श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५
साधना–योग
अभ्यास, संयम और मन का निग्रह
81 पद्य
महाभारत — खण्ड ५
शकुनि उवाच
तपः श्रेष्ठं प्रजानां हि मूलमेतन्न संशयः ।
कुटुम्बविधिनानेन यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
तपस्या श्रेष्ठ कर्म है । इसमें संदेह नहीं कि यही प्रजावर्गका मूल कारण है। परंतु गार्हस्थ्यविधायक शास्त्रके अनुसार इस गार्हस्थ्य-धर्ममें ही सारी तपस्या प्रतिष्ठित है ।
शकुनि उवाच
एतद् विदुस्तपो विप्रा द्वन्द्वातीता विमत्सराः ।
तस्माद् व्रतं मध्यमं तु लोकेषु तप उच्यते ॥
जिनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं है, जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित हैं, वे ब्राह्मण इसीको तप मानते हैं । यद्यपि लोकमें व्रतको भी तप कहा जाता है, किंतु वह पंचयज्ञके अनुष्ठानकी अपेक्षा मध्यम श्रेणीका है ।
युधिष्ठिर उवाच
तपसा महदाप्नोति बुद्ध्या वै विन्दते महत् ।
त्यागेन सुखमाप्नोति सदा कौन्तेय तत्त्ववित् ॥
कुन्तीनन्दन! तत्त्ववेत्ता पुरुष तपस्याद्वारा महान् पदको प्राप्त कर लेता है, ज्ञानयोगसे उस परमतत्त्वको उपलब्ध कर लेता है और स्वार्थत्यागके द्वारा सदा नित्य सुखका अनुभव करता रहता है ।
युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा।
भीष्म उवाच
दममेव महाराज धर्ममाहुः पुरातनम् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव तत्र कर्म समाप्यते ॥
महाराज! इन्द्रिय-संयमको ब्राह्मणोंका प्राचीन धर्म बताया गया है । इसके सिवा, उन्हें सदा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करना चाहिये; क्योंकि इसीसे उनके सब कर्मोंकी पूर्ति हो जाती है ।
भीष्म उवाच
ब्रह्मचारी व्रती नित्यं नित्यं दीक्षापरो वशी ।
परिचार्य तथा वेदं कृत्यं कुर्वन् वसेत् सदा ॥
ब्रह्मचारी नित्य निरन्तर मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए व्रत एवं दीक्षाके पालनमें तत्पर रहे । वेदोंका स्वाध्याय करते हुए सदा कर्तव्य-कर्मोंके पालनपूर्वक गुरु-गृहमें निवास करे ।
भीष्म उवाच
वेत्ति ज्ञानविसर्गं च निग्रहानुग्रहं तथा ।
यथोक्तवृत्तेर्धीरस्य क्षेमाश्रमपदं भवेत् ॥
जो तत्त्वज्ञान, सर्वत्याग, इन्द्रियसंयम तथा प्राणियोंपर अनुग्रह करना जानता है तथा जिसका पहले कहे अनुसार उत्तम आचार-विचार है, उस धीर पुरुषको कल्याणमय गृहस्थाश्रमसे मिलनेवाले फलकी प्राप्ति होती है ।
बृहस्पति उवाच
तस्माद् बुभूषुर्नियतो जितात्मा नियतेन्द्रियः ।
मेधावी स्मृतिमान् दक्षः संश्रयेत महीपतिम् ॥
इसलिये अपनी उन्नतिकी इच्छा रखनेवाला, मेधावी, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न एवं कार्यदक्ष मनुष्य नियमपूर्वक रहकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए राजाका आश्रय ग्रहण करे ।
भीष्म उवाच
अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यं दमो घृणा ।
एतत् तपो विदुर्धीरा न शरीरस्य शोषणम् ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, क्रूरताको त्याग देना, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना तथा सबके प्रति दयाभाव बनाये रखना-इन्हींको धीर पुरुषोंने तप माना है । केवल शरीरको सुखाना ही तप नहीं है ।
भीष्म उवाच
ये दम्भान्नाचरन्ति स्म येषां वृत्तिश्च संयता ।
विषयांश्च निगृह्णन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥
जो दम्भयुक्त आचरण नहीं करते, जिनकी जीविका नियमानुकूल चलती है और जो विषयोंके लिये बढ़ती हुई इच्छाको रोकते हैं, वे दुःखोंको लाँघ जाते हैं ।
भीष्म उवाच
विद्या तपो वा विपुलं धनं वा ।
सर्वं ह्येतद् व्यवसायेन शक्यम् ।
बुद्ध्यायत्तं तन्निवसेद् देहवत्सु ।
तस्माद् विद्याद् व्यवसायं प्रभूतम् ॥
विद्या, तप तथा प्रचुर धन — ये सब उद्योगसे प्राप्त हो सकते हैं । वह उद्योग प्राणियोंमें बुद्धिके अधीन होकर रहता है; अतः उद्योगको ही समस्त कार्योंकी सिद्धिका पर्याप्त साधन समझे ।
भीष्म उवाच
संनिकृष्टांश्चरेदेतान् न चैतान् मनसा त्यजेत् ।
विमुक्तस्तपसा सर्वान् धर्मादीन् कामनैष्ठिकान् ॥
ये धर्म आदि जिस प्रकार संनिकृष्ट अर्थात् अपना वास्तविक हित करनेवाले हों, उसी रूपमें इनका सेवन करे अर्थात् इनको कल्याणसाधन बनाकर ही उपयोगमें लावे । मनद्वारा भी इनका त्याग न करे, फिर स्वरूपसे शरीरद्वारा त्याग करना तो दूरकी बात है । केवल तप अथवा विचारके द्वारा ही उनसे अपनेको मुक्त रखे अर्थात् आसक्ति और फलका त्याग करके ही इन सब धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये ।
