श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

धर्म–आचरण

कर्तव्य और सदाचरण

89 पद्य

श्रीरामचरितमानस

कीर्ति का परोपकारी स्वरूप

कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥

राम सुकीरति भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥

कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गङ्गाजीकी तरह सबका हित करनेवाली हो । श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्ति तो बड़ी सुन्दर (सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है । यह असामञ्जस्य है (अर्थात् इन दोनोंका मेल नहीं मिलता), इसकी मुझे चिन्ता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 14(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 37 नीति–व्यवहार
भक्ति और ज्ञान का स्वरूप

भगति निरूपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥

सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पद रति रस बेद बखाना ॥

नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रियनिग्रह) लताओंके मण्डप हैं । मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है । ऐसा वेदोंने कहा है ।

बालकाण्ड, चौपाई 37.7 श्रीरामचरितमानस पृ. 62 साधना–योग
विरोध का सम्मान

जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा । जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा ॥

तदपि बिरोध मान जहँ कोई । तहाँ गएँ कल्यानु न होई ॥

यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरुके घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जानेसे कल्याण नहीं होता ।

शिवजी ने सती को समझाया कि जहाँ विरोध माना जाता हो, वहाँ बिना बुलाये जाना उचित नहीं है।

बालकाण्ड, चौपाई 62.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 84 नीति–व्यवहार
समर्थ की निर्दोषता

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं । रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥

गङ्गाजीमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता । सूर्य, अग्नि और गङ्गाजीकी भाँति समर्थको कुछ दोष नहीं लगता ।

बालकाण्ड, चौपाई 69.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 89 नीति–व्यवहार
आज्ञा का पालन

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥

तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥

माता, पिता, गुरु और स्वामीकी बातको बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिये । फिर आप तो सब प्रकारसे मेरे परम हितकारी हैं । हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिरपर है ।

शिवजी ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 77.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 95 गुरु महिमा
परहित हेतु आत्मोत्सर्ग

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा ॥

पर हित लागि तजइ जो देही । संतत संत प्रसंसहिं तेही ॥

तथापि मैं तुम्हारा काम तो करूँगा, क्योंकि वेद दूसरेके उपकारको परम धर्म कहते हैं । जो दूसरेके हितके लिये अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं ।

कामदेव ने देवताओं से अपनी विपत्ति सुनने के बाद यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 84.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 100 सेवा–करुणा–विनय

करेहु सदा संकर पद पूजा । नारिधरमु पति देउ न दूजा ॥

बचन कहत भरे लोचन बारी । बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी ॥

हे पार्वती! तू सदा शिवजीके चरणकी पूजा करना, नारियोंका यही धर्म है । उनके लिये पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है । इस प्रकारकी बातें कहते-कहते उनकी आँखोंमें आँसू भर आये और उन्होंने कन्याको छातीसे चिपटा लिया ।

बालकाण्ड, चौपाई 102.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 118

हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं । ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं ॥

तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला । नित नूतन सुंदर सब काला ॥

जो भगवान् विष्णु और महादेवजीसे विमुख हैं और जिनकी धर्ममें प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्नमें भी वहाँ नहीं जा सकते उस पर्वतपर एक विशाल बरगदका पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल (छहों ऋतुओं) में सुन्दर रहता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 106.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 122 वैराग्य
धर्म का ह्रास

तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही । समुझि परइ जस कारन मोही ॥

जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ॥

और जैसा कुछ मेरी समझमें आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ । जब-जब धर्मका ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं ।

शिवजी ने पार्वतीजी को श्रीराम के अवतार के कारण बताते हुए कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 121.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 135 लीला–रहस्य

धरम धुरंधर नीति निधाना । तेज प्रताप सील बलवाना ॥

तेहि के भए जुगल सुत बीरा । सब गुन धाम महा रनधीरा ॥

वह धर्मकी धुरीको धारण करनेवाला, नीतिकी खान, तेजस्वी, प्रतापी, सुशील और बलवान् था, उसके दो वीर पुत्र हुए, जो सब गुणोंके भण्डार और बड़े ही रणधीर थे ।

बालकाण्ड, चौपाई 153.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 161 नीति–व्यवहार

तपबल बिप्र सदा बरिआरा । तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा ॥

जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा । तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा ॥

तपके बलसे ब्राह्मण सदा बलवान् रहते हैं । उनके क्रोधसे रक्षा करनेवाला कोई नहीं है । हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणोंको वशमें कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जायँगे ।

