श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६

धर्म–आचरण

कर्तव्य और सदाचरण

122 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

अतिथि सत्कार का फल

भीष्म उवाच

अतिथिः पूजितो यद्धि ध्यायते मनसा शुभम् ।

न तत् क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीषिणः ॥

यदि अतिथि पूजित होकर मन-ही-मन गृहस्थके कल्याणका चिन्तन करे तो उससे जो फल मिलता है उसकी सौ यज्ञोंसे भी तुलना नहीं हो सकती अर्थात् सौ यज्ञोंसे भी बढ़कर है । ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 92 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 52

भीष्म → युधिष्ठिर

यथा भर्त्राश्रयो धर्मः स्त्रीणां लोके युधिष्ठिर ।

स देवः सा गतिर्नान्या क्षत्रियस्य तथा द्विजाः ॥

युधिष्ठिर! जैसे स्त्रियोंके लिये पतिकी सेवा ही संसारमें सबसे बड़ा धर्म है, पति ही उनका देवता और वही उनकी परम गति है, उनके लिये दूसरी कोई गति नहीं है; उसी प्रकार क्षत्रियके लिये ब्राह्मणकी सेवा ही परम धर्म है। ब्राह्मण ही उनका देवता और परम गति है, दूसरा नहीं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 8, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 98

भीष्म उवाच

दण्डपाणिर्यथा गोषु पालो नित्यं हि रक्षयेत् ।

ब्राह्मणान् ब्रह्म च तथा क्षत्रियः परिपालयेत् ॥

जैसे चरवाहा हाथमें डंडा लेकर सदा गौओंकी रखवाली करता है, उसी प्रकार क्षत्रियको उचित है कि वह ब्राह्मणों और वेदोंकी सदा रक्षा करे ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 8, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 100
मन के तीन कर्तव्य

भीष्म उवाच

अनभिध्या परस्वेषु सर्वसत्त्वेषु सौहृदम् ।

कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत् ॥

दूसरेके धनको लेनेका उपाय न सोचना, समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखना और कर्मोंका फल अवश्य मिलता है, इस बातपर विश्वास रखना — ये तीन मनसे आचरण करने योग्य कार्य हैं । इन्हें सदा करना चाहिये । (इनके विपरीत दूसरोंके धनका लालच करना, समस्त प्राणियोंसे वैर रखना और कर्मोंके फलपर विश्वास न करना — ये तीन मानसिक पाप हैं — इनसे सदा बचे रहना चाहिये)

अनुशासनपर्व, अध्याय 13, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 135 कर्म–प्रारब्ध

भीष्म उवाच

तस्माद् वाक्कायमनसा नाचरेदशुभं नरः ।

शुभाशुभान्याचरन् हि तस्य तस्याश्नुते फलम् ॥

इसलिये मनुष्यका कर्तव्य है कि वह मन, वाणी या शरीरसे कभी अशुभ कर्म न करे; क्योंकि वह शुभ या अशुभ जैसा कर्म करता है; उसका वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 13, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 136 कर्म–प्रारब्ध

युधिष्ठिर उवाच

अनृताः स्त्रिय इत्येवं वेदेष्वपि हि पठ्यते ।

धर्मोऽयं पूर्विका संज्ञा उपचारः क्रियाविधिः ॥

वेदोंमें भी यह बात पढ़ी गयी है कि स्त्रियाँ असत्यभाषिणी होती हैं, ऐसी दशामें उनका वह असत्य भी सहधर्मके अन्तर्गत आ सकता है, किंतु असत्य कभी धर्म नहीं हो सकता; अतः दाम्पत्यधर्मको जो सहधर्म कहा गया है, यह उसकी गौण संज्ञा है । वे पति-पत्नी साथ रहकर जो भी कार्य करते हैं, उसीको उपचारतः धर्म नाम दे दिया गया है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 19, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 289 नीति–व्यवहार
धर्म के लक्षण

भीष्म उवाच

अहिंसा सत्यमक्रोध आनृशंस्यं दमस्तथा ।

आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम् ॥

भीष्मजीने कहा — राजेन्द्र! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, कोमलता, इन्द्रियसंयम और सरलता — ये धर्मके निश्चित लक्षण हैं ।

युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्मजी ने धर्म के लक्षण बताए।

अनुशासनपर्व, अध्याय 22, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 323

भीष्म उवाच

ये तु धर्मं प्रशंसन्तश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् ।

अनाचरन्तस्तद् धर्मं संकरेऽभिरताः प्रभो ॥

प्रभो! जो लोग इस पृथ्वीपर धर्मकी प्रशंसा करते हुए घूमते-फिरते हैं; परंतु स्वयं उस धर्मका आचरण नहीं करते, वे ढोंगी हैं और धर्मसंकरता फैलानेमें लगे हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 22, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 323

भीष्म → राजन

अक्रोधना धर्मपराः सत्यनित्या दमे रताः ।

तादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! जो क्रोधरहित, धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और इन्द्रियसंयममें तत्पर हैं, ऐसे ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये और उन्हींको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है (अतः उन्हींको श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये)

अनुशासनपर्व, अध्याय 22, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 325
स्वर्गगामी पुरुषों के लक्षण

भीष्म उवाच

क्षमावन्तश्च धीराश्च धर्मकार्येषु चोत्थिताः ।

मङ्गलाचारसम्पन्नाः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥

जो क्षमावान्, धीर, धर्मकार्यके लिये उद्यत रहनेवाले और मांगलिक आचारसे सम्पन्न हैं, वे पुरुष भी स्वर्गगामी होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 23, श्लोक 88 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 340

भीष्म उवाच

यस्मिंस्तस्मिन् कुले जाता बहुपुत्राः शतायुषः ।

सानुक्रोशा जितक्रोधाः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥

जो किसी भी कुलमें उत्पन्न हो बहुत-से पुत्रों और सौ वर्षकी आयुसे युक्त होते हैं, दूसरोंपर दया करते हैं और क्रोधको काबूमें रखते हैं, वे पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 23, श्लोक 102 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 342

नारद उवाच

सम्यग् यजन्ति ये चेष्टी क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रियाः ।

सत्यं धर्मं क्षितिं गाश्च तान् नमस्यामि यादव ॥

यदुनन्दन! जो विधिपूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय और मनको वशमें करनेवाले हैं और सत्य, धर्म, पृथ्वी तथा गौओंकी पूजा करते हैं, उन्हींको मैं प्रणाम करता हूँ ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 31, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 397

नारद उवाच

ये सर्वातिथयो नित्यं गोषु च ब्राह्मणेषु च ।

नित्यं सत्ये चाभिरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

जो सबका अतिथि सत्कार करते तथा गौ-ब्राह्मण और सत्यपर प्रेम रखते हैं वे बड़े-बड़े संकटसे पार हो जाते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 31, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 399

भीष्म उवाच

ऋणमुन्मुच्य देवानामृषीणां च तथैव च ।

पितॄणामथ विप्राणामतिथीनां च पञ्चमम् ॥

पर्यायेण विशुद्धेन सुविनीतेन कर्मणा ।

एवं गृहस्थः कर्माणि कुर्वन् धर्मान्न हीयते ॥

जो यज्ञ-यागादि करके देवताओंके ऋणसे, वेदोंका स्वाध्याय करके ऋषियोंके ऋणसे, श्रेष्ठ पुत्रकी उत्पत्ति तथा श्राद्ध करके पितरोंके ऋणसे, दान देकर ब्राह्मणोंके ऋणसे और आतिथ्य सत्कार करके अतिथियोंके ऋणसे मुक्त होता है तथा क्रमशः विशुद्ध और विनययुक्त प्रयत्नसे शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करता है, वह गृहस्थ कभी धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 37, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 431

भीष्म उवाच

ब्राह्मः क्षात्रोऽथ गान्धर्व एते धर्म्या नरर्षभ ।

पृथग्वा यदि वा मिश्राः कर्तव्या नात्र संशयः ॥

नरश्रेष्ठ! ब्राह्म, क्षात्र (प्राजापत्य) तथा गान्धर्व — ये तीन विवाह धर्मानुकूल बताये गये हैं। ये पृथक् हों या अन्य विवाहोंसे मिश्रित-करने ही योग्य हैं । इसमें संशय नहीं है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 44, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 467

