श्रीगणेशाय नमः।
श्रीरामचरितमानस
वैराग्य
अनासक्ति और संसार की नश्वरता
86 पद्य
श्रीरामचरितमानस
उपजहिं एक संग जग माहीं । जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ॥
सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू ॥
दोनों (संत और असंत) जगत्में एक साथ पैदा होते हैं; पर [एक साथ पैदा होनेवाले] कमल और जोंककी तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं । (कमल दर्शन और स्पर्शसे सुख देता है, किन्तु जोंक शरीरका स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है ।) साधु अमृतके समान (मृत्युरूपी संसारसे उबारनेवाला) और असाधु मदिराके समान (मोह,प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करनेवाला) है, दोनोंको उत्पन्न करनेवाला जगद्रूपी अगाध समुद्र एक ही है । [शास्त्रोंमें समुद्रमन्थनसे ही अमृत और मदिरा दोनोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है] ।
अस बिबेक जब देइ बिधाता । तब तजि दोष गुनहिं मनु राता ॥
काल सुभाउ करम बरिआईं । भलेउ प्रकृति बस चुकड़ भलाई ॥
विधाता जब इस प्रकारका (हंसका-सा) विवेक देते हैं, तब दोषोंको छोड़कर मन गुणोंमें अनुरक्त होता है । काल-स्वभाव और कर्मकी प्रबलतासे भले लोग (साधु) भी मायाके वशमें होकर कभी-कभी भलाईसे चूक जाते हैं ।
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं । पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं ॥
भै अति प्रेम बिकल महतारी । धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी ॥
[फिर बोलीं कि] विधाताने जगत्में स्त्रीजातिको क्यों पैदा किया? पराधीनको सपने में भी सुख नहीं मिलता । यों कहती हुई माता प्रेममें अत्यन्त विकल हो गयी, परन्तु कुसमय जानकर (दुःख करनेका अवसर न जानकर) उन्होंने धीरज धरा ।
पार्वतीजी की विदाई के समय माता मैनाजी ने विलाप करते हुए यह कहा।
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं । ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं ॥
तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला । नित नूतन सुंदर सब काला ॥
जो भगवान् विष्णु और महादेवजीसे विमुख हैं और जिनकी धर्ममें प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्नमें भी वहाँ नहीं जा सकते उस पर्वतपर एक विशाल बरगदका पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल (छहों ऋतुओं) में सुन्दर रहता है ।
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें । ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें ॥
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा । तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा ॥
हे मुनि! सुनिये, मोह तो उसके मनमें होता है जिसके हृदयमें ज्ञान-वैराग्य नहीं है । आप तो ब्रह्मचर्यव्रतमें तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं । भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है?
भगवान् ने नारदजी से कहा।
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन ॥
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु ॥
घरमें रहते बुढ़ापा आ गया, परन्तु विषयोंसे वैराग्य नहीं होता; [इस बातको सोचकर] उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीहरिकी भक्ति बिना जन्म यों ही चला गया ।
स्वायम्भुव मनुजी ने घर में रहते बुढ़ापा आने पर विषयों से वैराग्य न होने और हरि भक्ति के बिना जन्म बीत जाने पर दुःख व्यक्त किया।
जे सुनि सादर नर बड़भागी । भव तरिहहिं ममता मद त्यागी ॥
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया । सोउ अवतरिहि मोरि यह माया ॥
जिन (चरित्रों) को बड़े भाग्यशाली मनुष्य आदरसहित सुनकर, ममता और मद त्यागकर, भवसागरसे तर जायँगे । आदिशक्ति यह मेरी [स्वरूपभूता] माया भी, जिसने जगत्को उत्पन्न किया है, अवतार लेगी ।
तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें । परम अकिंचन प्रिय हरि केरें ॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा । होत बिरंचि सिवहि संदेहा ॥
इसीसे तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिञ्चन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान्को प्रिय होते हैं । आप-सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनोंको देखकर ब्रह्मा और शिवजीको भी सन्देह हो जाता है [कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी] ।
कपट-तपस्वी ने राजा से कहा कि वह निर्धन और घर-द्वारहीन है।
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा ॥
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा ॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना ॥
तेहि बहुबिधि त्रास देस निकासइ जो कह बेद पुराना ॥
जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञमें [देवताओंके] भाग पानेकी बात रावण कहीं कानोंसे सुन पाता, तो [उसी समय] स्वयं उठ दौड़ता । कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था । संसारमें ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानोंमें भी सुननेमें नहीं आता था; जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरहसे त्रास देता और देशसे निकाल देता था ।
अग जगमय सब रहित बिरागी । प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ॥
मोर बचन सब के मन माना । साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥
वे चराचरमय (चराचरमें व्याप्त) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है); वे प्रेमसे प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि । (अग्नि अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिये अरणिमन्थनादि साधन किये जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है । इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान् भी प्रेमसे प्रकट होते हैं ।) मेरी बात सबको प्रिय लगी । ब्रह्माजीने ‘साधु, साधु’ कहकर बड़ाई की ।
शिवजी ने पार्वतीजी को देवताओं की सभा में कही अपनी बात सुनायी।
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई । मन मोदकन्हि कि भूख बुताई ॥
सिख हमारि सुनि परम पुनीता । जगदंबा जानहु जियँ सीता ॥
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी । भरि लोचन छबि लेहु निहारी ॥
सुंदर सुखद सकल गुन रासी । ए दोउ बंधु संभु उर बासी ॥
गाल बजाकर व्यर्थ ही मत मरो । मनके लड्डुओंसे भी कहीं भूख बुझती है? हमारी परम पवित्र (निष्कपट) सीखको सुनकर सीताजीको अपने जीमें साक्षात् जगज्जननी समझो (उन्हें पत्नीरूपमें पानेकी आशा एवं लालसा छोड़ दो), और श्रीरघुनाथजीको जगत्का पिता (परमेश्वर) विचारकर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो [ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा] । सुन्दर, सुख देनेवाले और समस्त गुणोंकी राशि ये दोनों भाई शिवजीके हृदयमें बसनेवाले हैं (स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदयमें छिपाये रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रोंके सामने आ गये हैं)
श्रीराम के दर्शन से विवेकी राजाओं ने अन्य राजाओं को समझाते हुए कहा।
सब नृप भए जोगु उपहासी । जैसें बिनु बिराग संन्यासी ॥
कीरति बिजय बीरता भारी । चले चाप कर बरबस हारी ॥
सब राजा उपहासके योग्य हो गये । जैसे वैराग्यके बिना संन्यासी उपहासके योग्य हो जाता है । कीर्ति, विजय, बड़ी वीरता — इन सबको वे धनुषके हाथों बरबस हारकर चले गये ।
सुन बोले गुर अति सुखु पाई । पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई ॥
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं । जद्यपि ताहि कामना नाहीं ॥
सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले — पुण्यात्मा पुरुषके लिये पृथ्वी सुखोंसे छायी हुई है । जैसे नदियाँ समुद्रमें जाती हैं, यद्यपि समुद्रको नदीकी कामना नहीं होती ।
राजा ने वसिष्ठजी को सारी कथा सुना दी तब गुरु बोले।
बिमल बंस यहु अनुचित एकू । बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू ॥
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई । हरउ भगत मन कै कुटिलाई ॥
पर इस निर्मल वंशमें यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयोंको छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़ेका ही (मेरा ही) होता है । [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका यह सुन्दर प्रेमपूर्ण पछतावा भक्तोंके मनकी कुटिलताको हरण करे ।
नैहर जनम भरब बरु जाई । जिअत न करबि सवति सेवकाई ॥
अरि बस दैउ जिआवत जाही । मरनु नीक तेहि जीवन चाही ॥
मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौतकी चाकरी नहीं करूँगी । दैव जिसको शत्रुके वशमें रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मरना ही अच्छा है ।
जिऐ मीन बरु बारि बिहीना । मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना ॥
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥
मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुखी होकर जीता रहे । परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [जरा भी] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है ।
राजा दशरथ ने कैकेयी से कहा।
जौं हठ करहु प्रेम बस बामा । तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा ॥
काननु कठिन भयंकरु भारी । घोर घामु हिम बारि बयारी ॥
हे वामा! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाममें दुःख पाओगी । वन बड़ा कठिन (क्लेशदायक) और भयानक है । वहाँकी धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं ।
धरनि धामु धनु पुर परिवारू । सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू ॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं । मोह मूल परमारथु नाहीं ॥
धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है । परमार्थतः ये नहीं हैं ।
सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ ॥
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥
जैसे स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपञ्चको हृदयसे देखना चाहिये ।
करमबचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार ॥
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार ॥
जबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्नमें भी वह सुख नहीं पाता ।
मुनि भरद्वाजजी ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा।
बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी । लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी ॥
एकन्ह एक बोलि सिख देहीं । लोचन लाहु लेहु छन एहीं ॥
उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती । मानो दरिद्रोंने चिन्तामणिकी ढेरी पा ली हो । वे एक-एकको पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रोंका लाभ ले लो ।
काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया । तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥
जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; न राग है, न द्वेष है; और न कपट, दम्भ और माया ही है-हे रघुराज! आप उनके हृदयमें निवास कीजिये ।
जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई । प्रिय परिवार सदन सुखदाई ॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई । तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई ॥
जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर — सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदयमें धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदयमें रहिये ।
सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु ॥
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु ॥
जिन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करनेसे ही भक्तजन तमाम भोग-विलासको तिनकेके समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीकी प्रिय पत्नी और जगत्की माता सीताजीके लिये यह [भोग-विलासका त्याग] कुछ भी आश्चर्य नहीं है ।
हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु ॥
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु ॥
प्रियतम (श्रीरामजी) रूपी जलके बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूँ कि विधाताने मुझे यह ‘यातनाशरीर’ ही दिया है [जो पापी जीवोंको नरक भोगनेके लिये मिलता है] ।
सुमन्त्र मार्ग में पछतावा करते हुए यह विचार कर रहे थे।
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू । कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥
जनि मानहु हियँ हानि गलानी । काल करम गति अघटित जानी ॥
हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज धरो । बुरा समय जानकर शोक त्याग दो । काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हृदयमें हानि और ग्लानि मत मानो ।
माता कौसल्या ने भरतजी को गोद में बैठाकर और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोले।
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ ॥
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥
मुनिनाथने विलखकर (दुखी होकर) कहा — हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान् है । हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं ।
मुनिनाथ ने भरत से कहा।
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग ॥
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥
उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्गका त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है ।
सरुज सरीर बादि बहु भोगा । बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥
जायँ जीव बिनु देह सुहाई । बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥
रोगी शरीरके लिये नाना प्रकारके भोग व्यर्थ हैं । श्रीहरिकी भक्तिके बिना जप और योग व्यर्थ हैं । जीवके बिना सुन्दर देह व्यर्थ है । वैसे ही श्रीरघुनाथजीके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है ।
संपति सब रघुपति कै आही । जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही ॥
तौ परिनाम न मोरि भलाई । पाप सिरोमनि साइँ दोहाई ॥
सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीकी है । यदि उसकी [रक्षाकी] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाममें मेरी भलाई नहीं है । क्योंकि स्वामीका द्रोह सब पापोंमें शिरोमणि (श्रेष्ठ) है ।
भरतजी ने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी की है।
साधु समाज न जाकर लेखा । राम भगत महुँ जासु न रेखा ॥
जायँ जिअत जग सो महिभारू । जननी जौबन बिटप कुठारू ॥
साधुओंके समाजमें जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजीके भक्तोंमें जिसका स्थान नहीं, वह जगत्में पृथ्वीका भार होकर व्यर्थ ही जीता है । वह माताके यौवनरूपी वृक्षके काटनेके लिये कुल्हाड़ामात्र है ।
निषादराज ने श्रीरामजी के लिए प्राणसमर्पण का निश्चय करके यह कहा।
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी । कबिकुल अगम करम मन बानी ॥
परम पेम पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥
मिलनकी प्रीति कैसे बखानी जाय? वह तो कविकुलके लिये कर्म, मन, वाणी तीनोंसे अगम है । दोनों भाई (भरतजी और श्रीरामजी) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारको भुलाकर परम प्रेमसे पूर्ण हो रहे हैं ।
बोरति ग्यान बिराग करारे । बचन ससोक मिलत नद नारे ॥
सोच उसास समीर तरंगा । धीरज तट तरुबर कर भंगा ॥
यह करुणाकी नदी [इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती है । शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें (आहें) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरङ्गे हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम वृक्षोंको तोड़ रही हैं ।
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से । ग्यान अनल मन कसें कनक से ॥
जे बिरंचि निरलेप उपाए । पदुम पत्र जिमि जग जल जाए ॥
मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी-सरीखे धीरधुरन्धर जो अपने मनोंको ज्ञानरूपी अग्निमें सोनेके समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजीने निर्लेप ही रचा और जो जगत्रूपी जलमें कमलके पत्तेकी तरह ही (जगत् में रहते हुए भी जगत्से अनासक्त) पैदा हुए … ।
मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी श्रीरामजी और भरतजी के अपार प्रेम को देखकर वैराग्य और विवेकसहित उस प्रेम में मग्न हो गए।
सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर ॥
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसमेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण करके शोभित हो रहे हों ।
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई । घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई ॥
नित नव राम प्रेम पनु पीना । बढ़त धरम दलु मनु न मलीना ॥
भरतजीका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है । तेज (अन्न, घृत आदिसे उत्पन्न होनेवाला मेद) घट रहा है । बल और मुखछबि (मुखकी कान्ति अथवा शोभा) वैसी ही बनी हुई है । रामप्रेमका प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्मका दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है (अर्थात् प्रसन्न है)
भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं ॥
सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति ॥
तुलसीदासजी कहते हैं — जो कोई भरतजीके चरित्रको नियमसे आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम होगा और सांसारिक विषय-रससे वैराग्य होगा ।
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति ॥
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति ॥
हे पार्वती! श्रीरामजीके गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं । परन्तु जो भगवान्से विमुख हैं और जिनका धर्ममें प्रेम नहीं है, वे महामूढ़ [उन्हें सुनकर] मोहको प्राप्त होते हैं ।
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप ॥
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर ॥
यह कठिन कलिकाल पापोंका खजाना है; इसमें न धर्म है, न ज्ञान है और न योग तथा जप ही है । इसमें तो जो लोग सब भरोसोंको छोड़कर श्रीरामजीको ही भजते हैं, वे ही चतुर हैं ।
अबिरल भगति बिरति सतसंगा । चरन सरोरुह प्रीति अभंगा ॥
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता । अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता ॥
अस तव रूप बखानउँ जानउँ । फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ ॥
संतत दासन्ह देहु बड़ाई । तातें मोहि पूँछेहु रघुराई ॥
मुझे प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग और आपके चरणकमलोंमें अटूट प्रेम प्राप्त हो । यद्यपि आप अखण्ड और अनन्त ब्रह्म हैं, जो अनुभवसे ही जाननेमें आते हैं और जिनका संतजन भजन करते हैं, यद्यपि मैं आपके ऐसे रूपको जानता हूँ और उसका वर्णन भी करता हूँ तो भी लौट-लौटकर मैं सगुण ब्रह्ममें (आपके इस सुन्दर स्वरूपमें) ही प्रेम मानता हूँ । आप सेवकोंको सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसीसे हे रघुनाथजी! आपने मुझसे पूछा है ।
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं । देख ब्रह्म समान सब माहीं ॥
कहिअ तात सो परम बिरागी । तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी ॥
ज्ञान वह है जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी [दोष] नहीं है और जो सबमें समानरूपसे ब्रह्मको देखता है । हे तात! उसीको परम वैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियोंको और तीनों गुणोंको तिनकेके समान त्याग चुका हो ।
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा । तब मम धर्म उपज अनुरागा ॥
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं । मम लीला रति अति मन माहीं ॥
इसका फल, फिर विषयोंसे वैराग्य होगा । तब (वैराग्य होनेपर) मेरे धर्म (भागवतधर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा । तब श्रवण आदि नौ प्रकारकी भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मनमें मेरी लीलाओंके प्रति अत्यन्त प्रेम होगा ।
सुनहु उमा ते लोग अभागी । हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई । चले बिलोकत बन बहुताई ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! सुनो, वे लोग अभागे हैं जो भगवान्को छोड़कर विषयोंसे अनुराग करते हैं । फिर दोनों भाई सीताजीको खोजते हुए आगे चले । वे वनकी सघनता देखते जाते हैं ।
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे ॥
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे ॥
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ॥
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू ॥
सब कथा कहकर भगवान्के मुखके दर्शन कर, हृदयमें उनके चरणकमलोंको धारण कर लिया और योगाग्निसे देहको त्यागकर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरिपदमें लीन हो गयी, जहाँसे लौटना नहीं होता । तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकारके कर्म, अधर्म और बहुत-से मत — ये सब शोकप्रद हैं; हे मनुष्यो! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम करो ।
गुनातीत सचराचर स्वामी । राम उमा सब अंतरजामी ॥
कामिन्ह कै दीनता देखाई । धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजी गुणातीत (तीनों गुणोंसे परे), चराचर जगत्के स्वामी और सबके अन्तरकी जाननेवाले हैं । [उपर्युक्त बातें कहकर] उन्होंने कामी लोगोंकी दीनता (बेबसी) दिखलायी है और धीर (विवेकी) पुरुषोंके मनमें वैराग्यको दृढ़ किया है ।
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा । पंपा नाम सुभग गंभीरा ॥
हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ — हरिका भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न [की भाँति झूठा] है । फिर प्रभु श्रीरामजी पंपा नामक सुन्दर और गहरे सरोवरके तीरपर गये ।
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना । बोध जथारथ बेद पुराना ॥
दंभ मान मद करहिं न काऊ । भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ॥
तथा वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान (परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) और वेद-पुराणका यथार्थ ज्ञान रहता है । वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते ।
उपजा ग्यान बचन तब बोला । नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला ॥
सुख संपति परिवार बड़ाई । सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ॥
जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा मन स्थिर हो गया । सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़प्पन) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा ।
श्रीरामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गई और वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे।
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा । जिमि लोभहि सोषइ संतोषा ॥
सरिता सर निर्मल जल सोहा । संत हृदय जस गत मद मोहा ॥
अगस्त्यके तारेने उदय होकर मार्गके जलको सोख लिया, जैसे सन्तोष लोभको सोख लेता है । नदियों और तालाबोंका निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोहसे रहित संतोंका हृदय!
तजि माया सेइअ परलोका । मिटहिं सकल भवसंभव सोका ॥
देह धरे कर यह फलु भाई । भजिअ राम सब काम बिहाई ॥
माया (विषयोंकी ममता-आसक्ति) को छोड़कर परलोकका सेवन (भगवान्के दिव्य धामकी प्राप्तिके लिये भगवत्सेवारूप साधन) करना चाहिये, जिससे भव (जन्म-मरण) से उत्पन्न सारे शोक मिट जायँ । हे भाई! देह धारण करनेका यही फल है कि सब कामों (कामनाओं) को छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही किया जाय ।
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही । लागी दया देखि करि मोही ॥
बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा । देहजनित अभिमान छड़ावा ॥
वहाँ चन्द्रमा नामके एक मुनि थे । मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी । उन्होंने बहुत प्रकारसे मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित (देहसम्बन्धी) अभिमानको छुड़ा दिया ।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई । काहि कहौं यह जान न कोई ॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा । जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥
मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है । पर कहूँ किससे? यह दु: ख कोई जानता नहीं । हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है ।
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान ॥
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥
मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ।
तजि मद मोह कपट छल नाना । करउँ सद्य तेहि साधु समाना ॥
जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ॥
सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥
और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ । माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार, इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है ।
सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥
इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है ।
ममता रत सन ग्यान कहानी । अति लोभी सन बिरति बखानी ॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा । ऊसर बीज बएँ फल जथा ॥
ममतामें फँसे हुए मनुष्यसे ज्ञानकी कथा, अत्यन्त लोभीसे वैराग्यका वर्णन, क्रोधीसे शम (शान्ति) की बात और कामीसे भगवान्की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसरमें बीज बोनेसे होता है (अर्थात् ऊसरमें बीज बोनेकी भाँति यह सब व्यर्थ जाता है)
सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी । भजहु नाथ ममता सब त्यागी ॥
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी । भूप राजु तजि होहिं बिरागी ॥
हे नाथ! आप विषयोंकी सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागतपर प्रेम करनेवाले भगवान्का भजन कीजिये । जिनके लिये श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं ।
परिहरि बयरुबयरु देहुदेहु बैदेही । भजहु कृपानिधि परम सनेही ॥
ताके बचन बान सम लागे । करिआ मुह करि जाहि अभागे ॥
[अत:] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजीको दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजीका भजन करो । रावणको उसके वचन बाणके समान लगे । [वह बोला—] अरे अभागे! मुँह काला करके [यहाँसे] निकल जा ।
सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥
अस बिचारि जियँ जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥
पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार — ये जगत् में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता । हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात! जागो ।
ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥
दान पर बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥
ईश्वरका भजन ही [उस रथको चलानेवाला] चतुर सारथि है । वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है । दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है ।
श्रीरामजी ने विभीषणजी से कहा।
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥
मोर अभाग्य जिआवत ओही । जेहिं ह्रौं हरि पद कमल बिछोही ॥
श्रीरघुनाथजीके बाणोंसे सिर कटनेपर भी नहीं मरता । विधाता सारे चरित्र विपरीत (उलटे) ही कर रहा है । [सच बात तो यह है कि] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान्के चरण-कमलोंसे अलग कर दिया है ।
जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं ॥
जेहि नमत सिवब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ॥
आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं ॥
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥
दैत्यरूपी वनको जलानेके लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरिको तुमने मनुष्य करके जाना । शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान्को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा । तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर तथा पापसमूहमय रहा! इतनेपर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजीने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ ।
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥
भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥
लोग बहुत-से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं । ये सब आपके चरणोंके निरादरके फल हैं । जो मनुष्य आपके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागरमें पड़े हैं ।
नहिं राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥
एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥
उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ; न मान है, न मद । उनको सम्पत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) समान है । इसीसे मुनिलोग योग (साधन) का भरोसा सदाके लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नताके साथ आपके सेवक बन जाते हैं ।
सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिविध ताप भव भय दावनी ॥
महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥
हे गरुड़जी! सुनिये, यह कथा [सबको] पवित्र करनेवाली है, [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म-मृत्युके भयका नाश करनेवाली है । महाराज श्रीरामचन्द्रजीके कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [निष्कामभावसे] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ।
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहँ सुंदर तरनी ॥
नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥
यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदीके [पार करनेके] लिये सुन्दर नाव है । अवधपुरीमें नित नये मङ्गलोत्सव होते हैं । सभी वर्गोंके लोग हर्षित रहते हैं ।
आस त्रास इरिषादि निवारक । बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥
भूप मौलि मनि मंडन धरनी । देहि भगति संसृति सरि तरनी ॥
आप [विषयोंकी] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्यके विस्तार करनेवाले हैं । हे राजाओंके शिरोमणि एवं पृथ्वीके भूषण श्रीरामजी! संसृति (जन्म-मृत्युके प्रवाह)-रूपी नदीके लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये ।
बिषय अलंपट सील गुनाकर । पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ॥
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी । लोभामरष हरष भय त्यागी ॥
संत विषयोंमें लम्पट (लिप्त) नहीं होते, शील और सद्गुणोंकी खान होते हैं । उन्हें पराया दुःख देखकर दुःख और सुख देखकर सुख होता । वे [सबमें, सर्वत्र, सब समय] समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है, वे मदसे रहित और वैराग्यवान् होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भयका त्याग किये हुए रहते हैं ।
बड़ें भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा ॥
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ॥
बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिला है । सब ग्रन्थोंने यही कहा है कि यह शरीर देवताओंको भी दुर्लभ है (कठिनतासे मिलता है) । यह साधनका धाम और मोक्षका दरवाजा है । इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया … ।
श्रीरामचन्द्रजी ने अयोध्यावासियों को उपदेश देते हुए कहा।
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ ॥
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ ॥
वह परलोकमें दुःख पाता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है तथा [अपना दोष न समझकर] कालपर, कर्मपर और ईश्वरपर मिथ्या दोष लगाता है ।
एहि तन कर फल बिषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं । पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥
हे भाई! इस शरीर प्राप्त होनेका फल विषयभोग नहीं है । [इस जगत्के भोगोंकी तो बात ही क्या] स्वर्गका भोग भी बहुत थोड़ा है और अन्तमें दुःख देनेवाला है । अतः जो लोग मनुष्यशरीर पाकर विषयोंमें मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृतको बदलकर विष ले लेते हैं ।
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥
करनधार सदगुर दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥
यह मनुष्यका शरीर भवसागर [से तारने] के लिये बेड़ा (जहाज) है । मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है । सद्गुरु इस मजबूत जहाजके कर्णधार (खेनेवाले) हैं । इस प्रकार दुर्लभ (कठिनतासे मिलनेवाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपासे सहज ही) उसे प्राप्त हो गये हैं … ।
बैर न बिग्रह आस न त्रासा । सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥
अनारंभ अनिकेत अमानी । अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी ॥
न किसीसे वैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे । उसके लिये सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं । जो कोई भी आरम्भ (फलकी इच्छासे कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घरमें ममता नहीं है), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो [भक्ति करनेमें] निपुण और विज्ञानवान् है ।
भव सागर चह पार जो पावा । राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा ॥
बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा । श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा ॥
जो संसाररूपी सागरका पार पाना चाहता है, उसके लिये तो श्रीरामजीकी कथा दृढ़ नौकाके समान है । श्रीहरिके गुणसमूह तो विषयी लोगोंके लिये भी कानोंको सुख देनेवाले और मनको आनन्द देनेवाले हैं ।
श्रवनवंत अस को जग माहीं । जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं ॥
ते जड़ जीव निजात्मक घाती । जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती ॥
जगत्में कानवाला ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजीके चरित्र न सुहाते हों । जिन्हें श्रीरघुनाथजीकी कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्माकी हत्या करनेवाले हैं ।
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी । कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी ॥
धर्मसील कोटिक महँ कोई । बिषय बिमुख बिराग रत होई ॥
हे त्रिपुरारि! सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्मके व्रतका धारण करनेवाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयसे विमुख (विषयोंका त्यागी) और वैराग्यपरायण होता है ।
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई । सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ॥
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ । जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ ॥
श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तोंमें कोई एक ही सम्यक् (यथार्थ) ज्ञानको प्राप्त करता है । और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है । जगत्में कोई विरला ही ऐसा (जीवन्मुक्त) होगा ।
बिनु संतोष न काम नसाहीं । काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं ॥
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ॥
संतोषके बिना कामनाका नाश नहीं होता और कामनाओंके रहते स्वप्नमें भी सुख नहीं हो सकता । और श्रीरामके भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं? बिना धरतीके भी कहीं पेड़ उग सकता है?
भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन ॥
तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन ॥
सुखके भण्डार, करुणाधाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं । [अतएव] ममता, मद और मानको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजीका ही भजन करना चाहिये ।
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ॥
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥
श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिके भजन बिना नहीं जाते । मनमें ऐसा विचारकर, सब कामनाओंको छोड़कर (निष्कामभावसे) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये ।
जोड़ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान ॥
जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥
हे हरिवाहन! मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहिन लेता है ।
ग्यान बिराग जोग बिग्याना । ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥
पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती । अबला अबल सहज जड़ जाती ॥
हे हरिवाहन! सुनिये; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान — ये सब पुरुष हैं; पुरुषका प्रताप सब प्रकारसे प्रबल होता है । अबला (माया) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति (जन्म) से ही जड़ (मूर्ख) होती है ।
पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर ॥
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ॥
परन्तु जो वैराग्यवान् और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्रीको त्याग सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयोंके वशमें हैं (उनके गुलाम हैं) और श्रीरघुवीरके चरणोंसे विमुख हैं ।
अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥
भगति करत बिनु जतन प्रयासा । संसृति मूल अबिद्या नासा ॥
भोजन करिअ तृपिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥
असि हरि भगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥
ऐसा विचारकर बुद्धिमान् हरिभक्त भक्तिपर लुभाये रहकर मुक्तिका तिरस्कार कर देते हैं । भक्ति करनेसे संसृति (जन्म-मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना ही यत्न और परिश्रमके (अपने-आप) वैसे ही नष्ट हो जाती है, जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्तिके लिये और उस भोजनको जठराग्नि अपने-आप (बिना हमारी चेष्टाके) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा?
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि ॥
जय पाइअ सो हरि भगति देख खगेस बिचारि ॥
वैराग्यरूपी ढालसे अपनेको बचाते हुए और ज्ञानरूपी तलवारसे मद, लोभ और मोहरूपी वैरियोंको मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज! इसे विचारकर देखिये ।
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई । जब उर बल बिराग अधिकाई ॥
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई । बिषय आस दुर्बलता गई ॥
हे गोसाईं! मनको नीरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता मिट जाय ।