श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५
धर्म–आचरण
कर्तव्य और सदाचरण
203 पद्य
महाभारत — खण्ड ५
ब्रह्मास्त्रं ब्राह्मणो विद्याद् यथावच्चरितव्रतः ।
क्षत्रियो वा तपस्वी यो नान्यो विद्यात् कथंचन ॥
‘वत्स! ब्रह्मास्त्रको ठीक-ठीक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण जान सकता है अथवा तपस्वी क्षत्रिय । दूसरा कोई किसी तरह इसे नहीं सीख सकता’
युधिष्ठिर उवाच
जङ्गमाजङ्गमान् सर्वानविहिंसंश्चतुर्विधान् ।
प्रजाः सर्वाः स्वधर्मस्थाः समः प्राणभृतः प्रति ॥
चार प्रकारके समस्त चराचर प्राणियोंमेंसे किसीकी हिंसा नहीं करूँगा । अपने-अपने धर्ममें स्थित हुई समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समभाव रखूँगा ।
भीम उवाच
आपत्काले हि संन्यासः कर्तव्य इति शिष्यते ।
जरयाभिपरीतेन शत्रुभिर्व्यंसितेन वा ॥
शास्त्रका उपदेश यह है कि आपत्तिकालमें या बुढ़ापेसे जर्जर हो जानेपर अथवा शत्रुओंद्वारा धन-सम्पत्तिसे वञ्चित कर दिये जानेपर मनुष्यको संन्यास ग्रहण करना चाहिये ।
शकुनि उवाच
तस्मात् स्वधर्ममास्थाय सुव्रताः सत्यवादिनः ।
लोकस्य गुरवो भूत्वा ते भवन्त्यनुपस्कृताः ॥
इसलिये अपने धर्मपर आरूढ़ हो उत्तम व्रतका पालन और सत्यभाषण करते हुए वे जगद्गुरु होकर सर्वथा संदेहरहित हो जाते हैं ।
नकुल उवाच
शमो दमस्तथा धैर्यं सत्यं शौचमथार्जवम् ।
यज्ञो धृतिश्च धर्मश्च नित्यमार्षो विधिः स्मृतः ॥
शम, दम, धैर्य, सत्य, शौच, सरलता, यज्ञ, धृति तथा धर्म — इन सबका ऋषियोंके लिये निरन्तर पालन करनेका विधान है ।
द्रौपदी उवाच
यस्मिन् क्षमा च क्रोधश्च दानादाने भयाभये ।
निग्रहानुग्रही चोभौ स वै धर्मविदुच्यते ॥
जिसमें समयानुसार क्षमा और क्रोध दोनों प्रकट होते हैं, जो दान देता और कर लेता है, जिसमें शत्रुओंको भय दिखाने और शरणागतोंको अभय देनेकी शक्ति है, जो दुष्टोंको दण्ड देता और दीनोंपर अनुग्रह करता है, वही धर्मज्ञ कहलाता है ।
अर्जुन उवाच
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मप्रवचनं कृतम् ।
अहिंसासाधुहिंसेति श्रेयान् धर्मपरिग्रहः ॥
लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये ही धर्मका प्रतिपादन किया गया है । सर्वथा हिंसा न की जाय अथवा दुष्टकी हिंसा की जाय, यह प्रश्न उपस्थित होनेपर जिसमें धर्मकी रक्षा हो, वही कार्य श्रेष्ठ मानना चाहिये ।
युधिष्ठिर उवाच
योगः क्षेमश्च राष्ट्रस्य धर्माधर्मौ त्वयि स्थितौ ।
मुच्यस्व महतो भारात् त्यागमेवाभिसंश्रय ॥
राष्ट्रके योग और क्षेम, धर्म तथा अधर्म सब तुममें ही स्थित हैं । तुम इस महान् भारसे मुक्त हो जाओ और त्यागका ही आश्रय लो ।
यदासौ सर्वभूतानां न द्रुह्यति न काङ्क्षति ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
‘जब वह मन, वाणी और क्रियाद्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंमेंसे किसीके साथ न तो द्रोह करता है और न किसीकी अभिलाषा ही रखता है, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है’
देवस्थान उवाच
अद्रोहः सत्यवचनं संविभागो दया दमः ।
प्रजनं स्वेषु दारेषु मार्दवं ह्रीरचापलम् ।
एवं धर्मं प्रधानेष्टं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
किसीसे द्रोह न करना, सत्य बोलना, (बलिवैश्वदेव कर्मद्वारा) समस्त प्राणियोंको यथायोग्य उनका भाग समर्पित करना, सबके प्रति दयाभाव बनाये रखना, मन और इन्द्रियोंका संयम करना, अपनी ही पत्नीसे संतान उत्पन्न करना तथा मृदुता, लज्जा एवं अचंचलता आदि गुणोंको अपनाना — ये श्रेष्ठ एवं अभीष्ट धर्म हैं — ऐसा स्वायम्भुव मनुका कथन है ।
व्यास → युधिष्ठिर
स्वधर्मं चर धर्मज्ञ यथाशास्त्रं यथाविधि ।
न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीयते ॥
धर्मज्ञ युधिष्ठिर! तुम शास्त्रके कथनानुसार विधिपूर्वक स्वधर्मका ही आचरण करो । तुम्हारे लिये गृहस्थ-आश्रमको छोड़कर वनमें जानेका विधान नहीं है ।
व्यास उवाच
क्षत्रियाणां तु वक्ष्यामि तवापि विदितं पुनः ।
यज्ञो विद्या समुत्थानमसंतोषः श्रयं प्रति ।
दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम् ।
वेदज्ञानं तथा कृत्स्नं तपः सुचरितं तथा ।
द्रविणोपार्जनं भूरि पात्रे च प्रतिपादनम् ।
एतानि राज्ञां कर्माणि सुकृतानि विशाम्पते ।
इमं लोकममुं चैव साधयन्तीति नः श्रुतम् ॥
प्रजानाथ! अब मैं पुनः क्षत्रियोंके धर्म बता रहा हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है । यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओंपर चढ़ाई करना, राजलक्ष्मीकी प्राप्तिसे कभी संतुष्ट न होना, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना, क्षत्रियतेजसे सम्पन्न रहना, प्रजाकी सब ओरसे रक्षा करना, समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, अधिक द्रव्योपार्जन और सत्पात्रको दान देना — ये सब राजाओंके कर्म हैं, जो सुन्दर ढंगसे किये जानेपर उनके इहलोक और परलोक दोनोंको सफल बनाते हैं, ऐसा हमने सुना है ।
व्यास उवाच
दीक्षां राज्ञः संयुगे युद्धमाहुर्योगं राज्ये दण्डनीत्यां च सम्यक् ।
वित्तत्यागो दक्षिणानां च यज्ञे ।
सम्यग् दानं पावनानीति विद्यात् ॥
राजाके लिये संग्राममें जूझना ही यज्ञकी दीक्षा लेना बताया गया है । राज्यकी रक्षा करते हुए दण्डनीतिमें भलीभाँति प्रतिष्ठित होना ही उसके लिये योगसाधन है तथा यज्ञमें दक्षिणारूपसे धनका त्याग एवं उत्तम रीति से दान ही राजाके लिये त्याग है । ये तीनों कर्म राजाको पवित्र करनेवाले हैं, ऐसा समझे ।
अश्मा उवाच
कुर्वीत पितृदैवत्यं धर्माणि च समाचरेत् ।
यजेच्च विद्वान् विधिवत् त्रिवर्गं चाप्युपाचरेत् ॥
विज्ञ पुरुष पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका यजन करे । धर्मानुकूल कार्योंका अनुष्ठान और यज्ञ करे तथा विधिपूर्वक धर्म, अर्थ और कामका भी सेवन करे ।
अश्मा उवाच
चरितब्रह्मचर्यो हि प्रजायेत यजेत च ।
पितृदेवमनुष्याणामानृण्यादनसूयकः ॥
मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पूर्णरूपसे पालन करके गृहस्थ आश्रम स्वीकार करे और पितरों, देवताओं तथा मनुष्यों (अतिथियों) के ऋणसे मुक्त होनेके लिये संतानोत्पादन तथा यज्ञ करे, किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखे ।
व्यास → युधिष्ठिर
प्रजानां पालनं धर्मो राज्ञां राजीवलोचन ।
धर्मः प्रमाणं लोकस्य नित्यं धर्मानुवर्तिनः ॥
व्यासजी बोले — कमलनयन युधिष्ठिर! राजाओंका धर्म प्रजाजनोंका पालन करना ही है । धर्मका अनुसरण करनेवाले लोगोंके लिये सदा धर्म ही प्रमाण है ।
व्यास उवाच
अवाप्तः क्षत्रधर्मस्ते राज्यं प्राप्तमकण्टकम् ।
रक्षस्व धर्मं कौन्तेय श्रेयान् यः प्रेत्य भारत ॥
कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! तुमने क्षत्रियधर्मका पालन किया है और इस समय तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य मिला है; अतः अब तुम उस धर्मकी ही रक्षा करो, जो मृत्युके पश्चात् सबका कल्याण करनेवाला है ।
व्यास उवाच
शिष्टाचारश्च शिष्टश्च धर्मो धर्मभृतां वर ।
सेवितव्यो नरव्याघ्र प्रेत्येह च सुखेप्सुना ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह! जो इहलोक और परलोकमें सुख चाहता हो उसे श्रेष्ठ पुरुषोंके आचार तथा उनके उपदेश किये हुए धर्मका सदा ही सेवन करना चाहिये ।
व्यास उवाच
अदत्तस्यानुपादानं दानमध्ययनं तपः ।
अहिंसा सत्यमक्रोध इज्या धर्मस्य लक्षणम् ॥
बिना दी हुई वस्तुको न लेना, दान, अध्ययन और तपमें तत्पर रहना, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, क्रोध त्याग देना और यज्ञ करना — ये सब धर्मके लक्षण हैं ।
वासुदेव उवाच
धर्मं शुश्रूषमाणेभ्यः पृष्टेन च सता पुनः ।
वक्तव्यं विदुषा चेति धर्ममाहुर्मनीषिणः ॥
मनीषी पुरुषोंने यह धर्म बताया है कि ‘श्रेष्ठ विद्वान् पुरुषसे जब कुछ पूछा जाय तो उसे उचित है कि वह सुननेकी इच्छावाले लोगोंको धर्मका उपदेश दे’
वैशम्पायन उवाच
सत्यं दानं तपः शौर्यं शान्तिर्दाक्ष्यमसम्भ्रमः ।
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
जिनमें सत्य, दान, तप, शूरता, शान्ति, दक्षता तथा असम्भ्रम (स्थिरचित्तता) — ये समस्त सद्गुण सदा मौजूद रहते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें ।
वैशम्पायन उवाच
सत्यनित्यः क्षमानित्यो ज्ञाननित्योऽतिथिप्रियः ।
यो ददाति सतां नित्यं स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
जिनमें सदा ही सत्य, सदा ही क्षमा और सदा ही ज्ञानकी स्थिति है, जो निरन्तर अतिथिसत्कारके प्रेमी हैं और सत्पुरुषोंको सदा दान देते रहते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें ।
भीष्म उवाच
ब्राह्मणानां यथा धर्मो दानमध्ययनं तपः ।
क्षत्रियाणां तथा कृष्ण समरे देहपातनम् ॥
भीष्मजीने कहा — श्रीकृष्ण! जैसे दान, अध्ययन और तप ब्राह्मणोंका धर्म है, उसी प्रकार समरभूमिमें शत्रुओंके शरीरको मार गिराना क्षत्रियोंका धर्म है ।
भीष्म उवाच
यथा हि गर्भिणी हित्वा स्वं प्रियं मनसोऽनुगम् ।
गर्भस्य हितमाधत्ते तथा राज्ञाप्यसंशयम् ॥
वर्तितव्यं कुरुश्रेष्ठ सदा धर्मानुवर्तिना ।
स्वं प्रियं तु परित्यज्य यद् यल्लोकहितं भवेत् ॥
जैसे गर्भवती स्त्री अपने मनको अच्छे लगने वाले प्रिय भोजन आदिका भी परित्याग करके केवल गर्भस्थ बालकके हितका ध्यान रखती है, उसी प्रकार धर्मात्मा राजाको भी चाहिये कि निःसंदेह वैसा ही बर्ताव करे । कुरुश्रेष्ठ! राजा अपनेको प्रिय लगनेवाले विषयका परित्याग करके जिसमें सब लोगोंका हित हो वही कार्य करे ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
लोकरञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः ।
सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ॥
अतः इस लोकमें प्रजावर्गको प्रसन्न रखना ही राजाओंका सनातन धर्म है । सत्यकी रक्षा और व्यवहारकी सरलता ही राजोचित कर्तव्य है ।
भीष्म उवाच
आत्मवांश्च जितक्रोधः शास्त्रार्थकृतनिश्चयः ।
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ॥
त्रय्यां संवृतमन्त्रश्च राजा भवितुमर्हति ।
वृजिनं च नरेन्द्राणां नान्यच्चारक्षणात् परम् ॥
जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, क्रोधको जीत लिया है तथा शास्त्रोंके सिद्धान्तका निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके प्रयत्नमें निरन्तर लगा रहता है, जिसे तीनों वेदोंका ज्ञान है तथा जो अपने गुप्त विचारोंको दूसरोंपर प्रकट नहीं होने देता है, वही राजा होने योग्य है, प्रजाकी रक्षा न करनेसे बढ़कर राजाओंके लिये दूसरा कोई पाप नहीं है ।
भीष्म उवाच
अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः ।
राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव ॥
जिसमें क्रोधका अभाव होता है, जो दुर्व्यसनोंसे दूर रहता है, जिसका दण्ड भी कठोर नहीं होता तथा जो अपनी इन्द्रियोंपर विजय पा लेता है, वह राजा हिमालयके समान सम्पूर्ण प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है ।
भीष्म उवाच
यः सत्करोति ज्ञानानि ज्ञेये परहिते रतः ।
सतां वर्त्मानुगस्त्यागी स राजा राज्यमर्हति ॥
जो ज्ञान एवं ज्ञानियोंका सत्कार करता है, शास्त्रके ज्ञातव्य विषयको समझने तथा परहित-साधन करनेमें संलग्न रहता है, सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाला और स्वार्थत्यागी है, वही राजा राज्य चलानेके योग्य समझा जाता है ।
भीष्म उवाच
यद्यप्यस्य विपत्तिः स्याद् रक्षमाणस्य वै प्रजाः ।
सोऽप्यस्य विपुलो धर्म एवंवृत्ता हि भूमिपाः ॥
प्रजाकी रक्षा करते हुए राजाके प्राण चले जायँ तो भी वह उसके लिये महान् धर्म है । राजाओंके व्यवहार और बर्ताव ऐसे ही होने चाहिये ।
भीष्म उवाच
न वै राज्यं न राजाऽऽसीन्न च दण्डो न दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥
पहले न कोई राज्य था, न राजा, न दण्ड था और न दण्ड देनेवाला, समस्त प्रजा धर्मके द्वारा ही एक-दूसरेकी रक्षा करती थी ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
देवगण उवाच
प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु ।
कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ॥
प्रिय और अप्रियका विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और मानको दूर हटाकर समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखो ।
देवताओं और महर्षियों ने राजा पृथु से कहा।
भीष्म उवाच
अक्रोधः सत्यवचनं संविभागः क्षमा तथा ।
प्रजनः स्वेषु दारेषु शौचमद्रोह एव च ॥
आर्जवं भृत्यभरणं नवैते सार्ववर्णिकाः ।
ब्राह्मणस्य तु यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि केवलम् ॥
किसीपर क्रोध न करना, सत्य बोलना, धनको बाँटकर भोगना, क्षमाभाव रखना, अपनी ही पत्नीके गर्भसे संतान पैदा करना, बाहर-भीतरसे पवित्र रहना, किसीसे द्रोह न करना, सरलभाव रखना और भरण पोषणके योग्य व्यक्तियोंका पालन करना — ये नौ सभी वर्णोंके लिये उपयोगी धर्म हैं । अब मैं केवल ब्राह्मणका जो धर्म है, उसे बता रहा हूँ ।
भीष्म उवाच
दममेव महाराज धर्ममाहुः पुरातनम् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव तत्र कर्म समाप्यते ॥
महाराज! इन्द्रिय-संयमको ब्राह्मणोंका प्राचीन धर्म बताया गया है । इसके सिवा, उन्हें सदा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करना चाहिये; क्योंकि इसीसे उनके सब कर्मोंकी पूर्ति हो जाती है ।
भीष्म उवाच
स्वदारतुष्टस्त्वृतुकालगामी ।
नियोगसेवी न शठो न जिह्मः ।
मिताशनो देवरतः कृतज्ञः ।
सत्यो मृदुश्चानृशंसः क्षमावान् ॥
गृहस्थको चाहिये कि वह अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हुए संतुष्ट रहे । ऋतुकालमें ही पत्नीके साथ समागम करे । शास्त्रोंकी आज्ञाका पालन करता रहे । शठता और कुटिलतासे दूर रहे । परिमित आहार ग्रहण करे । देवताओंकी आराधनामें तत्पर रहे । उपकार करनेवालोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट करे । सत्य बोले । सबके प्रति मृदुभाव रखे । किसीके प्रति क्रूर न बने और सदा क्षमाभाव रखे ।
सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च ।
धर्मस्तथार्थश्च रतिः स्वदारैः ।
निषेवितव्यानि सुखानि लोके ।
ह्यस्मिन् परे चैव मतं ममैतत् ॥
‘गृहस्थ पुरुष इस लोकमें सत्य, सरलता, अतिथि सत्कार, धर्म, अर्थ, अपनी पत्नीके प्रति अनुराग तथा सुखका सेवन करे । ऐसा होनेपर ही उसे परलोकमें भी सुख प्राप्त होते हैं, यह मेरा मत है’
भीष्म उवाच
ब्रह्मचारी व्रती नित्यं नित्यं दीक्षापरो वशी ।
परिचार्य तथा वेदं कृत्यं कुर्वन् वसेत् सदा ॥
ब्रह्मचारी नित्य निरन्तर मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए व्रत एवं दीक्षाके पालनमें तत्पर रहे । वेदोंका स्वाध्याय करते हुए सदा कर्तव्य-कर्मोंके पालनपूर्वक गुरु-गृहमें निवास करे ।
भीष्म उवाच
यः स्याद् दान्तः सोमपश्चार्यशीलः ।
सानुक्रोशः सर्वसहो निराशीः ।
ऋजुर्मृदुरनृशंसः क्षमावान् ।
सवै विप्रो नेतरः पापकर्मा ॥
जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, सोमयाग करके सोमरस पीनेवाला, सदाचारी, दयालु, सब कुछ सहन करनेवाला, निष्काम, सरल, मृदु, क्रूरतारहित और क्षमाशील हो, वही ब्राह्मण कहलाने योग्य है । उससे भिन्न जो पापाचारी है, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिये ।
भीष्म उवाच
अल्पाश्रयानल्पफलान् वदन्ति ।
धर्मानन्यान् धर्मविदो मनुष्याः ।
महाश्रयं बहुकल्याणरूपं ।
क्षात्रं धर्मं नेतरं प्राहुरार्याः ॥
धर्मके ज्ञाता आर्य पुरुषोंका कथन है कि अन्य समस्त धर्मोंका आश्रय तो अल्प है ही, फल भी अल्प ही है । परंतु क्षात्रधर्मका आश्रय भी महान् है और उसके फल भी बहुसंख्यक एवं परमकल्याणरूप हैं, अतः इसके समान दूसरा कोई धर्म नहीं है ।
भीष्म → राजन
सर्वे धर्मा राजधर्मप्रधानाः ।
सर्वे वर्णाः पाल्यमाना भवन्ति ।
सर्वस्त्यागो राजधर्मेषु राजंस्त्यागं धर्मं चाहुरग्र्यं पुराणम् ॥
सभी धर्मोंमें राजधर्म ही प्रधान है; क्योंकि उसके द्वारा सभी वर्णोंका पालन होता है । राजन्! राजधर्मोंमें सभी प्रकारके त्यागका समावेश है और ऋषिगण त्यागको सर्वश्रेष्ठ एवं प्राचीन धर्म बताते हैं ।
इन्द्र उवाच
शेषाः सृष्टा ह्यन्तवन्तो ह्यनन्ताः ।
सप्रस्थानाः क्षात्रधर्मा विशिष्टाः ।
अस्मिन् धर्मे सर्वधर्माः प्रविष्टास्तस्माद् धर्मं श्रेष्ठमिमं वदन्ति ॥
क्षात्रधर्म ही सबसे श्रेष्ठ है । शेष धर्म असंख्य हैं और उनका फल भी विनाशशील है । इस क्षात्रधर्ममें सभी धर्मोंका समावेश हो जाता है, इसलिये इसी धर्मको श्रेष्ठ कहते हैं ।
इन्द्र ने राजा से कहा।
इन्द्र उवाच
आत्मत्यागः सर्वभूतानुकम्पा ।
लोकज्ञानं पालनं मोक्षणं च ।
विषण्णानां मोक्षणं पीडितानां ।
क्षात्रे धर्मे विद्यते पार्थिवानाम् ॥
युद्धमें अपने शरीरकी आहुति देना, समस्त प्राणियोंपर दया करना, लोकव्यवहारका ज्ञान प्राप्त करना, प्रजाकी रक्षा करना, विषादग्रस्त एवं पीड़ित मनुष्योंको दुःख और कष्टसे छुड़ाना — ये सब बातें राजाओंके क्षात्रधर्ममें ही विद्यमान हैं ।
इन्द्र उवाच
अहिंसा सत्यमक्रोधो वृत्तिदायानुपालनम् ।
भरणं पुत्रदाराणां शौचमद्रोह एव च ॥
अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोधशून्य बर्ताव, दूसरोंकी आजीविका तथा बँटवारेमें मिली हुई पैतृक सम्पत्तिकी रक्षा, स्त्री-पुत्रोंका भरण-पोषण, बाहर-भीतरकी शुद्धि रखना तथा द्रोहभावका त्याग करना — यह उन सबका धर्म है ।
भीष्म उवाच
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति मानवः ।
न्यस्तदण्डो जितक्रोधः प्रेत्येह लभते सुखम् ॥
जो मानव समस्त प्राणियोंके प्रति अपने समान ही भाव रखता है, दण्डका त्याग कर देता है, क्रोधको जीत लेता है, वह इस लोकमें और मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी सुख पाता है ।
भीष्म उवाच
कृतज्ञो दृढभक्तिः स्यात् संविभागी जितेन्द्रियः ।
ईक्षितः प्रतिवीक्षेत मृदु वल्गु च सुष्ठु च ॥
राजा उपकार करनेवालोंके प्रति कृतज्ञ और अपने भक्तोंपर सुदृढ़ स्नेह रखनेवाला हो । उपभोगमें आनेवाली वस्तुओंको यथायोग्य विभाजन करके उन्हें काममें ले । इन्द्रियोंको वशमें रखे । जो उसकी ओर देखे, उसे वह भी देखे एवं स्वभावसे ही मृदु, मधुर और सरल हो ।
बृहस्पति उवाच
तस्माद् बुभूषुर्नियतो जितात्मा नियतेन्द्रियः ।
मेधावी स्मृतिमान् दक्षः संश्रयेत महीपतिम् ॥
इसलिये अपनी उन्नतिकी इच्छा रखनेवाला, मेधावी, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न एवं कार्यदक्ष मनुष्य नियमपूर्वक रहकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए राजाका आश्रय ग्रहण करे ।
भीष्म उवाच
यथा पुत्रास्तथा पौत्रा द्रष्टव्यास्ते न संशयः ।
भक्तिश्चैषां न कर्तव्या व्यवहारे प्रदर्शिते ॥
निःसंदेह राजाको चाहिये कि वह अपनी प्रजाको पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति स्नेहदृष्टिसे देखे; परंतु जब न्याय करनेका अवसर प्राप्त हो, तब उसे स्नेहवश पक्षपात नहीं करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
श्रोतुं चैव न्यसेद् राजा प्राज्ञान् सर्वार्थदर्शिनः ।
व्यवहारेषु सततं तत्र राज्यं प्रतिष्ठितम् ॥
राजा न्याय करते समय सदा वादी-प्रतिवादीकी बातोंको सुननेके लिये अपने पास सर्वार्थदर्शी विद्वान् पुरुषोंको बिठाये रखे; क्योंकि विशुद्ध न्यायपर ही राज्य प्रतिष्ठित होता है ।