भीष्म → युधिष्ठिर

पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या द्वावधर्म्यं युधिष्ठिर ।

पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यो कथंचन ॥

युधिष्ठिर! इन पाँच (ब्राह्म, प्राजापत्य, गान्धर्व, आसुर और राक्षस) विवाहोंमेंसे पूर्वकथित तीन विवाह धर्मानुकूल हैं और शेष दो पापमय हैं । आसुर और राक्षस विवाह किसी प्रकार भी नहीं करने चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 44, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 467

भीष्म उवाच

न ह्यकामेन संवासं मनुरेवं प्रशंसति ।

अयशस्यमधर्म्यं च यन्मृषा धर्मकोपनम् ॥

अकाम पुरुषके साथ सकामा कन्याका सहवास हो, इसे मनु अच्छा नहीं मानते हैं । अतः सर्वसम्मतिसे निश्चित किये हुए विवाहको मिथ्या करनेका प्रयत्न अयश और अधर्मका कारण होता है । वह धर्मको नष्ट करनेवाला माना गया है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 44, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 469

भीष्म उवाच

एतत् तु नापरे चक्रुरपरे जातु साधवः ।

साधूनां पुनराचारो गरीयान् धर्मलक्षणः ॥

कुछ लोगोंका कहना है कि दूसरे सत्पुरुषोंने ऐसा नहीं किया है और कुछ कहते हैं कि अन्य सत्पुरुषोंने भी कभी-कभी ऐसा किया है । अतः श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार ही धर्मका सर्वश्रेष्ठ लक्षण है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 45, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 476
अधर्ममूलक धन का निषेध

भीष्म उवाच

अन्योऽप्यथ न विक्रेयो मनुष्यः किं पुनः प्रजाः ।

अधर्ममूलैर्हि धनैस्तैर्न धर्मोऽथ कश्चन ॥

किसी दूसरे मनुष्यको भी नहीं बेचना चाहिये; फिर अपनी संतानको बेचनेकी तो बात ही क्या? अधर्ममूलक धनसे किया हुआ कोई भी धर्म सफल नहीं होता ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 45, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 479
वर्णसङ्करों की पारमार्थिक उन्नति

भीष्म उवाच

गोब्राह्मणाय साहाय्यं कुर्वाणा वै न संशयः ।

आनृशंस्यमनुक्रोशः सत्यवाक्यं तथा क्षमा ॥

स्वशरीरैरपि त्राणं बाह्यानां सिद्धिकारणम् ।

भवन्ति मनुजव्याघ्र तत्र मे नास्ति संशयः ॥

पुरुषसिंह! यदि ये गौ और ब्राह्मणोंकी सहायता करें, क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग दें, सबपर दया करें, सत्य बोलें, दूसरोंके अपराध क्षमा करें और अपने शरीरको कष्टमें डालकर भी दूसरोंकी रक्षा करें तो इन वर्णसंकर मनुष्योंकी भी पारमार्थिक उन्नति हो सकती है — इसमें संशय नहीं है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 48, श्लोक 34–35 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 497 नीति–व्यवहार

भीष्म → युधिष्ठिर

योनिसंकलुषे जातं नानाभावसमन्वितम् ।

कर्मभिः सज्जनाचीर्णैर्विज्ञेया योनिशुद्धता ॥

भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! जो कलुषित योनिमें उत्पन्न हुआ है, वह ऐसी नाना प्रकारकी चेष्टाओंसे युक्त होता है, जो सत्पुरुषोंके आचारसे विपरीत हैं; अतः उसके कर्मोंसे ही उसकी पहचान होती है । इसी प्रकार सज्जनोचित आचरणोंसे योनिकी शुद्धताका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 48, श्लोक 40 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 498 ज्ञान–विवेक

भीष्म उवाच

आत्मानमाख्याति हि कर्मभिर्नरः ।

सुशीलचारित्रकुलैः शुभाशुभैः ।

प्रणष्टमप्याशु कुलं तथा नरः ।

पुनः प्रकाशं कुरुते स्वकर्मतः ॥

मनुष्य अपने शुभाशुभ कर्म, शील, आचरण और कुलके द्वारा अपना परिचय देता है । यदि उसका कुल नष्ट हो गया हो तो भी वह अपने कर्मोंद्वारा उसे फिर शीघ्र ही प्रकाशमें ला देता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 48, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 500 कर्म–प्रारब्ध

भीष्म उवाच

तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ।

पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥

इसलिये अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही उचित है कि वह अपने खोदवाये हुए तालाबके किनारे अच्छे-अच्छे वृक्ष लगाये और उनका पुत्रोंके समान पालन करे; क्योंकि वे वृक्ष धर्मकी दृष्टिसे पुत्र ही माने गये हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 58, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 565
भूमिदान का महत्त्व

बृहस्पति उवाच

अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् ।

नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः ।

नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधिः ॥

भूमिदान करनेवाला पुरुष अमृत पैदा करनेवाली भूमि पाता है, भूमिके समान कोई दान नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, सत्यके समान कोई धर्म नहीं है और दानके समान कोई निधि नहीं है ।

बृहस्पति ने इन्द्र से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 62, श्लोक 92 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 594 नीति–व्यवहार

नारद उवाच

प्रत्यक्षं प्रीतिजननं भोक्तुर्दातुर्भवत्युत ।

सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत ॥

अन्नका दान ही एक ऐसा दान है, जो दाता और भोक्ता, दोनोंको प्रत्यक्षरूपसे संतुष्ट करनेवाला होता है । इसके सिवा अन्य जितने दान हैं, उन सबका फल परोक्ष है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 63, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 599 नीति–व्यवहार

भीष्म उवाच

यो ब्रूयाच्चापि शिष्याय धर्म्यं ब्राह्मीं सरस्वतीम् ।

पृथिवीगोप्रदानाभ्यां तुल्यं स फलमश्नुते ॥

जो ब्राह्मण अपने शिष्यको धर्मानुकूल ब्राह्मी सरस्वती (वेदवाणी) का उपदेश करता है, वह भूमिदान और गोदानके समान फलका भागी होता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 69, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 630

नाचिकेत उवाच

शुद्धो ह्यर्थी नावमन्यस्व धर्मान् ।

पात्रे देयं देशकालोपपन्ने ।

तस्माद् गावस्ते नित्यमेव प्रदेया ।

मा भूच्च ते संशयः कश्चिदत्र ॥

मुनिकुमार! धर्म निर्दोष विषय है । तुम धर्मकी अवहेलना न करना । उत्तम देश, काल प्राप्त होनेपर सुपात्रको दान देते रहना चाहिये । अतः तुम्हें सदा ही गोदान करना उचित है । इस विषयमें तुम्हारे भीतर कोई संदेह नहीं होना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 71, श्लोक 46 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 649
गोदान का महत्व

यम उवाच

गुरुं शिष्यो वरयेद् गोप्रदाने ।

स वै गन्ता नियतं स्वर्गमेव ।

विधिज्ञानां सुमहान् धर्म एष ।

विधिं ह्याद्यं विधयः संविशन्ति ॥

शिष्य जब गोदान करने लगे, तब उसे ग्रहण करनेके लिये गुरुको चुने । यदि गुरुने वह गोदान स्वीकार कर लिया तो शिष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है । विधिके जाननेवाले पुरुषोंके लिये यह गोदान महान् धर्म है। अन्य सब विधियाँ इस आदि विधिमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं ।

यमराज ने नाचिकेत से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 71, श्लोक 55 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 651 गुरु महिमा

पितामह उवाच

तत्र सर्वसहाः क्षान्ता वत्सला गुरुवर्तिनः ।

अहंकारैर्विरहिता यान्ति शक्र नरोत्तमाः ॥

इन्द्र! जो सब कुछ सहनेवाले, क्षमाशील, दयालु, गुरुजनोंकी आज्ञामें रहनेवाले और अहंकाररहित हैं, वे श्रेष्ठ मनुष्य ही उस लोकमें जाते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 73, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 657
गोलोक के पात्र

