो ब्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम ॥
यश, सत्य, दम, शौच, सरलता, लज्जा, अचंचलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य — ये सब मेरे शरीर हैं ।
यक्ष उवाच
अहिंसा समता शान्तिरानृशंस्यममत्सरः ।
द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रियो ह्यसि सदा मम ॥
अहिंसा, समता, शान्ति, दया और अमत्सर-डाहका न होना — इन्हें मेरे पास पहुँचनेके द्वार समझो । तुम मुझे सदा प्रिय हो ।
धर्मराज ने युधिष्ठिर से कहा।
वैशम्पायन उवाच
न चाप्यधर्मे न सुहृद्विभेदने ।
परस्वहारे परदारमर्शने ।
कदर्यभावे न रमेन्मनः सदा ।
नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम् ॥
तथा जो लोग सदा इस मनोहर उपाख्यानको स्मरण रखेंगे; उनका मन अधर्ममें, सुहृदोंके भीतर फूट डालनेमें, दूसरोंका धन हरनेमें, परस्त्रीगमनमें अथवा कृपणतामें कभी प्रवृत्त नहीं होगा ।
वैशम्पायन → राजन
राजन् विद्वान् भवान् दान्तः ।
सत्यसंधो जितेन्द्रियः ।
नैवंविधाः प्रमुह्यन्ते ।
नराः कस्याञ्चिदापदि ॥
राजन्! आप विद्वान्, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं । आप-जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं ।
वैशम्पायन उवाच
नासूयको न चापीर्षुर्नाभिमानी न मत्सरी ।
भविष्यति जनस्तत्र स्वयं धर्ममनुव्रतः ॥
वहाँ कोई न तो दूसरेके दोष देखनेवाला होगा और न ईर्ष्यालु । न किसीमें अभिमान होगा और न मात्सर्य (द्वेष) । वहाँके सब लोग स्वयं ही धर्ममें तत्पर होंगे ।
वैशम्पायन उवाच
भविष्यति जनस्तत्र नित्यं चेष्टप्रियव्रतः ।
धर्मात्मा शक्यते ज्ञातुं नापि तात द्विजातिभिः ।
किं पुनः प्राकृतैस्तात पार्थो विज्ञायते क्वचित् ।
यस्मिन् सत्यं धृतिर्दानं परा शान्तिर्धुवा क्षमा ।
ह्रीः श्रीः कीर्तिः परं तेज आनृशंस्यमथार्जवम् ॥
सदा इष्टजनोंका प्रिय करना ही उनका व्रत होगा । कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं । उनमें सत्य, धैर्य, दान, परम शान्ति, अटल क्षमा, लज्जा, श्री, कीर्ति, उत्कृष्ट तेज, दयालुता और सरलता आदि गुण सदा रहते हैं । अतः अन्य साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या, द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) भी उन्हें नहीं पहचान सकते ।
अश्वत्थामा उवाच
वैश्योऽधिगम्य वित्तानि ब्रह्मकर्माणि कारयेत् ।
शूद्रः शुश्रूषणं कुर्यात् त्रिषु वर्णेषु नित्यशः ।
वन्दनायोगविधिभिर्वैतसीं वृत्तिमास्थितः ॥
वैश्य कृषि और व्यापार आदिके द्वारा धनोपार्जन करके ब्राह्मणोंके द्वारा वेदोक्त कर्म करावें और शूद्र वैतसीवृत्ति (बेंतके वृक्षकी भाँति नम्रता) का आश्रय ले प्रणाम और आज्ञापालन आदिके द्वारा सदा तीनों वर्णोंके पास रहकर उनकी सेवा करे ।
भीष्म उवाच
तदैव ते हि विक्रान्तुमीषुः कौरवनन्दनाः ।
धर्मपाशनिबद्धास्तु न चेलुः क्षत्रियव्रतात् ॥
यच्चानृत इति ख्यायाद् यः स गच्छेत् पराभवम् ।
वृणुयुर्मरणं पार्था नानृतत्वं कथंचन ॥
कुरुकुलको आनन्द देनेवाले पाण्डव उसी समय पराक्रम करनेमें समर्थ थे, किंतु वे धर्मके बन्धनमें बँधे थे; इसलिये क्षत्रियव्रतसे विचलित नहीं हुए । यदि कोई अर्जुनको असत्यवादी कहेगा तो वह पराजयको प्राप्त होगा । कुन्तीके पुत्र मौतको गले लगा सकते हैं, किंतु किसी प्रकार असत्यका आश्रय नहीं ले सकते ।
अर्जुन उवाच
क्षमा दमश्च सत्यं च आनृशंस्यमथार्जवम् ।
एते चान्ये च बहवो यस्मिन् नित्यं द्विजे गुणाः ॥
इन विप्रशिरोमणिमें क्षमा, इन्द्रियसंयम, सत्य, कोमलता, सरलता तथा अन्य बहुत-से सद्गुण नित्य विद्यमान हैं ।
विराट उवाच
बहुशः प्रतिषिद्धोऽसि न च वाचं नियच्छसि ।
नियन्ता चेन्न विद्येत न कश्चिद् धर्ममाचरेत् ॥
विराटने कहा — कंक! मैंने बहुत बार मना किया, तो भी तू अपनी जबान नहीं बंद कर रहा है । सच है, यदि शासन करनेवाला राजा न हो, तो कोई भी धर्मका आचरण नहीं कर सकता ।