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्ये स्वकर्मस्थे मर्यादानामसंकरे ।
दण्डनीतिकृते क्षेमे प्रजानामकुतोभये ॥
स्वाम्ये प्रयत्नं कुर्वन्ति त्रयो वर्णा यथाविधि ।
तस्मादेव मनुष्याणां सुखं विद्धि समाहितम् ॥
इस प्रकार दण्डनीतिके प्रभावसे जब चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मोंमें संलग्न रहते हैं, धर्ममर्यादामें संकीर्णता नहीं आने पाती और प्रजा सब ओरसे निर्भय एवं कुशलपूर्वक रहने लगती है, तब तीनों वर्णोंके लोग विधिपूर्वक स्वास्थ्य-रक्षाका प्रयत्न करते हैं । युधिष्ठिर! इसीमें मनुष्योंका सुख निहित है, यह तुम्हें ज्ञात होना चाहिये ।
भीष्म उवाच
यस्यां भवन्ति भूतानि तद् विद्धि मनुजर्षभ ।
एष एव परो धर्मो यद् राजा दण्डनीतिमान् ॥
नरश्रेष्ठ! तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिये कि समस्त प्राणी दण्डनीतिके आधारपर ही टिके हुए हैं । राजा दण्डनीतिसे युक्त हो उसीके अनुसार चले-यही उसका सबसे बड़ा धर्म है ।
भीष्म उवाच
चरेद् धर्मानकटुको मुञ्चेत् स्नेहं न चास्तिकः ।
अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत् काममनुद्धतः ॥
(अब मैं क्रमशः उन गुणोंका वर्णन करता हूँ)-धर्मका आचरण करे, किंतु कटुता न आने दे ।-आस्तिक रहते हुए दूसरोंके साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े ।-क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही अर्थ-संग्रह करे ।-मर्यादाका अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे ।
भीष्म उवाच
दापयित्वा करं धर्म्यं राष्ट्रं नीत्या यथाविधि ।
तथैतं कल्पयेद् राजा योगक्षेममतन्द्रितः ॥
प्रजासे धर्मानुकूल कर ग्रहण करके राज्यका नीतिके अनुसार विधिपूर्वक पालन करते हुए राजाको आलस्य छोड़कर प्रजावर्गके योगक्षेमकी व्यवस्था करनी चाहिये ।
भीष्म उवाच
एष एव परो धर्मो यद् राजा रक्षति प्रजाः ।
भूतानां हि यथा धर्मो रक्षणं परमा दया ॥
राजा जो प्रजाकी रक्षा करता है, यही उसका सबसे बड़ा धर्म है । समस्त प्राणियोंकी रक्षा तथा उनके प्रति परम दया ही महान् धर्म है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
तस्मादेवं परं धर्मं मन्यन्ते धर्मकोविदाः ।
यो राजा रक्षणे युक्तो भूतेषु कुरुते दयाम् ॥
इसलिये जो राजा प्रजापालनमें तत्पर रहकर प्राणियोंपर दया करता है, उसके इस बर्तावको धर्मज्ञ पुरुष परम धर्म मानते हैं ।
भीष्म उवाच
दानमध्ययनं यज्ञं प्रजानां परिपालनम् ।
धर्ममेतदधर्मं वा जन्मनैवाभ्यजायथाः ॥
दान, वेदाध्ययन, यज्ञ तथा प्रजाका पालन — ये धर्मरूप हों या अधर्मरूप । तुम्हारा जन्म इन्हीं कर्मोंको करनेके लिये हुआ है ।
भीष्म उवाच
नैकान्तविनिपातेन विचचारेह कश्चन ।
धर्मी गृही वा राजा वा ब्रह्मचारी यथा पुनः ॥
कोई धर्मनिष्ठ हो, गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या राजा हो, पूर्णतया धर्मका आचरण नहीं कर सकता (कुछ-न-कुछ अधर्मका मिश्रण हो ही जाता है)
भीष्म उवाच
भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्माधर्मावुभावपि ।
कारणाद् देशकालस्य देशकालः स तादृशः ॥
देश-कालकी परिस्थितिके कारण कभी अधर्म तो धर्म हो जाता है और धर्म अधर्मरूपमें परिणत हो जाता है; क्योंकि वह वैसा ही देश काल है ।
भीष्म उवाच
अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यं दमो घृणा ।
एतत् तपो विदुर्धीरा न शरीरस्य शोषणम् ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, क्रूरताको त्याग देना, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना तथा सबके प्रति दयाभाव बनाये रखना-इन्हींको धीर पुरुषोंने तप माना है । केवल शरीरको सुखाना ही तप नहीं है ।
भीष्म उवाच
श्रेयसो लक्षणं चैतद् विक्रमो यस्य दृश्यते ।
कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात् समये यश्च तिष्ठति ॥
समर्थान् पूजयेद् यश्च नास्पर्धेः स्पर्धते च यः ।
न च कामाद् भयात् क्रोधाल्लोभाद् वा धर्ममुत्सृजेत् ॥
अमानी सत्यवान् क्षान्तो जितात्मा मानसंयुतः ।
स ते मन्त्रसहायः स्यात् सर्वावस्थापरीक्षितः ॥
श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण इस प्रकार है-जिसका पराक्रम देखा जाता हो, जिसके जीवनमें कीर्तिकी प्रधानता हो, जो अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहता हो, सामर्थ्यशाली पुरुषोंका सम्मान करता हो, जो स्पर्धाके अयोग्य पुरुषोंसे ईर्ष्या न रखता हो, कामना, भय, क्रोध अथवा लोभसे भी धर्मका उल्लंघन न करता हो, जिसमें अभिमानका अभाव हो, जो सत्यवान्, क्षमाशील, जितात्मा तथा सम्मानित हो और जिसकी सभी अवस्थाओंमें परीक्षा कर ली गयी हो, ऐसा पुरुष ही तुम्हारी गुप्त मन्त्रणामें सहायक होना चाहिये ।
भीष्म उवाच
कुलीनः कुलसम्पन्नस्तितिक्षुर्दक्ष आत्मवान् ।
शूरः कृतज्ञः सत्यश्च श्रेयसः पार्थ लक्षणम् ॥
कुन्तीनन्दन! उत्तम कुलमें जन्म होना, सदा श्रेष्ठ कुलके सम्पर्कमें रहना, सहनशीलता, कार्यदक्षता, मनस्विता, शूरता, कृतज्ञता और सत्यभाषण — ये ही श्रेष्ठ पुरुषके लक्षण हैं ।
भीष्म → राजन
व्यवहारेण शुद्धेन प्रजापालनतत्परः ।
प्राप्य धर्मं च कीर्तिं च लोकानाप्नोत्युभौ शुचिः ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! जो राजा बाहर-भीतरसे पवित्र रहकर शुद्ध व्यवहारसे प्रजापालनमें तत्पर रहता है, वह धर्म और कीर्ति प्राप्त करके इहलोक और परलोक दोनोंको सुधार लेता है ।
भीष्म उवाच
प्रजाः पालयतोऽसम्यगधर्मेणेह भूपतेः ।
हार्दं भयं सम्भवति स्वर्गश्चास्य विरुध्यते ॥
जो राजा अन्याय एवं अधर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसके हृदयमें भय बना रहता है तथा उसका परलोक भी बिगड़ जाता है ।
भीष्म उवाच
अथ योऽधर्मतः पाति राजामात्योऽथ वाऽऽत्मजः ।
धर्मासने संनियुक्तो धर्ममूले नरर्षभ ॥
कार्येष्वधिकृताः सम्यगकुर्वन्तो नृपानुगाः ।
आत्मानं पुरतः कृत्वा यान्त्यधः सहपार्थिवाः ॥
नरश्रेष्ठ! धर्म ही जिसकी जड़ है, उस धर्मासन अथवा न्यायासनपर बैठकर जो राजा, मन्त्री अथवा राजकुमार धर्म-पूर्वक प्रजाकी रक्षा नहीं करता तथा राजाका अनुसरण करनेवाले राज्यके दूसरे अधिकारी भी यदि अपनेको सामने रखकर प्रजाके साथ उचित बर्ताव नहीं करते हैं तो वे राजाके साथ ही स्वयं भी नरकमें गिर जाते हैं ।
भीष्म उवाच
यष्टव्यं क्रतुभिर्नित्यं दातव्यं चाप्यपीडया ।
प्रजानां रक्षणं कार्यं न कार्यं धर्मबाधकम् ॥
उसे प्रतिदिन नाना प्रकारके यज्ञ करना तथा दूसरोंको कष्ट न पहुँचाते हुए दान देना चाहिये । वह प्रजाजनोंकी रक्षा करे और कोई भी कार्य ऐसा न करे जिससे धर्ममें बाधा आती हो ।
भीष्म → राजन
यथादेशं यथाकालं यथाबुद्धि यथाबलम् ।
अनुशिष्यात् प्रजा राजा धर्मार्थी तद्धिते रतः ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! धर्मकी इच्छा रखनेवाले राजाको देश और कालकी परिस्थितिका ध्यान रखते हुए अपनी बुद्धि और बलके अनुसार प्रजाके हितसाधनमें संलग्न रहकर उसे अपने अनुशासनमें रखना चाहिये ।
भीष्म उवाच
पानागारनिवेशाश्च वेश्याः प्रापणिकास्तथा ।
कुशीलवाः सकितवा ये चान्ये केचिदीदृशाः ॥
नियम्याः सर्व एवैते ये राष्ट्रस्योपघातकाः ।
एते राष्ट्रेऽभितिष्ठन्तो बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ॥
शराबखाना खोलनेवाले, वेश्याएँ, कुट्टनियाँ, वेश्याओंके दलाल, जुआरी तथा ऐसे ही बुरे पेशे करनेवाले और भी जितने लोग हों, वे समूचे राष्ट्रको हानि पहुँचानेवाले हैं; अतः इन सबको दण्ड देकर दबाये रखना चाहिये । यदि ये राज्यमें टिके रहते हैं तो कल्याणमार्गपर चलनेवाली प्रजाको बड़ी बाधाएँ पहुँचाते हैं ।
उतथ्य उवाच
धर्माय राजा भवति न कामकरणाय तु ।
मान्धातरिति जानीहि राजा लोकस्य रक्षिता ॥
उतथ्य बोले — मान्धाता! राजा धर्मका पालन और प्रचार करनेके लिये ही होता है, विषय-सुखोंका उपभोग करनेके लिये नहीं । तुम्हें यह जानना चाहिये कि राजा सम्पूर्ण जगत्का रक्षक है ।
उतथ्य उवाच
स्वधर्मे वर्तमानानामर्थसिद्धिः प्रदृश्यते ।
तदेव मङ्गलं लोकः सर्वः समनुवर्तते ॥
जो अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन्हींसे अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती देखी जाती है । सारा संसार उसी मंगलमय धर्मका अनुसरण करता है ।
उतथ्य → तात
ममेदमिति नैवैतत् साधूनां तात धर्मतः ।
न वै व्यवस्था भवति यदा पापो न वार्यते ॥
तात! यदि पापकी प्रवृत्तिका निवारण न किया जाय तो यह मेरी वस्तु है, ऐसा कहना श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये असम्भव हो जाता है और उस समय कोई भी धार्मिक व्यवस्था टिकने नहीं पाती है ।
उतथ्य उवाच
वृषो ही भगवान् धर्मो यस्तस्य कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं विवर्धयेत् ॥
वृष नाम है भगवान् धर्मका । जो धर्मके विषयमें ‘अलम्’ (बस) कह देता है, उसे देवता ‘वृषल’ समझते हैं; अतः धर्मकी सदा ही वृद्धि करनी चाहिये ।
उतथ्य उवाच
कामक्रोधावनादृत्य धर्ममेवानुपालय ।
धर्मः श्रेयस्करतमो राज्ञां भरतसत्तम ॥
भरतभूषण! तुम भी काम और क्रोधकी अवहेलना करके निरन्तर धर्मका ही पालन करो । धर्म ही राजाओंके लिये सबसे बढ़कर कल्याण करनेवाला है ।
उतथ्य उवाच
यमो यच्छति भूतानि सर्वाण्येवाविशेषतः ।
तथा राज्ञानुकर्तव्यं यन्तव्या विधिवत् प्रजाः ॥
जैसे यमराज सभी प्राणियोंपर समानरूपसे शासन करते हैं, उसी प्रकार राजाको भी बिना किसी भेदभावके समस्त प्रजाओंपर विधिपूर्वक नियन्त्रण रखना चाहिये ।
वामदेव उवाच
अर्थसिद्धेः परं धर्मं मन्यते यो महीपतिः ।
वृद्ध्यां च कुरुते बुद्धिं स धर्मेण विराजते ॥
जो भूपाल धर्मको अर्थ-सिद्धिकी अपेक्षा भी बड़ा मानता है और उसीको बढ़ानेमें अपने मन और बुद्धिका उपयोग करता है, वह धर्मके कारण बड़ी शोभा पाता है ।