पितामह उवाच

यः सर्वमांसानि न भक्षीत ।

पुमान् सदा भावितो धर्मयुक्तः ।

मातापित्रोरर्चिता सत्ययुक्तः ।

शुश्रूषिता ब्राह्मणानामनिन्द्यः ॥

अक्रोधनो गोषु तथा द्विजेषु ।

धर्मे रतो गुरुशुश्रूषकश्च ।

यावज्जीवं सत्यवृत्ते रतश्च ।

दाने तो यः क्षमी चापराधे ॥

मृदुर्दान्तो देवपरायणश्च ।

सर्वातिथिश्चापि तथा दयावान् ।

ईदृग्गुणो मानवस्तं प्रयाति ।

लोकं गवां शाश्वतं चाव्ययं च ॥

जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 73, श्लोक 11–13 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 657

पितामह उवाच

जन्मप्रभृति सत्यं च यो ब्रूयान्नियतेन्द्रियः ।

गुरुद्विजसहः क्षान्तस्तस्य गोभिः समा गतिः ॥

जो जन्मसे ही सदा सत्य बोलता, इन्द्रियोंको काबूमें रखता, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी कठोर बातोंको भी सह लेता और क्षमाशील होता है, उसकी गौओंके समान गति होती है । अर्थात् वह गोलोकमें जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 73, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 658

भीष्म उवाच

त्वया हि कुर्वता शास्त्रं प्रमाणमिह पार्थिव ।

आत्मा धर्मः श्रुतं वेदाः पितरश्चर्षिभिः सह ॥

साक्षात् पितामहो ब्रह्मा गुरवोऽथ प्रजापतिः ।

प्रमाणमुपनीता वै स्थिताश्च न विचालिताः ॥

पृथ्वीनाथ! तुमने यहाँ शास्त्रको प्रमाण मानकर आत्मा, धर्म, शास्त्र, वेद, पितृगण, ऋषिगण, गुरु, प्रजापति और ब्रह्माजी — इन सबका मान बढ़ाया है तथा जो लोग धर्ममें स्थित हैं उन्हें भी तुमने अपना आदर्श दिखाकर विचलित नहीं होने दिया है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 84, श्लोक 23–24 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 724

भीष्म → राजन

ब्राह्मणान् न परीक्षेत क्षत्रियो दानधर्मवित् ।

दैवे कर्मणि पित्र्ये तु न्यायमाहुः परीक्षणम् ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! दान-धर्मके ज्ञाता क्षत्रियको देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञ-यागादि) में ब्राह्मणकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, किंतु पितृकर्म (श्राद्ध) में उनकी परीक्षा न्यायसंगत मानी गयी है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 90, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 770
लोभ का त्याग

भीष्म → राजन

तस्मात् सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत् ।

एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥

राजन्! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा धर्म है । अतः लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 93, श्लोक 143 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 813 नीति–व्यवहार

भीष्म → राजन

इत्येतदसुरेन्द्राय काव्यः प्रोवाच भार्गवः ।

सुवर्णाय मनुः प्राह सुवर्णो नारदाय च ॥

नारदोऽपि मयि प्राह गुणानेतान् महाद्युते ।

त्वमप्येतद् विदित्वेह सर्वमाचर पुत्रक ॥

भीष्मजी कहते हैं — राजन्! इस प्रकार शुक्राचार्यने असुरराज बलिको यह प्रसंग सुनाया और मनुने तपस्वी सुवर्णको इसका उपदेश किया । तत्पश्चात् तपस्वी सुवर्णने नारदजीको और नारदजीने मुझे धूप, दीप आदिके दानके गुण बताये । महातेजस्वी पुत्र! तुम भी इस विधिको जानकर इसीके अनुसार सब काम करो ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 98, श्लोक 65–66 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 873

धृतराष्ट्र उवाच

चातुर्मास्यैर्ये यजन्ते जनाः सदा ।

तथेष्टीनां दशशतं प्राप्नुवन्ति ।

ये चाग्निहोत्रं जुह्वति श्रद्दधाना ।

यथाम्नायं त्रीणि वर्षाणि विप्राः ॥

सुधारिणां धर्मधुरे महात्मनां ।

यथोदिते वर्त्मनि सुस्थितानाम् ।

धर्मात्मनामुद्वहतां गतिं तां ।

परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥

धृतराष्ट्रने कहा — जो लोग सदा चातुर्मास्य याग करते हैं, हजारों इष्टियोंका अनुष्ठान करते हैं तथा जो ब्राह्मण तीन वर्षोंतक वैदिक विधिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अग्निहोत्र करते हैं, धर्मका भार अच्छी तरह वहन करते हैं, वेदोक्त मार्गपर भलीभाँति स्थित होते हैं, वे ही धर्मात्मा महात्मा ब्राह्मण वरुणलोकमें जाते हैं । धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है । यह उससे भी उत्तम लोक प्राप्त करेगा ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 102, श्लोक 36–37 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 897

धृतराष्ट्र → मुने

ये राजानो राजसूयाभिषिक्ता ।

धर्मात्मानो रक्षितारः प्रजानाम् ।

ये चाश्वमेधावभृथे प्लुतांगास्तेषां लोका धृतराष्ट्रो न तत्र ॥

धृतराष्ट्रने कहा — मुने! जो धर्मात्मा राजा राजसूय यज्ञमें अभिषिक्त होते हैं प्रजाजनोंकी रक्षा करते हैं तथा अश्वमेधयज्ञके अवभृथ-स्नानमें जिसके सारे अंग भीग जाते हैं, उन्हींके लिये प्रजापतिलोक हैं । धृतराष्ट्र वहाँ भी नहीं जायगा ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 102, श्लोक 41 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 899

भीष्म उवाच

अक्रोधनः सत्यवादी भूतानामविहिंसकः ।

अनसूयुरजिह्मश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥

जो क्रोधहीन, सत्यवादी, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेवाला, अदोषदर्शी और कपटशून्य है, वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 104, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 913

भीष्म उवाच

आचारलक्षणो धर्मः संतश्चारित्रलक्षणाः ।

साधूनां च यथावृत्तमेतदाचारलक्षणम् ॥

सदाचार ही धर्मका लक्षण है। सच्चरित्रता ही श्रेष्ठ पुरुषोंकी पहचान है । श्रेष्ठ पुरुष जैसा बर्ताव करते हैं; वही सदाचारका स्वरूप अथवा लक्षण है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 104, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 913

भीष्म उवाच

आगमानां हि सर्वेषामाचारः श्रेष्ठ उच्यते ।

आचारप्रभवो धर्मो धर्मादायुर्विवर्धते ॥

सम्पूर्ण आगमोंमें सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है । सदाचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मसे आयु बढ़ती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 104, श्लोक 155 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 933

भीष्म उवाच

एतद् यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।

अनुकम्प्य सर्ववर्णान् ब्रह्मणा समुदाहृतम् ॥

पूर्वकालमें सब वर्णोंके लोगोंपर दया करके ब्रह्माजीने यह सदाचार धर्मका उपदेश दिया था । यह यश, आयु और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा कल्याणका परम आधार है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 104, श्लोक 156 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 933
उपवास की महिमा

अंगिरा उवाच

नास्ति वेदात् परं शास्त्रं नास्ति मातृसमो गुरुः ।

न धर्मात् परमो लाभस्तपो नानशनात् परम् ॥

वेदसे बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, धर्मसे बढ़कर कोई उत्कृष्ट लाभ नहीं है तथा उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 106, श्लोक 65 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 947 गुरु महिमा

अंगिरा उवाच

ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति पावनं दिवि चेह च ।

उपवासैस्तथा तुल्यं तपःकर्म न विद्यते ॥

जैसे इस लोक और परलोकमें ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणोंसे बढ़कर कोई पावन नहीं है, उसी प्रकार उपवासके समान कोई तप नहीं है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 106, श्लोक 66 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 947