प्रह्लाद उवाच
ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते संयच्छन्ति च मां सदा ।
ते मां काव्यपथे युक्तं शुश्रूषुमनसूयकम् ॥
धर्मात्मानं जितक्रोधं नियतं संयतेन्द्रियम् ।
समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥
वे ब्राह्मण विश्वस्त होकर मुझे नीतिका उपदेश देते और सदा संयममें रखते हैं । मैं सदा ही यथाशक्ति शुक्राचार्यके बताये हुए नीतिमार्गपर चलता, ब्राह्मणोंकी सेवा करता, किसीके दोष नहीं देखता और धर्ममें मन लगाता हूँ । क्रोधको जीतकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें किये रहता हूँ । अतः जैसे मधुकी मक्खियाँ शहदके छत्तेको फूलोंके रससे सींचती रहती हैं, उसी प्रकार उपदेश देनेवाले ब्राह्मण मुझे शास्त्रके अमृतमय वचनोंसे सींचा करते हैं ।
प्रह्लाद ने उस ब्रह्मवादी ब्राह्मण से कहा।
पूजनी उवाच
नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते ।
दाक्ष्येण कुर्वतः कर्म संयमात् प्रतितिष्ठति ॥
बुद्धिमान्के पास थोड़ा-सा धन हो तो वह भी सदा बढ़ता रहता है । वह दक्षतापूर्वक काम करते हुए संयमके द्वारा प्रतिष्ठित होता है ।
भीष्म उवाच
शिष्टाचारः प्रियो येषु दमो येषु प्रतिष्ठितः ।
सुखं दुःखं समं येषां सत्यं येषां परायणम् ॥
जिन्हें शिष्टाचार प्रिय है । जिनमें इन्द्रिय-संयम प्रतिष्ठित है । जिनके लिये सुख और दुःख समान है । सत्य ही जिनका परम आश्रय है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
धर्मस्य विधयो नैके ये वै प्रोक्ता महर्षिभिः ।
स्वं स्वं विज्ञानमाश्रित्य दमस्तेषां परायणम् ॥
महर्षियोंने अपने-अपने ज्ञानके अनुसार धर्मकी एक नहीं, अनेक विधियाँ बतायी हैं, परंतु उन सबका आधार दम (मन और इन्द्रियोंका संयम) ही है ।
भीष्म → राजन
सर्वमेतत् तपोमूलं कवयः परिचक्षते ।
न ह्यतप्ततपा मूढः क्रियाफलमवाप्नुते ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! इस सर्च्य जगत्का मूल कारण तप ही है, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं । जिस मूढ़ने तपस्या नहीं की है, उसे अपने शुभ कर्मोंका फल नहीं मिलता है ।
भीष्म उवाच
इन्द्रियाणीह रक्षन्ति स्वर्गधर्माभिगुप्तये ।
तस्मादर्थे च धर्मे च तपो नानशनात् परम् ॥
इस संसारमें धार्मिक पुरुष स्वर्गके साधनभूत धर्मकी रक्षाके लिये इन्द्रियोंको सुरक्षित (संयमशील बनाये) रखते हैं । परंतु धर्म और अर्थ दोनोंकी सिद्धिके लिये तप ही श्रेष्ठ साधन है और उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है ।
भीष्म उवाच
दमो नान्यस्पृहा नित्यं गाम्भीर्यं धैर्यमेव च ।
अभयं रोगशमनं ज्ञानेनैतदवाप्यते ॥
किसी दूसरेकी वस्तुको लेनेकी इच्छा न करना, सदा गम्भीरता और धीरता रखना, भयको त्याग देना तथा मनके रोगोंको शान्त कर देना — यह ‘दम’ (मन और इन्द्रियोंके संयम) का लक्षण है । इसकी प्राप्ति ज्ञानसे होती है ।
ब्राह्मण उवाच
यदा न कुरुते धीरः सर्वभूतेषु पापकम् ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब धैर्यसम्पन्न ज्ञानवान् पुरुष किसी भी प्राणीके प्रति मन, वाणी और क्रियाद्वारा पापपूर्ण बर्ताव नहीं करता, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।
पुत्र उवाच
तस्मात् सत्यव्रताचारः सत्ययोगपरायणः ।
सत्यागमः सदा दान्तः सत्येनैवान्तकं जयेत् ॥
अतः मनुष्यको सत्यव्रतका आचरण करना चाहिये । सत्ययोगमें तत्पर रहना और शास्त्रकी बातोंको सत्य मानकर श्रद्धापूर्वक सदा मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये । इस प्रकार सत्यके द्वारा ही मनुष्य मृत्युपर विजय पा सकता है ।
भीष्म उवाच
यः कामानाप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत् ।
प्रापणात् सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥
जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओंको पा लेता है; तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है — इन दोनोंके कार्योंमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करनेकी अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है ।
भीष्म उवाच
तस्मात् कामश्च लोभश्च तृष्णा कार्पण्यमेव च ।
त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्थो ह्यस्मि साम्प्रतम् ॥
अतः काम, लोभ, तृष्णा और कृपणताको चाहिये कि वे मोक्षकी ओर प्रस्थान करनेवाले मुझ साधकको छोड़कर चले जायँ । अब मैं सत्त्वगुणमें स्थित हो गया हूँ ।