वामदेव उवाच
गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वयमर्थानवेक्षिता ।
धर्मप्रधानो लाभेषु स चिरं सुखमश्नुते ॥
जो धर्मके विषयमें गुरुको प्रधान मानकर उनके उपदेशके अनुसार चलता है, जो स्वयं ही अर्थ-सम्बन्धी सारे कार्योंको देखता है तथा सब प्रकारके लाभोंमें धर्मको ही प्रधान लाभ समझता है, वह चिरकालतक सुखका उपभोग करता है ।
वामदेव उवाच
अमाययैव वर्तेत न च सत्यं त्यजेद् बुधः ।
दमं धर्मं च शीलं च क्षत्रधर्मं प्रजाहितम् ॥
नापत्रपेत प्रश्नेषु नाविभाव्यां गिरं सृजेत् ।
न त्वरेत न चासूयेत् तथा संगृह्यते परः ॥
विद्वान् राजा छल-कपट छोड़कर ही बर्ताव करे । सत्यको कभी न छोड़े । इन्द्रिय-संयम, धर्माचरण, सुशीलता, क्षत्रियधर्म तथा प्रजाके हितका कभी परित्याग न करे । यदि कोई कुछ पूछे तो उसका उत्तर देनेमें संकोच न करे, बिना विचारे कोई बात मुँहसे न निकाले, किसी काममें जल्दबाजी न करे और किसीकी निन्दा न करे, ऐसा बर्ताव करनेसे शत्रु भी अपने वशमें हो जाता है ।
वामदेव उवाच
मृषावादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।
न कामान्न च संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ॥
मिथ्या भाषण करना छोड़ दे, बिना याचना या प्रार्थना किये ही दूसरोंका प्रिय करे । किसी कामनासे, क्रोधसे तथा द्वेषसे भी धर्मका त्याग न करे ।
वामदेव → राजन
मरणान्तमिदं सर्वं नेह किञ्चिदनामयम् ।
तस्माद् धर्मे स्थितो राजा प्रजा धर्मेण पालयेत् ॥
राजन्! इस जगत्के सभी पदार्थ अन्तमें नष्ट होनेवाले हैं; यहाँ कोई भी वस्तु नीरोग या अविनाशी नहीं है । इसलिये राजाको धर्मपर स्थित रहकर प्रजाका धर्मके अनुसार ही पालन करना चाहिये ।
पराक्रम से पृथ्वी प्राप्त करने के पश्चात धर्मपरायण राजा को अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करना चाहिए।
वामदेव उवाच
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते ।
शृणोति प्रतिकूलानि सर्वदा विमना इव ॥
अग्राम्यचरितां वृत्तिं यो न सेवेत नित्यदा ।
जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥
जो मनके प्रतिकूल होनेके कारण अपने ही प्रयोजनकी सिद्धि चाहनेवाले सुहृद्की बात नहीं सहन करता और अपनी अर्थसिद्धिके विरोधी वचनोंको भी सुनता है, सदा अनमना-सा रहता है, जो बुद्धिमान् शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए बर्तावका सदा सेवन नहीं करता एवं पराजित या अपराजित व्यक्तियोंको उनके परम्परागत आचारका पालन नहीं करने देता, वह क्षत्रिय धर्मसे गिर जाता है ।
भीष्म उवाच
कर्म चैतदसाधूनामसाधून् साधुना जयेत् ।
धर्मेण निधनं श्रेयो न जयः पापकर्मणा ॥
यह तो दुष्टोंका काम है । श्रेष्ठ पुरुषको तो दुष्टोंपर भी धर्मसे ही विजय पानी चाहिये । धर्मपूर्वक युद्ध करते हुए मर जाना भी अच्छा है; परंतु पापकर्मके द्वारा विजय पाना अच्छा नहीं है ।
भीष्म उवाच
अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ।
विसृजन् श्लेष्ममूत्राणि कृपणं परिदेवयन् ॥
अविक्षतेन देहेन प्रलयं योऽधिगच्छति ।
क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ॥
खाटपर सोकर मरना क्षत्रियके लिये अधर्म है । जो क्षत्रिय कफ और मल-मूत्र छोड़ता तथा दुखी होकर विलाप करता हुआ बिना घायल हुए शरीरसे मृत्युको प्राप्त हो जाता है, उसके इस कर्मकी प्राचीन धर्मको जानने वाले विद्वान् पुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं ।
भीष्म → राजन
सत्येन हि स्थितो धर्म उपपत्त्या तथा परे ।
साध्वाचारतया केचित् तथैवौपयिकादपि ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! किन्हींका मत है कि धर्म सत्यसे ही स्थिर रहता है । दूसरे लोग युक्तिवादसे ही धर्मकी प्रतिष्ठा मानते हैं । किसी-किसीके मतमें श्रेष्ठ आचरणसे ही धर्मकी स्थिति है और कितने ही लोग यथासम्भव साम-दान आदि उपायोंके अवलम्बनसे भी धर्मकी प्रतिष्ठा स्वीकार करते हैं ।
मुनि उवाच
धर्ममेकेऽभिपद्यन्ते कल्याणाभिजना नराः ।
परत्र सुखमिच्छन्तो निर्विद्येयुश्च लौकिकात् ॥
उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए कुछ ही मनुष्य ऐसे हैं, जो धर्मकी शरण लेते हैं और परलोकमें सुखकी इच्छा रखकर समस्त लौकिक व्यापारसे उपरत हो जाते हैं ।
मुनि उवाच
कोशक्षये त्वमित्राणां वशं कौसल्य गच्छति ।
उभयत्र प्रयुक्तस्य धर्मेणाधर्म एव च ॥
कोसलराज! धर्म अथवा अधर्म या उन दोनोंमें ही प्रवृत्त रहनेवाले राजाका कोष निश्चय ही खाली हो जाता है । खजाना खाली होते ही राजा अपने शत्रुओंके वशमें आ जाता है ।
भीष्म → युधिष्ठिर
यच्च तेऽभ्यनुजानीयुः कर्म तात सुपूजिताः ।
धर्माधर्मविरुद्धं वा तत् कर्तव्यं युधिष्ठिर ॥
तात युधिष्ठिर! भलीभाँति पूजित हुए वे माता-पिता और गुरुजन जिस कामके लिये आज्ञा दें, वह धर्मके अनुकूल हो या विरुद्ध, उसका पालन करना ही चाहिये ।
भीष्म उवाच
धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः ।
यः स्याद् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥
धर्मका नाम ‘धर्म’ इसलिये पड़ा है कि वह सबको धारण करता है — अधोगतिमें जानेसे बचाता है और जीवनकी रक्षा करता है । धर्मने ही सारी प्रजाको धारण कर रखा है; अतः जिससे धारण और पोषण सिद्ध होता हो, वही धर्म है; ऐसा धर्मवेत्ताओंका निश्चय है ।
भीष्म उवाच
अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।
यः स्यादहिंसासम्पृक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥
प्राणियोंकी हिंसा न हो, इसके लिये धर्मका उपदेश किया गया है; अतः जो अहिंसासे युक्त हो, वही धर्म है, ऐसा धर्मात्माओंका निश्चय है ।
भीष्म उवाच
व्यवहारश्च नगरे यस्य कर्मफलोदयः ।
दृश्यते शंखलिखितः स धर्मफलभाङ् नृपः ॥
जिसके नगरमें कर्मके अनुसार फलकी प्राप्तिका प्रतिपादन करनेवाले शंख-लिखित मुनिके बनाये हुए न्याय-व्यवहारका पालन होता देखा जाता है, वह राजा धर्मके फलका भागी होता है ।
भीष्म उवाच
एतैरेव गुणैर्युक्तो राजा शास्त्रविशारदः ।
एष्टव्यो धर्मपरमः प्रजापालनतत्परः ॥
राजाको भी ऐसे ही गुणोंसे युक्त होना चाहिये। साथ ही उसमें शास्त्रज्ञान, धर्मपरायणता तथा प्रजापालनकी लगन भी होनी चाहिये; ऐसा ही राजा प्रजाजनोंके लिये वांछनीय होता है ।
भीष्म उवाच
युक्तदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासनः ।
चारनेत्रः प्रजावेक्षी धर्मार्थकुशलः सदा ॥
न्यायोचित दण्ड दे, दण्डका कभी त्याग न करे, धर्मकार्यका उपदेश दे, गुप्तचररूपी नेत्रोंद्वारा राज्यकी देखभाल करे, प्रजापर कृपादृष्टि रखे तथा सदा ही धर्म और अर्थके उपार्जनमें कुशलतापूर्वक लगा रहे ।
भीष्म उवाच
व्यवसायं समाधाय सूर्यो रश्मीनिवायतान् ।
धर्ममेवाभिरक्षेत कृत्वा तुल्ये प्रियाप्रिये ॥
जैसे सूर्य अपनी विस्तृत किरणोंका आश्रय ले सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार राजा प्रिय और अप्रियको समान समझकर सुदृढ़ उद्योगका अवलम्बन करके धर्मकी ही रक्षा करे ।
भीष्म उवाच
एतान् मयोक्ताश्चर राजधर्मान् ।
नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व ।
अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन ।
सर्वो हि लोको नृप धर्ममूलः ॥
नरेश्वर! मेरे बताये हुए इन राजधर्मोंका आचरण करो और प्रजाके पालनमें मन लगाओ । इससे तुम सुखपूर्वक पुण्यफल प्राप्त करोगे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्का मूल धर्म ही है ।
भीष्म → युधिष्ठिर
व्यवहारः प्रजागोप्ता ब्रह्मदिष्टो युधिष्ठिर ।
त्रीन् धारयति लोकान् वै सत्यात्मा भूतिवर्धनः ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका बताया हुआ जो प्रजा-रक्षक व्यवहार है, वह सत्यस्वरूप होनेके साथ ही ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाला है, वही तीनों लोकोंको धारण करता है ।
लक्ष्मी उवाच
धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम् ।
शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ॥
महाप्राज्ञ! धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं (लक्ष्मी) — ये सब सदा शीलके ही आधारपर रहते हैं — शील ही इन सबकी जड़ है । इसमे संशय नहीं है ।
लक्ष्मी ने इन्द्र से कहा।
यम → ब्रह्मन
तपः शौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च ।
मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा ॥
यमराजने कहा — ब्रह्मन्! मनुष्य तप करे, बाहर-भीतरसे पवित्र रहे और सदा सत्यभाषणरूप धर्मके पालनमें तत्पर रहे । यह सब करते हुए ही उसे नित्यप्रति माता-पिताकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ।
यमराज ने ऋषि गौतम को धर्मचर्चा के अवसर पर माता-पिता के ऋण से मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा।
भीष्म उवाच
परस्परं हि संरक्षा राज्ञा राष्ट्रेण चापदि ।
नित्यमेव हि कर्तव्या एष धर्मः सनातनः ॥
इसलिये आपत्तिकालमें राजा और राज्यकी प्रजा दोनोंको निरन्तर एक-दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये । यही सदाका धर्म है ।
भीष्म उवाच
यथा यथास्य बहवः सहायाः स्युस्तथा परे ।
आचारमेव मन्यन्ते गरीयो धर्मलक्षणम् ॥
जैसे-जैसे आचरणोंसे राजाके बहुत-से दूसरे लोग सहायक हों, वैसे ही आचरण उसे अपनाने चाहिये । धर्मज्ञ पुरुष आचारको ही धर्मका प्रधान लक्षण मानते हैं ।
भीष्म उवाच
यश्चतुर्गुणसम्पन्नं धर्मं ब्रूयात् स धर्मवित् ।
अहेरिव हि धर्मस्य पदं दुःखं गवेषितुम् ॥
यथा मृगस्य विद्धस्य पदमेकं पदं नयेत् ।
लक्षेद् रुधिरलेपेन तथा धर्मपदं नयेत् ॥