बृहस्पति उवाच

एतत् ते सर्वमाख्यातमन्नदानफलं महत् ।

मूलमेतत् तु धर्माणां प्रदानानां च भारत ॥

भारत! अन्न-दान सब प्रकारके धर्मों और दानोंका मूल है । इस प्रकार मैंने तुम्हें यह अन्नदानका सारा महान् फल बताया है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 112, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 999

बृहस्पति उवाच

आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः ।

न्यस्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ॥

जो मनुष्य सब भूतोंको अपने समान समझता, किसीपर प्रहार नहीं करता (दण्डको हमेशाके लिये त्याग देता है) और क्रोधको अपने काबूमें रखता है, वह मृत्युके पश्चात् सुख भोगता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 113, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1000 वैराग्य

भीष्म उवाच

अधृष्यः सर्वभूतानां विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ।

साधूनां सम्मतो नित्यं भवेन्मांसं विवर्जयन् ॥

जो पुरुष मांसका परित्याग कर देता है, उसका कोई भी प्राणी तिरस्कार नहीं करता है, वह सब प्राणियोंका विश्वासपात्र हो जाता है तथा श्रेष्ठ पुरुष उसका सदा सम्मान करते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1008

भीष्म उवाच

आत्मौपम्येन मन्तव्यं बुद्धिमद्भिः कृतात्मभिः ।

मृत्युतो भयमस्तीति विदुषां भूतिमिच्छताम् ॥

किं पुनर्हन्यमानानां तरसा जीवितार्थिनाम् ।

अरोगाणामपापानां पापैर्मांसोपजीविभिः ॥

अतः जो बुद्धिमान् और पुण्यात्मा है, उन्हें चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान समझें । जब अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंको भी मृत्युका भय बना रहता है, तब जीवित रहनेकी इच्छावाले नीरोग और निरपराध प्राणियोंको, जो मांसपर जीविका चलानेवाले पापी पुरुषोंद्वारा बलपूर्वक मारे जाते हैं, क्यों न भय प्राप्त होगा ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 20–21 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1009 ज्ञान–विवेक

भीष्म उवाच

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।

अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥

अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है और अहिंसा परम सत्य है; क्योंकि उसीसे धर्मकी प्रवृत्ति होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1010

भीष्म उवाच

धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।

मांसस्याभक्षणं प्राहुर्नियताः परमर्षयः ॥

नियमपरायण महर्षियोंने मांस भक्षणके त्यागको ही धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्तिका प्रधान उपाय और परमकल्याणका साधन बतलाया है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 35 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1011

भीष्म उवाच

हिरण्यदानैर्गोदानैर्भूमिदानैश्च सर्वशः ।

मांसस्याभक्षणे धर्मो विशिष्ट इति नः श्रुतिः ॥

सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान करनेसे जो धर्म प्राप्त होता है, मांसका भक्षण न करनेसे उसकी अपेक्षा भी विशिष्ट धर्मकी प्राप्ति होती है । यह हमारे सुननेमें आया है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 41 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1012

भीष्म उवाच

इमं धर्मममांसादं यश्चरेच्छ्रावयीत वा ।

अपि चेत् सुदुराचारो न जातु निरयं व्रजेत् ॥

जो मांस-भक्षणके परित्यागरूप इस धर्मका आचरण करता अथवा इसे दूसरोंको सुनाता है, वह कितना ही दुराचारी क्यों न रहा हो, नरकमें नहीं पड़ता ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 71 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1016

भीष्म → राजन

पठेद् वा य इदं राजन् शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः ।

अमांसभक्षणविधिं पवित्रमृषिपूजितम् ॥

विमुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वकामैर्महीयते ।

विशिष्टतां ज्ञातिषु च लभते नात्र संशयः ॥

राजन्! जो ऋषियोंद्वारा सम्मानित एवं पवित्र इस मांस भक्षणके त्यागके प्रकरणको पढ़ता अथवा बारंबार सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंद्वारा सम्मानित होता है और अपने सजातीय बन्धुओंमें विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 72–73 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1016

भीष्म उवाच

अहिंसालक्षणो धर्म इति धर्मविदो विदुः ।

यदहिंसात्मकं कर्म तत् कुर्यादात्मवान् नरः ॥

धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि अहिंसा ही धर्मका लक्षण है । मनस्वी पुरुष वही कर्म करे, जो अहिंसात्मक हो ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 116, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1018

व्यास उवाच

पाहि सर्वाः प्रजाः सम्यक् शुभाशुभविदात्मवान् ।

शुभैः संविभजन् कामैरशुभानां च पावनैः ॥

आत्मवान् भव सुप्रीतः स्वधर्माचरणे रतः ।

क्षात्रीं तनुं समुत्सृज्य ततो विप्रत्वमेष्यसि ॥

तुम शुभ और अशुभका ज्ञान प्राप्त करो तथा अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें करके भलीभाँति प्रजाका पालन करो । उत्तम भोगोंका दान करते हुए अशुभ दोषोंका मार्जन करके प्रजाको पावन बनाकर आत्मज्ञानी एवं सुप्रसन्न हो जाओ तथा सदा स्वधर्मके आचरणमें तत्पर रहो । तदनन्तर क्षत्रिय-शरीरका त्याग करके ब्राह्मणत्वको प्राप्त करोगे ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 119, श्लोक 4–5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1031 साधना–योग

व्यास उवाच

यथा वेदाः स्वधीताश्च यथा चेन्द्रियसंयमः ।

सर्वत्यागो यथा चेह तथा दानमनुत्तमम् ॥

जैसे वेदोंका स्वाध्याय, इन्द्रियोंका संयम और सर्वस्वका त्याग उत्तम है, उसी प्रकार इस संसारमें दान भी अत्यन्त उत्तम माना गया है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 120, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1036

बृहस्पति उवाच

एवमेतत् पुरा दृष्टं कुलवृद्धैर्द्विजातिभिः ।

तस्माद् वर्ज्यानि वर्ज्यानि कार्यं कार्यं च नित्यशः ।

भूतिकामेन मर्त्येन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥

इस प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंने पूर्वकालमें यह प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया है; अतः अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको शास्त्रमें जिन्हें त्याज्य बतलाया है, उन कर्मोंको त्याग देना चाहिये और जो कर्तव्य कर्म है, उसका सदा अनुष्ठान करते रहना चाहिये । यह मैं तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूँ ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 125, श्लोक 68 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1073

गार्ग्य उवाच

अपि क्रतुशतैरिष्ट्वा क्षयं गच्छति तद्धविः ।

न तु क्षीयन्ति ते धर्माः श्रद्दधानैः प्रयोजिताः ॥

सैकड़ों बार किये हुए यज्ञका फल भी क्षीण हो जाता है; किंतु श्रद्धालु पुरुषोंद्वारा उपर्युक्त धर्मोंका पालन किया जाय तो वे कभी क्षीण नहीं होते ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 127, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1087

गार्ग्य उवाच

आतिथ्यं सततं कुर्याद् दीपं दद्यात् प्रतिश्रये ।

वर्जयानो दिवा स्वापं न च मांसानि भक्षयेत् ॥

गोब्राह्मणं न हिंस्याच्च पुष्कराणि च कीर्तयेत् ।

एष श्रेष्ठतमो धर्मः सरहस्यो महाफलः ॥

गार्ग्यने कहा — सदा अतिथियोंका सत्कार करे, घरमें दीपक जलाये, दिनमें सोना छोड़ दे । मांस कभी न खाय । गौ और ब्राह्मणकी हत्या न करे तथा तीनों पुष्कर तीर्थोंका प्रतिदिन नाम लिया करे । यह रहस्यसहित श्रेष्ठतम धर्म महान् फल देनेवाला है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 127, श्लोक 9–10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1087
अतिथि सत्कार का महत्व

अरुन्धती उवाच

अहन्यहनि यो दद्यात् कपिलां द्वादशीः समाः ।

मासि मासि च सत्रेण यो यजेत सदा नरः ॥

गवां शतसहस्रं च यो दद्याज्ज्येष्ठपुष्करे ।

न तद्धर्मफलं तुल्यमतिथिर्यस्य तुष्यति ॥

जो मनुष्य बारह वर्षोंतक प्रतिदिन एक-एक कपिला गौका दान करता है, हर महीनेमें निरन्तर सत्रयाग चलाता और ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें जाकर एक लाख गोदान करता है, उसके धर्मका फल उस मनुष्यके बराबर नहीं हो सकता, जिसके द्वारा की हुई सेवासे अतिथि संतुष्ट हो जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 130, श्लोक 6–7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1095 सेवा–करुणा–विनय

श्रीमहेश्वर → देवि

अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम् ।

शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! किसी भी जीवकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब प्राणियोंपर दया करना, मन और इन्द्रियोंपर काबू रखना तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान देना गृहस्थ आश्रमका उत्तम धर्म है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1153

श्रीमहेश्वर उवाच

उपवासः सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः ।

स हि धर्मार्थसम्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

इसमें संशय नहीं कि उपवास (इन्द्रियसंयम) व्रतका आचरण करना ब्राह्मणके लिये सदा धर्म बतलाया गया है । धर्मार्थसम्पन्न ब्राह्मण ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1156

श्रीमहेश्वर उवाच

भैक्षचर्या परो धर्मो नित्ययज्ञोपवीतिता ।

नित्यं स्वाध्यायिता धर्मो ब्रह्मचर्याश्रमस्तथा ॥

ब्रह्मचारीके लिये भैक्षचर्या (गाँवोंमेंसे भिक्षा माँगकर लाना और गुरुको समर्पित करना) परम धर्म है । नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहना, प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय करना और ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंके पालनमें लगे रहना, ब्रह्मचारीका प्रधान कर्म है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 36 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1156

श्रीमहेश्वर उवाच

शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु ।

स शूद्रः संशिततपाः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।

शुश्रूषुरतिथिं प्राप्तं तपः संचिनुते महत् ॥

शूद्रका परम धर्म है तीनों वर्णोंकी सेवा । जो शूद्र सत्यवादी जितेन्द्रिय और घरपर आये हुए अतिथिकी सेवा करनेवाला है, वह महान् तपका संचय कर लेता है । उसका सेवारूप धर्म उसके लिये कठोर तप है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 57–58 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1160

श्रीमहेश्वर उवाच

सर्वभूतदया धर्मो न चैकग्रामवासिता ।

आशापाशविमोक्षश्च शस्यते मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥

मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनी चाहिये । यही उनका धर्म है । उन्हें सदा एक ही गाँवमें नहीं रहना चाहिये और अपने आशारूपी बन्धनोंको तोड़नेका प्रयत्न करना चाहिये । यही मुमुक्षुके लिये प्रशंसाकी बात है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 81 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1170 वैराग्य

श्रीमहेश्वर उवाच

सर्वभूतानुकम्पी यः सर्वभूतार्जवव्रतः ।

सर्वभूतात्मभूतश्च स वै धर्मेण युज्यते ॥

जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करता है, सबके साथ सरलताका बर्ताव करता और समस्त भूतोंको आत्मभावसे देखता है, वही धर्मके फलसे युक्त होता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 142, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1181

श्रीमहेश्वर उवाच

आर्जवे तु रतो नित्यं वसत्यमरसंनिधौ ।

तस्मादार्जवयुक्तः स्याद् य इच्छेद् धर्ममात्मनः ॥

जो सदा सरल बर्तावमें तत्पर रहता है, वह देवताओंके समीप निवास करता है । इसलिये जो अपने धर्मका फल पाना चाहता हो, उसे सरलतापूर्ण बर्तावसे युक्त होना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 142, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1181

श्रीमहेश्वर उवाच

क्षान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतो विहिंसकः ।

धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते ॥

क्षमाशील, जितेन्द्रिय, क्रोधविजयी, धर्मनिष्ठ, अहिंसक और सदा धर्मपरायण मनुष्य ही धर्मके फलका भागी होता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 142, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1182

श्रीमहेश्वर उवाच

व्यपेततन्द्रिर्धर्मात्मा शक्त्या सत्पथमाश्रितः ।

चारित्रपरमो बुद्धो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

जो पुरुष आलस्यरहित, धर्मात्मा, शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ मार्गपर चलनेवाला, सच्चरित्र और ज्ञानी होता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 142, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1182
वर्णधर्म और धर्मफल

श्रीमहेश्वर उवाच

यस्तु बुद्धः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवान् शुचिः ।

धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलमश्नुते ॥

जो पुरुष अपने वर्णधर्मका पालन करते हुए बोध प्राप्त करता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, पवित्र तथा धर्मज्ञ होकर धर्ममें ही लगा रहता है, वही धर्मके वास्तविक फलका उपभोग करता है ।

महेश्वर ने उमा से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 143, श्लोक 15 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1192 ज्ञान–विवेक

श्रीमहेश्वर उवाच

विघसाशिना सदा भाव्यं सत्पथालम्बिना तथा ।

बाह्मं हि मार्गमाक्रम्य वर्तितव्यं बुभूषता ॥

अपना कल्याण चाहनेवाले ब्राह्मणको उचित है कि वह सज्जनोंके मार्गका अवलम्बन करके सदा अतिथि और पोष्यवर्गको भोजन करानेके बाद अन्न ग्रहण करे, वेदोक्त पथका आश्रय लेकर उत्तम बर्ताव करे ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 143, श्लोक 55 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1197

श्रीमहेश्वर → देवि

एष वाणीकृतो देवि धर्मः सेव्यः सदा नरैः ।

शुभः सत्यगुणो नित्यं वर्जनीयो मृषा बुधैः ॥

देवि! यह वाणीजनित धर्म बताया गया है । मनुष्योंको सदा इसका सेवन करना चाहिये । विद्वानोंको उचित है कि वे सदा शुभ और सत्य वचन बोलें तथा मिथ्याका परित्याग करें ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 144, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1202

श्रीमहेश्वर उवाच

मानसेनेह धर्मेण संयुक्ताः पुरुषाः सदा ।

स्वर्गं गच्छन्ति कल्याणि तन्मे कीर्तयतः शृणु ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — कल्याणि! जो सदा मानसिक धर्मसे युक्त हैं अर्थात् मनसे धर्मका ही चिन्तन और आचरण करते हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं । मैं इस विषयमें जो बताता हूँ, उसे सुनो ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 144, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1203

श्रीमहेश्वर उवाच

एष दीर्घायुषां मार्गः सुवृत्तानां सुकर्मिणाम् ।

प्राणिहिंसाविमोक्षेण ब्रह्मणा समुदीरितः ॥

यह सत्कर्मका अनुष्ठान करनेवाले सदाचारी एवं दीर्घजीवी मनुष्योंका लक्षण है । स्वयं ब्रह्माजीने इस मार्गका उपदेश किया है । समस्त प्राणियोंकी हिंसाका परित्याग करनेसे ही इसकी उपलब्धि होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 144, श्लोक 60 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1207

श्रीमहेश्वर → देवि

एष देवि सतां धर्मो मन्तव्यो भूतिकारकः ।

नृणां हितार्थाय मया तव वै समुदाहृतः ॥

देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये । मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 145, श्लोक 57 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1215

उमा उवाच

सुस्वभावा सुवचना सुवृत्ता सुखदर्शना ।

अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ॥

सा भवेद् धर्मपरमा सा भवेद् धर्मभागिनी ।

देववत् सततं साध्वी या भर्तारं प्रपश्यति ॥

जिसके स्वभाव, बात-चीत और आचरण उत्तम हों, जिसको देखनेसे पतिको सुख मिलता हो, जो अपने पतिके सिवा दूसरे किसी पुरुषमें मन नहीं लगाती हो और स्वामीके समक्ष सदा प्रसन्नमुखी रहती हो, वह स्त्री धर्माचरण करनेवाली मानी गयी है । जो साध्वी स्त्री अपने स्वामीको सदा देवतुल्य समझती है, वही धर्मपरायणा और वही धर्मके फलकी भागिनी होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 146, श्लोक 35–36 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1394

उमा उवाच

न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा ।

स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी ॥

जिसके हृदयमें पतिके लिये जैसी चाह होती है, वैसी काम, भोग और सुखके लिये भी नहीं होती । वह स्त्री पातिव्रतधर्मकी भागिनी होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 146, श्लोक 47 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1395 वैराग्य

उमा उवाच

यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम् ।

पतिर्ब्रूयाद् दरिद्रो वा व्याधितो वा कथंचन ॥

आपन्नो रिपुसंस्थो वा ब्रह्मशापार्दितोऽपि वा ।

आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यमविशङ्कया ॥

पति दरिद्र हो जाय, किसी रोगसे घिर जाय, आपत्तिमें फँस जाय, शत्रुओंके बीचमें पड़ जाय अथवा ब्राह्मणके शापसे कष्ट पा रहा हो, उस अवस्थामें वह न करनेयोग्य कार्य, अधर्म अथवा प्राणत्यागकी भी आज्ञा दे दे, तो उसे आपत्तिकालका धर्म समझकर निःशंकभावसे तुरंत पूरा करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 146, श्लोक 57–58 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1397

ईश्वर उवाच

धर्माणां देशिकः साक्षात् स भविष्यति धर्मभाक् ।

धर्मवद्भिः स देवेशो नमस्कार्यः सदोद्यतैः ॥

इतना ही नहीं, वह धर्मोंका उपदेश देनेवाला साक्षात् धर्माचार्य एवं धर्मफलका भागी होगा । अतः धर्मात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा उत्साहित रहकर देवेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करें ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 147, श्लोक 42 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1405

ईश्वर उवाच

धर्म एव परो हि स्यात् तस्मिन्नभ्यर्चिते विभौ ।

स हि देवो महातेजाः प्रजाहितचिकीर्षया ॥

धर्मार्थं पुरुषव्याघ्र ऋषिकोटीः ससर्ज ह ।

ताः सृष्टास्तेन विभुना पर्वते गन्धमादने ॥

सनत्कुमारप्रमुखास्तिष्ठन्ति तपसान्विताः ।

तस्मात् स वाग्मी धर्मज्ञो नमस्यो द्विजपुङ्गवाः ॥

उन सर्वव्यापी परमेश्वरकी पूजा करनेसे परम धर्मकी सिद्धि होगी । वे महान् तेजस्वी देवता हैं । उन पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्रजाका हित करनेकी इच्छासे धर्मका अनुष्ठान करने लिये करोड़ों ऋषियोंकी सृष्टि की है । भगवान्‌के उत्पन्न किये हुए वे सनत्कुमार आदि ऋषि गन्धमादन पर्वतपर सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं । अतः द्विजवरो! उन प्रवचन-कुशल, धर्मज्ञ वासुदेवको सदा प्रणाम करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 147, श्लोक 43–45 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1405

भीष्म → राजन

धर्मेणापि सदा राजन् प्रजा रक्षितुमर्हसि ।

यस्तस्य विपुलो दण्डः सम्यग्धर्मः स कीर्त्यते ॥

राजन्! तुम धर्मपूर्वक सदा प्रजाकी रक्षा करते रहो । प्रजापालनके लिये जो दण्डका उचित उपयोग किया जाता है, वह धर्म ही कहलाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 148, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1415

भीष्म → राजन

सेवितं सततं राजन् पुरा राजर्षिसत्तमैः ।

क्षत्रधर्मपरैर्नित्यं सत्यव्रतपरायणैः ॥

राजन्! प्राचीनकालमें क्षत्रियधर्मका पालन करनेवाले और सदा सत्य व्रतके आचरणमें संलग्न रहनेवाले राजर्षिशिरोमणि इस मन्त्रका सदा ही जप किया करते थे ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 150, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1453

भीष्म उवाच

ब्राह्मणाः सर्वलोकानां महान्तो धर्मसेतवः ।

धनत्यागाभिरामाश्च वाक्संयमरताश्च ये ॥

ब्राह्मण समस्त जगत्की धर्ममर्यादाका संरक्षण करनेवाले सेतुके समान हैं । वे धनका त्याग करके प्रसन्न होते हैं और वाणीका संयम रखते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 151, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1463

भीष्म उवाच

धर्मकामाः स्थिता धर्मे सुकृतैर्धर्मसेतवः ।

यान् समाश्रित्य जीवन्ति प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ॥

वे धर्मकी ही इच्छा रखनेवाले, पुण्यकर्मोंद्वारा धर्ममें ही स्थित रहनेवाले और धर्मके सेतु हैं । उन्हींका आश्रय लेकर चारों प्रकारकी सारी प्रजा जीवन धारण करती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 151, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1464
धर्म की रक्षा हेतु अवतार

भीष्म उवाच

यदा धर्मो ग्लाति वंशे सुराणां ।

तदा कृष्णो जायते मानुषेषु ।

धर्मे स्थित्वा स तु वै भावितात्मा ।

परांश्च लोकानपरांश्च पाति ॥

जब धर्मका ह्रास होने लगता है, तब ये शुद्ध अन्तःकरणवाले श्रीकृष्ण देवताओं तथा मनुष्योंके कुलमें अवतार लेकर स्वयं धर्ममें स्थित हो उसका आचरण करते हुए उसकी स्थापना तथा पर और अपर लोकोंकी रक्षा करते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 158, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1498 लीला–रहस्य

वासुदेव उवाच

त्रिवर्गे चापवर्गे च यशःश्रीरोगशान्तिषु ।

देवतापितृपूजासु संतोष्याश्चैव नो द्विजाः ॥

धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये, मोक्षकी प्राप्तिके लिये और यश, लक्ष्मी तथा आरोग्यकी उपलब्धिके लिये एवं देवता और पितरोंकी पूजाके समय हमें ब्राह्मणोंको पूर्ण संतुष्ट करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 159, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1508 भक्ति
तर्क से परे ज्ञान

भीष्म उवाच

हेतूनामन्तमासाद्य विपुलं ज्ञानमुत्तमम् ।

ज्योतिः सर्वस्य लोकस्य विपुलं प्रतिपद्यते ॥

न त्वेव गमनं राजन् हेतुतो गमनं तथा ।

अग्राह्यमनिबद्धं च वाचा सम्परिवर्जयेत् ॥

जब सारे तर्क समाप्त हो जाते हैं तभी उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होती है । वह ज्ञान ही सम्पूर्ण जगत्के लिये उत्तम ज्योति है । राजन्! कोरे तर्कसे जो ज्ञान होता है, वह वास्तवमें ज्ञान नहीं है; अतः उसको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये । जिसका वेदके द्वारा प्रतिपादन नहीं किया गया हो, उस ज्ञानका परित्याग कर देना ही उचित है ।

भीष्म जी ने युधिष्ठिर से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 162, श्लोक 8–9 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1526 ज्ञान–विवेक

भीष्म उवाच

अहिंसा सत्यमक्रोधो दानमेतच्चतुष्टयम् ।

अजातशत्रो सेवस्व धर्म एष सनातनः ॥

अजातशत्रो! अंहिसा, सत्य, अक्रोध और दान — इन चारोंका सदा सेवन करो । यह सनातन धर्म है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 162, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1528

भीष्म उवाच

मनुष्या यदि वा देवाः शरीरमुपताप्य वै ।

धर्मिणः सुखमेधन्ते लोभद्वेषविवर्जिताः ॥

मनुष्य हों या देवता, जो शरीरको कष्ट देकर भी धर्माचरणमें लगे रहते हैं तथा लोभ और द्वेषका त्याग कर देते हैं, वे सुखी होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 162, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1529