भृगु उवाच
अविस्रम्भे न गन्तव्यं विस्रम्भे धारयेन्मनः ।
मनः प्राणे निगृह्णीयात् प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् ॥
जो विश्वासके योग्य नहीं है, उस मार्गपर न चले और जो विश्वास करनेयोग्य है, उसमें मन लगावे । मनको प्राणमें और प्राणको ब्रह्ममें स्थापित करे ।
भृगु उवाच
अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव विगर्हितः ।
अहिंसा सत्यमक्रोधः सर्वाश्रमगतं तपः ॥
किसीका अनादर करना, अहंकार दिखाना और ढोंग करना — इन दुर्गुणोंकी भी विशेष निन्दा की गयी है । किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना और मनमें क्रोध न आने देना — यह सभी आश्रमवालोंके लिये उपयोगी तप है ।
भीष्म उवाच
एक एव चरेद् धर्मं नास्ति धर्मे सहायता ।
केवलं विधिमासाद्य सहायः किं करिष्यति ॥
केवल वेदविधिका सहारा लेकर अकेले ही धर्मका आचरण करना चाहिये । उसमें सहायताकी आवश्यकता नहीं है । कोई दूसरा सहायक आकर क्या करेगा ।
भीष्म उवाच
शब्दं न विन्देच्छ्रोत्रेण स्पर्शं त्वचा न वेदयेत् ।
रूपं न चक्षुषा विद्याज्जिह्वया न रसांस्तथा ॥
प्रेयाण्यपि च सर्वाणि जह्याद् ध्यानेन योगवित् ।
पञ्चवर्गप्रमाथीनि नेच्छेच्चैतानि वीर्यवान् ॥
योगको जाननेवाले समर्थ पुरुषको चाहिये कि कानोंके द्वारा शब्द न सुने, त्वचासे स्पर्शका अनुभव न करे, आँखसे रूपको न देखे और जिह्वासे रसोंको ग्रहण न करे एवं ध्यानके द्वारा समस्त सूँघने योग्य वस्तुओंको भी त्याग दे तथा पाँचों इन्द्रियोंको मथ डालनेवाले इन विषयोंकी कभी मनसे भी इच्छा न करे ।
भीष्म उवाच
अनिर्वेदो गतक्लेशो गततन्द्रिरमत्सरी ।
समादध्यात् पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानयोगवित् ॥
ध्यानयोगको जाननेवाला साधक ऐसे विक्षेपके समय खेद या क्लेशका अनुभव न करे; अपितु आलस्य और मात्सर्यका त्याग करके ध्यानके द्वारा मनको पुनः एकाग्र करनेका प्रयत्न करे ।
भीष्म उवाच
ध्यानक्रियापरो युक्तो ध्यानवान् ध्याननिश्चयः ।
ध्याने समाधिमुत्पाद्य तदपि त्यजति क्रमात् ॥
वह ध्यानरूप क्रियामें ही नित्य तत्पर रहता है, ध्याननिष्ठ हो ध्यानके द्वारा ही तत्त्वका निश्चय कर लेता है, ध्यानमें समाधिस्थ होकर क्रमशः ध्यानरूप क्रियाका भी त्याग कर देता है ।
ब्रह्मा उवाच
महास्मृतिं पठेद् यस्तु तथैवानुस्मृतिं शुभाम् ।
तावप्येतेन विधिना गच्छेतां मत्सलोकताम् ।
यश्च योगे भवेद् भक्तः सोऽपि नास्त्यत्र संशयः ।
विधिनानेन देहान्ते मम लोकानवाप्नुयात् ।
साधये गम्यतां चैव यथास्थानानि सिद्धये ॥
ब्रह्माजीने कहा — देवताओ! जो महास्मृति तथा कल्याणमयी अनुस्मृतिका पाठ करता है, वह भी इसी विधिसे मेरा सालोक्य प्राप्त कर लेता है । जो योगका भक्त है, वह भी देहत्यागके पश्चात् इसी विधिसे मेरे लोकोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है । अब तुम सब लोग अपनी अभीष्ट सिद्धिके लिये अपने-अपने स्थानको जाओ । मैं तुम लोगों अभीष्ट साधन करता रहूँगा ।
भीष्म उवाच
एवं हि तपसा युक्तमर्कवत् तमसः परम् ।
त्रैलोक्यप्रकृतिर्देही तमसोऽन्ते महेश्वरः ॥
इस प्रकार तपस्यासे युक्त हुआ मन अज्ञानान्धकारसे ऊपर उठकर सूर्यके समान ज्ञानमय प्रकाशसे प्रकाशित होने लगता है । जीवात्मा तीनों लोकोंका कारणभूत ब्रह्म ही है । वह अज्ञान निवृत्तिके पश्चात् महेश्वर (विशुद्ध परमात्मा) रूपसे प्रतिष्ठित होता है ।
भीष्म उवाच
श्रियं दिव्यामभिप्रेप्सुर्वर्ष्मवान् मनसा शुचिः ।
शारीरैर्नियमैरुग्रैश्चरेन्निष्कल्मषं तपः ॥
जो दिव्य सम्पत्ति अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहे, उस देहधारी पुरुषको अपना मन शुद्ध रखना चाहिये और शरीरसे कठोर नियमोंका पालन करते हुए निर्दोष तपका अनुष्ठान करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
प्रकाशस्तपसो ज्ञानं लोके संशब्दितं तपः ।
रजस्तमोघ्नं यत् कर्म तपसस्तत् स्वलक्षणम् ॥
लोकमें तप शब्द विख्यात है । उस तपका फल है, ज्ञानस्वरूप प्रकाश । रजोगुण और तमोगुणका नाश करनेवाला जो निष्काम कर्म है, वही तपस्याका स्वरूपबोधक लक्षण है ।
भीष्म उवाच
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।
वाङ्मनोनियमः सम्यङ्मानसं तप उच्यते ॥
ब्रह्मचर्य और अहिंसाको शारीरिक तप कहते हैं । मन और वाणीका भलीभाँति किया हुआ संयम मानसिक तप कहलाता है ।
पञ्चशिख उवाच
त्याग एव हि सर्वेषां युक्तानामपि कर्मणाम् ।
नित्यं मिथ्याविनीतानां क्लेशो दुःखवहो मतः ॥
जो लोग मुक्तिके लिये प्रयत्नशील हों, उन सबको चाहिये कि सम्पूर्ण कर्मोंमें अहंता, ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग करे । जो इनका त्याग किये बिना ही विनीत (शाम, दम आदि साधनोंमें तत्पर) होनेका झूठा दावा करते हैं, उन्हें अविद्या आदि दुःखदायी क्लेश प्राप्त होते हैं ।
पञ्चशिख ने राजा जनक से कहा।
भीष्म उवाच
नादान्तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपपद्यते ।
क्रिया तपश्च सत्यं च दमे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
जिसने दमका पालन नहीं किया है, उसे अपने कर्मोंमें यथोचित सफलता नहीं मिलती; क्योंकि क्रिया, तप और सत्य — ये सभी दमके आधारपर ही प्रतिष्ठित होते हैं ।
दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं दम उच्यते ।
विपाप्मा निर्भयो दान्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥
‘दम’ तेजकी वृद्धि करता है । ‘दम’ परम पवित्र बताया गया है, मन और इन्द्रियोंका संयम करनेवाला पुरुष पाप और भयसे रहित होकर ‘महत्’ पदको प्राप्त कर लेता है ।
भीष्म उवाच
आश्रमेषु च सर्वेषु दम एव विशिष्यते ।
यच्च तेषु फलं धर्मे भूयो दान्ते तदुच्यते ॥
चारों आश्रमोंमें दमको ही श्रेष्ठ बताया गया है । उन सब आश्रमोंमें धर्मका पालन करनेसे जो फल मिलता है, दमनशील पुरुषको वह फल और अधिक मात्रामें उपलब्ध होता ।
भीष्म उवाच
त्यागश्च संनतिश्चैव शिष्यते तप उत्तमम् ।
सदोपवासी च भवेद् ब्रह्मचारी सदा भवेत् ॥
उनके मतमें तो त्याग और विनय ही उत्तम तप है । इनका पालन करनेवाला मनुष्य नित्य उपवासी और सदा ब्रह्मचारी है ।
प्रह्लाद उवाच
आर्जवेनाप्रमादेन प्रसादेनात्मवत्तया ।
वृद्धशुश्रूषया शक्र पुरुषो लभते महत् ॥
प्रह्लादने कहा — इन्द्र! सरलता, सावधानी, बुद्धिकी निर्मलता, चित्तकी स्थिरता तथा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेसे पुरुषको महत्-पदकी प्राप्ति होती है ।
भीष्म → युधिष्ठिर
मोक्षधर्मेषु नियतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं तत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! जो पुरुष मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर मोक्षोपयोगी धर्मोंके पालनमें संलग्न रहता है, वही प्रकृतिसे परे अविनाशी ब्रह्मपदको प्राप्त होता है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर को ब्रह्मपद प्राप्त करने के साधन बताते हुए कहा।
वासुदेव उवाच
समाधिर्नास्य कामार्थे नात्मानं स्तौति कर्हिचित् ।
अनीर्षुर्मृदुसंवादस्तस्मात् सर्वत्र पूजितः ॥
उनका मन कभी विषयभोगोंमें स्थित नहीं होता और वे कभी अपनी प्रशंसा नहीं करते हैं । किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं रखते तथा सबसे मीठे वचन बोलते हैं; इसीलिये उनका सर्वत्र आदर होता है ।
वासुदेव उवाच
कृतश्रमः कृतप्रज्ञो न च तृप्तः समाधितः ।
नित्ययुक्तोऽप्रमत्तश्च तस्मात् सर्वत्र पूजितः ॥
उन्होंने योगाभ्यासके लिये बड़ा परिश्चम किया है । उनकी बुद्धि पवित्र है । उन्हें समाधिसे कभी तृप्ति नहीं होती । वे कर्तव्य पालनके लिये सदा उद्यत रहते हैं और कभी प्रमाद नहीं करते हैं; इसीलिये सर्वत्र पूजे जाते हैं ।
व्यास उवाच
तपो निःश्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दमः ।
तेन सर्वानवाप्नोति यान् कामान् मनसेच्छति ॥
तप ही जीवके कल्याणका मुख्य साधन है । तपका मूल है शम और दम । पुरुष अपने मनसे जिन-जिन कामनाओंको पाना चाहता है, उन सबको वह तपस्यासे प्राप्त कर लेता है ।
व्यास उवाच
पञ्चभिः सततं यज्ञैः श्रद्दधानो यजेत च ।
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् ॥
सदा श्रद्धापूर्वक पञ्च-महायज्ञोंद्वारा परमात्माका पूजन करे, सर्वदा धैर्य धारण करे । प्रमाद (अकर्तव्य कर्मको करने और कर्तव्य कर्मकी अवहेलना करने) से बचे, इन्द्रियोंको संयममें रखे, धर्मका ज्ञाता बने और मनको भी अपने अधीन रखे ।
व्यास उवाच
क्रियावान् श्रद्दधानो हि दान्तः प्राज्ञोऽनसूयकः ।
धर्माधर्मविशेषज्ञः सर्वं तरति दुस्तरम् ॥
जो अपने धर्मके अनुसार कार्य करनेवाला, श्रद्धालु, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, विद्वान्, किसीके दोष न देखनेवाला तथा धर्म और अधर्मका विशेषज्ञ है, वह सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो जाता है ।
व्यास उवाच
धर्मोपस्थो ह्रीवरूथ उपायापायकूबरः ।
अपानाक्षः प्राणयुगः प्रज्ञायुर्जीवबन्धनः ॥
चेतनाबन्धुरश्चारुश्चाचारग्रहनेमिमान् ।
दर्शनस्पर्शनवहो घ्राणश्रवणवाहनः ॥
प्रज्ञानाभिः सर्वतन्त्रप्रतोदो ज्ञानसारथिः ।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितो धीरः श्रद्धादमपुरःसरः ॥
त्यागसूक्ष्मानुगः क्षेम्यः शौचगो ध्यानगोचरः ।
जीवयुक्तो रथो दिव्यो ब्रह्मलोके विराजते ॥
यह योग एक सुन्दर रथ है । धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है । लज्जा आवरण है । पूर्वोक्त उपाय और अपाय इसका कूबर है । अपानवायु धुरा है । प्राणवायु जूआ हैं । बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है । चैतन्य बन्धुर है । सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं । नेत्र, त्वचा, घ्राण और श्रवण इसके वाहन हैं । प्रज्ञा नाभि है । सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है । ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है । यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है । श्रद्धा और इन्द्रियदमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं । त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं । यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है । इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है । अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।
व्यास उवाच
नैवेच्छति न चानिच्छो यात्रामात्रव्यवस्थितः ।
अलोलुपोऽव्यथो दान्तो न कृती न निराकृतिः ।
नास्येन्द्रियमनेकाग्रं न विक्षिप्तमनोरथः ।
सर्वभूतसदृङ्मैत्रः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।
अस्पृहः सर्वकामेभ्यो ब्रह्मचर्यदृढव्रतः ।
अहिंस्रः सर्वभूतानामीदृक् सांख्यो विमुच्यते ॥
जो किसी वस्तुकी न तो इच्छा करता है, न अनिच्छा ही करता है, जीवन-निर्वाहमात्रके लिये जो कुछ मिल जाता है, उसीपर संतोष करता है, जो निर्लोभ, व्यथारहित और जितेन्द्रिय है, जिसको न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न कुछ न करनेसे ही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन कभी चंचल नहीं होते, जिसका मनोरथ पूर्ण हो गया है, जो समस्त प्राणियोंपर समान दृष्टि और मैत्रीभाव रखता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णको एक-सा समझता है, जिसकी दृष्टिमें प्रिय और अप्रियका भेद नहीं है, जो धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुतिमें सम रहता है, जो सम्पूर्ण भोगोंमें स्पृहारहित है, जो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य व्रतमें स्थित है तथा जो सब प्राणियोंमें हिंसाभावसे रहित है, ऐसा सांख्ययोगी (ज्ञानी) संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ।
व्यास उवाच
योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः ।
कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् ॥
क्रोधं शमेन जयति कामं संकल्पवर्जनात् ।
सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्रामुच्छेत्तुमर्हति ॥
विद्वानोंने योगके जो काम, क्रोध, लोभ, भय और पाँचवाँ स्वप्न — ये पाँच दोष बताये हैं उनका पूर्णतया उच्छेद करे । इनमेंसे क्रोधको शम (मनोनिग्रह) के द्वारा जीते, कामको संकल्पके त्यागद्वारा पराजित करे तथा धीर पुरुष सत्वगुणका सेवन करनेसे निद्राका उच्छेद कर सकता है ।
व्यास उवाच
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा ।
चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनोवाचं च कर्मणा ।
अप्रमादाद् भयं जह्याद् दम्भं प्राज्ञोपसेवनात् ॥
मनुष्य धैर्यका सहारा लेकर शिश्न और उदरकी रक्षा करे अर्थात् विषयभोग और भोजनकी चिन्ता दूर कर दे । नेत्रोंकी सहायतासे हाथ और पैरोंकी, मनके द्वारा नेत्र और कानोंकी तथा कर्मके द्वारा मन और वाणीकी रक्षा करे अर्थात् इनको शुद्ध बनावे । सावधानीके द्वारा भयका और विद्वान् पुरुषोंके सेवनसे दम्भका त्याग करे ।
व्यास उवाच
संनियम्येन्द्रियग्रामं कोष्ठे भाण्डमना इव ।
एकाग्रं चिन्तयेन्नित्यं योगान्नोद्वेजयेन्मनः ॥
द्रव्य चाहनेवाले मनुष्य जैसे सदा द्रव्यसमुदायको कोठेमें बाँध करके रखता है, उसी तरह योगका साधक भी इन्द्रिय-समुदायको संयममें रखकर हृदयकमलमें स्थित नित्य आत्माका एकाग्रभावसे चिन्तन करे । मनको योगसे उद्विग्न न होने दे ।
व्यास उवाच
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा स्वप्ने सुखं स्वपेत् ।
निवाते वा यथा दीपो दीप्यमानो न कम्पते ॥
मनुष्य नींदके समय जैसे सुखसे सोता है-सुषुप्तिके सुखका अनुभव करता है, अथवा जैसे वायुरहित स्थानमें जलता हुआ दीपक कम्पित नहीं होता, एकतार जला करता है, उसी प्रकार मन कभी चंचल न हो, यही उसके प्रसादका अर्थात् परम शुद्धिका लक्षण है ।
व्यास उवाच
एतद् वै जन्मसामर्थ्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
आत्मज्ञानं शमश्चैव पर्याप्तं तत्परायणम् ॥
विशेषरूपसे ब्राह्मणमें और समानभावसे मनुष्यमात्रमें इस ज्ञानको प्राप्त करनेकी जन्मसिद्ध शक्ति है । मन और इन्द्रियोंका संयम तथा आत्मज्ञान मोक्ष-प्राप्तिके लिये पर्याप्त साधन है ।
व्यास उवाच
मनसश्चेन्द्रियाणां चाप्यैकाग्र्यं परमं तपः ।
तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर उच्यते ॥
मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही सबसे बड़ी तपस्या है । यही सब धर्मोंसे श्रेष्ठतम परम धर्म बताया जाता है ।
व्यास उवाच
वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः ।
दमस्योपनिषद् दानं दानस्योपनिषत् तपः ॥
वेदका सार है सत्य वचन, सत्यका सार है इन्द्रियोंका संयम, संयमका सार है दान और दानका सार है तपस्या ।
कपिल उवाच
आनृशंस्यं क्षमा शान्तिरहिंसा सत्यमार्जवम् ।
अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा शमस्तथा ॥
पन्थानो ब्रह्मणस्त्वेते एतैः प्राप्नोति यत्परम् ।
तद् विद्वाननुबुध्येत मनसा कर्मनिश्चयम् ॥
समस्त प्राणियोंपर दया, क्षमा, शान्ति, अहिंसा, सत्य, सरलता, अद्रोह, निरभिमानता, लज्जा, तितिक्षा और शम — ये परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके मार्ग हैं । इनके द्वारा पुरुष परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार विद्वान् पुरुषको मनके द्वारा कर्मके वास्तविक परिणामका निश्चय समझना चाहिये ।
भीष्म उवाच
योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः ।
कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् ।
परित्यज्य निषेवेत यतवाग् योगसाधनान् ॥
काम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा — ये ही योगसम्बन्धी वे पाँच दोष हैं, जिनको विद्वान् पुरुष जानते हैं । इनका मूलोच्छेद कर देना चाहिये तथा इनका परित्याग करके वाणीको संयममें रखते हुए योगसाधनोंका सेवन करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
अमूढत्वमसंगित्वं कामक्रोधविवर्जनम् ।
अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थितिः ॥
एष मार्गों हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमलः शुचिः ।
तथा वाक्कायमनसां नियमः कामतोऽन्यथा ॥
मूढता और आसक्तिका अभाव, काम और क्रोधका त्याग एवं दीनता, उद्दण्डता तथा उद्वेगसे रहित होना और चित्तकी स्थिरता एवं निष्कामभावसे मन, वाणी और इन्द्रियोंका संयम — यह मोक्षका स्वच्छ, निर्मल एवं पवित्र मार्ग है ।
भीष्म उवाच
नित्यतृप्तः सुसंतुष्टः प्रसन्नवदनेन्द्रियः ।
विभीर्जप्यपरो मौनी वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
सर्वदा तृप्त और संतुष्ट रहे । मुख और इन्द्रियोंको प्रसन्न रखे । भयको पास न आने दे । प्रणव आदिका जप करता रहे तथा वैराग्यका आश्रय ले मौन रहे ।
उशना उवाच
नैष ज्ञानवता शक्यस्तपसा नैव चेज्यया ।
सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणां तु संयमेनैव शक्यते ॥
समस्त प्राणी इन्हींमें लयको प्राप्त होते हैं और इन्हींसे प्रकट भी होते हैं । इन्हें कोई शास्त्रज्ञान, तपस्या और यज्ञके द्वारा भी नहीं पा सकता । केवल इन्द्रियोंके संयमसे ही उनकी उपलब्धि हो सकती है ।
अपूर्वं सर्वतोभद्रं सर्वतोमुखमव्ययम् ।
अब्दैर्दशाहसंयुक्तं गूढमप्राज्ञनिन्दितम् ।
वर्णाश्रमकृतैर्धर्मैर्विपरीतं क्वचित्समम् ।
गतान्तैरध्यवसितमत्याश्रममिदं व्रतम् ।
मया पाशुपतं दक्ष शुभमुत्पादितं पुरा ।
तस्य चीर्णस्य तत् सम्यक् फलं भवति पुष्कलम् ।
तच्चास्तु ते महाभाग त्यज्यतां मानसो ज्वरः ॥
‘दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो अपूर्व है । साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी (सभी वर्गों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है । वर्षोंतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी उपलब्धि होती है । वह गूढ़ है । मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं । वह समस्त वर्णधर्म और आश्रम-धर्मके अनुकूल, सम और किसी-किसी अंशमें विपरीत भी है । जिन्हें सिद्धान्तका ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है । यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है । इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है । महाभाग! उस पाशुपत व्रतके अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो । अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो’
पराशर → राजन
संचिन्त्य मनसा राजन् विदित्वा शक्यमात्मनः ।
करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ॥
राजन्! जो मनुष्य मनसे खूब सोच-विचारकर, ‘अमुक काम मुझसे हो सकेगा या नहीं’ — इसका निश्चय करके शुभकर्मका अनुष्ठान करता है, वह अवश्य ही अपनी भलाई देखता है ।
पराशर उवाच
नाप्राप्यं तपसः किंचित् त्रैलोक्येऽपि परंतप ।
उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ॥
परंतप! त्रिलोकीमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो तपस्यासे प्राप्त न हो सके; किंतु जिन्होंने काम्य अथवा निषिद्ध कर्म नहीं किये हैं, उनकी तपस्याका फल सुखभोगोंका परित्याग ही है ।
पराशर उवाच
वीतरागो जितक्रोधः सम्यग् भवति यः सदा ।
विषये वर्तमानोऽपि न स पापेन युज्यते ॥
परंतु जो वीतराग होकर क्रोधको जीत लेता और नित्य सदाचारका पालन करता है, वह विषयोंमें वर्तमान रहकर भी पापकर्मसे सम्बन्ध नहीं जोड़ता है ।
हंस उवाच
इदं कार्यममृताशाः शृणोमि ।
तपो दमः सत्यमात्माभिगुप्तिः ।
ग्रन्थीन् विमुच्य हृदयस्य सर्वान् ।
प्रियाप्रिये स्वं वशमानयीत ॥
हंसने कहा — अमृतभोजी देवताओ! मैं तो सुनता हूँ कि तप, इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण और मनोनिग्रह आदि कार्य ही सबसे उत्तम हैं । हदयकी सारी गाँठें खोलकर प्रिय और अप्रियको अपने वशमें करे अर्थात् उनके लिये हर्ष एवं विषाद न करे ।
हंस उवाच
नाहं शप्तः प्रतिशपामि कंचिद् ।
दमं द्वारं ह्यमृतस्येह वेद्मि ।
गुह्यं ब्रह्म तदिदं वो ब्रवीमि ।
न मानुषाच्छ्रेष्ठतरं हि किंचित् ॥
कोई मुझे शाप दे दे तो भी मैं बदलेमें उसे शाप नहीं देता । इन्द्रियसंयमको ही मोक्षका द्वार मानता हूँ । इस समय तुमलोगोंको एक बहुत गुप्त बात बता रहा हूँ, सुनो । मनुष्ययोनिसे बढ़कर कोई उत्तम योनि नहीं है ।
हंस उवाच
यस्य वाङ्मनसी गुप्ते सम्यक् प्रणिहिते सदा ।
वेदास्तपश्च त्यागश्च स इदं सर्वमाप्नुयात् ॥
जिसकी वाणी और मन सुरक्षित होकर सदा सब प्रकारसे परमात्मामें लगे रहते हैं, वह वेदाध्ययन, तप और त्याग — इन सबके फलको पा लेता है ।
हंस उवाच
सत्यं दमं ह्यार्जवमानृशंस्यं ।
धृतिं तितिक्षामतिसेवमानः ।
स्वाध्यायनित्योऽस्पृहयन् परेषामेकान्तशील्यूर्ध्वगतिर्भवेत् सः ॥
जो सत्य, इन्द्रिय-संयम, सरलता, दया, धैर्य और क्षमाका अधिक सेवन करता है, सदा स्वाध्यायमें लगा रहता है, दूसरेकी वस्तु नहीं लेना चाहता तथा एकान्तमें निवास करता है, वह ऊर्ध्वगतिको प्राप्त होता है ।
भीष्म → युधिष्ठिर
रागं मोहं तथा स्नेहं कामं क्रोधं च केवलम् ।
योगाच्छित्त्वा ततो दोषान् पञ्चैतान् प्राप्नुवन्ति तत् ॥
भीष्मजी ने कहा — युधिष्ठिर! योगी पुरुष केवल योगबलसे राग, मोह, स्नेह, काम और क्रोध — इन पाँच दोषोंका मूलोच्छेद करके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ।
भीष्म उवाच
नाभ्यां कण्ठे च शीर्ष च हृदि वक्षसि पार्श्वयोः ।
दर्शने श्रवणे चापि घ्राणे चामितविक्रम ॥
स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहितः ।
आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युङ्क्ते सम्यग्विशाम्पते ॥
स शीघ्रमचलप्रख्यं कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम् ।
उत्तमं योगमास्थाय यदीच्छति विमुच्यते ॥
अमित पराक्रमी नरेश! योगके महान् व्रतमें एकाग्रचित्त रहनेवाला जो योगी नाभि, कण्ठ, मस्तक, हृदय, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग, नेत्र, कान और नासिका आदि स्थानोंमें धारणाके द्वारा सूक्ष्म आत्माको परमात्माके साथ भलीभाँति संयुक्त करता है, वह यदि इच्छा करे तो अपने पर्वताकार विशाल शुभाशुभ कर्मोंको शीघ्र ही भस्म करके उत्तम योगका आश्रय लेकर मुक्त हो जाता है ।
भीष्म उवाच
यथा कश्चिद् वनं घोरं बहुसर्पसरीसृपम् ।
श्वभ्रवत् तोयहीनं च दुर्गमें बहुकण्टकम् ॥
अभक्तमटवीप्रायं दावदग्धमहीरुहम् ।
पन्थानं तस्कराकीर्णं क्षेमेणाभिपतेद् युवा ॥
योगमार्गं तथाऽऽसाद्य यः कश्चिद् व्रजते द्विजः ।
क्षेमेणोपरमेन्मार्गाद् बहुदोषो हि स स्मृतः ॥
जैसे कोई-कोई बिरला नवयुवक ही अनेकानेक सर्पों तथा विच्छू आदिसे भरे हुए गड्ढ़ों और बहुत-से काँटोंवाले, जलशून्य, दुर्गम एवं घोर वनमें सकुशल यात्रा कर सकता है तथा जहाँ भोजन मिलना असम्भव है, जिसमें प्रायः जंगल-ही-जंगल पड़ता है, जहाँके वृक्ष दावानलसे जलकर भस्म हो गये हैं तथा जो चोर डाकुओंसे भरा हुआ है, ऐसे मार्गको सकुशल तै कर सकता है; उसी प्रकार योगमार्गका आश्रय लेकर कोई बिरला ही द्विज उसपर कुशलपूर्वक चल पाता है, क्योंकि वह बहुत-से दोषों (कठिनाइयों)-से भरा हुआ बताया गया है ।
भीष्म उवाच
यस्तु तिष्ठति कौन्तेय धारणासु यथाविधि ।
मरणं जन्म दुःखं च सुखं च स विमुञ्चति ॥
कुन्तीनन्दन! जो विधिपूर्वक योगकी धारणाओंमें स्थिर रहता है, वह जन्म, मृत्यु, दुःख और सुखके बन्धनोंसे छुटकारा पा जाता है ।
भीष्म उवाच
इन्द्रियाण्येव बुध्यन्ते स्वदेहे देहिनां नृप ।
कारणान्यात्मनस्तानि सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः ॥
नरेश्वर! देहधारियोंके अपने-अपने शरीरमें जो इन्द्रियाँ हैं, वे ही विशेष-विशेष विषयोंको देखती या अनुभव करती हैं; वे ही आत्माको विभिन्न ज्ञान करानेमें कारण हैं; क्योंकि वह सूक्ष्म आत्मा उन इन्द्रियोंद्वारा ही बाह्य विषयोंका दर्शन या प्रकाशन करता है (मुक्तावस्थामें मन और इन्द्रियोंसे सम्बन्ध न रहनेके कारण ही उसमें इन्द्रियजनित विशेष ज्ञानका अभाव देखा जाता है)
भीष्म → राजन
शमश्च दृष्टः परमं बलं च ।
ज्ञानं च सूक्ष्मं च यथावदुक्तम् ।
तपांसि सूक्ष्माणि सुखानि चैव ।
सांख्ये यथावद् विहितानि राजन् ॥
राजन्! प्रत्यक्ष प्राप्त मन और इन्द्रियोंका संयम, उत्तम बल, सूक्ष्मज्ञान तथा परिणाममें सुख देनेवाले जो सूक्ष्म तप बतलाये गये हैं, उन सबका सांख्यशास्त्रमें यथावत् वर्णन किया गया है ।
वसिष्ठ उवाच
योगकृत्यं तु योगानां ध्यानमेव परं बलम् ।
तच्चापि द्विविधं ध्यानमाहुर्विद्याविदो जनाः ॥
एकाग्रता च मनसः प्राणायामस्तथैव च ।
प्राणायामस्तु सगुणो निर्गुणो मनसस्तथा ॥
योगियोंके लिये प्रधान कर्तव्य है ध्यान । वही उनका परम बल है । योगके विद्वान् उस ध्यानको दो प्रकारका बतलाते हैं-एक तो मनकी एकाग्रता और दूसरा प्राणायाम । प्राणायामके भी दो भेद हैं-सगुण और निर्गुण । इनमेंसे जिस प्राणायाममें मनका सम्बन्ध सगुणके साथ रहता है, वह सगुण प्राणायाम है और जिसमें मनका सम्बन्ध निर्गुणके साथ रहता है, वह निर्गुण प्राणायाम है ।
वसिष्ठ उवाच
मूत्रोत्सर्गपुरीषे च भोजने च नराधिप ।
त्रिकालं नाभियुञ्जीत शेषं युञ्जीत तत्परः ॥
नरेश्वर! मलत्याग, मूत्रत्याग और भोजन — इन तीन कार्योंमें जो समय लगता है, उसमें योगका अभ्यास न करे । शेष समयमें तत्परतापूर्वक योगका अभ्यास करना चाहिये ।
वसिष्ठ → राजन
नावेदनिष्ठस्य जनस्य राजन् ।
प्रदेयमेतत् परमं त्वया भवेत् ।
विधित्समानाय विबोधकारण ।
प्रबोधहेतोः प्रणतस्य शासनम् ॥
राजन्! जो मनुष्य वेदमें श्रद्धा रखनेवाला न हो, उसे इस उत्तम ज्ञानका उपदेश तुम्हें नहीं करना चाहिये । जिसे बोधके लिये अधिक प्यास हो तथा जो जिज्ञासुभावसे शरणमें आया हो, वही इस उपदेशको सुननेका अधिकारी है ।
ऋषि उवाच
मनोवाक्कायिके धर्मे कुरु श्रद्धां समाहितः ।
निवृत्तौ वा प्रवृत्तौ वा सम्प्रधार्य गुणागुणान् ॥
पहले निवृत्ति और प्रवृत्ति-मार्गमें जो गुण-अवगुण हैं, उनका तुम अच्छी तरह निश्चय कर लो; फिर एकाग्रचित्त हो मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले धर्ममें श्रद्धा करो (अर्थात् श्रद्धापूर्वक धर्मके पालनमें लग जाओ)
नारद उवाच
नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात् ।
विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह सदा तपको क्रोधसे, लक्ष्मीको डाहसे, विद्याको मानापमानसे और अपने-आपको प्रमादसे बचावे ।
नारद उवाच
न तु योगमृते शक्या प्राप्तुं सा परमा गतिः ।
अवबन्धो हि बुद्धस्य कर्मभिर्नोपपद्यते ॥
परंतु योगके बिना उस परम गतिको नहीं प्राप्त किया जा सकता । बुद्धिमान्का कर्मोंके निकृष्ट बन्धनसे बँधा रहना उचित नहीं है ।
समाहितमनस्काश्च नियताः संयतेन्द्रियाः ।
एकान्तभावोपगता वासुदेवं विशन्ति ते ॥
जिन्होंने अपने मनको एकाग्र कर लिया है, जो शौच संतोष आदि नियमोंसे सम्पन्न और जितेन्द्रिय हैं, वे अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें गये हुए भक्त साक्षात् वासुदेवमें प्रवेश करते हैं ।
ब्रह्मा उवाच
हित्वा गुणमयं सर्वं कर्म हित्वा शुभाशुभम् ।
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा एवं भवति निर्गुणः ॥
देह, इन्द्रिय आदि समस्त गुणमय पदार्थोंकी ममता छोड़कर शुभाशुभ कर्मको त्यागकर तथा सत्य और मिथ्या दोनोंका परित्याग करके ही कोई साधक निर्गुण हो सकता है ।