जो वेदविहित स्मृतियोंद्वारा अनुमोदित, सज्जनोंद्वारा सेवित तथा अपनेको प्रिय लगनेवाला धर्म है, उसे चतुर्गुणसम्पन्न माना गया है । जो वैसे धर्मका उपदेश करता है, वही धर्मज्ञ है । सर्पके पदचिह्नकी भाँति धर्मके यथार्थ स्वरूपको ढूँढ़ निकालना बहुत कठिन है । जैसे बाणसे बिंधे हुए मृगका एक पैर पृथ्वीपर रक्तका लेप कर देनेके कारण व्याधको उस मृगके रहनेके स्थानको लक्षित कराकर वहाँ पहुँचा देता है, उसी प्रकार उक्त चतुर्गुणसम्पन्न धर्म भी धर्मके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति करा देता है ।
भीष्म उवाच
बह्वपथ्यं बलवति न किंचित् क्रियते भयात् ।
उभौ सत्याधिकारस्थौ त्रायेते महतो भयात् ॥
बलवान् पुरुषमें बहुत-सी बुराई होती है तो भी भयके मारे उसके विषयमें कोई मुँहसे कुछ बात नहीं निकालता है । यदि बल और धर्म दोनों सत्यके ऊपर प्रतिष्ठित हों तो वे मनुष्यकी महान् भयसे रक्षा करते हैं ।
पूजनी उवाच
यस्तु रञ्जयते राजा पौरजानपदान् गुणौः ।
न तस्य भ्रमते राज्यं स्वयं धर्मानुपालनात् ॥
जो राजा अपने गुणोंसे नगर और जनपदके लोगोंको प्रसन्न रखता है, उसका राज्य कभी डावाँडोल नहीं होता क्योंकि वह स्वयं धर्मका निरन्तर पालन करता रहता है ।
भीष्म उवाच
कर्मणा येन तेनैव मृदुना दारुणेन च ।
उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥
मनुष्य कोमल या कठोर, जिस किसी भी उपायसे सम्भव हो, दीनदशासे अपना उद्धार करे । इसके बाद शक्तिशाली हो पुनः धर्माचरण करे ।
जानता विहितं धर्मं न कार्यो धर्मसंकरः ।
मा स्म धर्मं परित्याक्षीस्त्वं हि धर्मभृतां वरः ॥
‘आप शास्त्रविहित धर्मको जानते हैं, अतः आपके द्वारा धर्मसंकरताका प्रचार नहीं होना चाहिये । धर्मका त्याग न कीजिये; क्योंकि आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ समझे जाते हैं’
श्वपच उवाच
येन येन विशेषण कर्मणा येन केनचित् ।
अभ्युज्जीवेत् साद्यमानः समर्थो धर्ममाचरेत् ॥
जो भूखों मर रहा हो, वह जिस-जिस उपायसे अथवा जिस किसी भी कर्मसे सम्भव हो, अपने जीवनकी रक्षा करे, फिर समर्थ होनेपर वह धर्मका आचरण कर सकता है ।
भीष्म उवाच
अहो देहप्रदानेन दर्शितातिथिपूजना ।
तस्माद् धर्मं चरिष्यामि धर्मो हि परमा गतिः ।
दृष्टो धर्मो हि धर्मिष्ठे यादृशो विहगोत्तमे ॥
अहो! महात्मा कबूतरने अपने शरीरका दान करके मेरे सामने अतिथि-सत्कारका उज्ज्वल आदर्श रक्खा है, अतः मैं भी अब धर्मका ही आचरण करूँगा; क्योंकि धर्म ही परम गति है । उस धर्मात्मा श्रेष्ठ पक्षीमें जैसा धर्म देखा गया है, वैसा ही मुझे भी अभीष्ट है ।
शौनक उवाच
स्वाध्यायशीलः स्थानेषु सर्वेषु समुपस्पृशेत् ।
त्यागधर्मः पवित्राणां संन्यासं मनुरब्रवीत् ॥
सभी तीर्थस्थानोंमें स्वाध्यायशील होकर स्नान करे । मनुने कहा है कि सर्वत्यागरूप संन्यास सम्पूर्ण पवित्र धर्मोंमें श्रेष्ठ है ।
भीष्म उवाच
कुर्वते च बहून् मार्गांस्तान् हेतुबलमाश्रिताः ।
सतां मार्गान् विलुम्पन्ति लोभाज्ञानेषु निष्ठिताः ॥
युक्तिबलका आश्रय लेकर बहुत-से असत् मार्ग खड़े कर देते हैं तथा लोभ और अज्ञानमें स्थित हो सत्पुरुषोंके स्थापित किये हुए मार्गों (धर्ममर्यादाओं) का नाश करने लगते हैं ।
भीष्म उवाच
शिष्टाचारः प्रियो येषु दमो येषु प्रतिष्ठितः ।
सुखं दुःखं समं येषां सत्यं येषां परायणम् ॥
जिन्हें शिष्टाचार प्रिय है । जिनमें इन्द्रिय-संयम प्रतिष्ठित है । जिनके लिये सुख और दुःख समान है । सत्य ही जिनका परम आश्रय है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
न ते चालयितुं शक्या धर्मव्यापारकारिणः ।
न तेषां भिद्यते वृत्तं यत्पुरा साधुभिः कृतम् ॥
उन्हें सत्कर्मसे विचलित नहीं किया जा सकता । वे केवल धर्मके अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं । पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने जिसका पालन किया है, उसी सदाचारका वे भी पालन करते हैं । उनका वह आचार कभी नष्ट नहीं होता ।
भीष्म उवाच
न दुष्करतरं दानान्नातिमातरमाश्रयः ।
त्रैविद्येभ्यः परं नास्ति संन्यासः परमं तपः ॥
दानसे बढ़कर कोई दुष्कर धर्म नहीं है, माताकी सेवासे बड़ा कोई दूसरा आश्रय नहीं है, तीनों वेदोंके विद्वानोंसे श्रेष्ठ कोई विद्वान् नहीं है और संन्यास सबसे बड़ा तप है ।
भीष्म उवाच
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥
मन, वाणी और क्रियाद्वारा सभी प्राणियोंके साथ कभी द्रोह न करना तथा दया और दान — यह श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है ।
भीष्म उवाच
नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ।
स्थितिर्हि सत्यं धर्मस्य तस्मात् सत्यं न लोपयेत् ॥
सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं और झूठसे बढ़कर कोई पातक नहीं है । सत्य ही धर्मकी आधारशिला है; अतः सत्यका लोप न करे ।
विदुर → राजन
बाहुश्रुत्यं तपस्त्यागः श्रद्धा यज्ञक्रिया क्षमा ।
भावशुद्धिर्दया सत्यं संयमश्चात्मसम्पदः ॥
विदुरजी बोले — राजन्! बहुत-से शास्त्रोंका अनुशीलन, तपस्या, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावशुद्धि, दया, सत्य और संयम — ये सब आत्माकी सम्पत्ति हैं ।
विदुर उवाच
धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
धर्मेण देवा ववृधुर्धर्मे चार्थः समाहितः ॥
धर्मसे ही ऋषियोंने संसार-समुद्रको पार किया है । धर्मपर ही सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं । धर्मसे ही देवताओंकी उन्नति हुई है और धर्ममें ही अर्थकी भी स्थिति है ।
वैशम्पायन उवाच
तस्माद् धर्मप्रधानेन साध्योऽर्थः संयतात्मना ।
विश्वस्तेषु हि भूतेषु कल्पते सर्वमेव हि ॥
इसलिये मनुष्य अपने मनको संयममें रखकर जीवनमें धर्मको प्रधानता देते हुए पहले धर्माचरण करके ही फिर धनका साधन करे; क्योंकि धर्मपरायण पुरुषपर ही समस्त प्राणियोंका विश्वास होता है और जब सभी प्राणी विश्वास करने लगते हैं तब मनुष्यका सारा काम स्वतः सिद्ध हो जाता है ।
भीष्म → युधिष्ठिर
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्ग्यः सत्यफलं तपः ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥
भीष्मजी बोले — युधिष्ठिर! वेदोंमें सर्वत्र सभी आश्रमोंके लिये स्वर्गसाधक यथार्थ फलकी प्राप्ति करानेवाली तपस्याका उल्लेख है । धर्मके बहुत-से द्वार हैं । संसारमें कोई ऐसी क्रिया नहीं है, जिसका कोई फल न हो ।
पुत्र उवाच
तस्मात् सत्यव्रताचारः सत्ययोगपरायणः ।
सत्यागमः सदा दान्तः सत्येनैवान्तकं जयेत् ॥
अतः मनुष्यको सत्यव्रतका आचरण करना चाहिये । सत्ययोगमें तत्पर रहना और शास्त्रकी बातोंको सत्य मानकर श्रद्धापूर्वक सदा मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये । इस प्रकार सत्यके द्वारा ही मनुष्य मृत्युपर विजय पा सकता है ।
मङ्कि उवाच
क्षमिष्ये क्षिपमाणानां न हिंसिष्ये विहिंसितः ।
द्वेष्ययुक्तः प्रियं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रियम् ॥
अब जो लोग मुझपर आक्षेप या मेरा तिरस्कार करेंगे, उनके उस बर्तावको मैं चुपचाप सह लूँगा । जो लोग मुझे मारे-पीटेंगे या कष्ट देंगे, उनके साथ भी मैं बदलेमें वैसा बर्ताव नहीं करूँगा । द्वेषके योग्य पुरुषका भी यदि साथ हो जाय और वह मुझे अप्रिय वचन कहने लगे तो मैं उसपर ध्यान न देकर उससे अप्रिय वचन नहीं बोलूँगा ।
भीष्म उवाच
सुखं जीवन्ति मुनयो भैक्ष्यवृत्तिं समाश्रिताः ।
अद्रोहेणैव भूतानां सारङ्गा इव पक्षिणः ॥
जिस प्रकार पपीहा पक्षी किसी भी प्राणीसे वैर न करके याचनावृत्तिसे अपना निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार मुनिजन भिक्षावृत्तिका आश्रय लेकर सुखसे जीवन व्यतीत करते हैं (अद्रोहका उपदेश देनेके कारण पपीहा गुरु हुआ)
भृगु उवाच
ब्राह्मणा ब्रह्मतन्त्रस्थास्तपस्तेषां न नश्यति ।
ब्रह्म धारयतां नित्यं व्रतानि नियमांस्तथा ॥
जो ब्राह्मण वेदकी आज्ञाके अधीन रहकर सारा कार्य करते, वेदमन्त्रोंको स्मरण रखते और सदा व्रत एवं नियमोंका पालन करते हैं, उनकी तपस्या कभी नष्ट नहीं होती ।
भृगु → मुने
सत्यं ब्रह्म तपः सत्यं सत्यं विसृजते प्रजाः ।
सत्येन धार्यते लोकः स्वर्गं सत्येन गच्छति ॥
भृगुजी कहते हैं — मुने! सत्य ही ब्रह्म है, सत्य ही तप है, सत्य ही प्रजाकी सृष्टि करता है, सत्यके ही आधारपर संसार टिका हुआ है और सत्यके ही प्रभावसे मनुष्य स्वर्गमें जाता है ।
भृगु उवाच
अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव विगर्हितः ।
अहिंसा सत्यमक्रोधः सर्वाश्रमगतं तपः ॥
किसीका अनादर करना, अहंकार दिखाना और ढोंग करना — इन दुर्गुणोंकी भी विशेष निन्दा की गयी है । किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना और मनमें क्रोध न आने देना — यह सभी आश्रमवालोंके लिये उपयोगी तप है ।
भीष्म → राजन
दुराचारा दुर्विचेष्टा दुष्प्रज्ञाः प्रियसाहसाः ।
असंतस्त्विति विख्याताः संतश्चाचारलक्षणाः ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! जो दुराचारी, बुरी चेष्टावाले, दुर्बुद्धि और दुःसाहसको प्रिय माननेवाले हैं, वे दुष्टात्माके नामसे विख्यात होते हैं । श्रेष्ठ पुरुष तो वही हैं, जिनमें सदाचार-देखा जाय — सदाचार ही उनका लक्षण है ।
ब्राह्मण उवाच
सत्यं वेदेषु जागार्ति फलं सत्ये परं स्मृतम् ।
सत्याद् धर्मो दमश्चैव सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
वेदोंमें सत्य ही जागता है — उसीकी महिमा बतायी गयी है । सत्यका ही सबसे श्रेष्ठ फल माना गया है । धर्म और इन्द्रिय-संयमकी सिद्धि भी सत्यसे ही होती है । सत्यके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ।
ब्राह्मण → राजन
यतो धर्मस्ततः सत्यं सर्वं सत्येन वर्धते ।
किमर्थमनृतं कर्म कर्तुं राजंस्त्वमिच्छसि ॥
जहाँ धर्म है वहाँ सत्य है । सत्यसे ही सबकी वृद्धि होती है । राजन्! आप क्यों असत्यपूर्ण बर्ताव करना चाहते हैं?