भीष्म उवाच

मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः ।

तस्मात् सर्वाणि भूतानि धर्ममेव समासते ॥

मनीषी पुरुष धर्मको समस्त प्राणियोंका हृदय कहते हैं । अतः समस्त प्राणियोंको धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 162, श्लोक 60 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1533

भीष्म उवाच

एक एव चरेद् धर्मं न धर्मध्वजिको भवेत् ।

धर्मवाणिजका ह्येते ये धर्ममुपभुञ्जते ॥

मनुष्यको चाहिये कि वह अकेला ही धर्मका आचरण करे। धर्मध्वजी (धर्मका दिखावा करनेवाला) न बने । जो धर्मको जीविकाका साधन बनाते हैं, उसके नामपर जीविका चलाते हैं, वे धर्मके व्यवसायी हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 162, श्लोक 61 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1533

भीष्म उवाच

एतावन्मात्रमेतद्धि भूतानां प्राज्ञलक्षणम् ।

कालयुक्तोऽप्युभयविच्छेषं युक्तं समाचरेत् ॥

प्राणियोंकी बुद्धिमत्ताकी यही पहचान है कि वे धर्मके फलमें विश्वास करके उसके आचरणमें लग जायँ । जिसे कर्तव्य अकर्तव्य दोनोंका ज्ञान है, उस पुरुषको चाहिये कि प्रतिकूल प्रारब्धसे युक्त होकर भी यथायोग्य धर्मका ही आचरण करे ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 164, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1538

भीष्म उवाच

स्प्रष्टुमप्यसमर्थो हि ज्वलन्तमिव पावकम् ।

अधर्मः संततो धर्मं कालेन परिरक्षितम् ॥

धर्मका स्वरूप प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी है, काल उसकी सब ओरसे रक्षा करता है । अतः अधर्ममें इतनी शक्ति नहीं है कि वह फैलकर धर्मको छू भी सके ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 164, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1539

भीष्म उवाच

यथा पाण्डोः सुता राजंस्तथैव तव धर्मतः ।

तान् पालय स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान् ॥

ये पाण्डव जैसे राजा पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे भी हैं । ये सदा गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते हैं । तुम धर्ममें स्थित रहकर अपने पुत्रोंके समान ही इनका पालन करना ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 167, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1556

आनृशंस्यपरैर्भाव्यं सदैव नियतात्मभिः ।

ब्रह्मण्यैर्धर्मशीलैश्च तपोनित्यैश्च भारताः ॥

‘भरतवंशियो! तुमलोगोंको सबके साथ कोमलताका बर्ताव करना, सदा अपने मन और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखना तथा ब्राह्मणभक्त, धर्मनिष्ठ एवं तपस्वी होना चाहिये’

अनुशासनपर्व, अध्याय 167, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1559

वासुदेव → अर्जुन

यथा तां बुद्धिमास्थाय गतिमग्र्यां गमिष्यसि ।

शृणु धर्मभृतां श्रेष्ठ गदितं सर्वमेव मे ॥

जिससे तुम उस समत्वबुद्धिका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त कर लोगे । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब तुम मेरी सारी बातें ध्यान देकर सुनो ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 16, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1653
श्रेष्ठ पुरुषों का बर्ताव

ब्राह्मण उवाच

दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तं ब्रह्मधारणम् ।

दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम् ॥

संयमाश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम् ।

व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि ॥

मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् ।

गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः ॥

प्रवर्तनं शुभानां च तत् सतां वृत्तमुच्यते ।

ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वतीः ॥

दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना — यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है । इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है ।

सिद्ध ब्राह्मण ने काश्यप से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 18, श्लोक 15–18 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1667 सेवा–करुणा–विनय

ब्राह्मण उवाच

एवं सत्सु सदा पश्येत् तत्राप्येषा ध्रुवा स्थितिः ।

आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिन् शान्ता व्यवस्थिताः ॥

सत्पुरुषोंमें सदा ही इस प्रकारका धार्मिक आचरण देखा जाता है । उन्हींमें धर्मकी अटल स्थिति होती है । सदाचार ही धर्मका परिचय देता है । शान्तचित्त महात्मा पुरुष सदाचारमें ही स्थित रहते हैं ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 18, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1667

वासुदेव उवाच

इमं धर्मं समास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः ।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥

इस आत्मदर्शनरूप धर्मका आश्रय लेकर स्त्री, वैश्य और शूद्र तथा जो पापयोनिके मनुष्य हैं, वे भी परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 19, श्लोक 61 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1678
परम सुखदायक धर्म

वासुदेव उवाच

नातः परं सुखं त्वन्यत् किंचित् स्याद् भरतर्षभ ।

बुद्धिमान् श्रद्दधानश्च पराक्रान्तश्च पाण्डव ॥

यः परित्यज्यते मर्त्यो लोकसारमसारवत् ।

एतैरुपायैः स क्षिप्रं परां गतिमवाप्नुते ॥

भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है । पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान्, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 19, श्लोक 64–65 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1678 वैराग्य

सर्वे स्वविषये श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यधर्मिणः ॥

‘सभी अपने-अपने स्थानपर श्रेष्ठ हो और सबका धर्म एक-दूसरेपर अवलम्बित है ।’

अनुगीतापर्व, अध्याय 23, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1699

यति उवाच

अहिंसा सर्वधर्माणामिति वृद्धानुशासनम् ।

यदिहिंस्रं भवेत् कर्म तत् कार्यमिति विद्महे ॥

वृद्ध पुरुषोंका यह उपदेश है कि अहिंसा सब धर्मोंमें श्रेष्ठ है, जो कार्य हिंसासे रहित हो वही करने योग्य है, यही हमारा मत है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 28, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1716 नीति–व्यवहार

ब्रह्मा उवाच

वृथारम्भा हि ये केचिद् वृथा दानानि यानि च ।

वृथा भक्षणमित्येतत् तामसं वृत्तमिष्यते ॥

(विधि और श्रद्धासे रहित) व्यर्थ कार्योंका आरम्भ करना, (देश-काल-पात्रका विचार न करके अश्रद्धा और अवहेलनापूर्वक) व्यर्थ दान देना तथा (देवता और अतिथिको दिये बिना) व्यर्थ भोजन करना भी तामसिक कार्य है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 36, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1755

ब्रह्मा उवाच

निर्ममो निरहङ्कारो निराशीः सर्वतः समः ।

अकामभूत इत्येव सतां धर्मः सनातनः ॥

ममता, अहंकार और आशासे रहित होकर सर्वत्र समदृष्टि रखना और सर्वथा निष्काम हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 38, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1762 वैराग्य
ब्राह्मण के कर्तव्य

ब्रह्मा उवाच

तेष्वप्रमादं कुर्वीत त्रिषु कर्मसु धर्मवित् ।

दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः सर्वभूतसमो मुनिः ॥

सर्वमेतद् यथाशक्ति विप्रो निर्वर्तयन् शुचिः ।

एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं गृहस्थः संशितव्रतः ॥

धर्मज्ञ ब्राह्मणको इनके पालनमें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये । इन्द्रियसंयमी, मित्रभावसे युक्त, क्षमावान्, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखनेवाला, मननशील, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला और पवित्रतासे रहनेवाला गृहस्थ ब्राह्मण सदा सावधान रहकर अपनी शक्तिके अनुसार यदि उपर्युका नियमोंका पालन करता है तो वह स्वर्गलोकको जीत लेता है ।

ब्रह्माजी ने महर्षिगण से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 45, श्लोक 24–25 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1795 नीति–व्यवहार
आठ व्रतों का पालन

ब्रह्मा उवाच

अहिंसा ब्रह्मचर्यं च सत्यमार्जवमेव च ।

अक्रोधश्चानसूया च दमो नित्यमपैशुनम् ।

अष्टस्वेतेषु युक्तः स्याद् व्रतेषु नियतेन्द्रियः ॥

अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना — इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे । इन्द्रियोंको वशमें रखे ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 46, श्लोक 29–30 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1800 साधना–योग