बालकाण्ड, चौपाई 165.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 171 ज्ञान–विवेक
गुरु की महिमा

सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा । द्विज गुर कोप कहहु को राखा ॥

राखड़ गुर जौं कोप बिधाता । गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता ॥

राजाने मुनिके चरण पकड़कर कहा — हे स्वामी! सत्य ही है । ब्राह्मण और गुरुके क्रोधसे, कहिये, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं; पर गुरुसे विरोध करनेपर जगत्में कोई भी बचानेवाला नहीं है ।

राजा प्रतापभानु ने कपटी मुनि के चरण पकड़कर कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 166.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 172 गुरु महिमा

जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा ॥

आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा ॥

अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना ॥

तेहि बहुबिधि त्रास देस निकासइ जो कह बेद पुराना ॥

जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञमें [देवताओंके] भाग पानेकी बात रावण कहीं कानोंसे सुन पाता, तो [उसी समय] स्वयं उठ दौड़ता । कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था । संसारमें ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानोंमें भी सुननेमें नहीं आता था; जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरहसे त्रास देता और देशसे निकाल देता था ।

बालकाण्ड, छन्द (183 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 186 वैराग्य

देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान ॥

धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान ॥

हे राजन्! प्रसन्न मनसे इनको दो, मोह और अज्ञानको छोड़ दो । हे स्वामी! इससे तुमको धर्म और सुयशकी प्राप्ति होगी और इनका परम कल्याण होगा ।

बालकाण्ड, दोहा 207 श्रीरामचरितमानस पृ. 208 भक्ति

सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती । कस न राम तुम्ह राखहु नीती ॥

धरम सेतु पालक तुम्ह ताता । प्रेम बिबस सेवक सुखदाता ॥

यह सुनकर मुनीश्वर विश्वामित्रजीने प्रेमसहित वचन कहे-हे राम! तुम नीतिकी रक्षा कैसे न करोगे; हे तात! तुम धर्मकी मर्यादाका पालन करनेवाले और प्रेमके वशीभूत होकर सेवकोंको सुख देनेवाले हो ।

बालकाण्ड, चौपाई 298.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 218 नीति–व्यवहार

रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ । मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ ॥

मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी । जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी ॥

रघुवंशियोंका यह सहज (जन्मगत) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्गपर पैर नहीं रखता । मुझे तो अपने मनका अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने [जाग्रत्की कौन कहे] स्वप्नमें भी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डाली है ।

बालकाण्ड, चौपाई 231.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 228
श्रेष्ठ पुरुष के लक्षण

जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी । नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी ॥

मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं । ते नरबर थोरे जग माहीं ॥

रणमें शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात् जो लड़ाईके मैदानसे भागते नहीं), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टिको नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँसे ‘नाहीं’ नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसारमें थोड़े हैं ।

श्रीरामजी अपने छोटे भाई से बातें कर रहे हैं।

बालकाण्ड, चौपाई 231.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 228 नीति–व्यवहार

जौं तुम्ह तेहु मुनि की नाईं । पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं ॥

छमहु चूक अनजानत केरी । चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी ॥

यदि आप मुनिकी तरह आते, तो हे स्वामी! बालक आपके चरणोंकी धूलि सिरपर रखता । अनजानेकी भूलको क्षमा कर दीजिये । ब्राह्मणोंके हृदयमें बहुत अधिक दया होनी चाहिये ।

बालकाण्ड, चौपाई 282.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 271

छत्रिय तनु धरि समर सकाना । कुल कलंकु तेहिं पावँर आना ॥

कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी । कालहु डरहिं न रन रघुबंसी ॥

क्षत्रियका शरीर धरकर जो युद्धमें डर गया, उस नीचने अपने कुलपर कलङ्क लगा दिया । मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, कुलकी प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रणमें कालसे भी नहीं डरते ।

बालकाण्ड, चौपाई 284.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 273

तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु ॥

बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु ॥

तथापि तुम जाकर अपने कुलका जैसा व्यवहार हो, ब्राह्मणों, कुलके बूढ़ों और गुरुओंसे पूछकर और वेदोंमें वर्णित जैसा आचार हो वैसा करो ।

बालकाण्ड, दोहा 286 श्रीरामचरितमानस पृ. 275

तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ । धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ ॥

तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी । तसि पुनीत कौसल्या देबी ॥

वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना ही बुलाये स्वाभाविक ही धर्मात्मा पुरुषके पास जाती हैं । तुम जैसे गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवताकी सेवा करनेवाले हो, वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 294.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 281 भक्ति

सासु ससुर गुर सेवा करेहू । पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू ॥

अति सनेह बस सखीं सयानी । नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी ॥

सास, ससुर और गुरुकी सेवा करना । पतिका रुख देखकर उनकी आज्ञाका पालन करना । सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेहके वश कोमल वाणीसे स्त्रियोंके धर्म सिखलाती हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 334.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 320

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू । जनि अबला जिमि करुना करहू ॥

तनु तिय तनय धामु धनु धरनी । सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी ॥

या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये । यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये-पीटिये नहीं । सत्यव्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी-सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 35.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 375 नीति–व्यवहार

सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी । जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥

तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥

हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माताके वचनोंका अनुरागी (पालन करनेवाला) है । आज्ञा-पालनके द्वारा] माता-पिताको सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी! सारे संसारमें दुर्लभ है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 41.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 380

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु । अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु ॥

एक धरम परमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने ॥

जो हठ करके (कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखोंके पात्र हो गये । स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा । एक (दूसरे) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 48.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 385 ज्ञान–विवेक

नाहिन रामु राज के भूखे । धरम धुरीन बिषय रस रूखे ॥

गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू । नृप सन अस बरु दूसर लेहू ॥

श्रीरामचन्द्रजी राज्यके भूखे नहीं हैं । वे धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले और विषय-रससे रूखे हैं (अर्थात् उनमें विषयासक्ति है ही नहीं) । [इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्रीरामजी वन न गये तो भरतके राज्यमें विघ्न करेंगे; इतनेपर भी मन न माने तो] तुम राजासे दूसरा ऐसा (यह) वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरुके घर रहें ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 50.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 387

सरल सुभाउ राम महतारी । बोली बचन धीर धरि भारी ॥

तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका । पितु आयसु सब धरमक टीका ॥

सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजीकी माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोलीं — हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया । पिताकी आज्ञाका पालन करना ही सब धर्मोंका शिरोमणि धर्म है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 55.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 392

गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस ॥

हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस ॥

[मेरी आज्ञा मानकर घरपर रहनेसे] गुरु और वेदके द्वारा सम्मत धर्म [के आचरण] का फल तुम्हें बिना ही क्लेशके मिल जाता है । किन्तु हठके वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 61 श्रीरामचरितमानस पृ. 397 ज्ञान–विवेक

लागि सासु पग कह कर जोरी । छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी ॥

दीन्हि प्रानपति मोहिसिख सोई । जेहि बिधि मोर परम हित होई ॥

सासके पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं-हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठाईको क्षमा कीजिये । मुझे प्राणपतिने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 64.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 399 नीति–व्यवहार
आज्ञा पालन का महत्त्व

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ ॥

लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥

जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेनेका लाभ पाया है; नहीं तो जगत्में जन्म व्यर्थ ही है ।

श्रीरामचन्द्रजी ने भाई लक्ष्मण को हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभी से नाता तोड़े हुए खड़े देखा तब वचन बोले।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 70 श्रीरामचरितमानस पृ. 404 ज्ञान–विवेक

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं । लागि अगम अपनी कदराईं ॥

नरबर धीर धरम धुर धारी । निगम नीति कहुँ ते अधिकारी ॥

हे स्वामी! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरतासे वह मेरे लिये अगम (पहुँचके बाहर) लगी । शास्त्र और नीतिके तो वे ही श्रेष्ठ पुरुष अधिकारी हैं जो धीर हैं और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 72.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 405
सगे-सम्बन्धियों की सेवा

गुरपितु मातु बंधु सुर साईं । सेइअहिं सकल प्रान की नाईं ॥

रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही के ॥

गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राणके समान करनी चाहिये । फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणोंके भी प्रिय हैं, हृदयके भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं ।

सुमित्राजी ने वन जाते लक्ष्मणजी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 75.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 407 सेवा–करुणा–विनय

सिबि दधीच हरिचंद नरेसा । सहे धरम हित कोटि कलेसा ॥

रंतिदेव बलि भूप सुजाना । धरमु धरेउ सहि संकट नाना ॥

शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चन्द्रने धर्मके लिये करोड़ों (अनेकों) कष्ट सहे थे । बुद्धिमान् राजा रन्तिदेव और बलि बहुत-से संकट सहकर भी धर्मको पकड़े रहे (उन्होंने धर्मका परित्याग नहीं किया)