मनु उवाच
धर्मादुत्कृष्यते श्रेयस्तथाश्रेयोऽप्यधर्मतः ।
रागवान् प्रकृतिं ह्येति विरक्तो ज्ञानवान् भवेत् ॥
धर्म करनेसे श्रेयकी वृद्धि होती है और अधर्म करनेसे मनुष्यका अकल्याण होता है । विषयासक्त पुरुष प्रकृतिको प्राप्त होता है और विरक्त आत्मज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाता है ।
भीष्म → राजन
ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति ।
अत्रोपायं प्रवक्ष्यामि यथावच्छास्त्रचक्षुषा ।
तत्त्वज्ञानाच्चरन् राजन् प्राप्नुयात्परमां गतिम् ॥
भीष्मजी कहते हैं — राजन्! अब मैं तुम्हें शास्त्र-दृष्टिसे मोक्षका यथावत् उपाय बताता हूँ। शास्त्रविहित कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता हुआ मनुष्य तत्त्वज्ञानसे परमगतिको प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म उवाच
वाग्देहमनसां शौचं क्षमा सत्यं धृतिः स्मृतिः ।
सर्वधर्मेषु धर्मज्ञा ज्ञापयन्ति गुणान् शुभान् ॥
वाणी, शरीर और मनकी पवित्रता, क्षमा, सत्य, धैर्य और स्मृति — इन गुणोंको प्रायः सभी धर्मोंके धर्मज्ञ पुरुष कल्याणकारी बताते हैं ।
भीष्म उवाच
यदिदं ब्रह्मणो रूपं ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम् ।
परं तत् सर्वधर्मेभ्यस्तेन यान्ति परां गतिम् ॥
यह जो ब्रह्मचर्य नामक गुण है, इसे तो शास्त्रोंमें ब्रह्मका स्वरूप ही बताया गया है । यह सब धर्मोंसे श्रेष्ठ है । ब्रह्मचर्यके पालनसे मनुष्य परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ।
भीष्म उवाच
यत् कृतं स्याच्छुभं कर्म पापं वा यदि वाश्नुते ।
तस्माच्छुभानि कर्माणि कुर्याद् वा बुद्धिकर्मभिः ॥
मनुष्य शुभ या अशुभ जैसा भी कर्म करता है उसका फल उसे स्वयं ही भोगना पड़ता है; इसलिये मन, बुद्धि और क्रियाके द्वारा सदा शुभ कर्मोंका ही आचरण करे ।
भीष्म उवाच
भूतैर्हि करणैः कर्मणि प्रतिपद्यते ।
स दुःखं प्राप्य लोकेऽस्मिन् नरकायोपपद्यते ।
तस्मान्मनोवाक्शरीरैराचरेद् धैर्यमात्मनः ॥
रजोगुणसे प्रभावित हुई इन्द्रियोंकी प्रेरणासे मनुष्य विषयभोगरूप कर्मोंमेंप्रवृत्त होता है और इस लोकमें दुःख भोगकर अन्तमें नरकगामी होता है । अतः मन, वाणी और शरीरद्वारा ऐसा कार्य करे जिससे अपनेको धैर्य प्राप्त हो ।
भीष्म उवाच
एवमेकायनं धर्ममाहुर्वेदविदो जनाः ।
यथाज्ञानमुपासन्तः सर्वे यान्ति परां गतिम् ॥
वेदके ज्ञाता विद्वान् पुरुषोंने इस प्रकार एकमात्र ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले साधनरूप धर्मका वर्णन किया है । अपने-अपने ज्ञानके अनुसार उपासना करनेवाले सभी साधक परम गतिको प्राप्त होते हैं ।
प्रह्लाद उवाच
आर्जवेनाप्रमादेन प्रसादेनात्मवत्तया ।
वृद्धशुश्रूषया शक्र पुरुषो लभते महत् ॥
प्रह्लादने कहा — इन्द्र! सरलता, सावधानी, बुद्धिकी निर्मलता, चित्तकी स्थिरता तथा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेसे पुरुषको महत्-पदकी प्राप्ति होती है ।
नमुचि उवाच
न तत्सदःसत्परिषत् सभा च सा ।
प्राप्य यां न कुरुते सदा भयम् ।
धर्मतत्त्वमवगाह्य बुद्धिमान् ।
योऽभ्युपैति स धुरंधरः पुमान् ॥
न तो ऐसी कोई सभा है, न साधु-सत्पुरुषोंकी कोई परिषद् है और न कोई ऐसा जनसमाज ही है, जिसे पाकर कोई पुरुष कभी भय न करे। जो बुद्धिमान् धर्मतत्त्वमें अवगाहन करके उसीको अपनाता है, वही धुरंधर माना गया है ।
लक्ष्मी उवाच
दातारः संगृहीतार आर्याः करुणवेदिनः ।
महाप्रसादा ऋजवो दृढभक्ता जितेन्द्रियाः ॥
वे दान देते, कर आदिके द्वारा धन संग्रह करते तथा आर्य-जनोचित आचार-विचारसे रहते थे । वे दया करना जानते थे । वे दूसरोंपर महान् अनुग्रह करनेवाले थे । वे सभी सरल स्वभावके और दृढ़तापूर्वक भक्ति रखनेवाले थे । उन सबने अपनी इन्द्रियोंपर विजय पायी थी ।
व्यास उवाच
पञ्चभिः सततं यज्ञैः श्रद्दधानो यजेत च ।
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् ॥
सदा श्रद्धापूर्वक पञ्च-महायज्ञोंद्वारा परमात्माका पूजन करे, सर्वदा धैर्य धारण करे । प्रमाद (अकर्तव्य कर्मको करने और कर्तव्य कर्मकी अवहेलना करने) से बचे, इन्द्रियोंको संयममें रखे, धर्मका ज्ञाता बने और मनको भी अपने अधीन रखे ।
व्यास उवाच
क्रियावान् श्रद्दधानो हि दान्तः प्राज्ञोऽनसूयकः ।
धर्माधर्मविशेषज्ञः सर्वं तरति दुस्तरम् ॥
जो अपने धर्मके अनुसार कार्य करनेवाला, श्रद्धालु, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, विद्वान्, किसीके दोष न देखनेवाला तथा धर्म और अधर्मका विशेषज्ञ है, वह सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो जाता है ।
व्यास उवाच
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् ।
वीतहर्षमदक्रोधो ब्राह्मणो नावसीदति ॥
जो धैर्यवान्, प्रमादशून्य, जितेन्द्रिय, धर्मज्ञ, मनस्वी तथा हर्ष, मद और क्रोधसे रहित है, वह ब्राह्मण कभी विषादको नहीं प्राप्त होता है ।
भीष्म उवाच
द्वन्द्वैर्न यत्र बाध्यन्ते मानसेन च कर्मणा ।
समाः सर्वत्र मैत्राश्च सर्वभूतहिते रताः ॥
उस स्थितिको प्राप्त हुए मनुष्योंको सुख-दुःखादि द्वन्द्व, मानसिक संकल्प और कर्म-संस्कार बाधा नहीं पहुँचाते । वहाँ पहुँचे हुए मानव सर्वत्र समानभाव रखते हैं, सबको मित्र मानते हैं और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ।
शुक उवाच
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञः पूतोऽहं गुरुशासनात् ।
कृत्वा बुद्धिं विमुक्तात्मा द्रक्ष्याम्यात्मानमव्ययम् ॥
मैं आप-जैसे गुरुके उपदेशसे पवित्र हो गया हूँ तथा मुझे जगत्के वृत्तान्त (लौकिक नीति-रीति) का भी ज्ञान हो गया है; अतः धर्माचरणसे बुद्धिका संस्कार करके स्थूल देहका अभिमान त्यागकर अपने अविनाशीस्वरूप परमात्माका दर्शन करूँगा ।
व्यास उवाच
स्वदारनिरतो दान्तो ह्यनसूयुर्जितेन्द्रियः ।
ऋत्विक् पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः ॥
वृद्धबालातुरैर्वेद्यैर्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः ।
मातापितृभ्यां जामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया ॥
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ।
एतान् विमुच्य संवादान् सर्वपापैर्विमुच्यते ॥
गृहस्थ पुरुष सदा अपनी ही स्त्रीसे प्रेम करे । इन्द्रियोंका संयम करके जितेन्द्रिय बने । किसीके गुणोंमें दोष न ढूँढ़े । वह ऋत्विज, पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, शरणागत, वृद्ध, बालक, रोगी, वैद्य, जाति-भाई, सम्बन्धी, बन्धु-बान्धव, माता-पिता, कुटुम्बकी स्त्री, भाई, पुत्र, पत्नी, पुत्री तथा सेवक-समूहके साथ कभी विवाद न करे । जो इन सबके साथ कलह त्याग देता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।
व्यास उवाच
अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान् नियतेन्द्रियः ।
शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥
जो हिंसा न करनेवाला, समदर्शी, सत्यवादी, धैर्यवान्, जितेन्द्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंको शरण देनेवाला है, वह अत्यन्त उत्तम गति पाता है ।
व्यास उवाच
दानं हि भूताभयदक्षिणायाः ।
सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह ।
तीक्ष्णां तनुं यः प्रथमं जहाति ।
सोऽऽनन्त्यमाप्नोत्यभयं प्रजाभ्यः ॥
इस जगत्में जीवोंको अभयकी दक्षिणा देना सब दानोंसे बढ़कर है । जो पहलेसे ही हिंसाका त्याग कर देता है, वह सब प्राणियोंसे निर्भय होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ।
व्यास उवाच
गन्धान् रसान् नानुरुन्ध्यात् सुखं वा ।
नालंकारांश्चाप्नुयात् तस्य तस्य ।
मानं च कीर्तिं च यशश्च नेच्छेत् ।
स वै प्रचारः पश्यतो ब्राह्मणस्य ॥
व्यासजी कहते हैं — बेटा! साधकको चाहिये कि गन्ध और रस आदि विषयोंका उपभोग न करे, विषयसेवनजनित सुखकी ओर न जाय, स्वर्ण आदिके बने हुए सुन्दर-सुन्दर आभूषणोंको भी न धारण करे तथा मान, बड़ाई और यशकी इच्छा न करे, यही ज्ञानवान् ब्राह्मणका आचार है ।
व्यास उवाच
वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः ।
दमस्योपनिषद् दानं दानस्योपनिषत् तपः ॥
वेदका सार है सत्य वचन, सत्यका सार है इन्द्रियोंका संयम, संयमका सार है दान और दानका सार है तपस्या ।
भीष्म उवाच
न च पापकृतः पापान्मुच्यन्ते केचिदापदि ।
अपापवादी भवति यथा भवति धर्मकृत् ।
धर्मस्य निष्ठा त्वाचारस्तमेवाश्रित्य भोत्स्यसे ॥
पापाचारी मनुष्य आपत्तिकालमें कष्ट भोगकर भी उस पापसे मुक्त नहीं होते और धर्मका आचरण करनेवाले लोग आपत्तिकालमें भी पापका समर्थन नहीं करते हैं । आचार (शौचाचार-सदाचार) ही धर्मका आधार है; अतः युधिष्ठिर! तुम उस आचारका आश्रय लेकर ही धर्मके यथार्थ स्वरूपको जान सकोगे ।
भीष्म उवाच
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।
सत्येन विधृतं सर्वं सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
सत्य बोलना शुभ कर्म है । सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई कार्य नहीं है । सत्यने ही सबको धारण कर रखा है और सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ।
भीष्म → युधिष्ठिर
सर्वं प्रियाभ्युपगतं धर्ममाहुर्मनीषिणः ।
पश्यैतं लक्षणोद्देशं धर्माधर्मे युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! सबके साथ प्रेमपूर्ण बर्ताव करनेसे जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब धर्म है, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है तथा जो इसके विपरीत है, वह अधर्म है । तुम धर्म और अधर्मका संक्षेपसे यही लक्षण समझो ।
तुलाधार उवाच
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।
या वृत्तिः स परो धर्मस्तेन जीवामि जाजले ॥
जिसमें किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करना पड़े अथवा कम-से-कम द्रोह करनेसे काम चल जाय, ऐसी जो जीवन-वृत्ति है, वही उत्तम धर्म है । जाजले! मैं उसीसे जीवन निर्वाह करता हूँ ।
तुलाधार उवाच
सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः ।
कर्मणा मनसा वाचा स धर्मं वेद जाजले ॥
जाजले! जो सब जीवोंका सुहृद् होता और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा सदा सबके हितमें लगा रहता है, वही वास्तवमें धर्मको जानता है ।
तुलाधार उवाच
दानं भूताभयस्याहुः सर्वदानेभ्य उत्तमम् ।
ब्रवीमि ते सत्यमिदं श्रद्दधस्व च जाजले ॥
प्राणियोंको अभयदान देना सब दानोंसे उत्तम बताया गया है । जाजले! मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ, तुम इसपर विश्वास करो ।
तुलाधार उवाच
कारणाद् धर्ममन्विच्छेन्न लोकचरितं चरेत् ।
यो हन्याद् यश्च मां स्तौति तत्रापि शृणु जाजले ॥
समौ तावपि मे स्यातां न हि मेऽस्ति प्रियाप्रियम् ।
एतदीदृशकं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ॥