ब्रह्मा उवाच

न तत्र क्रमते बुद्धिर्नेन्द्रियाणि न देवताः ।

वेदा यज्ञाश्च लोकाश्च न तपो न व्रतानि च ॥

यत्र ज्ञानवतां प्राप्तिरलिङ्गग्रहणा स्मृता ।

तस्मादलिङ्गधर्मज्ञो धर्मतत्त्वमुपाचरेत् ॥

उस आत्मतत्त्वतक बुद्धि, इन्द्रिय और देवताओंकी भी पहुँच नहीं होती । जहाँ केवल ज्ञानवान् महात्माओंकी ही गति है, वहाँ वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रतका भी प्रवेश नहीं होता; क्योंकि वह बाह्य चिह्नसे रहित मानी गयी है । इसलिये बाह्य चिह्नोंसे रहित धर्मको जानकर उसका यथार्थरूपसे पालन करना चाहिये ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 46, श्लोक 50–51 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1802 ज्ञान–विवेक

ब्रह्मा उवाच

तथैनमवमन्येरन् परे सततमेव हि ।

यथावृत्तश्चरेच्छान्तः सतां धर्मानकुत्सयन् ।

य एवं वृत्तसम्पन्नः स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते ॥

जिस कामके करनेसे समाजके दूसरे लोग अनादर करें, वैसा ही काम शान्त रहकर सदा करता रहे, किंतु सत्पुरुषोंके धर्मकी निन्दा न करे । जो इस प्रकारके बर्तावसे सम्पन्न है, वह श्रेष्ठ मुनि कहलाता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 46, श्लोक 53 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1803 नीति–व्यवहार

ब्रह्मा उवाच

क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।

ज्ञानं त्यागोऽथ संन्यासः सात्त्विकं वृत्तमिष्यते ॥

क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, ज्ञान, त्याग तथा संन्यास — ये सात्त्विक बर्ताव बताये गये हैं ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 48, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1809

ब्रह्मा उवाच

एवं धर्मस्य विज्ञेयं संसाधनमुपायतः ।

उपायज्ञो हि मेधावी सुखमत्यन्तमश्नुते ॥

ऐसा विचारकर किसी उपायसे धर्मके साधनका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि उपायको जाननेवाला मेधावी पुरुष अत्यन्त सुखका भागी होता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 50, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1817

ब्रह्मा उवाच

एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्मः सनातनः ।

एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद् वृत्तमनिन्दितम् ॥

यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 51, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1828 वैराग्य
धर्म की रक्षा हेतु अवतार

वासुदेव → भार्गव

तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः ।

बह्वीः संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम ॥

धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।

तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव ॥

भार्गव! उस धर्ममें प्रवृत्त होकर जो पाप कर्मोंसे निवृत्त हो गये हैं ऐसे मनुष्योंके साथ मैं सदा निवास करता हूँ । साधुशिरोमणे! मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप बर्ताव करता हूँ ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 54, श्लोक 12–13 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1845 लीला–रहस्य
धर्म की स्थापना

वासुदेव उवाच

अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमच्युतः ।

धर्मस्य सेतुं बध्नामि चलिते चलिते युगे ।

तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ॥

अधर्ममें लगे हुए सभी मनुष्योंको दण्ड देनेवाला और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाला ईश्वर मैं ही हूँ । जब-जब युगका परिवर्तन होता है, तब-तब मैं प्रजाकी भलाईके लिये भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादाकी स्थापना करता हूँ ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 54, श्लोक 15–16 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1846 लीला–रहस्य

उत्तङ्क → राजन

प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिनः ।

मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः ॥

उत्तंकने कहा — राजन्! धर्मनिपुण विद्वानोंने उसीको ब्राह्मण कहा है, जो अपनी वाणीका संयम करता हो-सत्यवादी हो । जो मित्रोंके साथ विषमताका व्यवहार करता है, उसे चोर माना गया है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 58, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1869 नीति–व्यवहार

वैशम्पायन → राजन

कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्माख्यं यथावद् द्विजसत्तमाः ।

चक्रुस्ते विधिवद् राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ॥

राजन्! वहाँ ब्राह्मणशिरोमणियोंने प्रवर्ग्य नामक धर्मानुकूल कर्मको यथोचित रीतिसे सम्पन्न करके विधिपूर्वक सोमाभिषव — सोमलताका रस निकालनेका कार्य किया ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 88, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2026

नकुल उवाच

विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ।

अनसूयवो विक्रोधाः साधवो वीतमत्सराः ।

त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ।

स ब्रह्मचर्यं गोत्रं ते तस्य ख्यात्वा परस्परम् ।

कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा ॥

ब्राह्मण-परिवारके सब लोग विशुद्धचित्त, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु, मनको वशमें रखनेवाले, दोषदृष्टिसे रहित, क्रोधहीन, सज्जन, ईर्ष्यारहित और धर्मज्ञ थे । उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अभिमान, मद और क्रोधको सर्वथा त्याग दिया था । क्षुधासे कष्ट पाते हुए उस अतिथि ब्राह्मणको अपने ब्रह्मचर्य और गोत्रका परस्पर परिचय देते हुए वे कुटीमें ले गये ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 90, श्लोक 36–37 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2042 वैराग्य

पुत्र उवाच

प्राणधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया ।

प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ॥

प्राणधारणमात्रसे आप तप कर सकते हैं । देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित हुआ प्राण ही परम धर्म है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 90, श्लोक 59 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2046

श्वशुर → ब्रह्मन

ब्रह्मचर्येण दानेन यज्ञेन तपसा तथा ।

असंकरेण धर्मेण तस्माद् गच्छ दिवं द्विज ॥

अतः ब्रह्मन्! तुम अपने ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, तप तथा संकरतारहित धर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चलो ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 90, श्लोक 87 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2050

श्वशुर उवाच

विभवो न नृणां पुण्यं स्वशक्त्या स्वर्जितं सताम् ।

न यज्ञैर्विविधैर्विप्र यथान्यायेन संचितैः ॥

विप्रवर! मनुष्योंके लिये धन ही पुण्यका हेतु नहीं है। साधु पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार सुगमतापूर्वक पुण्यका अर्जन कर लेते हैं । न्यायपूर्वक संचित किये हुए अन्नके दानसे जैसा उत्तम फल प्राप्त होता है, वैसा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे भी नहीं सुलभ होता ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 90, श्लोक 101 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2052 कर्म–प्रारब्ध

धृतराष्ट्र उवाच

अश्वमेधसहस्रेण यो यजेत् पृथिवीपतिः ।

पालयेद् वापि धर्मेण प्रजास्तुल्यं फलं लभेत् ॥

जो राजा एक हजार अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करता है अथवा दूसरा जो नरेश धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उन दोनोंको समान फल प्राप्त होता है ।

आश्रमवासपर्व, अध्याय 7, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2286

वैशम्पायन उवाच

स राजा राजधर्मांश्च ब्रह्मोपनिषदं तथा ।

अवाप्तवान्नरश्रेष्ठो बुद्धिनिश्चयमेव च ॥

विदुरश्च महाप्राज्ञो ययौ सिद्धिं तपोबलात् ।

धृतराष्ट्रः समासाद्य व्यासं चैव तपस्विनम् ॥

उन नरश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने राजधर्म, ब्रह्मविद्या तथा बुद्धिका यथार्थ निश्चय भी पा लिया था । महाज्ञानी विदुरने तो अपने तपोबलसे सिद्धि प्राप्त की थी; परंतु धृतराष्ट्रने तपस्वी व्यासका आश्रय लेकर सिद्धिलाभ किया था ।

पुत्रदर्शनपर्व, अध्याय 35, श्लोक 2–3 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2405 ज्ञान–विवेक

सौति उवाच

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित् शृणोति मे ।

धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥

मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता । धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते ।

स्त्रीपर्व, अध्याय 5, श्लोक 62 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2539

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् ।

धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।

नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये ।

जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥

‘कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे । धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य । इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य’

स्त्रीपर्व, अध्याय 5, श्लोक 63 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2539 ज्ञान–विवेक