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 95.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 424
सत्य धर्म की महिमा

धरमु न दूसर सत्य समाना । आगम निगम पुरान बखाना ॥

मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा । तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा ॥

वेद, शास्त्र और पुराणोंमें कहा गया है कि सत्यके समान दूसरा धर्म नहीं है । मैंने उस धर्मको सहज ही पा लिया है । इस [सत्यरूपी धर्म] का त्याग करनेसे तीनों लोकोंमें अपयश छा जायगा ।

श्रीरामजी ने मन्त्री को समझाते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 95.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 424

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं । ते नरेस बिनु पावक दहहीं ॥

मंगल मूलमूल बिप्र परितोषू । दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू ॥

क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्निके ही (अपने दुष्ट कर्मोंसे ही) जलकर भस्म हो जाते हैं । ब्राह्मणोंका संतोष सब मङ्गलोंकी जड़ है और भूदेव ब्राह्मणोंका क्रोध करोड़ों कुलोंको भस्म कर देता है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 126.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 450

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं । बिप्र धेनु हित संकट सहहीं ॥

नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका । घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका ॥

जो अवगुणोंको छोड़कर सबके गुणोंको ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौके लिये संकट सहते हैं, नीति-निपुणतामें जिनकी जगत्में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 131.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 454 नीति–व्यवहार

जीवत सकल जनम फल पाए । अंत अमरपति सदन सिधाए ॥

अस अनुमानि सोच परिहरहू । सहित समाज राज पुर करहू ॥

जीवनकालमें ही उन्होंने जन्म लेनेके सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्तमें वे इन्द्रलोकको चले गये । ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाजसहित नगरका राज्य करो ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 161.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 479 ज्ञान–विवेक

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥

सोचिअ नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥

सोच उस ब्राह्मणका करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोगमें ही लीन रहता है । उस राजाका सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 172.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 488 नीति–व्यवहार
पितृ आज्ञा का पालन

अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ॥

ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥

जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी (स्वर्ग) में निवास करते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 174 श्रीरामचरितमानस पृ. 490
आत्मीय वचनों का पालन

गुरपितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥

उचित कि अनुचित किएँ बिचारू । धरमु जाइ सिर पातक भारू ॥

[क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद् (मित्र) की वाणी सुनकर प्रसन्न मनसे उसे अच्छी समझकर करना (मानना) चाहिये । उचित-अनुचितका विचार करनेसे धर्म जाता है और सिरपर पापका भार चढ़ता है ।

भरतजी ने माता की वाणी सुनकर धैर्य धरकर और उचित उत्तर देने के लिए यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 177.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 492

करइ स्वामि हित सेवकु सोई । दूषन कोटि देइ किन कोई ॥

अस बिचारि सुचि सेवक बोले । जे सपनेहुँ निज धरम न डोले ॥

सेवक वही है जो स्वामीका हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे । भरतजीने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकोंको बुलाया जो कभी स्वप्नमें भी अपने धर्मसे नहीं डिगे थे ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 186.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 499

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरम यहु नाथ हमारा ॥

भरत बचन मुनिबर मन भाए । सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ॥

हे नाथ! आपकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसका पालन करना, यह हमारा परम धर्म है । भरतजीके ये वचन मुनिश्रेष्ठके मनको अच्छे लगे । उन्होंने विश्वासपात्र सेवकों और शिष्योंको पास बुलाया ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 213.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 522
आध्यात्मिक राज्य का स्वरूप

भट जम नियम सैल रजधानी । सांति सुमति सुचि सुंदर रानी ॥

सकल अंग संपन्न सुराऊ । राम चरन आश्रित चित चाऊ ॥

यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) तथा नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योद्धा हैं पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियाँ हैं । वह श्रेष्ठ राजा राज्यके सब अङ्गोंसे पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके आश्रित रहनेसे उसके चित्तमें चाव (आनन्द या उत्साह) है ।

भरतजी ने सेवक के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रम के समीप जा पहुँचे।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 235.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 541 भक्ति

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम ॥

लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम ॥

[वसिष्ठजीने कहा—] हे राम! तुम धर्मके सेतु और दयाके धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो? लोग दुखी हैं । दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 248 श्रीरामचरितमानस पृ. 552 सेवा–करुणा–विनय

मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता ॥

जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू । हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ॥

मुझ सेवककी तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है (मेरे दिन अच्छे नहीं हैं) और विधाता प्रतिकूल है । यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म (अधर्म) होगा, क्योंकि सेवकका धर्म शिवजीके पर्वत कैलाससे भी भारी (निबाहनेमें कठिन) है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 253.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 557 नीति–व्यवहार

सब कर हित रुख राउरि राखें । आयसु किएँ मुदित फुर भाषें ॥

प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई । माथें मानि करौं सिख सोई ॥

आपका रुख रखनेमें और आपकी आज्ञाको सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करनेमें ही सबका हित है । पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षाको माथेपर चढ़ाकर करूँ ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 258.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 561 नीति–व्यवहार

मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥

हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥

पक्षी और पशु मुनियोंके पास [बेधड़क] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकोंको देखते ही भाग जाते हैं । मित्र और शत्रुको पशु-पक्षी भी पहचानते हैं । फिर मनुष्यशरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 264.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 566 ज्ञान–विवेक

लरिकाइहि तें रघुबर बानी । पालत नीति प्रीति पहिचानी ॥

सील सकोच सिंधु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥

श्रीरामजीकी लड़कपनसे ही यह बान है कि वे प्रेमको पहचानकर नीतिका पालन करते हैं । श्रीरघुनाथजी शील और संकोचके समुद्र हैं । वे सुन्दर मुखके [या सबके अनुकूल रहनेवाले], सुन्दर नेत्रवाले [या सबको कृपा और प्रेमकी दृष्टिसे देखनेवाले] और सरलस्वभाव हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 274.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 574 नीति–व्यवहार
आज्ञा पालन का महत्त्व

गुरपितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ॥

अस बिचारि सब सोच बिहाई । पालहु अवध अवधि भरि जाई ॥

गुरु, पिता, माता और स्वामीकी शिक्षा (आज्ञा) का पालन करनेसे कुमार्गपर भी चलनेसे पैर गड्ढेमें नहीं पड़ता (पतन नहीं होता) । ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधिभर उसका पालन करो ।

श्रीरामचन्द्रजी ने भरतजी से अयोध्या लौटकर राज्य सँभालने को कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 315.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 609 साधना–योग
मुखिया का कर्तव्य

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ॥

पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥

तुलसीदासजी कहते हैं — [श्रीरामजीने कहा—] मुखिया मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेको तो एक (अकेला) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगोंका पालन-पोषण करता है ।

श्रीरामजी ने भाई भरत को राजधर्म समझाते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 315 श्रीरामचरितमानस पृ. 610 नीति–व्यवहार

राजधरम सरबसु एतनोई । जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥

बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥

राजधर्मका सर्वस्व (सार) भी इतना ही है । जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है । श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया । परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 316.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 610 नीति–व्यवहार

परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मंजु मुद मंगल करनू ॥

हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू ॥

भरतजीका परम पवित्र आचरण (चरित्र) मधुर, सुन्दर और आनन्द-मङ्गलोंका करनेवाला है । कलियुगके कठिन पापों और क्लेशोंको हरनेवाला है । महामोहरूपी रात्रिको नष्ट करनेके लिये सूर्यके समान है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 326.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 618 ज्ञान–विवेक

कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित ॥

प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम ॥

उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभुने कृपा करके उसे छोड़ दिया । श्रीरामजीके समान कृपालु और कौन होगा?

अरण्यकाण्ड, सोरठा 2 श्रीरामचरितमानस पृ. 624
सच्चे गुणों की परीक्षा

धीरज धर्म मित्र अरु नारी । आपद काल परिखिअहिं चारी ॥

बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना । अंध बधिर क्रोधी अति दीना ॥

ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना । नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥

एकइ धर्म एक ब्रत नेमा । कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥

धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री — इन चारोंकी विपत्तिके समय ही परीक्षा होती है । वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन, ऐसे भी पतिका अपमान करनेसे स्त्री यमपुरमें भाँति-भाँतिके दुःख पाती है । शरीर, वचन और मनसे पतिके चरणोंमें प्रेम करना स्त्रीके लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है ।

अनसूयाजी ने सीताजी को पतिव्रत-धर्म समझाते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 5(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 627 नीति–व्यवहार

छन सुख लागि जनम सत कोटी । दुख न समुझ तेहि सम को खोटी ॥

बिनु श्रम नारि परम गति लहई । पतिव्रत धर्म छाड़ि छल गई ॥

क्षणभरके सुखके लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मोंके दुःखको नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी । जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत-धर्मको ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गतिको प्राप्त करती है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 5(क).9 श्रीरामचरितमानस पृ. 628

अतुलित भुज प्रताप बल धामः । कलि मल विपुल विभंजन नामः ॥

धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः । संतत शं तनोतु मम रामः ॥

जिनकी भुजाओंका प्रताप अतुलनीय है, जो बलके धाम हैं, जिनका नाम कलियुगके बड़े भारी पापोंका नाश करनेवाला है, जो धर्मके कवच (रक्षक) हैं और जिनके गुणसमूह आनन्द देनेवाले हैं, वे श्रीरामजी निरन्तर मेरे कल्याणका विस्तार करें ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 11.8 श्रीरामचरितमानस पृ. 636 नाम महिमा

धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना । ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ॥

जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई । सो मम भगति भगत सुखदाई ॥

धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योगसे ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्षका देनेवाला है — ऐसा वेदोंने वर्णन किया है । और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तोंको सुख देनेवाली है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 16.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 642 ज्ञान–विवेक
परहित का फल

परहित बस जिन्ह के मन माहीं । तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

तनु तजि तात जाहु मम धामा । देउँ काह तुम्ह पूरनकामा ॥

जिनके मनमें दूसरेका हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिये जगत्में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है । हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाममें जाइये । मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)

श्रीरामचन्द्रजी ने जटायु से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 31.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 665 सेवा–करुणा–विनय

सापत ताड़त परुष कहंता । बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ॥

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना । सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥

शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं । शील और गुणसे हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है । और गुणगणोंसे युक्त और ज्ञानमें निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 34.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 668 नीति–व्यवहार
नवधा भक्ति का वर्णन

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥

छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥

मेरे (राम) मन्त्रका जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास — यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है । छठी भक्ति है इन्द्रियोंका निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्योंसे वैराग्य और निरंतर संत पुरुषोंके धर्म (आचरण) में लगे रहना ।

श्रीरामजी ने शबरीजी को नवधा भक्ति बताते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 36.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 669 साधना–योग

प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता । प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥

मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी । बालक सुत सम दास अमानी ॥

सयाना हो जानेपर उस पुत्रपर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती (अर्थात् मातृपरायण शिशुकी तरह फिर उसको बचानेकी चिन्ता नहीं करती; क्योंकि वह मातापर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है) । ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्रके समान है और [तुम्हारे-जैसा] अपने बलका मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्रके समान है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 43.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 678 ज्ञान–विवेक
सन्तों के लक्षण

षट बिकार जित अनघ अकामा । अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥

अमित बोध अनीह मितभोगी । सत्यसार कबि कोबिद जोगी ॥

वे संत [काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — इन] छः विकारों (दोषों) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिञ्चन (सर्वत्यागी), बाहर-भीतरसे पवित्र, सुखके धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान्, योगी … ।

नारद मुनि ने श्रीरामजी से सन्तों के लक्षणों के बारे में पूछा, तब श्रीरामजी ने सन्तों के गुणों का वर्णन किया।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 45.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 680 ज्ञान–विवेक

सावधान मानद मदहीना । धीर धर्म गति परम प्रबीना ॥

सावधान, दूसरोंको मान देनेवाले, अभिमानरहित, धैर्यवान्, धर्मके ज्ञान और आचरणमें अत्यन्त निपुण … ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 45.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 680 साधना–योग
श्रीराम का परोपकारी स्वभाव

उमा राम सम हित जग माहीं । गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं ॥

सुर नर मुनि सब कै यह रीती । स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥

हे पार्वती! जगत्में श्रीरामजीके समान हित करनेवाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है । देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थके लिये ही सब प्रीति करते हैं ।

शिवजी ने पार्वतीजी से श्रीराम की सुहृदता का वर्णन करते हुए कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 12.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 696 नीति–व्यवहार

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं । कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं ॥

ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा । जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा ॥

चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुगको पाकर धर्म भाग जाते हैं । ऊसरमें वर्षा होती है, पर वहाँ घासतक नहीं उगती । जैसे हरिभक्तके हृदयमें काम नहीं उत्पन्न होता ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 15(क).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 699

कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं ॥

जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं ॥

कभी-कभी वायु बड़े जोरसे चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं । जैसे कुपुत्रके उत्पन्न होनेसे कुलके उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 15(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 699
सच्चे परामर्श का महत्त्व

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ॥

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥

मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि [अप्रसन्नताके] भय या [लाभकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] प्रिय बोलते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं); तो [क्रमश:] राज्य, शरीर और धर्म — इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है ।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 37 श्रीरामचरितमानस पृ. 750 नीति–व्यवहार

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं । आयूहीन भए सब तबहीं ॥

साधु अवग्या तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ॥

ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये (उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी) । [शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! साधुका अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याणकी हानि (नाश) कर देता है ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 42.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 754
दुष्ट सङ्ग का त्याग

बरु भल बास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥

अब पद देखि कुसल रघुराया । जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया ॥

हे तात! नरकमें रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका संग [कभी] न दे । [विभीषणजीने कहा—] हे रघुनाथजी! अब आपके चरणोंका दर्शन कर कुशलसे हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझपर दया की है ।

श्रीरामजी ने लङ्केश से पूछा कि तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है, तब विभीषणजी ने यह वचन कहे।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 46.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 758 नीति–व्यवहार

संत कहहिं असि नीति दसानन । चौथेंपन जाइहि नृप कानन ॥

तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता । जो कर्ता पालक संहर्ता ॥

हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन (बुढ़ापे) में राजाको वनमें चला जाना चाहिये । हे स्वामी! वहाँ (वनमें) आप उनका भजन कीजिये जो सृष्टिके रचनेवाले, पालनेवाले और संहार करनेवाले हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 7.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 780 कर्म–प्रारब्ध

साम दान अरु दंड बिभेदा । नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा ॥

नीति धर्म के चरन सुहाए । अस जियँ जानि नाथ पहिं आए ॥

हे नाथ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद — ये चारों राजाके हृदयमें बसते हैं । ये नीति-धर्मके चार सुन्दर चरण हैं । [किन्तु रावणमें धर्मका अभाव है] ऐसा जीमें जानकर ये नाथके पास आ गये हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 38(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 811 नीति–व्यवहार

उग्र बचन सुनि सकल डेराने । चले क्रोध करि सुभट लजाने ॥

सन्मुख मरन बीर कै सोभा । तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा ॥

रावणके उग्र (कठोर) वचन सुनकर सब वीर डर गये और लज्जित होकर क्रोध करके युद्धके लिये लौट चले । रणमें [शत्रुके] सम्मुख (युद्ध करते हुए) मरनेमें ही वीरकी शोभा है । [यह सोचकर] तब उन्होंने प्राणोंका लोभ छोड़ दिया ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 42.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 816

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन । आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥

पर उपदेस कुसल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥

रावणने उनको ज्ञानका उपदेश किया । वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा (बातें) शुभ और पवित्र है । दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं । पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेशके अनुसार आचरण भी करते हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 78.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 850 ज्ञान–विवेक

बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग ॥

चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥

सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें तत्पर हुए सदा वेद-मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं । उन्हें न किसी बातका भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 20 श्रीरामचरितमानस पृ. 932

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥

सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥

‘राम-राज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं व्यापते । सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदोंमें बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 21.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 932

चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥

राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥

धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है । पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 21.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 933 भक्ति
परोपकार और अधर्म

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

निर्नय सकल पुरान बेद कर । कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥

हे भाई! दूसरोंकी भलाईके समान कोई धर्म नहीं है और दूसरोंको दुःख पहुँचानेके समान कोई नीचता (पाप) नहीं है । हे तात! समस्त पुराणों और वेदोंका यह निर्णय (निश्चित सिद्धान्त) मैंने तुमसे कहा है, इस बातको पण्डितलोग जानते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 41.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 950 सेवा–करुणा–विनय

तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान ॥

जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन ॥

तब मैंने हृदयमें विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, उसे मैं इसी कर्मसे पा जाऊँगा; तब तो इसके समान दूसरा कोई धर्म ही नहीं है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 48 श्रीरामचरितमानस पृ. 957

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी । कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी ॥

धर्मसील कोटिक महँ कोई । बिषय बिमुख बिराग रत होई ॥

हे त्रिपुरारि! सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्मके व्रतका धारण करनेवाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयसे विमुख (विषयोंका त्यागी) और वैराग्यपरायण होता है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 54.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 961 वैराग्य

सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग ॥

श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग ॥

पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक, बता, किसको प्यारा नहीं लगता? वेद और पुराण ऐसी ही नीति कहते हैं । हे काक! सावधान होकर सुन ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 86 श्रीरामचरितमानस पृ. 991

बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा । जल बिनु रस कि होइ संसारा ॥

सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई । जिमि बिनु तेज न रूप गोसाँई ॥

तपके बिना क्या तेज फैल सकता है? जल-तत्त्वके बिना संसारमें क्या रस हो सकता है? पण्डितजनोंकी सेवा बिना क्या शील (सदाचार) प्राप्त हो सकता है? हे गोसाईं! जैसे बिना तेज (अग्नि-तत्त्व) के रूप नहीं मिलता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 90(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 994

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान ॥

जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥

धर्मके चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमेंसे कलिमें एक [दानरूपी] चरण ही प्रधान है । जिस किसी प्रकारसे भी दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 103(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1008 सेवा–करुणा–विनय

सुनु मम बचन सत्य अब भाई । हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥

अब जनि करहि बिप्र अपमाना । जानेसु संत अनंत समाना ॥

हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन । द्विजोंकी सेवा ही भगवान्‌को प्रसन्न करनेवाला व्रत है । अब कभी ब्राह्मणका अपमान न करना । संतोंको अनन्त श्रीभगवान्हीके समान जानना ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 109(क).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 1015 सत्सङ्ग–सन्त महिमा
भजन का महत्व

हानि कि जग एहि सम किछु भाई । भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥

अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥

हे भाई! जगत्में क्या इसके समान दूसरी भी कोई हानि है कि मनुष्यका शरीर पाकर भी श्रीरामजीका भजन न किया जाय? चुगलखोरीके समान क्या कोई दूसरा पाप है? और हे गरुड़जी! दयाके समान क्या कोई दूसरा धर्म है?

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 112(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 1021 भक्ति

सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई । जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥

जप तप ब्रत जम नियम अपारा । जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ॥

तेइ तृन हरित चरै जब गाई । भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई ॥

नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा । निर्मल मन अहीर निज दासा ॥

श्रीहरिकी कृपासे यदि सात्त्विकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयरूपी घरमें आकर बस जाय; असंख्यों जप, तप, व्रत, यम और नियमादि शुभ धर्म और आचार (आचरण), जो श्रुतियोंने कहे हैं, उन्हीं [धर्माचाररूपी] हरे तृणों (घास) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़ेको पाकर वह पेन्हावे । निवृत्ति (सांसारिक विषयोंसे और प्रपञ्चसे हटना) नोई (गौके दूहते समय पिछले पैर बाँधनेकी रस्सी) है, विश्वास [दूध दूहनेका] बरतन है, निर्मल (निष्पाप) मन जो स्वयं अपना दास है (अपने वशमें है), दुहनेवाला अहीर है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 117(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 1028 साधना–योग

नर तन सम नहिं कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही ॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी । ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥

मनुष्य-शरीरके समान कोई शरीर नहीं है । चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं । यह मनुष्य-शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्षकी सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको देनेवाला है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 1035 ज्ञान–विवेक
सन्तों का अभ्युदय

संत उदय संतत सुखकारी । बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी ॥

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा । पर निंदा सम अघ न गरीसा ॥

और संतोंका अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्यका उदय विश्वभरके लिये सुखदायक है । वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म माना है और परनिन्दाके समान भारी पाप नहीं है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).11 श्रीरामचरितमानस पृ. 1036 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

नाना कर्म धर्म ब्रत दाना । संजम दम जप तप मख नाना ॥

भूत दया द्विज गुर सेवकाई । बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई ॥

जहँ लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी ॥

सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपाँ काहूँ एक पाई ॥

अनेकों प्रकारके कर्म, धर्म, व्रत और दान, अनेकों संयम, दम, जप, तप और यज्ञ, प्राणियोंपर दया, ब्राह्मण और गुरुकी सेवा; विद्या, विनय और विवेककी बड़ाई [आदि], जहाँतक वेदोंने साधन बतलाये हैं, हे भवानी! उन सबका फल श्रीहरिकी भक्ति ही है । किन्तु श्रुतियोंमें गायी हुई वह श्रीरघुनाथजीकी भक्ति श्रीरामजीकी कृपासे किसी एक (विरले) ने ही पायी है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 126.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1043

धन्य देस सो जहँ सुरसरी । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी ॥

धन्य सो भूपु नीति जो करई । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई ॥

वह देश धन्य है जहाँ श्रीगङ्गाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्मका पालन करती है । वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्मसे नहीं डिगता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 127.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1044