इस कर्मका हेतु या परिणाम क्या है? इसपर विचार करके ही तुम्हें किसी भी धर्मको स्वीकार करना चाहिये । लोगोंने किया है या कर रहे हैं, यह जानकर उनका अन्धानुकरण नहीं करना चाहिये । जाजले! अब मैं अपने विषयमें कुछ निवेदन करता हूँ, उसे सुनो, जो मुझे मारता है तथा जो मेरी प्रशंसा करता है, वे दोनों ही मेरे लिये बराबर हैं । उनमेंसे कोई भी मेरे लिये प्रिय या अप्रिय नहीं है, मनीषी पुरुष ऐसे ही धर्मकी प्रशंसा करते हैं ।
तुलाधार उवाच
न श्रावयन् न च यजन् न ददद् ब्राह्मणेषु च ।
काम्यां वृत्तिं लिप्समानः कां गतिं याति जाजले ।
इदं तु दैवतं कृत्वा यथा यज्ञमवाप्नुयात् ॥
जाजले! जो ब्राह्मण वेदाध्ययन, यजन और ब्राह्मणोंको दान देना आदि वर्णोचित कर्म नहीं करता और मनोहर भोग-पदार्थोंकी लिप्सा रखता है, वह कुत्सित गतिको प्राप्त होता है । किंतु निष्काम धर्मको देवताके समान आराध्य बनानेवाला मनुष्य यज्ञके यथार्थ फल — मोक्षको प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म → ब्रह्मन
अहिंसादिकृतं कर्म इह चैव परत्र च ।
श्रद्धां निहन्ति वै ब्रह्मन् सा हता हन्ति तं नरम् ॥
अहिंसा और दया आदि भावोंसे प्रेरित होकर किया हुआ कर्म इहलोक और परलोकमें भी उत्तम फल देनेवाला है । ब्रह्मन्! यदि मनमें हिंसाकी भावना हो तो वह श्रद्धाका नाश कर देती है । फिर नष्ट हुई श्रद्धा कर्म करनेवाले इस हिंसक मनुष्यका ही सर्वनाश कर डालती है ।
भीष्म उवाच
श्रद्धां कुरु महाप्राज्ञ ततः प्राप्स्यसि यत् परम् ।
श्रद्धावान् श्रद्दधानश्च धर्मश्चैव हि जाजले ।
स्ववर्त्मनि स्थितश्चैव गरीयानेव जाजले ॥
महाज्ञानी जाजलि! तुम इसपर श्रद्धा करो । तदनन्तर इसके अनुसार आचरण करनेसे तुम्हें परमगतिकी प्राप्ति होगी । श्रद्धा करनेवाला श्रद्धालु पुरुष साक्षात् धर्मका स्वरूप है । जाजले! जो श्रद्धापूर्वक अपने धर्मपर स्थित है, वही सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।
भीष्म → राजन
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रजानामनुकम्पार्थं गीतं राज्ञा विचख्नुना ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! प्राचीन कालमें राजा विचख्नुने समस्त प्राणियोंपर दया करनेके लिये जो उद्गार प्रकट किया था, उस प्राचीन इतिहासका इस प्रसंगमें जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं ।
भीष्म उवाच
सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत् ।
कामकाराद् विहिंसन्ति बहिर्वेद्यां पशून् नराः ॥
धर्मात्मा मनुने सम्पूर्ण कर्मोंमें अहिंसाका ही प्रतिपादन किया है । मनुष्य अपनी ही इच्छासे यज्ञकी बाह्यवेदीपर पशुओंका बलिदान करते हैं ।
भीष्म → युधिष्ठिर
यथा शरीरं न ग्लायेन्नेयान्मृत्युवशं यथा ।
तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत् ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! कर्मोंमें इस प्रकार प्रवृत्त होना चाहिये, जिससे शरीरकी शक्ति सर्वथा क्षीण न हो जाय, जिससे वह मृत्युके अधीन न हो जाय; क्योंकि मनुष्य शरीरके समर्थ होनेपर ही धर्मका पालन कर सकता है ।
सत्यवान् उवाच
न मूलघातः कर्तव्यो नैष धर्मः सनातनः ।
अपि स्वल्पवधेनैव प्रायश्चित्तं विधीयते ॥
इसलिये दुष्टोंको प्राणदण्ड देकर उनका मूलोच्छेद नहीं करना चाहिये । किसीकी जड़ उखाड़ना सनातन धर्म नहीं है । अपराधके अनुरूप साधारण दण्ड देना चाहिये, उसीसे अपराधीके पापोंका प्रायश्चित हो जाता है ।
द्युमत्सेन उवाच
यत्र यत्रैव शक्येरन् संयन्तुं समये प्रजाः ।
स तावान् प्रोच्यते धर्मो यावन्न प्रतिलङ्घ्यते ॥
द्युमत्सेनने कहा — बेटा! जहाँ-जहाँ भी प्रजाको धर्मकी मर्यादाके भीतर नियन्त्रित करके रखा जा सके वहाँ-वहाँ वैसा करना धर्म ही बताया जाता है । जबतक कि धर्मका उल्लंघन नहीं किया जाता (तबतक ही वहाँ ऐसी व्यवस्था कर लेनी चाहिये)
स्यूमरश्मि उवाच
गृहस्थ एव यजते गृहस्थस्तप्यते तपः ।
गार्हस्थ्यमस्य धर्मस्य मूलं यत्किंचिदेजते ॥
गृहस्थ ही यज्ञ करता है, गृहस्थ ही तप करता है । मनुष्य जो कुछ भी चेष्टा करता है-जिस किसी भी शुभ कर्मका आचरण करता है, उस धर्मका मूल कारण गार्हस्थ्य-आश्रम ही है ।
स्यूमरश्मि उवाच
यथाश्रममुपासीत आगमस्तत्र सिध्यति ।
सिद्धिः प्रत्यक्षरूपा च दृश्यत्यागमनिश्चयात् ॥
जिस-जिस आश्रममें जो-जो धर्म विहित है, वहाँ-वहाँ उसी-उसी धर्मकी उपासना करनी चाहिये । उस-उस स्थानपर उसी-उसी धर्मका आचरण करनेसे वहाँ आगम सफल होता है । एवं शास्त्रके निश्चयसे ही सिद्धिका प्रत्यक्ष दर्शन होता है ।
कपिल उवाच
आनृशंस्यं क्षमा शान्तिरहिंसा सत्यमार्जवम् ।
अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा शमस्तथा ॥
पन्थानो ब्रह्मणस्त्वेते एतैः प्राप्नोति यत्परम् ।
तद् विद्वाननुबुध्येत मनसा कर्मनिश्चयम् ॥
समस्त प्राणियोंपर दया, क्षमा, शान्ति, अहिंसा, सत्य, सरलता, अद्रोह, निरभिमानता, लज्जा, तितिक्षा और शम — ये परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके मार्ग हैं । इनके द्वारा पुरुष परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार विद्वान् पुरुषको मनके द्वारा कर्मके वास्तविक परिणामका निश्चय समझना चाहिये ।
भीष्म उवाच
देवता ब्राह्मणाः सन्तो यक्षा मानुषचारणाः ।
धार्मिकान् पूजयन्तीह न धनाढ्यान् न कामिनः ॥
देवता, ब्राह्मण, साधु-संत, यक्ष, मनुष्य और चारण — ये सब-के-सब इस जगत्में धर्मात्माओंका ही पूजन करते हैं, धनियों और भोगियोंका नहीं ।
भीष्म → युधिष्ठिर
तस्माद् धर्मे प्रवर्तेथाः सर्वावस्थं युधिष्ठिर ।
धर्मे स्थितानां कौन्तेय सिद्धिर्भवति शाश्वती ॥
अतः कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम सभी अवस्थाओंमें धर्मका ही आचरण करो; क्योंकि जो लोग धर्ममें स्थित रहते हैं, उन्हें सदा रहनेवाली मोक्षरूप परम सिद्धि प्राप्त होती है ।
भीष्म उवाच
विद्वान् सर्वेषु भूतेषु आत्मना सोपमो भवेत् ।
कृतकृत्यो विशुद्धात्मा सर्वं त्यजति चैव ह ॥
विद्वान् पुरुष सभी प्राणियोंके प्रति अपने समान ही भाव रखे। इससे वह कृतकृत्य और शुद्धचित्त होकर समस्त दोषोंको त्याग देता है ।
पुत्र उवाच
अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति ।
युवैव धर्मशीलः स्यादनिमित्तं हि जीवितम् ॥
सारे काम अधूरे ही रह जाते हैं और मौत अपनी ओर खींच लेती है, इसलिये युवावस्थामें ही मनुष्यको धर्मका आचरण करना चाहिये, क्योंकि जीवनका कुछ ठिकाना नहीं है ।
भीष्म → युधिष्ठिर
गुरुपूजा च सततं वृद्धानां पर्युपासनम् ।
श्रवणं चैव शास्त्राणां कूटस्थं श्रेय उच्यते ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! सदा गुरुजनोंकी पूजा, वृद्ध पुरुषोंकी सेवा और शास्त्रोंका श्रवण — ये तीन कल्याणके अमोघ साधन बताये जाते हैं ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर को कल्याण के अमोघ साधनों के विषय में बताया।
नारद उवाच
धर्मेण वेदाध्ययनं वेदान्तानां तथैव च ।
ज्ञानार्थानां च जिज्ञासा श्रेय एतदसंशयम् ॥
धर्माचरणपूर्वक वेद और वेदाङ्गोंका स्वाध्याय करना तथा उनके सिद्धान्तको जाननेकी इच्छाको जगाये रखना निस्संदेह कल्याणका साधन है ।
पराशर उवाच
आयुर्न सुलभं लब्ध्वा नावकर्षेद् विशाम्पते ।
उत्कर्षार्थं प्रयतेत नरः पुण्येन कर्मणा ॥
प्रजानाथ! मनुष्य-शरीरकी आयु सुलभ नहीं है — वह दुर्लभ वस्तु है, उसे पाकर आत्माको नीचे नहीं गिराना चाहिये । मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्यकर्मके अनुष्ठानद्वारा आत्माके उत्थानके लिये सदा प्रयत्न करता रहे ।
पराशर → राजन
संचिन्त्य मनसा राजन् विदित्वा शक्यमात्मनः ।
करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ॥
राजन्! जो मनुष्य मनसे खूब सोच-विचारकर, ‘अमुक काम मुझसे हो सकेगा या नहीं’ — इसका निश्चय करके शुभकर्मका अनुष्ठान करता है, वह अवश्य ही अपनी भलाई देखता है ।
पराशर → राजन
दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो ।
भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत् ।
गरीयसः पूजयेदात्मशक्त्या ।
सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ॥
राजन्! प्रत्येक पुरुषको इन्द्रियसंयमी और धर्मात्मा होकर समस्त प्राणियोंको अपने ही समान समझना चाहिये । जो विद्या, तप और अवस्थामें अपनेसे बड़े हों अथवा गुरु-कोटिके लोग हों, उन सबकी यथाशक्ति पूजा करनी चाहिये। सत्यभाषण और अच्छे आचार-विचारसे ही सुख मिलता है ।
पराशर उवाच
अपो हि प्रयतः शीतास्तापिता ज्वलनेन वा ।
शक्तितोऽतिथये दत्त्वा क्षुधार्तायाश्नुते फलम् ॥
जो मौसमका विचार करके अपनी शक्तिके अनुसार प्यासे और भूखे अतिथिको ठंडा या गरम किया हुआ जल और अन्न पवित्रभावसे अर्पण करता है, वह उत्तम फल पाता है ।
पराशर उवाच
येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण धिगस्तु तान् ।
धर्मं वै शाश्वतं लोके न जह्याद् धनकाङ्क्षया ॥
धर्मका पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है । जो अधर्मसे प्राप्त होता है, वह धन तो धिक्कार देने योग्य है। संसारमें धनकी इच्छासे शाश्वत धर्मका त्याग कभी नहीं करना चाहिये ।
पराशर उवाच
मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी ।
विद्वान् क्लीबः पश्यति प्रीतियोगात् ।
दाक्ष्येण हीनो धर्मयुक्तो नदान्तो ।
लोकेऽस्मिन् वै पूज्यते सद्भिरार्यः ॥
जो अभिमानका त्याग करके वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करता, विद्वान् एवं काम-भोगमें अनासक्त होकर सबको प्रेमभावसे देखता, मनमें चतुराई न रखकर धर्ममें संलग्न रहता और दूसरोंका दमन या हिंसा नहीं करता है, वह मनुष्य इस लोकमें श्रेष्ठ है तथा सत्पुरुष भी उसका आदर करते हैं ।
पराशर उवाच
तमर्चयित्वा वैश्यस्तु कुर्यादत्यर्थमृद्धिमत् ।
रक्षितव्यं तु राजन्यैरुपयोज्यं द्विजातिभिः ॥
अजिह्मैरशठक्रोधैर्हव्यकव्यप्रयोक्तृभिः ।
शूद्रैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति ॥
उसीकी पूजा करके वैश्यको चाहिये कि खेती और पशुपालन आदिके द्वारा उसे अत्यन्त समृद्धिशाली बनाये । राजाको उसकी रक्षा करनी चाहिये और ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे कुटिलता, शठता एवं क्रोधको त्यागकर हव्य-कव्यका प्रयोग करते हुए उस अन्न-धनका यज्ञ (लोकहितके कार्य) में सदुपयोग करें। शूद्रोंको यज्ञभूमि तथा त्रैवर्णिकोंके घरोंको झाड़-बुहारकर साफ रखना चाहिये। ऐसा करनेसे धर्मका नाश नहीं होता ।
पराशर उवाच
धर्मादपेतं यत् कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् ।
न तत् सेवेत मेधावी न तद्धितमिहोच्यते ॥
धर्मके विपरीत कर्म यदि लौकिक दृष्टिसे बहुत लाभदायक हो तो भी बुद्धिमान् पुरुषको उसका सेवन नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे इस जगत् में हितकर नहीं बताया जाता है ।
पराशर → राजन
तस्मादहं ब्रवीमि त्वां राजन् संचिन्त्य शास्त्रतः ।
संसिद्धाधिगमं कुर्यात् कर्म हिंसात्मकं त्यजेत् ॥
