श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

भक्ति

प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध

232 पद्य

श्रीरामचरितमानस

प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी । तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी ॥

हरि हर पद रति मति न कुतरकी । तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की ॥

जिन्हें न तो प्रभुके चरणोंमें प्रेम है और न अच्छी समझ ही है, उनको यह कथा सुननेमें फीकी लगेगी । जिनकी श्रीहरि (भगवान् विष्णु) और श्रीहर (भगवान् शिव) के चरणोंमें प्रीति है और जिनकी बुद्धि कुतर्क करनेवाली नहीं है [जो श्रीहरि-हरमें भेदकी या ऊँच-नीचकी कल्पना नहीं करते], उन्हें श्रीरघुनाथजीकी यह कथा मीठी लगेगी ।

बालकाण्ड, चौपाई 9.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 31 ज्ञान–विवेक

गई बहोर गरीब नेवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू ॥

बुध बरनहिं हरि जस अस जानी । करहिं पुनीत सुफल निज बानी ॥

वे प्रभु श्रीरघुनाथजी गयी हुई वस्तुको फिर प्राप्त करानेवाले, गरीबनिवाज (दीनबन्धु), सरलस्वभाव, सर्वशक्तिमान् और सबके स्वामी हैं । यही समझकर बुद्धिमान् लोग उन श्रीहरिका यश वर्णन करके अपनी वाणीको पवित्र और उत्तम फल (मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम) देनेवाली बनाते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 13.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 36
रामनाम की महिमा

बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ॥

राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥

श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और ‘राम’ नामके दो सुन्दर अक्षर सावन-भादोंके महीने हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 19 श्रीरामचरितमानस पृ. 43 नाम महिमा

समुझत सरिस नाम अरु नामी । प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी ॥

नाम रूप दुइ ईस उपाधी । अकथ अनादि सुसामुझि साधी ॥

समझनेमें नाम और नामी दोनों एक-से हैं, किन्तु दोनोंमें परस्पर स्वामी और सेवकके समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामीमें पूर्ण एकता होनेपर भी जैसे स्वामीके पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नामके पीछे नामी चलते हैं । प्रभु श्रीरामजी अपने ‘राम’ नामका ही अनुगमन करते हैं, नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं) । नाम और रूप दोनों ईश्वरकी उपाधि हैं; ये (भगवान्के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुन्दर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धिसे ही इनका [दिव्य अविनाशी] स्वरूप जाननेमें आता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 21.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 45 ज्ञान–विवेक
नामजप की महिमा

जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ॥

राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृती चारिउ अनघ उदारा ॥

[संकटसे घबराये हुए] आर्त भक्त नामजप करते हैं तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं । जगत्में चार प्रकारके (- अर्थार्थी-धनादिकी चाहसे भजनेवाले, - आर्त — संकटकी निवृत्तिके लिये भजनेवाले, -जिज्ञासु — भगवान्‌को जाननेकी इच्छासे भजनेवाले, ४-ज्ञानी-भगवान्‌को तत्त्वसे जानकर स्वाभाविक ही प्रेमसे भजनेवाले) रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 22.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 46
नाम की महिमा

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार ॥

कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार ॥

इस प्रकार निर्गुणसे नामका प्रभाव अत्यन्त बड़ा है । अब अपने विचारके अनुसार कहता हूँ कि नाम [सगुण] रामसे भी बड़ा है ।

बालकाण्ड, दोहा 23 श्रीरामचरितमानस पृ. 47 नाम महिमा
श्रीराम की उदारता

प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आप समान ॥

तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥

प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी) तो वृक्षके नीचे और बंदर डालीपर (अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ोंकी शाखाओंपर कूदनेवाले बंदर) । परन्तु ऐसे बंदरोंको भी उन्होंने अपने समान बना लिया । तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 29(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 53 सेवा–करुणा–विनय

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि । रामकथा कलि कलुष बिभंजनि ॥

रामकथा कलि पंनग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ॥

रामकथा पण्डितोंको विश्राम देनेवाली, सब मनुष्योंको प्रसन्न करनेवाली और कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली है । रामकथा कलियुगरूपी साँपके लिये मोरनी है और विवेकरूपी अग्निके प्रकट करनेके लिये अरणि (मन्थन की जानेवाली लकड़ी) है, (अर्थात् इस कथासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है)

बालकाण्ड, चौपाई 31.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 55 ज्ञान–विवेक

असुर सेन सम नरक निकंदिनि । साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि ॥

संत समाज पयोधि रमा सी । बिस्व भार भर अचल छमा सी ॥

यह रामकथा असुरोंकी सेनाके समान नरकोंका नाश करनेवाली और साधुरूप देवताओंके कुलका हित करनेवाली पार्वती (दुर्गा) है । यह संत-समाजरूपी क्षीरसमुद्रके लिये लक्ष्मीजीके समान है और सम्पूर्ण विश्वका भार उठानेमें अचल पृथ्वीके समान है ।

बालकाण्ड, चौपाई 31.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 55
मन्त्र और महामणि की महिमा

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥

हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥

विषयरूपी साँपका जहर उतारनेके लिये मन्त्र और महामणि हैं । ये ललाटपर लिखे हुए कठिनतासे मिटनेवाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं । अज्ञानरूपी अन्धकारके हरण करनेके लिये सूर्यकिरणोंके समान और सेवकरूपी धानके पालन करनेमें मेघके समान हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 32(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 57 साधना–योग ज्ञान–विवेक
सगुण लीला और प्रेम भक्ति

लीला सगुन जो कहहिं बखानी । सोइ स्वच्छता करइ मल हानी ॥

प्रेम भगति जो बरनि न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥

सगुण लीलाका जो विस्तारसे वर्णन करते हैं, वही राम-सुयशरूपी जलकी निर्मलता है, जो मलका नाश करती है; और जिस प्रेमाभक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जलकी मधुरता और सुन्दर शीतलता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 36.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 60 लीला–रहस्य

ते नर यह सर तजहिं न काऊ । जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ ॥

जो नहाइ चह एहिं सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई ॥

जिनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवरको कभी नहीं छोड़ते । हे भाई! जो इस सरोवरमें स्नान करना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे ।

बालकाण्ड, चौपाई 39.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 64 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

जुग बिच भगति देवधुनि धारा । सोहति सहित सुबिरति बिचारा ॥

त्रिविध ताप त्रासक तिमुहानी । राम सरूप सिंधु समुहानी ॥

दोनोंके बीचमें भक्तिरूपी गङ्गाजीकी धारा ज्ञान और वैराग्यके सहित शोभित हो रही है । ऐसी तीनों तापोंको डरानेवाली यह तिमुहानी नदी रामस्वरूपरूपी समुद्रकी ओर जा रही है ।

बालकाण्ड, चौपाई 40.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 65 ज्ञान–विवेक
ईश्वरीय विधान की स्वीकार्यता

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥

अस कहि लगे जपन हरिनामा । गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥

जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा । तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे । [मनमें] ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुखके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ।

सतीजी को राम की परीक्षा लेने से रोक न पाकर शिवजी ने मन ही मन ऐसा कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 52.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 75 शरणागति कर्म–प्रारब्ध
निन्दा का प्रतिकार

संत संभु श्रीपति अपबादा । सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा ॥

काटिअ तासु जीभ जो बसाई । श्रवन मूदि न त चलिअ पराई ॥

जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान्‌की निन्दा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निन्दा करनेवाले) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूँदकर जगदातमावहाँसे भाग जाय ।

सतीजी ने सभा को सम्बोधित करते हुए शिवजी की निन्दा करने वालों के लिए यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 64.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 85 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

बर दायक प्रनतारति भंजन । कृपासिंधु सेवक मन रंजन ॥

इच्छित फल बिनु सिव अवराधें । लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥

शिवजी वर देनेवाले, शरणागतोंके दुःखोंका नाश करनेवाले, कृपाके समुद्र और सेवकोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हैं । शिवजीकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप करनेपर भी वाञ्छित फल नहीं मिलता ।

बालकाण्ड, चौपाई 70.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 90 शरणागति

बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतू ॥

कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी । तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥

कृपाके समुद्र शिवजी बोले — हे देवताओ! कहिये, आप किसलिये आये हैं? ब्रह्माजीने कहा — हे प्रभो! आप अन्तर्यामी हैं, तथापि हे स्वामी! भक्तिवश मैं आपसे विनती करता हूँ ।

बालकाण्ड, चौपाई 88.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 105 शरणागति
रामभक्त का लक्षण

सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं । रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं ॥

बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू ॥

शिवजीके चरणकमलोंमें जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्रीरामचन्द्रजीको स्वप्नमें भी अच्छे नहीं लगते । विश्वनाथ श्रीशिवजीके चरणोंमें निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्तका लक्षण है ।

मुनि याज्ञवल्क्य ने मुनि भरद्वाज से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 104.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 120 ज्ञान–विवेक
परमेश्वर का स्वरूप

प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू । जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥

राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्ब रहित सब उर पुर बासी ॥

हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने पहले आपसे पूछी थी, वही कहिये । [यह सत्य है कि] श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्म हैं, चिन्मय (ज्ञानस्वरूप) हैं, अविनाशी हैं, सबसे रहित और सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करनेवाले हैं ।

पार्वतीजी ने शिवजी से अपना पहला प्रश्न फिर पूछा।

बालकाण्ड, चौपाई 120(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 134 लीला–रहस्य ज्ञान–विवेक
रघुपथ की महिमा

कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु ॥

भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद ॥

[याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—] हे भरद्वाज! मैं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथा कहता हूँ, तुम आदरसे सुनो । तुलसीदासजी कहते हैं — मान और मदको छोड़कर आवागमनका नाश करनेवाले रघुनाथजीको भजो ।

याज्ञवल्क्यजी ने भरद्वाज जी से श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की कथा सुनाते हुए कहा।

बालकाण्ड, सोरठा 124(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 138

रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान ॥

तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान ॥

भगवान् रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले — हे मुनिराज! आपका स्मरण करनेसे दूसरोंके मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं [फिर आपके लिये तो कहना ही क्या है?] ।

बालकाण्ड, दोहा 128 श्रीरामचरितमानस पृ. 141 ज्ञान–विवेक
शिवनाम का जप

जपहु जाइ संकर सत नामा । होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा ॥

कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें । असि परतीति तजहु जनि भोरें ॥

[भगवान्ने कहा—] जाकर शङ्करजीके शतनामका जप करो, इससे हृदयमें तुरंत शान्ति होगी । शिवजीके समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वासको भूलकर भी न छोड़ना ।

भगवान् विष्णु ने नारद मुनि से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 138.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 149 नाम महिमा

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी । सो न पाव मुनि भगति हमारी ॥

अस उर धरि महि बिचरहु जाई । अब न तुम्हहि माया निअराई ॥

हे मुनि! पुरारि (शिवजी) जिसपर कृपा नहीं करते, वह मेरी भक्ति नहीं पाता । हृदयमें ऐसा निश्चय करके जाकर पृथ्वीपर विचरो । अब मेरी माया तुम्हारे निकट नहीं आवेगी ।

बालकाण्ड, चौपाई 138.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 149 ज्ञान–विवेक
ईश्वरीय माया का प्रभाव

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल ॥

अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥

देवता, मनुष्य और मुनियोंमें ऐसा कोई नहीं है जिसे भगवान्‌की महान् बलवती माया मोहित न कर दे । मनमें ऐसा विचारकर उस महामायाके स्वामी (प्रेरक) श्रीभगवान्‌का भजन करना चाहिये ।

शिवजी पार्वती से कहते हैं।

बालकाण्ड, सोरठा 140 श्रीरामचरितमानस पृ. 151 माया–संसार
भक्तिहीन जीवन का शोक

होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन ॥

हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु ॥

घरमें रहते बुढ़ापा आ गया, परन्तु विषयोंसे वैराग्य नहीं होता; [इस बातको सोचकर] उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीहरिकी भक्ति बिना जन्म यों ही चला गया ।

स्वायम्भुव मनुजी ने घर में रहते बुढ़ापा आने पर विषयों से वैराग्य न होने और हरि भक्ति के बिना जन्म बीत जाने पर दुःख व्यक्त किया।

बालकाण्ड, सोरठा 142 श्रीरामचरितमानस पृ. 152 वैराग्य

उर अभिलाष निरंतर होई । देखिअ नयन परम प्रभु सोई ॥

अगुन अखंड अनंत अनादी । जेहि चिंतहिं परमारथबादी ॥

हृदयमें निरन्तर यही अभिलाषा हुआ करती कि हम [कैसे] उन परम प्रभुको आँखोंसे देखें, जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी (ब्रह्मज्ञानी, तत्त्ववेत्ता) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 144.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 154 ज्ञान–विवेक
ईश्वर की महिमा

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू । बिधि हरि हर बंदित पद रेनू ॥

सेवत सुलभ सकल सुखदायक । प्रनतपाल सचराचर नायक ॥

हे प्रभो! सुनिये, आप सेवकोंके लिये कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं । आपकी चरण-रजकी ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी भी वन्दना करते हैं । आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं । आप शरणागतके रक्षक और जड-चेतनके स्वामी हैं ।

मनुजी ने प्रेमपूर्वक भगवान से यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 146.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 155 शरणागति

प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई । जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई ॥

तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी । ब्रह्म सकल उर अंतरजामी ॥

परन्तु हे प्रभु! बहुत ढिठाई हो रही है, यद्यपि हे भक्तोंका हित करनेवाले! वह ढिठाई भी आपको अच्छी ही लगती है । आप ब्रह्मा आदिके भी पिता (उत्पन्न करनेवाले), जगत्के स्वामी और सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले ब्रह्म हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 150.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 159 ज्ञान–विवेक

सुत बिषइक तव पद रति होऊ । मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ ॥

मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना । मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना ॥

आपके चरणोंमें मेरी वैसी ही प्रीति हो जैसी पुत्रके लिये पिताकी होती है, चाहे मुझे कोई बड़ा भारी मूर्ख ही क्यों न कहे । जैसे मणिके बिना साँप और जलके बिना मछली [नहीं रह सकती], वैसे ही मेरा जीवन आपके अधीन रहे (आपके बिना न रह सके)

बालकाण्ड, चौपाई 151.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 159 शरणागति

हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना । भूप बिबेकी परम सुजाना ॥

करइ जे धरम करम मन बानी । बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी ॥

[राजाके] हृदयमें किसी फलकी टोह (कामना) न थी । राजा बड़ा ही बुद्धिमान् और ज्ञानी था । वह ज्ञानी राजा कर्म, मन और वाणीसे जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान् वासुदेवके अर्पित करके करता था ।

बालकाण्ड, चौपाई 156.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 163 ज्ञान–विवेक
अकिञ्चनता की महिमा

तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें । परम अकिंचन प्रिय हरि केरें ॥

तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा । होत बिरंचि सिवहि संदेहा ॥

इसीसे तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिञ्चन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान्‌को प्रिय होते हैं । आप-सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनोंको देखकर ब्रह्मा और शिवजीको भी सन्देह हो जाता है [कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी] ।

कपट-तपस्वी ने राजा से कहा कि वह निर्धन और घर-द्वारहीन है।

बालकाण्ड, चौपाई 161(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 167 वैराग्य
ईश्वर की सर्वव्यापकता

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना । प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥

देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥

मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान् सब जगह समान रूपसे व्यापक हैं, प्रेमसे वे प्रकट हो जाते हैं । देश, काल, दिशा, विदिशामें बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों ।

शिवजी ने पार्वतीजी से कहा कि देवताओं की सभा में उन्होंने यह बात कही थी।

बालकाण्ड, चौपाई 185.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 188 ज्ञान–विवेक लीला–रहस्य
परमेश्वर की व्यापकता

अग जगमय सब रहित बिरागी । प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ॥

मोर बचन सब के मन माना । साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥

वे चराचरमय (चराचरमें व्याप्त) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है); वे प्रेमसे प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि । (अग्नि अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिये अरणिमन्थनादि साधन किये जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है । इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान् भी प्रेमसे प्रकट होते हैं ।) मेरी बात सबको प्रिय लगी । ब्रह्माजीने ‘साधु, साधु’ कहकर बड़ाई की ।

शिवजी ने पार्वतीजी को देवताओं की सभा में कही अपनी बात सुनायी।

बालकाण्ड, चौपाई 185.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 188 वैराग्य

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता ॥

गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता ॥

पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई ॥

जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥

हे देवताओंके स्वामी, सेवकोंको सुख देनेवाले, शरणागतकी रक्षा करनेवाले भगवान्! आपकी जय हो! जय हो!! हे गो-ब्राह्मणोंका हित करनेवाले, असुरोंका विनाश करनेवाले, समुद्रकी कन्या (श्रीलक्ष्मीजी) के प्रिय स्वामी! आपकी जय हो । हे देवता और पृथ्वीका पालन करनेवाले! आपकी लीला अद्भुत है,उसका भेद कोई नहीं जानता । ऐसे जो स्वभावसे ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हमपर कृपा करें ।

बालकाण्ड, छन्द 187.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 188 शरणागति

बारेहि ते निज हित पति जानी । लछिमन राम चरन रति मानी ॥

भरत सत्रुहन दूनउ भाई । प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई ॥

बचपनसे ही श्रीरामचन्द्रजीको अपना परम हितैषी स्वामी जानकर लक्ष्मणजीने उनके चरणोंमें प्रीति जोड़ ली । भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंमें स्वामी और सेवककी जिस प्रीतिकी प्रशंसा है वैसी प्रीति हो गयी ।

बालकाण्ड, चौपाई 198.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 199 शरणागति
माया और भक्ति का प्रभाव

देखी माया सब बिधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ॥

देखा जीव नचावइनचावइ जाहीजाही ।। देखीदेखी भगति जो छोरइ ताही ॥

सब प्रकारसे बलवती मायाको देखा कि वह [भगवान्के सामने] अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है । जीवको देखा, जिसे वह माया नचाती है और [फिर] भक्तिको देखा, जो उस जीवको [मायासे] छुड़ा देती है ।

श्रीहरि ने माता को अपना अखण्ड अद्भुत रूप दिखलाया।

बालकाण्ड, चौपाई 202.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 203 माया–संसार

देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान ॥

धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान ॥

हे राजन्! प्रसन्न मनसे इनको दो, मोह और अज्ञानको छोड़ दो । हे स्वामी! इससे तुमको धर्म और सुयशकी प्राप्ति होगी और इनका परम कल्याण होगा ।

बालकाण्ड, दोहा 207 श्रीरामचरितमानस पृ. 208 धर्म–आचरण
परम कृपालु प्रभु

अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल ॥

तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऐसे दीनबन्धु और बिना ही कारण दया करनेवाले हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ [मन]! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हींका भजन कर ।

बालकाण्ड, दोहा 211 श्रीरामचरितमानस पृ. 212 शरणागति

इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि । कहि न जाइ मन भाव सुहावनि ॥

सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू । ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू ॥

इनकी आपसकी प्रीति बड़ी पवित्र और सुहावनी है, वह मनको बहुत भाती है, पर [वाणीसे] कही नहीं जा सकती । विदेह (जनकजी) आनन्दित होकर कहते हैं — हे नाथ! सुनिये, ब्रह्म और जीवकी तरह इनमें स्वाभाविक प्रेम है ।

बालकाण्ड, चौपाई 217.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 217
देवी की स्तुति

सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायनी पुरारिपुरारि पिआरी ॥

देबि पूजि पद कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ॥

हे [भक्तोंको मुँहमाँगा] वर देनेवाली! हे त्रिपुरके शत्रु शिवजीकी प्रिय पत्नी! आपकी सेवा करनेसे चारों फल सुलभ हो जाते हैं । हे देवि! आपके चरणकमलोंकी पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं ।

जानकीजी ने देवी के चरण पकड़ लिए।

बालकाण्ड, चौपाई 236.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 232 सेवा–करुणा–विनय
भक्ति और विनय का फल

बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥

सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ । बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ॥

सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहि मन कामना तुम्हारी ॥

नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ॥

गिरिजाजी सीताजीके विनय और प्रेमके वशमें हो गयीं । उन (के गले) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुसकरायी । सीताजीने आदरपूर्वक उस प्रसाद (माला) को सिरपर धारण किया । गौरीजीका हृदय हर्षसे भर गया और वे बोलीं, हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मन:कामना पूरी होगी । नारदजीका वचन सदा पवित्र (संशय, भ्रम आदि दोषोंसे रहित) और सत्य है । जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा ।

पुष्पवाटिका में गौरी-पूजन के समय सीताजी की विनय से प्रसन्न होकर गिरिजाजी ने आशीर्वाद दिया।

बालकाण्ड, चौपाई 236.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 233 सेवा–करुणा–विनय
भाव के अनुरूप दर्शन

राज समाज बिराजत रूरे । उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे ॥

जिन्ह कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ॥

वे राजाओंके समाजमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणोंके बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों । जिनकी जैसी भावना थी, प्रभुकी मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी ।

राजकुमार (राम और लक्ष्मण) वहाँ आए।

बालकाण्ड, चौपाई 241.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 237 लीला–रहस्य

जगत पिता रघुपतिहि बिचारी । भरि लोचन छबि लेहु निहारी ॥

सुंदर सुखद सकल गुन रासी । ए दोउ बंधु संभु उर बासी ॥

और श्रीरघुनाथजीको जगत्‌का पिता (परमेश्वर) विचारकर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो [ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा] । सुन्दर, सुख देनेवाले और समस्त गुणोंकी राशि ये दोनों भाई शिवजीके हृदयमें बसनेवाले हैं (स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदयमें छिपाये रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रोंके सामने आ गये हैं)

बालकाण्ड, चौपाई 246.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 241
भगवद्दर्शन का फल

सुधा समुद्र समीप बिहाई । मृगजलु निरखि मरहु कत धाई ॥

करहु जाई जा कहुँ जोइ भावा । हम तौ आजु जनम फलु पावा ॥

समीप आये हुए (भगवद्दर्शनरूप) अमृतके समुद्रको छोड़कर तुम [जगज्जननी जानकीको पत्नीरूपमें पानेकी दुराशारूप मिथ्या] मृगजलको देखकर दौड़कर क्यों मरते हो? फिर [भाई!] जिसको जो अच्छा लगे वही जाकर करो । हमने तो [श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन करके] आज जन्म लेनेका फल पा लिया (जीवन और जन्मको सफल कर लिया)

बालकाण्ड, चौपाई 246.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 241 ज्ञान–विवेक
सच्चे स्नेह का फल

तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी ॥

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥

तो सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् मुझे रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी दासी अवश्य बनायेंगे । जिसका जिसपर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ।

सीताजी ने अपनी व्याकुलता जानकर धीरज धरकर हृदय में विश्वास लेकर यह वाणी कही।

बालकाण्ड, चौपाई 259.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 253 शरणागति

तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ । धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ ॥

तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी । तसि पुनीत कौसल्या देबी ॥

वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना ही बुलाये स्वाभाविक ही धर्मात्मा पुरुषके पास जाती हैं । तुम जैसे गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवताकी सेवा करनेवाले हो, वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 294.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 281 धर्म–आचरण
श्रीसीतारामजी की महिमा

जिन्ह कर नाम लेत जग माहीं । सकल अमंगल मूल नसाहीं ॥

करतल होहिं पदारथ चारी । तेइ सिय रामु कहेउ कामारी ॥

जिनका नाम लेते ही जगत्में सारे अमङ्गलोंकी जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) मुट्ठीमें आ जाते हैं, ये वही [जगत्के माता-पिता] श्रीसीतारामजी हैं; कामके शत्रु शिवजीने ऐसा कहा ।

शिवजी ने देवताओं को समझाया कि यह श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी का विवाह है।

बालकाण्ड, चौपाई 315.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 297 नाम महिमा
चरण पखारन और जयघोष

लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली ॥

नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली ॥

जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं ॥

जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं ॥

वे श्रीरामजीके चरणकमलोंको पखारने लगे, प्रेमसे उनके शरीरमें पुलकावली छा रही है ॥

आकाश और नगरमें होनेवाली गान, नगाड़े और जय-जयकारकी ध्वनि मानो चारों दिशाओंमें उमड़ चली । जो चरणकमल कामदेवके शत्रु श्रीशिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें सदा ही विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है और कलियुगके सारे पाप भाग जाते हैं … ।

राजा-रानी प्रेममग्न होकर श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र चरणों को पखारने लगे।

बालकाण्ड, छन्द 324.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 308 नाम महिमा
राम के दिव्य गुण

तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय ॥

जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन ॥

तुम पूर्णकाम हो, सुजानशिरोमणि हो और भावप्रिय हो (तुम्हें प्रेम प्यारा है) । हे राम! तुम भक्तोंके गुणोंको ग्रहण करनेवाले, दोषोंको नाश करनेवाले और दयाके धाम हो ।

रानी ने सीता जी को श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित करते हुए ये वचन कहे।

बालकाण्ड, सोरठा 336 श्रीरामचरितमानस पृ. 322

नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल ॥

सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल ॥

वे ही समस्त सुखोंके मूल [आप] मेरे नेत्रोंके विषय हुए । ईश्वरके अनुकूल होनेपर जगत्में जीवको सब लाभ-ही-लाभ है ।

बालकाण्ड, दोहा 341 श्रीरामचरितमानस पृ. 326
राम यश की महिमा

निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो ॥

रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो ॥

उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं ॥

बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं ॥

अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये तुलसीने रामका यश कहा है । [नहीं तो] श्रीरघुनाथजीका चरित्र अपार समुद्र है, किस कविने उसका पार पाया है? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाहके मङ्गलमय उत्सवका वर्णन आदरके साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामजीकी कृपासे सदा सुख पावेंगे ।

तुलसीदासजी ने अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए श्रीरघुनाथजी के यश का वर्णन किया है।

बालकाण्ड, छन्द (361 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 343 नाम महिमा

सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं । जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं ॥

भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी । रामु पुनीत प्रेम अनुगामी ॥

[वसिष्ठजीने कहा—] हे राजन्! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना जीकी जलन नहीं जाती, वही स्वामी (सर्वलोकमहेश्वर) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेमके अनुगामी हैं । [श्रीरामजी पवित्र प्रेमके पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, इसीसे तो प्रेमवश आपके पुत्र हुए हैं] ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 4.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 349 लीला–रहस्य
सेवक का समर्पण

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू । भयउ पुनीत आजु यहु गेहू ॥

आयसु होइ सो करौं गोसाईं । सेवकु लहइ स्वामि सेवकाईं ॥

परन्तु प्रभु (आप)-ने प्रभुता छोड़कर (स्वयं यहाँ पधारकर) जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया । हे गोसाईं! [अब] जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ स्वामीकी सेवामें ही सेवकका लाभ है ।

श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि वसिष्ठजी के आगमन पर उनके चरणों में मस्तक नवाकर और षोडशोपचार से पूजन करके उनका स्वागत किया।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 9.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 353 शरणागति
राम के बिना जीवन

जिऐ मीन बरु बारि बिहीना । मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना ॥

कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥

मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुखी होकर जीता रहे । परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [जरा भी] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है ।

राजा दशरथ ने कैकेयी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 33.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 373 वैराग्य

बारहिं बार लाइ उर लीन्ही । धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥

अचल होउ अहिवातु तुम्हारा । जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥

उन्होंने सीताजीको बार-बार हृदयसे लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गङ्गाजी और यमुनाजीमें जलकी धारा बहे, तबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 69.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 403 शरणागति
परमेश्वर के प्रति अनन्य प्रेम

जहँ लगि जगत सनेह सगाई । प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई ॥

मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी । दीनबंधु उर अंतरजामी ॥

जगत्में जहाँतक स्नेहका सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेदने गाया है — हे स्वामी! हे दीनबन्धु! हे सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं ।

लक्ष्मणजी ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 72.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 405

पुत्रवती जुबती जग सोई । रघुपति भगतु जासु सुतु होई ॥

नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी । राम बिमुख सुत तें हित जानी ॥

संसारमें वही युवती स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजीका भक्त हो । नहीं तो जो रामसे विमुख पुत्रसे अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी । पशुकी भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 75.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 407
परमार्थ का स्वरूप

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ॥

सखा परम परमारथु एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥

विवेक होनेपर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञानका नाश होनेपर) श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होता है । हे सखा! मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 93.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 422 ज्ञान–विवेक
पूर्ण समर्पण का सुख

करमबचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार ॥

तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार ॥

जबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्नमें भी वह सुख नहीं पाता ।

मुनि भरद्वाजजी ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 107 श्रीरामचरितमानस पृ. 434 वैराग्य
प्रेम और परमार्थ का मिलन

राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ॥

मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ । मिलत धरें तन कह सबु कोऊ ॥

श्रीरामजीने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदयसे लगा लिया । [उसे इतना आनन्द हुआ] मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो । सब कोई [देखनेवाले] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ (परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं ।

रामचन्द्रजी के प्रेमी एक तपस्वी को पहचानकर प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसे हृदय से लगा लिया।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 111.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 437 ज्ञान–विवेक

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी । लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी ॥

एकन्ह एक बोलि सिख देहीं । लोचन लाहु लेहु छन एहीं ॥

उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती । मानो दरिद्रोंने चिन्तामणिकी ढेरी पा ली हो । वे एक-एकको पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रोंका लाभ ले लो ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 114.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 440 वैराग्य
श्रीराम के दर्शन का प्रभाव

रामहि देखि एक अनुरागे । चितवत चले जाहिं सँग लागे ॥

एक नयन मग छबि उर आनी । होहिं सिथिल तन मन बर बानी ॥

कोई श्रीरामचन्द्रजीको देखकर ऐसे अनुरागमें भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं । कोई नेत्रमार्गसे उनकी छविको हृदयमें लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणीसे शिथिल हो जाते हैं (अर्थात् उनके शरीर, मन और वाणीका व्यवहार बंद हो जाता है)

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी का रूप देखकर सब प्रेमानन्द में मग्न हो गए।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 114.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 440 साधना–योग
ईश्वरीय कृपा और साक्षात्कार

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन । जानहिं भगत भगत उर चंदन ॥

वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है । हे रघुनन्दन! हे भक्तोंके हृदयके शीतल करनेवाले चन्दन! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 128.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 451 ज्ञान–विवेक शरणागति
अनन्य भक्ति का फल

जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई । प्रिय परिवार सदन सुखदाई ॥

सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई । तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई ॥

जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर — सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदयमें धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदयमें रहिये ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 131.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 455 वैराग्य

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन ॥

बचन किरातन्ह के सुनतजिमि पितु बालक बैन ॥

जो वेदोंके वचन और मुनियोंके मनको भी अगम हैं, वे करुणाके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलोंके वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकोंके वचन सुनता है ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 136 श्रीरामचरितमानस पृ. 459 लीला–रहस्य
प्रेम की प्रधानता

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा ॥

राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥

श्रीरामचन्द्रजीको केवल प्रेम प्यारा है; जो जाननेवाला हो (जानना चाहता हो), वह जान ले । तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमसे परिपुष्ट हुए (प्रेमपूर्ण) कोमल वचन कहकर उन सब वनमें विचरण करनेवाले लोगोंको संतुष्ट किया ।

श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम से परिपुष्ट हुए कोमल वचन कहकर उन सब वनमें विचरण करनेवाले लोगों को सन्तुष्ट किया।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 137.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 459

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु ॥

रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु ॥

जिन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करनेसे ही भक्तजन तमाम भोग-विलासको तिनकेके समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीकी प्रिय पत्नी और जगत्की माता सीताजीके लिये यह [भोग-विलासका त्याग] कुछ भी आश्चर्य नहीं है ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 140 श्रीरामचरितमानस पृ. 462 वैराग्य
साधुसङ्ग और हरिभजन का त्याग

जे नहिं साधुसंग अनुरागे । परमारथ पथ बिमुख अभागे ॥

जे न भजहिं हरि नर तनु पाई । जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ॥

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं । बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ॥

तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ । जननी जौं यहु जानौं भेऊ ॥

जिनका सत्सङ्गमें प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थके मार्गसे विमुख हैं; जो मनुष्यशरीर पाकर श्रीहरिका भजन नहीं करते; जिनको हरि-हर (भगवान् विष्णु और शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता, जो वेदमार्गको छोड़कर वाम (वेदप्रतिकूल) मार्गपर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत्को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेदको जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगोंकी गति दें ।

भरतजी ने माता कौसल्या के सामने सौगन्ध खाते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 168.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 485 सत्सङ्ग–सन्त महिमा
हरिभक्ति की महत्ता

सरुज सरीर बादि बहु भोगा । बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥

जायँ जीव बिनु देह सुहाई । बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥

रोगी शरीरके लिये नाना प्रकारके भोग व्यर्थ हैं । श्रीहरिकी भक्तिके बिना जप और योग व्यर्थ हैं । जीवके बिना सुन्दर देह व्यर्थ है । वैसे ही श्रीरघुनाथजीके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 178.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 493 वैराग्य
परम त्याग का सङ्कल्प

स्वामि काज करिहउँ रन रारी । जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ॥

तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें । दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें ॥

मैं स्वामीके कामके लिये रणमें लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकोंको अपने यशसे उज्ज्वल कर दूँगा । श्रीरघुनाथजीके निमित्त प्राण त्याग दूँगा । मेरे तो दोनों ही हाथोंमें आनन्दके लड्डू हैं (अर्थात् जीत गया तो रामसेवकका यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजीकी नित्य सेवा प्राप्त करूँगा)

निषादराज ने श्रीरामजी के लिए प्राणसमर्पण का निश्चय करके यह कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 190.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 503 शरणागति
भजन का महत्त्व

समुझि मोरिकरतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ ॥

जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ ॥

मेरी करतूत और कुलको समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी महिमाको मनमें देख (विचार) कर (अर्थात् कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करनेवाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी! पर उन्होंने मुझ जैसे नीचको भी अपनी अहैतुकी कृपावश अपना लिया — यह समझकर) जो रघुवीर श्रीरामजीके चरणोंका भजन नहीं करता, वह जगत्में विधाताके द्वारा ठगा गया है ।

निषादराज ने भरतजी के चरणों की वन्दना करते हुए यह बात कही।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 195 श्रीरामचरितमानस पृ. 507 कर्म–प्रारब्ध

बैरिउ राम बड़ाईबड़ाई करहीं । बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं ॥

सारद कोटि कोटि सत सेषा । करिन सकहिं प्रभु गुन गन लेखा ॥

शत्रु भी श्रीरामजीकी बड़ाई करते हैं । बोल-चाल, मिलनेके ढंग और विनयसे वे मनको हर लेते हैं । करोड़ों सरस्वती और अरबों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहोंकी गिनती नहीं कर सकते ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 200.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 511 लीला–रहस्य

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान ॥

जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥

मुझे न अर्थकी रुचि (इच्छा) है, न धर्मकी, न कामकी और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ । जन्म-जन्ममें मेरा श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 204 श्रीरामचरितमानस पृ. 515

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही । लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ॥

सीता राम चरन रति मोरें । अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ॥

स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामिद्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम आपकी कृपासे दिन-दिन बढ़ता ही रहे ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 205.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 515

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ । जाचत जलु पबि पाहन डारउ ॥

चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई ॥

मेघ चाहे जन्मभर चातककी सुधि भुला दे और जल माँगनेपर वह चाहे वज्र और पत्थर (ओले) ही गिरावे, पर चातककी रटन घटनेसे तो उसकी बात ही घट जायगी (प्रतिष्ठा ही नष्ट हो जायगी) । उसकी तो प्रेम बढ़नेमें ही सब तरहसे भलाई है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 205.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 515

कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें । तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें ॥

भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी । भइ मृदु बानि सुमंगल देनी ॥

जैसे तपानेसे सोनेपर आब (चमक) आ जाती है, वैसे ही प्रियतमके चरणोंमें प्रेमका नियम निबाहनेसे प्रेमी सेवकका गौरव बढ़ जाता है । भरतजीके वचन सुनकर बीच त्रिवेणीमेंसे सुन्दर मङ्गल देनेवाली कोमल वाणी हुई ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 205.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 516

अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु ॥

सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु ॥

हे भरत! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया; यही मत तुम्हारे लिये उचित था । श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम होना ही संसारमें समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल है ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 207 श्रीरामचरितमानस पृ. 517

तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु ॥

राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु ॥

हे भरत! तुम्हारे लिये (तुम्हारी समझमें) यह कलङ्क है, पर हम सबके लिये तो उपदेश है । श्रीरामभक्तिरूपी रसकी सिद्धिके लिये यह समय गणेश (बड़ा शुभ) हुआ है ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 208 श्रीरामचरितमानस पृ. 518

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा । रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ॥

उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना । घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना ॥

हे तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजीके दास कुमुद और चकोर हैं [वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोरको दुःख होता है]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं । जगद्रूपी आकाशमें यह घटेगा नहीं, वरं दिन-दिन दूना होगा ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 209.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 518

तब किछु कीन्ह राम रुख जानी । अब कुचालि करि होइहि हानी ॥

सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ । निज अपराध रिसाहिं न काऊ ॥

उस समय (पिछली बार) तो श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर कुछ किया था । परन्तु इस समय कुचाल करनेसे हानि ही होगी । हे देवराज! श्रीरघुनाथजीका स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किये हुए अपराधसे कभी रुष्ट नहीं होते ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 218.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 527

राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी ॥

अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई । करहु भरत पद प्रीति सुहाई ॥

श्रीरामजी सदा अपने सेवकों (भक्तों) की रुचि रखते आये हैं । वेद, पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं । ऐसा हृदयमें जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरतजीके चरणोंमें सुन्दर प्रीति करो ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 219.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 528

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु ॥

कबिहि अगमजिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु ॥

भरतजीका उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते । कविके लिये तो वह वैसा ही अगम है जैसा अहंता और ममतासे मलिन मनुष्योंके लिये ब्रह्मानन्द!

अयोध्याकाण्ड, दोहा 225 श्रीरामचरितमानस पृ. 533 ज्ञान–विवेक

बिषई जीव पाइ प्रभुताई । मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ॥

भरतु नीति रत साधु सुजाना । प्रभु पद प्रेमु सकल जग जाना ॥

परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूपको प्रकट कर देते हैं । भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु (आप) के चरणोंमें उनका प्रेम है, इस बातको सारा जगत् जानता है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 228.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 535 नीति–व्यवहार
आध्यात्मिक राज्य का स्वरूप

भट जम नियम सैल रजधानी । सांति सुमति सुचि सुंदर रानी ॥

सकल अंग संपन्न सुराऊ । राम चरन आश्रित चित चाऊ ॥

यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) तथा नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योद्धा हैं पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियाँ हैं । वह श्रेष्ठ राजा राज्यके सब अङ्गोंसे पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके आश्रित रहनेसे उसके चित्तमें चाव (आनन्द या उत्साह) है ।

भरतजी ने सेवक के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रम के समीप जा पहुँचे।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 235.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 541 धर्म–आचरण

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु ॥

ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु ॥

सुन्दर मुनिमण्डलीके बीचमें सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 239 श्रीरामचरितमानस पृ. 545 ज्ञान–विवेक

मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी । कबिकुल अगम करम मन बानी ॥

परम पेम पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥

मिलनकी प्रीति कैसे बखानी जाय? वह तो कविकुलके लिये कर्म, मन, वाणी तीनोंसे अगम है । दोनों भाई (भरतजी और श्रीरामजी) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारको भुलाकर परम प्रेमसे पूर्ण हो रहे हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 241.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 546 वैराग्य

रघुपति भगति सुमंगल मूला । नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला ॥

एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं । बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं ॥

श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुन्दर मङ्गलोंका मूल है, इस प्रकार कहकर सराहना करते हुए देवता आकाशसे फूल बरसाने लगे । वे कहने लगे-जगत्में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वसिष्ठजीके समान बड़ा कौन हैं?

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 243.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 548

तात बात फुरि राम कृपाहीं । राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ॥

सकुचउँ तात कहत एक बाता । अरध तजहिं बुध सरबस जाता ॥

[वे बोले—] हे तात! बात सत्य है, पर है रामजीकी कृपासे ही । रामविमुखको तो स्वप्नमें भी सिद्धि नहीं मिलती । हे तात! मैं एक बात कहनेमें सकुचाता हूँ । बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [आधेकी रक्षाके लिये] आधा छोड़ दिया करते हैं ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 256.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 559 कर्म–प्रारब्ध
गुरु भक्ति का महत्त्व

जे गुर पद अंबुज अनुरागी । ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ॥

राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू ॥

जो लोग गुरुके चरणकमलोंके अनुरागी हैं, वे लोकमें (लौकिक दृष्टिसे) भी और वेदमें (पारमार्थिक दृष्टिसे) भी बड़भागी होते हैं! [फिर] जिसपर आप (गुरु) का ऐसा स्नेह है, उस भरतके भाग्यको कौन कह सकता है?

श्रीरामचन्द्रजी ने गुरु वसिष्ठजी से भरतजी के भाग्य की प्रशंसा करते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 259.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 562 गुरु महिमा

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका । राम रजायस आपन नीका ॥

निज पन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ॥

सब तरहसे विचार करके अन्तमें उन्होंने मनमें यही निश्चय किया कि श्रीरामजीकी आज्ञामें ही अपना कल्याण है । उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा । यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया (अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया)

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 266.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 567 शरणागति
परमार्थ का सार

स्वारथु नाथ फिरें सबही का । किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका ॥

यह स्वारथ परमारथ सारू । सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू ॥

हे नाथ! आपके लौटनेमें सभीका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करनेमें करोड़ों प्रकारसे कल्याण है । यही स्वार्थ और परमार्थका सार (निचोड़) है, समस्त पुण्योंका फल और सम्पूर्ण शुभ गतियोंका शृङ्गार है ।

भरतजी ने श्रीरामचन्द्रजी से अयोध्या लौटने की विनती करते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 268.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 569 ज्ञान–विवेक

राम दरस लालसा उछाहू । पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ॥

मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही । बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ॥

श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण किसीको रास्तेकी थकावट और क्लेश जरा भी नहीं है । मन तो वहाँ है जहाँ श्रीराम और जानकीजी हैं । बिना मनके शरीरके सुख-दुःखकी सुध किसको हो?

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 275.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 575

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥

तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बड़ाई ॥

जिन राजा जनकका ज्ञानरूपी सूर्य भव (आवागमन) रूपी रात्रिका नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलोंको खिला देती हैं (आनन्दित करती हैं), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं? यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है! [अर्थात् राजा जनककी यह दशा श्रीसीतारामजीके अलौकिक प्रेमके कारण हुई, लौकिक मोह-ममताके कारण नहीं । जो लौकिक मोह-ममताको पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजीका प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता] ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 277.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 576

बिषई साधक सिद्ध सयाने । त्रिबिध जीव जग बेद बखाने ॥

राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू ॥

विषयी, साधक और ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष-जगत्में ये तीन प्रकारके जीव वेदोंने बताये हैं । इन तीनोंमें जिसका चित्त श्रीरामजीके स्नेहसे सरस (सराबोर) रहता है, साधुओंकी सभामें उसीका बड़ा आदर होता है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 277.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 577
प्रेमयुक्त ज्ञान की महिमा

सोह न राम पेम बिनु ग्यानू । करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥

मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए । राम घाट सब लोग नहाए ॥

श्रीरामजीके प्रेमके बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधारके बिना जहाज । वसिष्ठजीने विदेहराज (जनकजी) को बहुत प्रकारसे समझाया । तदनन्तर सब लोगोंने श्रीरामजीके घाटपर स्नान किया ।

महर्षि वसिष्ठ ने विदेहराज को समझाया।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 277.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 577 ज्ञान–विवेक

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु । बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु ॥

मोह मगन मति नहिं बिदेह की । महिमा सिय रघुबर सनेह की ॥

जनकजीका ज्ञानरूपी चिरंजीवी (मार्कण्डेय) मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो उस श्रीरामप्रेमरूपी बालकका सहारा पाकर बच गया । वस्तुतः [ज्ञानिशिरोमणि] विदेहराजकी बुद्धि मोहमें मग्न नहीं है । यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है [जिसने उन-जैसे महान् ज्ञानीके ज्ञानको भी विकल कर दिया] ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 286.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 585 ज्ञान–विवेक

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ । जहँ न राम पद पंकज भाऊ ॥

जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू । जहँ नहिं राम पेम परधानू ॥

जहाँ श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाय । जिसमें श्रीरामप्रेमकी प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 291.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 589 ज्ञान–विवेक
प्रभु के दिव्य स्वरूप

प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी । पूज्य परम हित अंतरजामी ॥

सरल सुसाहिबु सील निधानू । प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥

हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् (मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं । सरलहृदय, श्रेष्ठ मालिक, शीलके भण्डार, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान ।

भरतजी ने श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 298.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 594 गुरु महिमा

समरथ सरनागत हितकारी । गुनगाहकु अवगुन अघ हारी ॥

स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाईं । मोहि समान मैं साइँ दोहाई ॥

समर्थ, शरणागतका हित करनेवाले, गुणोंका आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापोंको हरनेवाले हैं । हे गोसाईं! आप-सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामीके साथ द्रोह करनेमें मेरे समान मैं ही हूँ ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 298.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 595 शरणागति
निस्वार्थ स्वामी सेवा

सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥

अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा ॥

वह रुचि है — कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना । और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है । हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय ।

भरतजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी से यह विनती की।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 301.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 597 सेवा–करुणा–विनय

पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं । सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं ॥

राउर बदि भल भव दुख दाहू । प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू ॥

हे गोसाईं! आपके प्रेम और सम्बन्धसे अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनन्द) से युक्त हैं । आपके लिये भवदुःख (जन्म-मरणके दुःख) की ज्वालामें जलना भी अच्छा है और प्रभु (आप) के बिना परमपद (मोक्ष) का लाभ भी व्यर्थ है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 314.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 608 ज्ञान–विवेक
पर्णकुटी की शोभा

सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर ॥

भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर ॥

छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसमेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण करके शोभित हो रहे हों ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 321 श्रीरामचरितमानस पृ. 615 वैराग्य

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति ॥

चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति ॥

फिर भरतजी तो [स्वयं] श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके पात्र हैं । वे इस (भोगैश्वर्यत्यागरूप) करनीसे बड़े नहीं हुए (अर्थात् उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है) । [पृथ्वीपरका जल न पीनेकी] टेकसे चातककी और नीर-क्षीर-विवेककी विभूति (शक्ति) से हंसकी भी सराहना होती है ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 324 श्रीरामचरितमानस पृ. 617 ज्ञान–विवेक
भरत चरित्र का प्रभाव

भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं ॥

सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति ॥

तुलसीदासजी कहते हैं — जो कोई भरतजीके चरित्रको नियमसे आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम होगा और सांसारिक विषय-रससे वैराग्य होगा ।

अयोध्याकाण्ड, सोरठा 326 श्रीरामचरितमानस पृ. 619 वैराग्य

तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए ॥

मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए ॥

जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई ॥

रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई ॥

मुनि अत्यन्त प्रेमसे पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रोंको श्रीरामजीके मुखकमलमें लगाये हुए हैं । [मनमें विचार रहे हैं कि] मैंने ऐसे कौन-से जप-तप किये थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियोंसे परे प्रभुके दर्शन पाये । जप, योग और धर्म-समूहसे मनुष्य अनुपम भक्तिको पाता है । श्रीरघुवीरके पवित्र चरित्रको तुलसीदास रात-दिन गाता है ।

अरण्यकाण्ड, छन्द (6(क) के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 630 ज्ञान–विवेक

नहिं सतसंग जोग जप जागा । नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा ॥

एक बानि करुनानिधान की । सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥

मैंने न तो सत्सङ्ग, योग, जप अथवा यज्ञ ही किये हैं और न प्रभुके चरणकमलोंमें मेरा दृढ़ अनुराग ही है । हाँ, दयाके भण्डार प्रभुकी एक बान है कि जिसे किसी दूसरेका सहारा नहीं है, वह उन्हें प्रिय होता है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 10.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 633 शरणागति
भक्ति और सत्सङ्ग की अभिलाषा

अबिरल भगति बिरति सतसंगा । चरन सरोरुह प्रीति अभंगा ॥

जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता । अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता ॥

अस तव रूप बखानउँ जानउँ । फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ ॥

संतत दासन्ह देहु बड़ाई । तातें मोहि पूँछेहु रघुराई ॥

मुझे प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग और आपके चरणकमलोंमें अटूट प्रेम प्राप्त हो । यद्यपि आप अखण्ड और अनन्त ब्रह्म हैं, जो अनुभवसे ही जाननेमें आते हैं और जिनका संतजन भजन करते हैं, यद्यपि मैं आपके ऐसे रूपको जानता हूँ और उसका वर्णन भी करता हूँ तो भी लौट-लौटकर मैं सगुण ब्रह्ममें (आपके इस सुन्दर स्वरूपमें) ही प्रेम मानता हूँ । आप सेवकोंको सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसीसे हे रघुनाथजी! आपने मुझसे पूछा है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 13.6 श्रीरामचरितमानस पृ. 640 वैराग्य

सो सुतंत्र अवलंब न आना । तेहि आधीन ग्यान बिग्याना ॥

भगति तात अनुपम सुखमूला । मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ॥

वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसको (ज्ञान-विज्ञान आदि किसी) दूसरे साधनका सहारा (अपेक्षा) नहीं है । ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं । हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुखकी मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल (प्रसन्न) होते हैं ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 16.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 642 ज्ञान–विवेक

एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा । तब मम धर्म उपज अनुरागा ॥

श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं । मम लीला रति अति मन माहीं ॥

इसका फल, फिर विषयोंसे वैराग्य होगा । तब (वैराग्य होनेपर) मेरे धर्म (भागवतधर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा । तब श्रवण आदि नौ प्रकारकी भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मनमें मेरी लीलाओंके प्रति अत्यन्त प्रेम होगा ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 16.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 643 वैराग्य
भक्ति का मार्ग

संत चरन पंकज अति प्रेमा । मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥

गुरु पितु मातु बंधु पति देवा । सब मोहि कहँ जानै दृढ़दृढ़ सेवा ॥

मम गुन गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥

काम आदि मद दंभ न जाकें । तात निरंतर बस मैं ताकें ॥

जिसका संतोंके चरणकमलोंमें अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्मसे भजनका दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवामें दृढ़ हो, मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गद्गद हो जाय और नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 16.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 643 सेवा–करुणा–विनय

मम गुन गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥

काम आदि मद दंभ न जाकें । तात निरंतर बस मैं ताकें ॥

मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गद्गद हो जाय और नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 16.6 श्रीरामचरितमानस पृ. 643

बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम ॥

तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम ॥

जिनको कर्म, वचन और मनसे मेरी ही गति है; और जो निष्काम भावसे मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय-कमलमें मैं सदा विश्राम किया करता हूँ ।

अरण्यकाण्ड, दोहा 16 श्रीरामचरितमानस पृ. 643

सुनहु उमा ते लोग अभागी । हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥

पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई । चले बिलोकत बन बहुताई ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! सुनो, वे लोग अभागे हैं जो भगवान्‌को छोड़कर विषयोंसे अनुराग करते हैं । फिर दोनों भाई सीताजीको खोजते हुए आगे चले । वे वनकी सघनता देखते जाते हैं ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 33.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 667 वैराग्य

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ॥

भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥

जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता — इन सबके होनेपर भी भक्तिसे रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल [शोभाहीन] दिखायी पड़ता है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 35.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 669
नवधा भक्ति का वर्णन

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं । सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥

मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ तू सावधान होकर सुन और मनमें धारण कर । पहली भक्ति है संतोंका सत्संग । दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंगमें प्रेम ।

श्रीरामजी ने शबरीजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 35.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 669 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

सातवँ सम मोहि मय जग देखा । मोतें संत अधिक करि लेखा ॥

आठव जथालाभ संतोषा । सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥

सातवीं भक्ति है जगत्भरको समभावसे मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतोंको मुझसे भी अधिक करके मानना । आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसीमें संतोष करना और स्वप्नमें भी पराये दोषोंको न देखना ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 36.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 669 ज्ञान–विवेक

नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥

नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई । नारि पुरुष सचराचर कोई ॥

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें । सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ॥

जोगि बूंद दुरलभ गति जोई । तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई ॥

नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदयमें मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्थामें हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना । इन नवोंमेंसे जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो, हे भामिनि! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है । फिर तुझमें तो सभी प्रकारकी भक्ति दृढ़ है । अतएव जो गति योगियोंको भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 36.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 670

कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे ॥

तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे ॥

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ॥

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू ॥

सब कथा कहकर भगवान्के मुखके दर्शन कर, हृदयमें उनके चरणकमलोंको धारण कर लिया और योगाग्निसे देहको त्यागकर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरिपदमें लीन हो गयी, जहाँसे लौटना नहीं होता । तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकारके कर्म, अधर्म और बहुत-से मत — ये सब शोकप्रद हैं; हे मनुष्यो! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम करो ।

अरण्यकाण्ड, छन्द (36 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 670 वैराग्य
रामनाम की श्रेष्ठता

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कह अधिक एक तें एका ॥

राम सकल नामन्ह तें अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥

यद्यपि प्रभुके अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक-से-एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामोंसे बढ़कर हो और पापरूपी पक्षियोंके समूहके लिये यह वधिकके समान हो ।

नारदजी ने श्रीरघुनाथजी से यह वर माँगते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 42(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 677 नाम महिमा

राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम ॥

अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम ॥

आपकी भक्ति पूर्णिमाकी रात्रि है; उसमें ‘राम’ नाम यही पूर्ण चन्द्रमा होकर और अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें निवास करें ।

अरण्यकाण्ड, दोहा 42(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 677 नाम महिमा

तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा । प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा ॥

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा । भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा ॥

करउँ सदा तिन्ह के रखवारी । जिमि बालक राखड़ महतारी ॥

गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई । तहँ राखड़ जननी अरगाई ॥

तब मैं विवाह करना चाहता था । हे प्रभु! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया? [प्रभु बोले—] हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्षके साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं, मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालककी रक्षा करती है । छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँपको पकड़ने जाता है तो वहाँ माता उसे [अपने हाथों] अलग करके बचा लेती है ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 43.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 677 शरणागति

जनहि मोर बल निज बल ताही । दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥

यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं । पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं ॥

मेरे सेवकको केवल मेरा ही बल रहता है और उसे (ज्ञानीको) अपना बल होता है । पर काम-क्रोधरूपी शत्रु तो दोनोंके लिये हैं । [भक्तके शत्रुओंको मारनेकी जिम्मेवारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बलको माननेवाले ज्ञानीके शत्रुओंका नाश करनेकी जिम्मेवारी मुझपर नहीं है ।] ऐसा विचारकर पण्डितजन (बुद्धिमान् लोग) मुझको ही भजते हैं । वे ज्ञान प्राप्त होनेपर भी भक्तिको नहीं छोड़ते ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 43.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 678 ज्ञान–विवेक

रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग ॥

राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग ॥

जो लोग रावणके शत्रु श्रीरामजीका पवित्र यश गावेंगे और सुनेंगे, वे वैराग्य, जप और योगके बिना ही श्रीरामजीकी दृढ़ भक्ति पावेंगे ।

अरण्यकाण्ड, दोहा 46(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 681
सत्सङ्ग और भक्ति का मार्ग

दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग ॥

हि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥

युवती स्त्रियोंका शरीर दीपककी लौके समान है, हे मन! तू उसका पतिंगा न बन । काम और मदको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीका भजन कर और सदा सत्संग कर ।

अरण्यकाण्ड, दोहा 46(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 681 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर ॥

जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न ॥

जहाँ श्रीशिव-पार्वती बसते हैं, उस काशीको मुक्तिकी जन्मभूमि, ज्ञानकी खान और पापोंका नाश करनेवाली जानकर उसका सेवन क्यों न किया जाय?

किष्किन्धाकाण्ड, सोरठा 1 श्रीरामचरितमानस पृ. 684

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें । सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें ॥

नाथ जीव तव मायाँ मोहा । सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा ॥

हे नाथ! यद्यपि मुझमें बहुत-से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामीकी विस्मृतिमें न पड़े (आप उसे न भूल जायँ) हे नाथ! जीव आपकी मायासे मोहित है । वह आपहीकी कृपासे निस्तार पा सकता है ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 3.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 686 शरणागति
अनन्य सेवक की बुद्धि

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ॥

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ॥

और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान्‌का रूप है ।

श्रीरघुनाथजी ने हनुमानजी को उठाकर हृदय से लगाया और उन्हें सम्बोधित करते हुए यह कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 3 श्रीरामचरितमानस पृ. 686 शरणागति ज्ञान–विवेक
माया का मिथ्यात्व

ए सब राम भगति के बाधक । कहहिं संत तव पद अवराधक ॥

सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं । मायाकृत परमारथ नाहीं ॥

क्योंकि आपके चरणोंकी आराधना करनेवाले संत कहते हैं कि ये सब (सुख-सम्पत्ति आदि) रामभक्तिके विरोधी हैं । जगत्में जितने भी शत्रु-मित्र और सुख-दुःख [आदि द्वन्द्व] हैं, सब-के-सब मायारचित हैं, परमार्थतः (वास्तवमें) नहीं हैं ।

सुग्रीव ने ज्ञान उत्पन्न होने पर श्री राम से ये वचन कहे।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 7.9 श्रीरामचरितमानस पृ. 691 माया–संसार

प्रगट सो तनु तव आगें सोवा । जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ॥

उपजा ग्यान चरन तब लागी । लीन्हेसि परम भगति बर मागी ॥

वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है । फिर तुम किसके लिये रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्‌के चरणों लगी और उसने परम भक्तिका वर माँग लिया ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 11.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 695 ज्ञान–विवेक

बिनु घन निर्मल सोह अकासा । हरिजन इव परिहरि सब आसा ॥

कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी । कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी ॥

बिना बादलोंका निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओंको छोड़कर सुशोभित होते हैं । कहीं-कहीं (विरले ही स्थानोंमें) शरद् ऋतुकी थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है । जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 16.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 700

लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया । सो नर तुम्ह समान रघुराया ॥

यह गुन साधन तें नहिं होई । तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ॥

और लोभकी फाँसीसे जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी! वह मनुष्य आपहीके समान है । ये गुण साधनसे नहीं प्राप्त होते । आपकी कृपासे ही कोई-कोई इन्हें पाते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 21.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 704 ज्ञान–विवेक

तजि माया सेइअ परलोका । मिटहिं सकल भवसंभव सोका ॥

देह धरे कर यह फलु भाई । भजिअ राम सब काम बिहाई ॥

माया (विषयोंकी ममता-आसक्ति) को छोड़कर परलोकका सेवन (भगवान्के दिव्य धामकी प्राप्तिके लिये भगवत्सेवारूप साधन) करना चाहिये, जिससे भव (जन्म-मरण) से उत्पन्न सारे शोक मिट जायँ । हे भाई! देह धारण करनेका यही फल है कि सब कामों (कामनाओं) को छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही किया जाय ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 23.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 705 वैराग्य

जामवंत अंगद दुख देखी । कहीं कथा उपदेस बिसेषी ॥

तात राम कहुँ नर जनि मानहु । निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु ॥

जाम्बवान्ने अंगदका दुःख देखकर विशेष उपदेशकी कथाएँ कहीं । [वे बोले—] हे तात! श्रीरामजीको मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 26.6 श्रीरामचरितमानस पृ. 709 ज्ञान–विवेक

हम सब सेवक अति बड़भागी । संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी ॥

हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, जो निरन्तर सगुण ब्रह्म (श्रीरामजी) प्रीति रखते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 26.7 श्रीरामचरितमानस पृ. 709
प्रभु का अवतार और भक्ति

निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि ॥

सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ॥

देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणोंके लिये प्रभु अपनी इच्छासे [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार लेते हैं । वहाँ सगुणोपासक [भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकारके मोक्षोंको त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 26 श्रीरामचरितमानस पृ. 709 लीला–रहस्य

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं । अति अपार भवसागर तरहीं ॥

तासु दूत तुम्ह तजि कदराई । राम हृदयँ धरि करहु उपाई ॥

पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागरसे तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्रीरामजीको हृदयमें धारण करके उपाय करो ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 29.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 711 नाम महिमा

भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिंजे नर अरु नारि ॥

तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि ॥

श्रीरघुवीरका यश भव (जन्म-मरण)-रूपी रोगकी [अचूक] दवा है । जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिराके शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथोंको सिद्ध करेंगे ।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 30(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 713 ज्ञान–विवेक
कर्तव्य की प्रधानता

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ॥

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥

हनुमान्जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा — भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ?

हनुमान्जी ने मैनाक पर्वत से कहा।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 1 श्रीरामचरितमानस पृ. 717 सेवा–करुणा–विनय

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ॥

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥

अयोध्यापुरीके राजा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखे हुए नगरमें प्रवेश करके सब काम कीजिये । उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर हो जाता है, अग्निमें शीतलता आ जाती है ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 5.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 721 शरणागति

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा । पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥

जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी) को भुलाकर [विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 8.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 723 ज्ञान–विवेक

कहेहू तें कछु दुख घटि होई । काहि कहौं यह जान न कोई ॥

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा । जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥

मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है । पर कहूँ किससे? यह दु: ख कोई जानता नहीं । हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 15.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 730 वैराग्य

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता । सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥

उर आनहु रघुपति प्रभुताई । सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥

हनुमान्जीने कहा — हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो । श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 15.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 730 साधना–योग

मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान ॥

भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥

मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 23 श्रीरामचरितमानस पृ. 737 वैराग्य

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई । जब तव सुमिरन भजन न होई ॥

केतिक बात प्रभु जातुधान की । रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥

हनुमान्जीने कहा — हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब आपका भजन-स्मरण न हो । हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी है? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 32.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 744

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना । ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥

यह संबाद जासु उर आवा । रघुपति चरन भगति सोइ पावा ॥

हे उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती! यह स्वामी-सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति पा गया ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 34.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 746 ज्ञान–विवेक
विकारों का त्याग

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ ॥

सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ॥

हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ — ये सब नरकके रास्ते हैं । इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं ।

विभीषणजी ने रावण से कहा।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 38 श्रीरामचरितमानस पृ. 751 काम–क्रोध–लोभ–मोह

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा । बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥

जासु नाम त्रय ताप नसावन । सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ॥

जिसे सम्पूर्ण जगत्से द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण जानेपर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते । जिनका नाम तीनों तापोंका नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूपमें प्रकट हुए हैं । हे रावण! हृदयमें यह समझ लीजिये ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 39(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 752 शरणागति

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात ॥

तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ॥

मुनि पुलस्त्यजीने अपने शिष्यके हाथ यह बात कहला भेजी है । हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु (आप) से कह दी ।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 39(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 752
सन्त की महिमा

उमा संत कइ इहड़ बड़ाई । मंद करत जो करइ भलाई ॥

तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा । रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! संतकी यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करनेपर भी [बुराई करनेवालेकी] भलाई ही करते हैं । [विभीषणजीने कहा—] आप मेरे पिताके समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजीको भजनेमें ही है ।

विभीषण ने रावण से कहा।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 41.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 754 सत्सङ्ग–सन्त महिमा
निर्मल मन की पात्रता

निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥

भेद लेन पठवा दससीसा । तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥

जो मनुष्य निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है । मुझे कपट और छल छिद्र नहीं सुहाते । यदि उसे रावणने भेद लेनेको भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपनेको कुछ भी भय या हानि नहीं है ।

श्रीरामजी ने सुग्रीव से हँसकर कहा।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 44.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 756 साधना–योग

तजि मद मोह कपट छल नाना । करउँ सद्य तेहि साधु समाना ॥

जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ॥

सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥

समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥

और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ । माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार, इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 48.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 759 वैराग्य

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना । ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ॥

निज जन जानि ताहि अपनावा । प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ॥

ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो मनुष्य दूसरेको भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु हैं । अपना सेवक जानकर विभीषणको श्रीरामजीने अपना लिया । प्रभुका स्वभाव वानरकुलके मनको [बहुत] भाया ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 50.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 761 लीला–रहस्य

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान ॥

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥

श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंका देनेवाला है । जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागरको तर जायँगे ।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 60 श्रीरामचरितमानस पृ. 770 नाम महिमा

लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड ॥

भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ॥

लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीरामजीको क्यों नहीं भजता?

लङ्काकाण्ड, दोहा (आरम्भ का, अङ्कहीन) श्रीरामचरितमानस पृ. 774 ज्ञान–विवेक

सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥

संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥

जो शिवसे द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्नमें भी मुझे नहीं पाता । शङ्करजीसे विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 2.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 776 ज्ञान–विवेक

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ॥

जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि । सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि ॥

जो मनुष्य [मेरे स्थापित किये हुए इन] रामेश्वरजीका दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोकको जायँगे । और जो गङ्गाजल लाकर इनपर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा (अर्थात् मेरे साथ एक हो जायगा)

लङ्काकाण्ड, चौपाई 3.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 776 शरणागति

होइ अकाम जो छल तजि सेइहि । भगति मोरि तेहि संकर देहि ॥

मम कृत सेतु जो दरसनु करिही । सो बिनु श्रम भवसागर तरिही ॥

जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्रीरामेश्वरजीकी सेवा करेंगे, उन्हें शङ्करजी मेरी भक्ति देंगे । और जो मेरे बनाये सेतुका दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जायगा ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 3.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 776 शरणागति

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान ॥

ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥

श्रीरघुवीरके प्रतापसे पत्थर भी समुद्रपर तैर गये । ऐसे श्रीरामजीको छोड़कर जो किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं वे [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 3 श्रीरामचरितमानस पृ. 777 ज्ञान–विवेक

सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी । भजहु नाथ ममता सब त्यागी ॥

मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी । भूप राजु तजि होहिं बिरागी ॥

हे नाथ! आप विषयोंकी सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागतपर प्रेम करनेवाले भगवान्‌का भजन कीजिये । जिनके लिये श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 7.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 780 वैराग्य

एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन ॥

धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ॥

इस प्रकार कृपा, रूप (सौन्दर्य) और गुणोंके धाम श्रीरामजी विराजमान हैं । वे मनुष्य धन्य हैं जो सदा इस ध्यानमें लौ लगाये रहते हैं ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 11(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 784

सुनु रावन परिहरि चतुराई । भजसि न कृपासिंधु रघुराई ॥

जौं खल भएसि राम कर द्रोही । ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥

अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन । कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीका तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि तू श्रीरामजीका वैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 27.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 799 शरणागति

देहिं परम गति सो जियँ जानी । अस कृपाल को कहहु भवानी ॥

अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी । नर मतिमंद ते परम अभागी ॥

ऐसा हृदयमें जानकर वे उन्हें परमगति (मोक्ष) देते हैं । हे भवानी! कहो तो ऐसे कृपालु [और] कौन हैं? प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 45.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 818 ज्ञान–विवेक

परिहरि बयरुबयरु देहुदेहु बैदेही । भजहु कृपानिधि परम सनेही ॥

ताके बचन बान सम लागे । करिआ मुह करि जाहि अभागे ॥

[अत:] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजीको दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजीका भजन करो । रावणको उसके वचन बाणके समान लगे । [वह बोला—] अरे अभागे! मुँह काला करके [यहाँसे] निकल जा ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 49.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 821 वैराग्य

भजु रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना ॥

नील कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥

श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो । हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो । नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें रखो ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 56.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 828

बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर ॥

जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर ॥

मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना । हे भाई! मैं काल (मृत्यु)-के वश हो गया हूँ, मुझे अपना पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 64 श्रीरामचरितमानस पृ. 836 कर्म–प्रारब्ध

चरित राम के सगुन भवानी । तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी ॥

अस बिचारि जे तग्य बिरागी । रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी ॥

हे भवानी! श्रीरामजीकी इन सगुण लीलाओंके विषयमें बुद्धि और वाणीके बलसे तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता । ऐसा विचारकर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही करते हैं ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 74(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 845 ज्ञान–विवेक

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम ॥

भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥

जो जीवोंके द्रोहमें रत है, मोहके वश हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्नमें भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्तकी शान्ति हो सकती है?

लङ्काकाण्ड, दोहा 78 श्रीरामचरितमानस पृ. 850 माया–संसार

किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो ॥

पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो ॥

मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं ॥

संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं ॥

भगवान्ने अमृतके समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे ही बलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया । इसके कारण तुम्हारा यश तीनों लोकोंमें नित्य नया बना रहेगा । जो लोग मेरेसहित तुम्हारी शुभ कीर्तिको परम प्रेमके साथ गायेंगे वे बिना ही परिश्रम इस अपार संसारसागरका पार पा जायँगे ।

लङ्काकाण्ड, छन्द (106 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 886 नाम महिमा

हम देवता परम अधिकारी । स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी ॥

भव प्रबाहँ संतत हम परे । अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥

हम देवता श्रेष्ठ अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्तिको भुलाकर निरन्तर भवसागरके प्रवाह (जन्म-मृत्युके चक्र) में पड़े हैं । अब हे प्रभो! हम आपकी शरणमें आ गये हैं, हमारी रक्षा कीजिये ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 110.6 श्रीरामचरितमानस पृ. 891 शरणागति

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना । चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना ॥

ताते उमा मोच्छ नहिं पायो । दसरथ भेद भगति मन लायो ॥

श्रीरघुनाथजीने पहलेके (जीवित कालके) प्रेमको विचारकर, पिताकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दृढ़ ज्ञान करा दिया । हे उमा! दशरथजीने भेद-भक्तिमें अपना मन लगाया था, इसीसे उन्होंने [कैवल्य] मोक्ष नहीं पाया ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 112.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 894 ज्ञान–विवेक

मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद ॥

कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद ॥

जिनको मुनि ध्यानमें भी नहीं पाते, जिन्हें वेद नेति नेति कहते हैं, वे ही कृपाके समुद्र श्रीरामजी वानरोंके साथ अनेकों प्रकारके विनोद कर रहे हैं ।

लङ्काकाण्ड, दोहा 117(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 900 ज्ञान–विवेक

जौं करनी समुझे प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कलप सत कोरी ॥

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ । दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ॥

[बात भी ठीक ही है, क्योंकि] यदि प्रभु मेरी करनीपर ध्यान दें, तो सौ करोड़ (असंख्य) कल्पोंतक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता । [परन्तु आशा इतनी ही है कि] प्रभु सेवकका अवगुण कभी नहीं मानते । वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभावके हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 1(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 909 शरणागति

बहु रोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥

भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥

लोग बहुत-से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं । ये सब आपके चरणोंके निरादरके फल हैं । जो मनुष्य आपके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागरमें पड़े हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 194(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 925 वैराग्य

अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं ॥

अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें । प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥

जिन्हें आपके चरणकमलोंमें प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलिन (उदास) और दु:खी रहते हैं । और जिन्हें आपकी लीला-कथाका आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 194(क).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 926 ज्ञान–विवेक

करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ॥

सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥

वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरन्तर शुद्ध हृदयसे आपके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदरको समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वीपर विचरते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 194(क).8 श्रीरामचरितमानस पृ. 926 साधना–योग

सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिविध ताप भव भय दावनी ॥

महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥

हे गरुड़जी! सुनिये, यह कथा [सबको] पवित्र करनेवाली है, [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म-मृत्युके भयका नाश करनेवाली है । महाराज श्रीरामचन्द्रजीके कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [निष्कामभावसे] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 15.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 927 वैराग्य

जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥

सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥

और जो मनुष्य सकामभावसे सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं । वे जगत्में देवदुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तकालमें श्रीरघुनाथजीके परमधामको जाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 15.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 927

सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिं भगति गति संपति नई ॥

खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥

इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [क्रमश:] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति (नित्य नये भोग) पाते हैं । हे पक्षिराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धिकी पहुँचके अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [जन्म-मरणके] भय और दुःखको हरनेवाली है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 15.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 927

बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहँ सुंदर तरनी ॥

नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥

यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदीके [पार करनेके] लिये सुन्दर नाव है । अवधपुरीमें नित नये मङ्गलोत्सव होते हैं । सभी वर्गोंके लोग हर्षित रहते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 15.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 927 वैराग्य

चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥

राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥

धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है । पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 21.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 933 धर्म–आचरण
श्रीराम की महिमा

काल कराल ब्याल खगराजहि । नमत राम अकाम ममता जहि ॥

लोभ मोह मृगजूथ किरातहि । मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥

कालरूपी भयानक सर्पके भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जीको भजो । निष्कामभावसे प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजीको भजो । लोभ-मोहरूपी हरिनोंके समूहके नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरातको भजो । कामदेवरूपी हाथीके लिये सिंहरूप तथा सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीको भजो ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 30.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 941 काम–क्रोध–लोभ–मोह

संसय सोक निबिड़ तम भानुहि । दनुज गहन घन दहन कृसानुहि ॥

जनकसुता समेत रघुबीरहि । कस न भजहु भंजन भव भीरहि ॥

संशय और शोकरूपी घने अन्धकारके नाश करनेवाले श्रीरामरूप सूर्यको भजो । राक्षसरूपी घने वनको जलानेवाले श्रीरामरूप अग्निको भजो । जन्म-मृत्युके भयको नाश करनेवाले श्रीजानकीजीसमेत श्रीरघुवीरको क्यों नहीं भजते?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 30.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 941

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू । सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू ॥

सुलभ सुखद मारग यह भाई । भगति मोरि पुरान श्रुति गाई ॥

यदि परलोकमें और यहाँ दोनों जगह सुख चाहते हो, तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हृदयमें दृढ़तासे पकड़ रखो । हे भाई! यह मेरी भक्तिका मार्ग सुलभ और सुखदायक है, पुराणों और वेदोंने इसे गाया है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 45.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 954

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा । जोग न मख जप तप उपवासा ॥

सरल सुभाव न मन कुटिलाई । जथा लाभ संतोष सदाई ॥

कहो तो, भक्तिमार्गमें कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योगकी आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवासकी! [यहाँ इतना ही आवश्यक है कि] सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसीमें सदा सन्तोष रखे ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 46.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 954

मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह ॥

ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह ॥

जो मेरे गुणसमूहोंके और मेरे नामके परायण है, एवं ममता, मद और मोहसे रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो [परमात्मारूप] परमानन्दराशिको प्राप्त है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 46 श्रीरामचरितमानस पृ. 955

आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥

तव पद पंकज प्रीति निरंतर । सब साधन कर यह फल सुंदर ॥

[तथा] हे प्रभो! अनेक तन्त्र, वेद और पुराणोंके पढ़ने और सुननेका सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनोंका भी यही एक सुन्दर फल है कि आपके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रेम हो ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 49.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 957

छूटइ मल कि मलाहि के धोएँ । घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ ॥

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई । अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥

मैलसे धोनेसे क्या मैल छूटता है? जलके मथनेसे क्या कोई घी पा सकता है? [उसी प्रकार] हे रघुनाथजी! प्रेम-भक्तिरूपी [निर्मल] जलके बिना अन्तःकरणका मल कभी नहीं जाता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 49.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 957

भव सागर चह पार जो पावा । राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा ॥

बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा । श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा ॥

जो संसाररूपी सागरका पार पाना चाहता है, उसके लिये तो श्रीरामजीकी कथा दृढ़ नौकाके समान है । श्रीहरिके गुणसमूह तो विषयी लोगोंके लिये भी कानोंको सुख देनेवाले और मनको आनन्द देनेवाले हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 53.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 961 वैराग्य

धन्य सती पावन मति तोरी । रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी ॥

सुनहु परम पुनीत इतिहासा । जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा ॥

हे सती! तुम धन्य हो; तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त पवित्र है । श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें तुम्हारा कम प्रेम नहीं है (अत्यधिक प्रेम है) । अब वह परम पवित्र इतिहास सुनो, जिसे सुननेसे सारे लोकके भ्रमका नाश हो जाता है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 55.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 963 ज्ञान–विवेक
सत्सङ्ग और अनन्य प्रेम

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग ॥

मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग ॥

सत्संगके बिना हरिकी कथा सुननेको नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोहके गये बिना श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 61 श्रीरामचरितमानस पृ. 968 सत्सङ्ग–सन्त महिमा

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा । किएँ जोग तप ग्यान बिरागा ॥

उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥

बिना प्रेमके केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादिके करनेसे श्रीरघुनाथजी नहीं मिलते । [अतएव तुम सत्संगके लिये वहाँ जाओ जहाँ] उत्तर दिशामें एक सुन्दर नील पर्वत है । वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 62(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 968 ज्ञान–विवेक
भक्तों हेतु अवतार

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप ॥

किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥

भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके-से अनेकों परम पावन चरित्र किये ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 72(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 977 लीला–रहस्य

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥

हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित ब्याप तेहि बिद्या ॥

हे पक्षिराज! इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता । श्रीहरिके सेवकको अविद्या नहीं व्यापती । प्रभुकी प्रेरणासे उसे विद्या व्यापती है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 79(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 984 ज्ञान–विवेक

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे । लवन बिना बहु बिंजन जैसे ॥

भजन हीन सुख कवने काजा । अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥

जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू । मो पर करहु कृपा अरु नेहू ॥

मन भावत बर मागउँ स्वामी । तुम्ह उदार उर अंतरजामी ॥

भक्तिसे रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फीके) हैं जैसे नमकके बिना बहुत प्रकारके भोजनके पदार्थ । भजनसे रहित सुख किस कामके? हे पक्षिराज! ऐसा विचारकर मैं बोला, हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझपर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मैं अपना मन भाया वर माँगता हूँ । आप उदार हैं और हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 84(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 988

भगति हीन बिरंचि किन होई । सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई ॥

भगतिवंत अति नीचउ प्रानी । मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी ॥

भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवोंके समान ही प्रिय है । परन्तु भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है, यह मेरी घोषणा है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 86.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 990

पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ ॥

सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ ॥

वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभावसे मुझे भजता है वही मुझे परम प्रिय है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 87(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 991

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा । बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा ॥

राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ॥

जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥

प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥

हे पक्षिराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ । [वह यह है कि] भगवान्के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते । हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीकी कृपा बिना श्रीरामजीकी प्रभुता नहीं जानी जाती, प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 89(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 993

जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥

प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥

प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 89(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 993 ज्ञान–विवेक

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा । परस कि होइ बिहीन समीरा ॥

कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा । बिनु हरि भजन न भव भय नासा ॥

निज-सुख (आत्मानन्द) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है? वायु-तत्त्वके बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वासके बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जन्म-मृत्युके भयका नाश नहीं होता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 90(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 994

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ॥

राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥

बिना विश्वासके भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते (ढरते) नहीं और श्रीरामजीकी कृपाके बिना जीव स्वप्नमें भी शान्ति नहीं पाता ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 90(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 994 ज्ञान–विवेक शरणागति

अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल ॥

भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥

हे धीरबुद्धि! ऐसा विचारकर सम्पूर्ण कुतर्कों और सन्देहोंको छोड़कर करुणाकी खान सुन्दर और सुख देनेवाले श्रीरघुवीरका भजन कीजिये ।

उत्तरकाण्ड, सोरठा 90(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 994

भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन ॥

तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन ॥

सुखके भण्डार, करुणाधाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं । [अतएव] ममता, मद और मानको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजीका ही भजन करना चाहिये ।

उत्तरकाण्ड, सोरठा 92(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 997 वैराग्य

जप तप मख सम दम ब्रत दाना । बिरति बिबेक जोग बिग्याना ॥

सब कर फल रघुपति पद प्रेमा । तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा ॥

अनेक जप, तप, यज्ञ, शम (मनको रोकना), दम (इन्द्रियोंको रोकना), व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सबका फल श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होना है । इसके बिना कोई कल्याण नहीं पा सकता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 95(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 999 साधना–योग

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा । मन क्रम बचन राम पद नेहा ॥

सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा । जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा ॥

जीवके लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो । वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीरको पाकर श्रीरघुवीरका भजन किया जाय ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 96(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1000

श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक ॥

तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥

वेदसम्मत तथा वैराग्य और ज्ञानसे युक्त जो हरिभक्तिका मार्ग है, मोहवश मनुष्य उसपर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथोंकी कल्पना करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 100(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1005 ज्ञान–विवेक

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार ॥

गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥

हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये, कलिकाल पाप और अवगुणोंका घर है । किन्तु कलियुगमें एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबन्धनसे छुटकारा मिल जाता है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 102(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1007 लीला–रहस्य
नाम सङ्कीर्तन की महिमा

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग ॥

जो गति होड़ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥

सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें जो गति पूजा, यज्ञ और योगसे प्राप्त होती है, वही गति कलियुगमें लोग केवल भगवान्के नामसे पा जाते हैं ।

गरुड़जी को सम्बोधित करते हुए कलिकाल के गुणों का वर्णन।

उत्तरकाण्ड, दोहा 102(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1007 नाम महिमा
नाम सङ्कीर्तन की महिमा

द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥

द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके मनुष्य संसारसे तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है । और कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 103(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1007 नाम महिमा साधना–योग
नाम सङ्कीर्तन की महिमा

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना । एक अधार राम गुन गाना ॥

सब भरोस तजि जो भज रामहि । प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥

कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥

कलियुगमें न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है । श्रीरामजीका गुणगान ही एकमात्र आधार है । अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजीको भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहोंको गाता है, वही भवसागरसे तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । नामका प्रताप कलियुगमें प्रत्यक्ष है । कलियुगका एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर [मानसिक] पाप नहीं होते ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 103(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1007 नाम महिमा

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ॥

गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥

यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुगके समान दूसरा युग नहीं है । [क्योंकि] इस युगमें श्रीरामजीके निर्मल गुणसमूहोंको गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार [रूपी समुद्र] से तर जाता है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 103(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1008 नाम महिमा

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ॥

भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥

श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिके भजन बिना नहीं जाते । मनमें ऐसा विचारकर, सब कामनाओंको छोड़कर (निष्कामभावसे) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 104(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1009 वैराग्य

पावन जस कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥

लाभु कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना ॥

बिना पुण्यके क्या पवित्र यश [प्राप्त] हो सकता है? बिना पापके भी क्या कोई अपयश पा सकता है? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते हैं उस हरि-भक्तिके समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 112(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1021 ज्ञान–विवेक
भजन का महत्व

हानि कि जग एहि सम किछु भाई । भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥

अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥

हे भाई! जगत्में क्या इसके समान दूसरी भी कोई हानि है कि मनुष्यका शरीर पाकर भी श्रीरामजीका भजन न किया जाय? चुगलखोरीके समान क्या कोई दूसरा पाप है? और हे गरुड़जी! दयाके समान क्या कोई दूसरा धर्म है?

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 112(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 1021 धर्म–आचरण

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ॥

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! जो श्रीरामजीके चरणोंके प्रेमी हैं और काम, अभिमान तथा क्रोधसे रहित हैं, वे जगत्‌को अपने प्रभुसे भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें?

उत्तरकाण्ड, दोहा 112(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1022 ज्ञान–विवेक

जे असि भगति जानि परिहरहीं । केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥

ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी । खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥

जो भक्तिकी ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञानके लिये श्रम (साधन) करते हैं, वे मूर्ख घरपर खड़ी हुई कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये मदारके पेड़को खोजते फिरते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 115(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1025 ज्ञान–विवेक

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई । जे सुख चाहहिं आन उपाई ॥

ते सठ महासिंधु बिनु तरनी । पैरि पार चाहहिं जड़ करनी ॥

हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर दूसरे उपायोंसे सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड़ करनीवाले (अभागे) बिना ही जहाजके तैरकर महासमुद्रके पार जाना चाहते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 115(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1025 ज्ञान–विवेक

भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥

नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥

भक्ति और ज्ञानमें कुछ भी भेद नहीं है । दोनों ही संसारसे उत्पन्न क्लेशोंको हर लेते हैं । हे नाथ! मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं । हे पक्षिश्रेष्ठ! उसे सावधान होकर सुनिये ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 115(क).7 श्रीरामचरितमानस पृ. 1026 ज्ञान–विवेक

भगतिहि सानुकूल रघुराया । ताते तेहि डरपति अति माया ॥

राम भगति निरुपम निरुपाधी । बस जासु उर सदा अबाधी ॥

तेहि बिलोकि माया सकुचाई । करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥

अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी । जाचहिं भगति सकल सुख खानी ॥

श्रीरघुनाथजी भक्तिके विशेष अनुकूल रहते हैं । इसीसे माया उससे अत्यन्त डरती रहती है । जिसके हृदयमें उपमारहित और उपाधिरहित (विशुद्ध) रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा (रोक-टोक) के बसती है, उसे देखकर माया सकुचा जाती है । उसपर वह अपनी प्रभुता कुछ भी नहीं कर (चला) सकती । ऐसा विचारकर ही जो विज्ञानी मुनि हैं, वे भी सब सुखोंकी खानि भक्तिकी ही याचना करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 116(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1027

तेहि बिलोकि माया सकुचाई । करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥

अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी । जाचहिं भगति सकल सुख खानी ॥

उसे देखकर माया सकुचा जाती है । उसपर वह अपनी प्रभुता कुछ भी नहीं कर (चला) सकती । ऐसा विचारकर ही जो विज्ञानी मुनि हैं, वे भी सब सुखोंकी खानि भक्तिकी ही याचना करते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 116(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1027

अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥

भगति करत बिनु जतन प्रयासा । संसृति मूल अबिद्या नासा ॥

भोजन करिअ तृपिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥

असि हरि भगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥

ऐसा विचारकर बुद्धिमान् हरिभक्त भक्तिपर लुभाये रहकर मुक्तिका तिरस्कार कर देते हैं । भक्ति करनेसे संसृति (जन्म-मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना ही यत्न और परिश्रमके (अपने-आप) वैसे ही नष्ट हो जाती है, जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्तिके लिये और उस भोजनको जठराग्नि अपने-आप (बिना हमारी चेष्टाके) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 119(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1032 वैराग्य

भोजन करिअ तृपिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥

असि हरि भगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥

जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्तिके लिये और उस भोजनको जठराग्नि अपने-आप (बिना हमारी चेष्टाके) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 119(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 1032

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि ॥

भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ॥

हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! मैं सेवक हूँ और भगवान् मेरे सेव्य (स्वामी) हैं, इस भावके बिना संसाररूपी समुद्रसे तरना नहीं हो सकता । ऐसा सिद्धान्त विचारकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंका भजन कीजिये ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 119(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1032 ज्ञान–विवेक
भक्ति की महिमा

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई । हारहिं सकल सलभ समुदाई ॥

खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसइ भगति जाके उर माहीं ॥

[उसके प्रकाशसे] अविद्याका प्रबल अन्धकार मिट जाता है । मदादि पतंगोंका सारा समूह हार जाता है । जिसके हृदयमें भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को रामभक्तिरूपी मणि की महिमा बताते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 120(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1033 काम–क्रोध–लोभ–मोह

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि ॥

जय पाइअ सो हरि भगति देख खगेस बिचारि ॥

वैराग्यरूपी ढालसे अपनेको बचाते हुए और ज्ञानरूपी तलवारसे मद, लोभ और मोहरूपी वैरियोंको मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज! इसे विचारकर देखिये ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 120(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1034 वैराग्य

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा । जौं एहि भाँति बनै संजोगा ॥

सदगुर बैद बचन बिस्वासा । संजम यह न बिषय कै आसा ॥

यदि श्रीरामजीकी कृपासे इस प्रकारका संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जायँ । सद्गुरुरूपी वैद्यके वचनमें विश्वास हो । विषयोंकी आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 122(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1038 शरणागति

रघुपति भगति सजीवन मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं । नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥

श्रीरघुनाथजीकी भक्ति संजीवनी जड़ी है । श्रद्धासे पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवाके साथ लिया जानेवाला मधु आदि) है । इस प्रकारका संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं जाते ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 122(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1038 शरणागति

बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ॥

बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥

जलको मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [को पेरने] से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरिके भजन बिना संसाररूपी समुद्रसे नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 122(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1039 शरणागति

श्लोक- विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे ॥

हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥

मैं आपसे भलीभाँति निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ — मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्रीहरिका भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागरको [सहज ही] पार कर जाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 122(ग) श्रीरामचरितमानस पृ. 1040 शरणागति

जहँ लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी ॥

सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपाँ काहूँ एक पाई ॥

जहाँतक वेदोंने साधन बतलाये हैं, हे भवानी! उन सबका फल श्रीहरिकी भक्ति ही है । किन्तु श्रुतियोंमें गायी हुई वह श्रीरघुनाथजीकी भक्ति श्रीरामजीकी कृपासे किसी एक (विरले) ने ही पायी है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 126.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1043

एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना । रघुपति भगति केर पंथाना ॥

अति हरि कृपा जाहि पर होई । पाउँ देइ एहिं मारग सोई ॥

इसमें सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो श्रीरघुनाथजीकी भक्तिको प्राप्त करनेके मार्ग हैं । जिसपर श्रीहरिकी अत्यन्त कृपा होती है, वही इस मार्गपर पैर रखता है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 129.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1046
राम-स्मरण की महिमा

एहिं कलिकाल न साधन दूजा । जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा ॥

रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि । संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि ॥

[तुलसीदासजी कहते हैं—] इस कलिकालमें योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है । बस, श्रीरामजीका ही स्मरण करना, श्रीरामजीका ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजीके ही गुणसमूहोंको सुनना चाहिये ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 130(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1047 नाम महिमा

जासु पतित पावन बड़ बाना । गावहिं कबि श्रुति संत पुराना ॥

ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई । राम भजें गति केहिं नहिं पाई ॥

पतितोंको पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है — ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं — रे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हींको भज । श्रीरामको भजनेसे किसने परम गति नहीं पायी?

उत्तरकाण्ड, चौपाई 130(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1047 शरणागति