अतः राजन्! मैं शास्त्रके अनुसार खूब सोच-विचारकर कहता हूँ कि मनुष्यको उन्नत होनेका प्रयत्न तो करना चाहिये, किंतु हिंसात्मक कर्मका त्याग कर देना चाहिये ।
पराशर उवाच
न संकरेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद् विचक्षणः ।
धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत् कल्याणमुच्यते ॥
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह धर्म करनेके लिये न्यायको त्यागकर पापमिश्रित मार्गसे धनका संग्रह न करे; क्योंकि उसे कल्याणकारी नहीं बताया जाता है ।
पराशर उवाच
धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा ।
आत्मभूतः सदा लोके चरेद् भूतान्यहिंसया ॥
धर्मशील विद्वान् मनुष्य सचेष्ट हो चाहे चेष्टारहित, उसे चाहिये कि सदैव जगत्में सबके प्रति आत्मभाव रखकर किसी भी प्राणीकी हिंसा न करते हुए समभावसे व्यवहार करे ।
पराशर उवाच
तथा हि बुद्धियुक्तानां शाश्वतं ब्रह्मवादिनाम् ।
अन्विच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ॥
वास्तवमें जो शुभ कर्मोंका अनुष्ठान तो करते हैं, परन्तु उनसे सुख पानेकी इच्छाको त्याग देते हैं, उन समत्व-बुद्धिसे युक्त ब्रह्मवादी पुरुषोंको ही सनातन पदकी प्राप्ति होती है ।
पराशर उवाच
अप्रयत्नागताः सेव्या गृहस्थैर्विषयाः सदा ।
प्रयत्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मतिः ॥
इसलिये गृहस्थ पुरुषको सदा बिना प्रयत्न अपने-आप प्राप्त हुए विषयोंका ही सेवन करना चाहिये और प्रयत्न करके तो अपने धर्मका ही पालन करना चाहिये । यही मेरा मत है ।
पराशर → राजन
सर्वे वर्णा धर्मकार्याणि सम्यक् ।
कृत्वा राजन् सत्यवाक्यानि चोक्त्वा ।
त्यक्त्वाधर्मं दारुणं जीवलोके ।
यान्ति स्वर्गं नात्र कार्यो विचारः ॥
राजन्! सभी वर्णोंके लोग इस जीव जगत्में अपने-अपने धर्मानुसार कर्मका भलीभाँति अनुष्ठान करके, सदा सत्य बोलकर तथा भयानक पापकर्मका सर्वथा परित्याग करके स्वर्गलोकमें जाते हैं । इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।
हंस उवाच
न वै देवा हीनसत्त्वेन तोष्याः ।
सर्वाशिना दुष्कृतकर्मणा वा ।
सत्यव्रता ये तु नराः कृतज्ञा ।
धर्मे रतास्तैः सह सम्भजन्ते ॥
सत्त्वगुणसे रहित और सब कुछ भक्षण करनेवाले पापाचारी मनुष्य देवताओंको संतुष्ट नहीं कर सकते । जो मनुष्य नियमपूर्वक सत्य बोलनेवाले, कृतज्ञ और धर्मपरायण हैं, उन्हींके साथ देवता स्नेह-सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।
ऋषि → तात
धर्मः सतां हितः पुंसां धर्मश्चैवाश्रयः सताम् ।
धर्माल्लोकास्त्रयस्तात प्रवृत्ताः सचराचराः ॥
धर्म ही सत्पुरुषोंका कल्याण करनेवाला और धर्म ही उनका आश्रय है। तात! चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोक धर्मसे ही उत्पन्न हुए हैं ।
ऋषि उवाच
मनोवाक्कायिके धर्मे कुरु श्रद्धां समाहितः ।
निवृत्तौ वा प्रवृत्तौ वा सम्प्रधार्य गुणागुणान् ॥
पहले निवृत्ति और प्रवृत्ति-मार्गमें जो गुण-अवगुण हैं, उनका तुम अच्छी तरह निश्चय कर लो; फिर एकाग्रचित्त हो मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले धर्ममें श्रद्धा करो (अर्थात् श्रद्धापूर्वक धर्मके पालनमें लग जाओ)
ऋषि उवाच
यथा ज्ञाने परिचयः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ।
तथा धर्मे परिचयः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ॥
जैसे ज्ञानका फल चाहनेवालेके लिये ज्ञानसे परिचित होना आवश्यक है, उसी प्रकार धर्मका फल चाहनेवाले मनुष्यको भी धर्मका परिचय प्राप्त करना चाहिये ।
ऋषि उवाच
अधृतात्मन् धृतौ तिष्ठ दुर्बुद्धे बुद्धिमान् भव ।
अप्रशान्तः प्रशाम्य त्वमप्राज्ञः प्राज्ञवच्चर ॥
अधीरचित्त नरेश! धीरताका आश्रय लो । दुर्बुद्धे! बुद्धिमान् बनो । तुम सदा अशान्त रहते हो । अबसे शान्त हो जाओ और अबतक मूर्खोके से बर्ताव करते रहे, अब विद्वानोंके समान आचरण करो ।
सुलभा उवाच
नास्त्यसाधारणो राजा नास्ति राज्यमराजकम् ।
राज्येऽसति कुतो धर्मो धर्मेऽसति कुतः परम् ॥
साधारण प्रजा न हो तो कोई राजा नहीं हो सकता । राजा न हो तो राज्य नहीं टिक सकता । राज्य न हो तो धर्म कैसे रह सकता है और धर्म न हो तो परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो सकती है?
व्यास उवाच
सत्ये तिष्ठ रतो धर्मे हित्वा सर्वमनार्जवम् ।
देवतातिथिशेषेण मात्रां प्राणस्य संलिह ॥
सत्यपर डटे रहो तथा सब प्रकारकी वक्रता छोड़कर धर्ममें अनुराग करो । देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करके जो अन्न बचे, उसीका प्राणरक्षाके लिये आस्वादन करो ।
व्यास उवाच
नास्तिकं भिन्नमर्यादं कूलपातमिव स्थितम् ।
वामतः कुरु विस्रब्धो नरं वेणुमिवोद्धृतम् ॥
जो नास्तिक हो, धर्मकी मर्यादा भंग कर रहा हो और किनारेको तोड़-फोड़कर गिरा देनेवाले नदीके महान् जल-प्रवाहकी भाँति स्थित हो, ऐसे मनुष्यको उखाड़े हुए बाँसकी तरह बिना किसी हिचकके त्याग दो ।
व्यास उवाच
राजा सदा धर्मपरः शुभाशुभस्य गोप्ता ।
समीक्ष्य सुकृतिनां दधाति लोकान् ।
बहुविधमपि चरति प्रविशति ।
सुखमनुपगतं निरवद्यम् ॥
जो राजा सर्वदा धर्मपरायण रहकर उत्तम और अधम प्रजाका यथायोग्य विचारपूर्वक पालन करता है, वह पुण्यात्माओंके लोकोंको प्राप्त होता है । यदि वह स्वयं भी नाना प्रकारके शुभ कर्मोंका आचरण करता है तो उसके फलस्वरूप उसे अप्राप्त एवं निर्दोष सुख प्राप्त होता है ।
व्यास उवाच
मर्यादा नियताः स्वयम्भुवा य इहेमाः ।
प्रभिनत्ति दशगुणा मनोऽनुगत्वात् ।
निवसति भृशमसुखं पितृविषयविपिनमवगाह्य स पापः ॥
जो मनुष्य मनचाही करनेके कारण स्वायम्भुवमनुकी बाँधी हुई धर्मकी दस प्रकारकी मर्यादाओंको तोड़ता है, वह पापात्मा पितृलोकके असिपत्रवनमें जाकर वहाँ अत्यन्त दुःख भोगता रहता है ।
व्यास उवाच
पुरा करोति सोऽन्तकः प्रमादगोमुखां चमूम् ।
यथागृहीतमुत्थितस्त्वरस्व धर्मपालने ॥
देखो, तुम्हारा जो प्रमाद है, उसमें निवास करनेवाला काल तुम्हारी इन्द्रियोंके समुदायको मुखरहित (भोगशक्तिसे हीन) कर रहा है । इनके असमर्थ हो जानेके पहले ही तुम खड़े हो जाओ और अपने शरीरसे धर्मका पालन करनेके लिये जल्दी करो ।
व्यास उवाच
सकूलमूलबान्धवं प्रभुर्हरत्यसङ्गवान् ।
न सन्ति यस्य वारकाः कुरुष्व धर्मसंनिधिम् ॥
सर्वसमर्थ काल किसीके प्रति भी स्नेह नहीं करता । वह कूल और मूल अर्थात् आदि-अन्तसहित समस्त बन्धु-बान्धवोंको हर ले जाता है । उसको रोकनेवाले कोई नहीं हैं; इसलिये तुम धर्मका संचय करो ।
व्यास उवाच
श्रुतं समस्तमश्नुते प्रकुर्वतः शुभाः क्रियाः ।
तदेतदर्थदर्शनं कृतज्ञमर्थसंहितम् ॥
जो समस्त शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करता और तदनुसार शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें लगा रहता है, उसीके लिये इस ज्ञानका उपदेश किया गया है; क्योंकि कृतज्ञ पुरुषको जो भी उपदेश दिया जाता है, वही सफल होता है ।
व्यास उवाच
एवमभ्याहते लोके कालेनोपनिपीडिते ।
सुमहद् धैर्यमालम्ब्य धर्मं सर्वात्मना कुरु ॥
इस प्रकार जब सारा संसार कालसे आहत और पीड़ित हो रहा है, तब तुम महान् धैर्यका आश्रय ले सम्पूर्ण हृदयसे धर्मका आचरण करो ।
व्यास उवाच
तदेतत् सम्प्रदृश्यैव कर्मभूमिं प्रपश्यतः ।
शुभान्याचरितव्यानि परलोकमभीप्सता ॥
इहलोक कर्मभूमि है — ऐसा समझकर इसकी ओर देखते हुए दिव्य लोकोंकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको शुभ कर्मोंका ही आचरण करना चाहिये ।
नारद उवाच
निवृत्तिः कर्मणः पापात् सततं पुण्यशीलता ।
सद्वृत्तिः समुदाचारः श्रेय एतदनुत्तमम् ॥
पापकर्मोंसे दूर रहना, सदा पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करना, श्रेष्ठ पुरुषोंके से बर्ताव और सदाचारका पालन करना-यही सर्वोत्तम श्रेय (कल्याण)-का साधन है ।
भीष्म उवाच
सात्वतं विधिमास्थाय प्राक् सूर्यमुखनिःसृतम् ।
पूजयामास देवेशं तच्छेषेण पितामहान् ॥
पितृशेषेण विप्रांश्च संविभज्याश्रितांश्च सः ।
शेषान्नभुक् सत्यपरः सर्वभूतेष्वहिंसकः ॥
जो पहले भगवान् सूर्यके मुखसे प्रकट हुआ था, उस वैष्णव शास्त्रोक्त विधिका आश्रय ले वे प्रथम तो देवेश्वर भगवान् नारायणका पूजन करते । फिर उनकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे पितरोंका, पितरोंकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे ब्राह्मणोंका तथा अन्य आश्रितजनोंका विभागपूर्वक सत्कार करते थे । सबको देनेके अनन्तर बचे हुए अन्नका भोजन करते थे, सत्यमें तत्पर रहते और किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करते थे ।
जनमेजय उवाच
नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रियः ।
अगत्वा गतयस्तिस्रो यद् गच्छत्यव्ययं हरिम् ॥
निश्चय ही यह अनन्यभावसे भगवान्का भजनरूप धर्म श्रेष्ठ एवं श्रीनारायणको परम प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेनेवाले भक्तजन उक्त तीन गतियोंको प्राप्त न होकर सीधे चौथी गतिमें पहुँचकर अविनाशी श्रीहरिको प्राप्त कर लेते हैं ।
जनमेजय ने वैशम्पायनजी से कहा।
भीष्म → राजन
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्गः सत्यफलं महत् ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! सभी आश्रमोंमें स्वधर्मपालनका विधान है, सबमें स्वर्गका तथा महान् सत्यफल-मोक्षका भी साधन है । धर्मके यज्ञ, दान, तप आदि बहुत-से द्वार हैं; अतः इस जगत्में धर्मकी कोई भी क्रिया निष्फल नहीं होती ।
अतिथि उवाच
केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद् यज्ञफलं द्विजाः ।
वानप्रस्थाश्रयाः केचिद् गार्हस्थ्यं केचिदास्थिताः ॥
कोई द्विज मोक्षकी प्रशंसा करते हैं तो कोई यज्ञफलकी । कोई वानप्रस्थ-धर्मका आश्रय लेते हैं तो कोई गार्हस्थ्य-धर्मका ।
नागभार्या उवाच
शिष्याणां गुरुशुश्रूषा विप्राणां वेदधारणम् ।
भृत्यानां स्वामिवचनं राज्ञो लोकानुपालनम् ॥
नागपत्नीने कहा — शिष्योंका धर्म है गुरुकी सेवा करना, ब्राह्मणोंका धर्म है वेदोंको धारण करना, सेवकोंका धर्म है स्वामीकी आज्ञाका पालन तथा राजाका धर्म है प्रजावर्गका सतत संरक्षण ।
नागभार्या उवाच
विप्रक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषा शूद्रकर्म तत् ।
गृहस्थधर्मो नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता ॥
नागराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — तीनों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका कर्तव्य बताया गया है और समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखना गृहस्थका धर्म है ।
नागभार्या उवाच
अभिप्रेतामसंश्लिष्टां कृत्वा चात्महितां क्रियाम् ।
न याति निरयं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ॥
अपनी रुचिके अनुकूल कर्म भी यदि पापके सम्पर्कसे रहित और अपने लिये हितकर हो तो उसे करके कोई भी नरकमें नहीं पड़ता है । ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं ।